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आलोक मेहता की किताब के जरिए गंभीर चिंतन संग हुई पुरानी यादें ताजा...
बुधवार की शाम इंदिरागांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के लिए ख़ास थी....
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
राजेश बादलवरिष्ठ पत्रकार।।
बुधवार की शाम इंदिरागांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के लिए ख़ास थी। जाने माने पत्रकार आलोक मेहता की नई किताब 'नमन नर्मदा' का लोकार्पण भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओ.पी. रावत ने किया।
इस मौके पर राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों के चुनिंदा प्रतिनिधि उपस्थित थे । अगर नाम गिनाऊँ तो कड़ी बहुत लंबी हो जाएगी, लेकिन कला केंद्र के सचिव और शिक्षाविद सच्चिदानंद जोशी, इंटरनेशनल मेलोडी फाउंडेशन के डॉक्टर हरीश भल्ला,कला केंद्र के पुस्तकालय निदेशक डॉक्टर रमेश गौर, समाचार4मीडिया के डिप्टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा, पत्रकार सुश्री मानसी की उपस्थिति से कार्यक्रम गरिमापूर्ण हो गया।ज़ाहिर है आलोक जी मेरे वरिष्ठ रहे हैं तो मुझे वहाँ होना ही था ।
किताब के लोकार्पण के बहाने भारत की सबसे पवित्र मानी जाने वाली और मध्यप्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा और उसके इर्द गिर्द पनपी करोड़ों साल पुरानी संस्कृति के बारे में गंभीर और सार्थक चर्चा हो गई।
आलोक मेहता ने उन सभी जिज्ञासाओं का समाधान किया ,जो इस पुस्तक की ज़रूरत को लेकर उठ रही थीं। आलोक जी ख़ुद भी उज्जैन के निवासी हैं और क्षिप्रा तथा नर्मदा नदियों के आंचल में बड़े हुए हैं ।पुस्तक अभी पढ़ने को नहीं मिली लेकिन आलोकजी ने स्पष्ट किया कि नर्मदा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्व स्वीकार किया गया है और इसे अँग्रेज़ी में लिखने से विदेशों में भी नर्मदा की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का नर्मदा पर गहराई से अध्ययन चौंकाने वाला रहा। प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उन्होंने मध्यप्रदेश के नर्मदा घाटी विकास में अलग-अलग भूमिकाओं का निर्वहन किया, मगर नर्मदा घाटी संस्कृति के संरक्षण को लेकर वे अभी भी संवेदनशील हैं। बड़ी बेबाक़ी से उन्होंने माना कि नर्मदा बचाओ आंदोलन ने एक दौर में बड़ी सार्थक भूमिका निभाई। इससे बांधों की डूब में आने वाले किसानों को ज़मीनों का बेहतर मुआवज़ा मिला और अँग्रेज़ों के ज़माने से चले आ रहे क़ानून से मुक्ति मिली, लेकिन बाद में आंदोलन की रचनात्मक भूमिका नहीं रही।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने जब घाटी के किसानों की स्थिति का आकलन किया तो चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। वह यह कि बड़े और संपन्न किसान नर्मदा किनारे अपने संसाधनों से खेती में सिंचाई तो करते थे ,लेकिन छोटे किसान बड़े घाटे में रहते थे । उन्हें भी बड़े किसान पानी देते थे लेकिन बदले में फसल या उपज का बड़ा हिस्सा हड़प लेते थे। इस पर रोक लगी है। उन्होंने नर्मदा के यायावर अमृतलाल वेगड़ को श्रद्धा से याद किया, जिन्होंने नर्मदा की अनेक परिक्रमाएँ कीं और इस प्राचीन संस्कृति के अनेक नए अध्याय खोजे। इसके अलावा अनिल माधव दवे ने भी नर्मदा रहस्यों को उदघाटित करने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
दुर्भाग्य से अब ये दोनों ही इस दुनिया से विदाई ले चुके हैं। उन्होंने नर्मदा को प्रदूषित होने से बचाने और शोधपरक काम करने का आह्वान किया और समाज में पुस्तक और पुस्तकालयों की ज़रूरत को रेखांकित किया। कला केंद्र के सचिव सच्चिदानंद जोशी ने भी नर्मदा की प्राचीनता और इस क्षेत्र के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक प्रतीकों के संरक्षण पर ज़ोर दिया। डॉक्टर रमेश गौर ने पुस्तक पढ़ने और पुस्तकालय संस्कृति के विकास को बढ़ावा देने पर ज़ोर डाला।इस अवसर की कुछ झलकियां निम्न है...
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