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वेब मीडिया अब क्यों नहीं है न्यू मीडिया, बताया BBC हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा ने...
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नोएडा परिसर में...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
विकास सक्सेना ।।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नोएडा परिसर में 24 अगस्त को पत्रकारिता के नवांगतुक छात्रों लिए सत्रारंभ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर वेब जर्नलिज्म ने किस तरह से न्यूज रूम को बदला है इसके बारे में बात करते हुए बीबीसी हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा ने बताया कि वे बीबीसी के न्यूजरूम में पिछले 14 वर्षों से काम कर रहे हैं। उन्होंने बीबीसी में अपनी पत्रकारिता का सफर 2002 के नवंबर में शुरू किया, लेकिन 2003 से 2009 तक बीबीसी के लंदन के न्यूज रूम में रहे और इसके बाद 2009 से अब तक इसके दिल्ली न्यूज रूम से जुड़े हुए हैं। उन्होंने आगे कहा, ‘शुरुआत में बीबीसी की पहचान एक रेडियो के माध्यम से हुई थी, तब रेडियो में इसका बड़ा नाम था। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या की खबर आई तो बीबीसी ने सबसे पहले ब्रेक की और वह शायद इसलिए क्योंकि उस समय वेब पत्रकारिता नहीं हुआ करती थी और तब सिर्फ सरकारी माध्यम हुआ करते थे। जब मैंने जॉइन किया था, तब भी बीबीसी रेडियो बहुत बड़ा नाम था, लेकिन तब वेब पत्रकारिता को न्यू मीडिया कहा जाता था। हालांकि कहा तो अभी भी जाता है, लेकिन अब इसे 14 साल हो गए हैं। इसलिए यह न्यू मीडिया नहीं रह गया है। वेब पत्रकारिता ने पूरा न्यूज रूम बदल दिया है। एक समय न्यूजरूम की शक्ल ये हुआ करती थी कि पहले जो संवाददाता थे, कॉपी लिखते थे और डेस्क पर देकर तसल्ली से घर चले जाते थे, इसके बाद डेस्क के लोग इसे एडिट कर सही खबर बनाकर पब्लिश करते थे। लेकिन अब दौर बदल गया है। वेब पत्रकारिता को अब और मजबूती मिली है। कॉन्टेंट को और वैरायटी मिली है। अब वो ट्रेडिशनल चीजें ही कॉन्टेंट या खबर नहीं रह गई हैं, जो एक समय में समझा जाता था।
फेक न्यूज पर उन्होंने कहा कि फेक न्यूज आज एक बहुत बड़ी चुनौती है और यह इतनी बड़ी हो गई है कि शायद आज हम इसको समझ नहीं पा रहे हैं। बहुत सारी चीजें जो आज वायरल कर दी जाती हैं, उसकी पड़ताल करने का कोई सही जरिया नहीं है। मुझे लगता है कि मीडिया के ज्यादातर सीनियर लोग इससे चिंतित भी हैं। इस पर काम भी हो रहा है। हम लोग आगामी 12 नवंबर को 7 शहरों में फेक न्यूज को लेकर एक कॉन्फ्रेंस भी कर रहें हैं, जिसमें इसकी क्या चुनौतियां हैं उस पर टेक्नोलॉजी कंपनियों से चर्चा करेंगे, फिर चाहे वह फेसबुक हो, गूगल हो या फिर वॉट्सऐप हो।
उन्होंने आगे कहा कि आज की तारीख में फेक न्यूज को फैलाने का सबसे बड़ा जरिया वॉट्सऐप बन गया है। वे लोग (सोशल मीडिया कंपनियां) किस तरह से फेक न्यूज को लेकर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और बतौर पत्रकार हम लोगों के सामने क्या चुनौतियां आ रही हैं, आम लोग इससे कैसे ठगे जाते हैं, इस पर चर्चा करेंगे। क्योंकि कई बार बीबीसी के नाम पर लोगों को ठगा गया है, बीबीसी के नाम से सर्वे जारी किए गए हैं, जबकि कहना चाहूंगा कि बीबीसी कोई सर्वेक्षण नहीं करता है। बीबीसी को सर्वे करने की परमिशन नहीं है। लेकिन फेक न्यूज को फैलाने वाले बीबीसी की विश्वसनीयता को खूब समझते हैं और इसलिए इसे वायरल करते हैं। लेकिन बहुत ही कम लोग होते हैं जो इसकी पुष्टि करना चाहते हैं। इसलिए आज ये जो फेक न्यूज का दौर आ गया है ये वेब पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ी चुनौती है और ये सिर्फ हम पत्रकारों के लिए नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी के सामने भी बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सेंसेशनल जर्नलिज्म वाली हेडलाइन भी आज एक चुनौती बनी हुई है। जैसे- ‘बीच सड़क पर क्या हुआ ऐसा, लोग देखते रह गए...’, इस तरह की हेडलाइन से आपको उकसाया जा रहा है कि आप क्लिक करके देखें कि हुआ क्या है। लेकिन कई बार आपको निराशा हाथ लगेगी, कि अरे सिर्फ यही बात थी। ये सेंसेशनल जर्नलिज्म है। एक समय पर टेलिविजन न्यूज चैनल को लेकर भी कहा जाता था कि ये सब भूत, प्रेत की कहानियां दिखाते हैं, गाय उड़ाते हैं। लेकिन धीरे-धीरे समय बदला और परिपक्वता आई। यही परिपक्वता हम वेब पत्रकारिता में भी चाह रहे हैं और धीरे-धीरे ये यहां भी आएगी। जब धीरे-धीरे लोगों को इसकी वैल्यू समझमें आने लगेगी कि इस तरह कि हेडलाइन सिर्फ आपको बांधे रखने के लिए है, तो वे मात्र दो सेकेंड ही खबर पर रुकेंगे और आगे बढ़ जाएंगे, क्योंकि दो सेकेंड में ही पूरी खबर का सार पता लग जाएगा। लेकिन तथ्य वाली खबरें, जिसमें पुख्ता चीजें होंगी, जानकारी बढ़ाने वाला कंटेंट होगा, तो शायद फिर पाठक 30 से 40 सेकेंड तक पढ़ना चाहेंगे, और यह तब होगा जब आगे चलकर वेबसाइट को विज्ञापन इस आधार पर मिलने लगेंगे कि आपकी खबरों पर लोग कितनी देर तक इंगेज रहते हैं। फिर खबर पर लोगों के इंगेज का समय धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा और फिर एक से दो मिनट तक हो जाएगा। आने वाले समय में ये प्रवृत्तियां बदलेंगी।
वेबसाइट को मिल रही चुनौतियों के बारें में उन्होंने आगे कहा कि हमारी जो सामाजिक व्यवस्थाएं हैं उसमें तमाम तरह के बदलावों के बावजूद भी निर्णय आज भी घरों में पुरुष करते हैं। घर में कौन सा इंटरनेट का पैक रहेगा, कौन सा रिचार्ज होगा, इन सब चीजों का फैसला ज्यादातर पुरुष ही करते हैं, लिहाजा ये बहुत बड़ी वजह है कि भारत में आज भी इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की ज्यादा है और इसी वजह से कॉन्टेंट का क्रिएशन भी ज्यादातर पुरुषों को ध्यान में रखकर किया जाता है। ये एक चुनौती है और इस चुनौती पर भी काम हो रहा है। अधिक से अधिक महिलाएं इंटरनेट कंजप्शन में आएं और उनके लिए कॉन्टेंट क्रिएट किया जाए ये एक चुनौती है और इसके साथ ही ये मीडिया हाउसेज की भी जिम्मेदारी है।
इस दौरान उन्होंने छात्रों से आह्वान करते हुए कहा कि आप जब सभी छात्र पत्रकारिता में आएं, तो इस जिम्मेदारी के साथ कि महिलाओं को अलग-थलग करने वाला कॉन्टेंट क्रिएट न करें, बल्कि कॉन्टेंट ऐसा हो, जिसके बारे में भी सोचा जाए और उनको ध्यान में रखकर बनाया जाए, क्योंकि कई बार खबरों की हेडलाइन और फोटो ऐसी होती है, जिसे देखकर महिलाएं क्लिक नहीं करना चाहती हैं। लेकिन खबर लगाने वाले को ये लग रहा होता है कि अधिक से अधिक लोग खबर पर क्लिक करेंगे, क्योंकि शायद क्लिक रेट से ऐडवर्टाइमेंट मिल सकें, इसलिए उसे क्लिक पेज बना दिया जाता है, लेकिन क्या ये सार्थक जर्नलिज्म होगा, इसे धीरे-धीरे हमें सोचना होगा। वेब पत्रकारिता की यही बड़ी चुनौतियां हैं।
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