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पाठकों की मजबूरी है NDTV वेबसाइट पर विज्ञापन देखना, कई वेबसाइट्स ने दी राहत

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।। हाल ही में की गई एक जांच में पता चला है कि पिछले साल अंग्रेजी न्‍यूज वेबसाइट्स ने एडब्‍लॉक (adblock) को प्रतिबंधित कर दिया था। इनमें सिर्फ ‘एनडीटीवी’ ही ऐसी वेबसाइट थी जिसने एडब्‍लॉक का इस्‍तेमाल करने वाले

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

हाल ही में की गई एक जांच में पता चला है कि पिछले साल अंग्रेजी न्‍यूज वेबसाइट्स ने एडब्‍लॉक (adblock) को प्रतिबंधित कर दिया था। इनमें सिर्फ ‘एनडीटीवी’ ही ऐसी वेबसाइट थी जिसने एडब्‍लॉक का इस्‍तेमाल करने वाले रीडर्स को कंटेंट डिस्‍पले नहीं किया था।

इसके अलावा दूसरी वेबसाइट जिनमें ‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया, ‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स,’ ‘द हिन्‍दू’, ‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ ने कंटेंट को पढ़ने के लिए बिना किसी चेतावनी के एडबलॉक्‍स (adblock) का इस्‍तेमाल करने की अनुमति दे दी थी।

जुलाई 2016 की बात करें तो कई भारतीय वेबसाइट ने एडब्‍लॉकर्स के खिलाफ आवाज उठाई थी।  इन वेबसाइट्स ने एडब्‍लॉकर्स का इस्‍तेमाल करने वाले अपने पाठकों को अपनी वेबसाइट से कंटेंट पढ़ने से रोक दिया था। वर्ष 2015 में एडब्‍लॉकिंग से पब्लिशर्स को 22 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था। मार्च 2016 तक भारत में दूसरे नंबर पर सबसे ज्‍यादा 122 मिलियन इंटरनेट यूजर्स थे जिन्‍होंने अपने ब्रॉउसर में एडब्‍लॉक सॉफ्टवेयर इंस्‍टॉल कराया हुआ था। एडब्‍लॉकिंग का सबसे ज्‍यादा नकारात्‍मक प्रभाव (negative impact) देश की सबसे ज्‍यादा पढ़ी जाने वाली अंग्रेजी न्‍यूज वेबसाइट पर पड़ा। इनमें ‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया, ‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स,’ ‘द हिन्‍दू’, ‘इंडियन एक्‍सप्रेस’  और ‘एनडीटीवी’ ने एडब्‍लॉकिंग के खिलाफ आवाज उठाई थी। हालांकि पिछले कुछ महीनों से एडब्‍लॉक का इस्‍तेमाल करने वाले यूजर्स पर यह कड़ाई थोड़ी कम हो गई थी।

 तकनीकी बदलाव (Technological challenges)

जिस समय एडब्‍लॉकर्स के खिलाफ वेबसाइट ने आवाज उठाई हुई थी, एडब्‍लॉकिंग सॉफ्टवेयर ‘Adblock Plus’ ने एक नई सर्विस लॉन्‍च की थी। इस नई सर्विस में चमकने वाले एड्स (glaring ads) को ‘acceptable ads’ से रिप्‍लेस कर दिया गया था। इस सर्विस में acceptable ads की एक लिस्‍ट तैयार हो जाती थी और जब एडब्‍लॉक का इस्‍तेमाल कर रीडर पेज पर आता था, तो acceptable replacement ads दिखाई देते थे। इसके अलावा पिछली साल इसका एक और हल ‘adblocker-blocker-blocker’ निकाला गया था। भारतीय पाठकों ने इस प्रतिबंध से निपटने के लिए अपने सभी कामों को रिसॉर्ट (resorted) करना शुरू कर दिया था वहीं कुछ रीडर्स बाद में पढ़ने के लिए इनके लिंक को सेव कर रहे थे। इसके बाद Adblock Plus सॉफ्टवेयर अपडेट ने adblock-block को भी पीछे छोड़ दिया।

यह पूछे जाने पर कि ‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ की वेबसाइट ने एडब्‍लॉक का इस्‍तेमाल करने वाले यूजर्स को वेबसाइट का इस्‍तेमाल करने से क्‍यों नहीं रोका इंडियन एक्‍सप्रेस के सीईओ (डिजिटल) संदीप अमर ने कहा, ‘यह एक तकनीकी चुनौती है, समय के साथ बदलने के लिए हमें अपनी नियमावली (code)  को अपडेट करने की जरूरत है।’

एडब्‍लॉक बैन उतना ज्‍यादा प्रभावी नहीं है, ऐसा क्‍यों के बारे में पूछे जाने पर ‘चित्रलेखा’ के डिजिटल हेड मनन कोटक ने कहा, ‘दुनियाभर में एडब्‍लॉक का इस्‍तेमाल करने वाले 419 मिलयन यूजर्स ने 30 प्रतिशत भारतीय हैं। सिर्फ इसी कारण से मेरे दिमाग में आया कि भारतीय न्‍यूज वेबसाइट्स ने एडब्‍लॉकर्स का इस्‍तेमाल करने वाले यूजर्स को प्रतिबंध में छूट क्‍यों दी। इससे टैफिक में काफी कमी आ रही थी।’

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 एडवर्टाइजिंग से मिलने वाला रेवेन्‍यू घटा (Drop in revenue from advertising)

एडब्‍लॉकर्स से न्‍यूज वेबसाइट का रेवेन्‍यू सीधे-सीधे प्रभावित होता है और उनके लिए अपने कंज्‍यूमर को मुफ्त में कंटेंट देना काफी मुशिकल हो जाता है। इंडस्‍ट्री के विशेषज्ञों की मानें तो पिछले दो वर्षों में एडब्‍लॉकिंग का डिजिटल मार्केटिंग इंडस्‍ट्री पर काफी अहम प्रभाव पड़ा है। ‘MindShift Interactive  के सीईओ जफर का कहना है, ‘वर्ष 2015 में एडब्‍लॉकिंग से पब्लिशर्स को 22 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ और वर्ष 2016 में यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ गया। ऐसे में रेवेन्‍यू में भी काफी कमी आई। कई पब्लिशर्स को सिर्फ एडवर्टाइजिंग रेवेन्‍यू का ही सहारा होता है और यदि उन्‍हें कम किलक मिल रहे हैं तो उन पर तमाम दबाव डाले जाएंगे।

 बेहतर व्‍यवस्‍था का निर्माण (Creating a clutter-free interface)0

एडब्‍लॉक का इस्‍तेमाल करने वाले यूजर्स और भारतीय न्‍यूज बेवसाइट के बीच विवाद के बीच अब एक ऐसा इंटरफेस तैयार हुआ है जो पहले से काफी अलग है।  ऐसे एड जिनमें अपने आप विडियो प्‍ले हो जाता हैं और जो बेवसाइट ओपन करते ही बैनर पर फैल जाते थे, यूजर्स ज्‍यादातर इन्हें डिस्‍लाइक (disliked) कर देते थे। ऐसे एड्स अब थोड़े ही रह गए हैं।

‘इंडियन ए‍क्‍सप्रेस’ के हेड (न्यू मीडिया) अनंत गोयनका का कहना है, ऐडवर्टाइजमेंट्स किसी भी पब्लिशर के बिजनेस मॉडल का अहम हिस्‍सा है और हम लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं। ब्रैंड सॉल्‍यूशंस और नैटिव फार्मेट ही इसका भविष्‍य है। हम कभी भी इस मामले में समझौता नहीं करते। उदाहरण के लिए हम कभी भी मोबाइल पर एड्स को ओवरले (overlay) रन नहं करते हैं। इसके अलावा हम यह भी ध्‍यान रखते हैं कि कुछ एड और फार्मेट एक ही यूजर को बार-बार दिखाई न दें।

गोयनका का कहना है कि फ्री कंटेंट सिर्फ एक ही कीमत पर उपलब्‍ध कराया जा सकता है और वह कीमत है विज्ञापन। गोयनका ने यह भी कहा कि अपने एडवर्टाइजमेंट की समस्‍याओं का हल करना भी इंडियन एक्‍सप्रेस की प्राथमिकता होगी।

नैटिव एडवर्टाइजिंग और सबस्क्रिप्‍शन मॉडल्‍स (Native advertising and subscription models)

पिछले साल बेवसाइट्स ने अपने रीडर्स से कहा था कि या तो वे अपने एडब्‍लॉकर्स को हटा (disable) दें अथवा वेबसाइट का एडमुक्‍त वर्जन (ad-free version) देखने के लिए हफ्ते में एक डॉलर का भुगतान करें। कोटक का कहना है, ‘मेरे हिसाब से यह उचित कदम है। न्‍यूज वेबसाइट को भी अपनी फाइनेंस‍ स्थिति के लिए नए रास्‍ते तलाशने होंगे। फिर चाहे वह एड्स से हो अथवा सबस्क्रिप्‍शन से। सिर्फ इसी के द्वारा ही क्‍वालिटी को बरकरार रखा जा सकता है।’ इसके अलावा कोटक का यह भी कहना था कि वेबसाइट को अपने फालोअर्स के लिए भी संवेदनशील होना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बेकार के ऐडवर्टाइजमेंट्स (intrusive) को नजरअंदाज किया जाए।

कोटक ने कहा, ‘कुल मिलाकर पब्लिशर्स ऐडवर्टाइजमेंट्स को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं लेकिन वह यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि बेकार के (intrusive) ऐड न दिखाए जाएं।’ वहीं गोयनका ने कहा, ‘डिजिटल प्‍लेटफार्म पर अपने ऑडियंस की बढ़ोतरी से हम फिलहाल काफी खुश हैं।’

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