होम / इंडस्ट्री ब्रीफिंग / उर्मिलेश बोले, यह न तो ‘हिंदुत्व’ की जीत है और न ही सामाजिक न्याय-बहुजन राजनीति की हार

उर्मिलेश बोले, यह न तो ‘हिंदुत्व’ की जीत है और न ही सामाजिक न्याय-बहुजन राजनीति की हार

‘यूपी में बीजपी की जीत दिलचस्प और चमत्कारी है। पर एसपी-बीएसपी की हार अप्रत्याशित नहीं। बीजेपी की जीत का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसके नेता भी इसे हिंदुत्व की जीत नहीं बता पा रहे हैं।’ हिंदी दैनिक अखबार नवभारत टाइम्स में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का। उनका पूरा आलेख आप

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

‘यूपी में बीजपी की जीत दिलचस्प और चमत्कारी है। पर एसपी-बीएसपी की हार अप्रत्याशित नहीं। बीजेपी की जीत का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसके नेता भी इसे हिंदुत्व की जीत नहीं बता पा रहे हैं।’ हिंदी दैनिक अखबार नवभारत टाइम्स में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

सैफई साम्राज्य और मायालोक की हार 

प्रशासनिक कामकाज, सांगठनिक सक्रियता और चुनावी तैयारी के लिहाज से समाजवादी पार्टी के लिए यूपी के चुनाव शुरू से ही बहुत अनुकूल नहीं लग रहे थे। ऊपर से सत्ताधारी ‘सैफई परिवार’ में मचे घमासान ने बीजेपी के लिए माहौल और अनुकूल बनाया। प्रतिकूल स्थिति का सामना करने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आनन-फानन में कांग्रेस से गठबंधन किया। यूपी में मरी पड़ी कांग्रेस को 100 से ज्यादा सीटें दी गईं। जब अखिलेश और राहुल गांधी ने प्रचार अभियान की शुरुआत की तो अनेक राजनीतिक प्रेक्षकों को लगा कि चुनाव एकतरफा नहीं होगा। कांटे की लड़ाई होगी। लेकिन नतीजे आए तो ‘एग्जिट पोल्स’ के अनुमान से भी ज्यादा सीटें बीजेपी को मिलीं।

दुविधा में विरोधी

यूपी में बीजपी की जीत दिलचस्प और चमत्कारी है। पर एसपी-बीएसपी की हार अप्रत्याशित नहीं। बीजेपी की जीत का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसके नेता भी इसे हिंदुत्व की जीत नहीं बता पा रहे हैं। चुनाव से पहले और उसके दरम्यान सांप्रदायिक विद्वेष और विभाजन के अनेक प्रयासों, जुमलों और नारों के बावजूद यह न तो ‘हिंदुत्व’ की जीत है और न ही सामाजिक न्याय-बहुजन राजनीति की हार है। अगर कोई हारा है तो वह है अहंकार और परिवारवाद (निहित स्वार्थों की कलह सहित) में आकंठ डूबा ‘सैफई-साम्राज्य’ और संकीर्ण-व्यक्तिवादी राजनीति का ‘मायालोक’! बीजेपी की प्रचंड जीत प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के आक्रामक अभियान, ध्रुवीकरण की कोशिश, जबर्दस्त ‘मीडिया-प्रबंधन’ (खासतौर पर रेडियो और टीवी चैनल्स के इस्तेमाल) के अलावा गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों के बड़े हिस्से को संघ-बीजेपी के पक्ष में उतारने का नतीजा है। सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग और दलित समुदायों के बीच बीजेपी को खास समर्थन नहीं मिला। तब उसे महज 47 सीटें मिली थीं और वोट थे 15 फीसदी। तब सवर्ण और वैश्य समुदाय के अलावा कुछ इलाकों में कुर्मी-कोइरी समुदायों का उसे आंशिक-समर्थन मिला था। लेकिन सन् 2014 के संसदीय चुनाव में उसने पहली बार गैर-जाटव दलितों और गैर-यादव पिछड़ों में पैठ बनाई। उसे राज्य की 80 संसदीय सीटों में 73 पर कामयाबी मिली। इस नए जनाधार को उसने नोटबंदी और रोजगार-संकट के बावजूद सन् 2017 में बरकरार रखा। उसकी बड़ी कामयाबी का मूल मंत्र यही है।

यह जानना दिलचस्प होगा कि बीजेपी ने गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों में पैठ कैसे बनाई! लंबे समय तक ब्राह्मण-बनिया समुदाय की पार्टी समझी जाने वाली बीजेपी ने पिछड़े वर्ग में घुसपैठ की सबसे पहली कोशिश कोइरी-कुशवाहा-मौर्य-शाक्य और कुर्मी समुदाय के साथ की। मंदिर-मस्जिद विवाद के दौरान चलाए सघन सांप्रदायिक अभियान में आरएसएस ने इन्हीं समुदायों के बीच से कई नए नेता उभारे। सन् 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नाकाम होने के तुरंत बाद बीजेपी-संघ ने यूपी में चुनावी-तैयारी शुरू कर दी थी। जिस वक्त समाजवादी पार्टी में ‘गृह-युद्ध’ चल रहा था, संघ-बीजेपी के कार्यकर्ता ‘शिव-कथा’, ‘भगवत-कथा’ आदि के जरिए दलितों-पिछड़ों के बीच अपना अभियान चला रहे थे।

वे पिछड़ों के मुहल्लों में कथा-वाचन के बाद भोज-भात करते और बूथ-आधारित संगठन भी बनाते। पिछड़ी और दलित जातियों के बीच इस बात का जबर्दस्त प्रचार किया गया कि सरकार में अगर कभी पिछड़े आए तो सारा फायदा ‘यादवों’ को मिला या दलित सत्ता में आए तो उसका फायदा ‘जाटवों’ को गया। सोशल मीडिया में प्रचलित कुछ आंकड़ों और ‘पोस्ट-ट्रुथ’ को रणनीति के तौर पर अपनाया गया। सत्ता में होने के बावजूद अखिलेश सरकार या एसपी ने संघ-बीजेपी के इस अभियान को तर्क और आकड़ों के स्तर पर कहीं भी चुनौती नहीं दी। बीएसपी की भाईचारा कमेटियां भी पहले की तरह गांव-गांव में सक्रिय नहीं रह गईं। संघ-बीजेपी के लिए खुला मैदान था।

अखिलेश यादव की इस बात के लिए समाज और मीडिया में तारीफ की गई कि उन्होंने अपने पिता की राजनीति के कुछ नकारात्मक पक्षों (अमर सिंह या कुछ विवादास्पद चरित्रों आदि) से किनारा किया लेकिन उनके कुछ सकारात्मक पक्षों को भी उन्होंने अपने पांच साल के कार्यकाल में पूरी तरह नजर अंदाज किया। मुलायम की तरह उन्होंने पार्टी के साथ गैर-यादव पिछड़ों को जोड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। यही नहीं, उनके कुछ खास सलाहकारों ने उन्हें समझा दिया कि ‘शालीन और साफ-सुथरे व्यक्तित्व’ के चलते वह ‘सर्व-स्वीकार्य’ नेता बनते जा रहे हैं। अब उन्हें ‘सामाजिक न्याय’ जैसे अजेंडे पर जोर देने की जरूरत नहीं है। अपने ‘विकास-दर्शन’ का उन्हें डंका बजाना चाहिये। पर अखिलेश का ‘विकास-दर्शन’ अन्य शासक-दलों की तरह ही कुछ निजी निवेश बढ़ाने और हाइवे-एक्सप्रेस-वे बनाने तक सीमित था। यह काम भी पश्चिमी यूपी के कुछ इलाकों तक ही सीमित रहा। उनके ‘विकास के अजेंडे’ में दलित-पिछड़ों की खासतौर पर अनदेखी हुई। इसीलिए ‘काम बोलता है’ का नारा कोई आकर्षण नहीं पैदा कर सका। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में कुछ खास नहीं हुआ था।

मुकाबले से बाहर

दूसरी तरफ, वह अपनी ‘शालीन और सर्वस्वीकार्य नेता’ की छवि के जरिए सवर्ण समुदायों में रत्तीभर समर्थन नहीं जुटा सके। ये समुदाय व्यापक तौर पर बीजेपी के साथ जमे रहे और दलित-पिछड़ों का एक हिस्सा भी एसपी-बीएसपी को छोड़कर ‘भगवा-धारा’ के साथ चला गया। मायावती इस भ्रम की शिकार रहीं कि पार्टी में विक्षुब्ध और उपेक्षित रहे अनेक दिग्गजों के बीजेपी की तरफ जाने का उनके जनाधार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन जन-धारणा के स्तर वह चुनावी मुकाबले से पहले ही बाहर हो चुकी थीं।


टैग्स
सम्बंधित खबरें

BSE व NSE ने इस मामले में 'बालाजी टेलीफिल्म्स' पर लगाया जुर्माना

टीवी और फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स (Balaji Telefilms Limited) पर स्टॉक एक्सचेंज ने जुर्माना लगाया है।

2 days ago

मैडिसन मीडिया सिग्मा की CEO वनिता केसवानी ने छोड़ा पद

मीडिया इंडस्ट्री से एक बड़ी खबर सामने आई है। वनिता केसवानी ने मैडिसन मीडिया सिग्मा (Madison Media Sigma) के सीईओ पद से इस्तीफा दे दिया है।

2 days ago

वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी में शाजिया फ़ज़ल को मिली ये बड़ी जिम्मेदारी

ग्लोबल मीडिया और एंटरटेनमेंट कंपनी वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी (Warner Bros. Discovery) में शाजिया फ़ज़ल को बड़ी जिम्मेदारी मिली है

2 days ago

अब RPSG मीडिया के CEO होंगे साहिल शेट्टी, 9 मार्च को संभालेंगे जिम्मेदारी

नेटवर्क18 स्टूडियो से अलग होने के बाद साहिल शेट्टी अब आरपीएसजी मीडिया (RPSG Media) में चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (CEO) के तौर पर जुड़ने जा रहे हैं

2 days ago

'जिनेमा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट' की बोर्ड मीटिंग आज, 14.80 करोड़ रुपये जुटाने पर होगा फैसला

जिनेमा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट लिमिटेड ने स्टॉक एक्सचेंज को जानकारी दी है कि कंपनी की बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक सोमवार, 2 मार्च 2026 को होने जा रही है।

3 days ago


बड़ी खबरें

दुनिया को अलविदा कह गए वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व राज्यसभा सांसद एच.के. दुआ

वरिष्ठ पत्रकार, राजनयिक और पूर्व राज्यसभा सांसद एच.के. दुआ का बुधवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।

16 hours ago

BSE व NSE ने इस मामले में 'बालाजी टेलीफिल्म्स' पर लगाया जुर्माना

टीवी और फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स (Balaji Telefilms Limited) पर स्टॉक एक्सचेंज ने जुर्माना लगाया है।

2 days ago

मैडिसन मीडिया सिग्मा की CEO वनिता केसवानी ने छोड़ा पद

मीडिया इंडस्ट्री से एक बड़ी खबर सामने आई है। वनिता केसवानी ने मैडिसन मीडिया सिग्मा (Madison Media Sigma) के सीईओ पद से इस्तीफा दे दिया है।

2 days ago

क्या पाकिस्तान अफगानिस्तान को हरा पाएगा: रजत शर्मा

तालिबान ने कहा कि उसके हमले में 55 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, इनमें से 23 सैनिकों की लाशें भी अफगान लड़ाके अपने साथ अफगानिस्तान ले गए।

2 days ago

वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी में शाजिया फ़ज़ल को मिली ये बड़ी जिम्मेदारी

ग्लोबल मीडिया और एंटरटेनमेंट कंपनी वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी (Warner Bros. Discovery) में शाजिया फ़ज़ल को बड़ी जिम्मेदारी मिली है

2 days ago