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जब अटल जी की वो बात सुनकर सब पत्रकारों की आखें नम हो गई थीं...
अटल जी एक ऐसे नेता थे, जिनका पत्रकारों के साथ एक लगाव था। वे कभी सेंसरशिप...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
राजदीप सरदेसाई
कंसल्टिंग एडिटर, टीवी टुडे ग्रुप ।।
अटल जी एक ऐसे नेता थे, जिनका पत्रकारों के साथ एक लगाव था। वे कभी सेंसरशिप की बात नहीं करते थे,अपनी आलोचनाओं को स्वीकार करते थे, अपनी मुस्कुराहट से कई बार कई इशारे कर दिया करते थे।
मुझे उनके साथ की तीन घटनाएं आज फौरी तौर पर याद आ रही हैं। जब हम उनके साथ लाहौर बस यात्रा के दौरान पाकिस्तान गए थे, तो नवाज शरीफ की ओर से बड़ा भव्य बुफे डिनर आयोजित किया गया था। जब हमने डिनर के बाद उनसे पूछा कि पाक के साथ बातचीत कैसी रही? तो अटल जी ने जवाब दिया कि बातचीत अच्छी रही, पर यहां के गाजर के हलवे में वो बात नहीं जो दिल्ली के गाजर के हलवे में होती है। यही खासियत थी अटल जी की, कब क्या कैसे कहना है, वो इससे भलीभांति परिचित थे।
इस दौरान का एक ओर वाकया मुझे याद है। उस यात्रा के दौरान एक शाम पंजाब के गवर्नर के घर सबके लिए चाय पार्टी थी। उस दौरान भारत और पाक के रिश्तों को अटल जी ने एक कविता के जरिये बयां किया था। उस कविता का एक-एक शब्द भावों से परिपूर्ण था, जिस तरह उन्होंने अपनी स्पीच के माध्यम से वो कविता गुनगुनाई थी, उसका एक-एक शब्द सुन वहां मौजूद हर पत्रकार चाहे वे पाक का हो या भारत का या किसी और मुल्क का, बड़ा इमोशनल हो गया था। हम सबकी आंखें उस कविता को सुनने के बाद नम थीं।
गुजरात के दंगों के दौरान मेरे द्वारा की गई कवरेज के बारे में उस दौरान जब अटल जी मुझे मिले तो मुझसे बोले कि प्रमोद (महाजन) बता रहा था कि सख्त रिपोर्टिंग कर रहे हो। अपना काम करते रहिए, पर अगली बार मुझे भी डीवीडी भिजवाया कीजिए, ताकि मैं भी आपकी रिपोर्टिंग देख सकूं। यही उनकी खासियत थी कि कभी भी उन्होंने मीडिया पर सेंसरशिप की बात ही नहीं की। 2004 में जब पूरी बीजेपी 'इंडिया शाइनिंग' के मुगालते में थी तो उस दौरान अटल जी का इंटरव्यू करते हुए मैंने उनसे इंडिया शाइनिंग के बारे में एक सवाल पूछा। पर, तब हाल ही में लखनऊ में घटित साड़ी कांड से दुखी वाजपेयी मुझसे बोले, 'छोडि़ए इंडिया शाइनिंग, देखिए लखनऊ में क्या हुआ है? कितनी दुखद घटना है कि कितने लोगों के साथ बुरा हो गया है।' कहते-कहते भावुक हो उठे थे वाजपेयी। इस बात का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि क्योंकि इससे एक बात ये पता चलती है कि अटल जी इस देश के आम आदमी से किस तरह जुड़े हुए थे। उसके दुख-दर्द को इतनी गहराई तक महसूस करते थे। दूसरी बात उनकी राजनीतिक समझ की थी। जहां उस दौर में पूरी भाजपा इंडिया शाइनिंग-शाइनिंग कर रही थी, वो देश की असली तस्वीर समझ रहे थे। वह कई बार प्रमोद से पूछा करते थे कि क्या वाकई पार्टी जीत रही है।
मैं अटल जी के साथ एक यात्रा पर न्यूयॉर्क गया था, तब फ्लाइट में अटल जी मुझसे मिले और पूछा कि क्या पहले भी न्यूयॉर्क गए हो, मैंने जवाब दिया कि दस-पंद्रह साल पहले एक बार गया था पर न्यूयॉर्क को ढंग से देखा नहीं है। तब उन्होंने तुरंत प्रिंसिपल सेक्रेटरी बृजेश मिश्रा को बुलाया और कहा कि इन्हें नॉनवेज पसंद है, न्यूयॉर्क में किस रेस्टोरेंट में बढि़या नॉनवेज मिलेगा, वो इनको बताइए। हंसते हुए बोले, इनको बढि़या स्टेक (steak) खिलाइए, ये हमारी तरह मछली नहीं खाते हैं। ये बात इसलिए बता रहा हूं क्योंकि ये दर्शाती है कि अटल के अंदर कितना ह्यूमन टच था। कैसे वो लोगों को अपना बना लेते थे और लोगों के अपने बन जाते थे। पत्रकारों के लिए उनके दिल में खास इज्जत थी। उस समय प्रधानमंत्री के साथ प्लेन में पत्रकार इकनॉमी क्लास में बैठकर जाते थे। लेकिन, प्रधानमंत्री और ब्यूरोक्रेट्स फर्स्ट कलास में बैठते थे। अटल जी हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि जब फ्लाइट टेकऑफ हो जाती थी तो वे पत्रकारों को अपने केबिन में बुलाकर उनके साथ बात करते थे। ये दर्शाता है कि कैसे वह सबको अपना मानते हुए समान समय देने की कोशिश करते थे।
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