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दशक की सबसे दुखद घटना सौम्या विश्ननाथन की हत्या : अमृता राय
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समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
सुप्रिया अवस्थी
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पिछले दस सालों में, जब से टेलीविज़न पत्रकारिता फली फूली है, महिला पत्रकारों की स्थिति बेहतर हुई है। पहले, जहां सिर्फ अंग्रेज़ी की कुछ गिनी-चुनी महिला पत्रकारों की पहचान थी अब हिन्दी महिला पत्रकारों को मीडिया जगत में पहचाना जाने लगा है। ये अलग बात है कि पत्रकारिता के सर्वोच्च पदों पर अपनी जगह बनाने के लिए महिला पत्रकारों को अभी और मेहनत करनी होगी। अल्का सक्सेना और मृणाल पांडेय के रूप में कुछ मिसाल ज़रूर हैं मगर पत्रकारिता में महिलाओं को अपने लिए ऊंची जगह बनाना आज भी आसान नहीं है।
पत्रकारिता में महिलाएं खूब आ रही हैं और अपनी पहचान बना रही हैं। फिलहाल ये सुकून की बात है। दशा में सुधार और संपूर्ण बदलाव धीरे-धीरे ही आते हैं। जहां तक निजी अनुभव की बात है मैनें, अपने काम के दौरान कभी रुकावट महसूस नहीं की। अच्छी पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है, काम के प्रति समर्पण। अगर, उस दृढ़ निश्चय से हम काम करते हैं तो जगह बनती जाती है। लेकिन, महिला पत्रकार घर, परिवार और समाज के साथ तालमेल बिठाने में कई बार उस तरह का समर्पण नहीं दिखा पातीं। शायद, यही वजह है कि वो काम तो कर रही हैं, मगर, उनके लिए नाम स्थापित कर पाना मुश्किल हो रहा है।
टेलीविजन पत्रकार, सौम्या विश्वनाथन के साथ हुआ हादसा किसी महिला पत्रकार के साथ दोबारा ना हो। महिला पत्रकारिता के लिए पिछले दस सालों में हुई ये सबसे दुखद घटना रही। महिलाओं को सुरक्षित माहौल में काम करने का मौका मिलना चाहिए। बीता दशक पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े बदलाव के रूप में याद किया जाएगा। खासकर, टेलीविजन पत्रकारिता के आने के बाद से मीडिया का अंदाज़ ही बदल गया। जैसे-जैसे टेलीविजन पत्रकारिता ने पांव पसारा महिलाओं की भूमिका भी बढ़ती चली गई है। दृश्य माध्यम की ज़रूरत ही इसे कहेंगे कि चाहे-अनचाहे महिलाओं को पर्दे पर ज्यादा जगह देनी पड़ी और पुरुषों के दबदबे वाले पत्रकारिता के माध्यम में जगह बनाने में महिलाओं ने ज्यादा वक्त भी नहीं लिया। आज, किसी भी न्यूज़ चैनल को खोलिए 60 फीसदी जगहों पर आप महिलाओं को ही न्यूज़ पढ़ते पाएंगे। महिलाओं के रोज़गार और समाज में उनके प्रति नज़रिए में भी इससे बदलाव आया है।
हर रिपोर्ट के लिए, एक जैसी मेहनत तो फिर किसी को खास तवज्जो क्यों? वैसे 6 से 14 साल तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने की रिपोर्ट करना सुकून भरा रहा। 2011 का साल मेरे विचार से, ‘सूचना के अधिकार’ के और बेहतर इस्तेमाल का साल हो सकता है। पत्रकारिता में नए बदलाव ला सकता है ‘सूचना का हथियार’। भ्रष्टाचार के तमाम मामले इसके ज़रिए ही सामने आए हैं। लेकिन, बड़े पैमाने पर अब भी इसका इस्तेमाल होना बाकी है। पत्रकारिता में, पारदर्शिता लाने में भी शायद इसका महत्वपूर्ण योगदान रहे।
ईमानदारी से अपना काम करना ही, नए वर्ष के लिए ईमानदार योजना हो सकती है।
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