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लोकपाल ही एक रास्ता है, ऐसा नहीं है
<div><b>राणा यशवंत</b><b>, </b><b>ग्रुप एडिटर</b><b>, </b><b>महुआ न्यूज</b></div> <div>अगर सरकार यह
समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
राणा यशवंत, ग्रुप एडिटर, महुआ न्यूज
अगर सरकार यह मान रही है कि लोकपाल के दायरे में लाने के बाद ही मीडिया जवाबदेह बनेगी या उस पर किसी तरह का रेगुलेशन लग सकता है तो सरकार मीडिया को लोकपाल के दायरे में लाए, लेकिन पहले सरकार स्पष्ट करे की मीडिया को लोकपाल ने दायरे में लाने की जरूरत क्या है। सरकार का एक पक्ष खासकर सूचना प्रसारण मंत्री खुद ही यह कह रही है कि मीडिया के लिए सेल्फ रेगुलेशन ही सबसे वाजिब तरीका है। और जो दो संस्थाएं एनबीईए और बीईए रेगुलेशन के लिए जिम्मेदार हैं, वह अपना काम बखूबी कर भी रही हैं। सभी चैनल इन संस्थाओं के निर्देशन में ही काम कर रहे हैं।
लेकिन इस पर सवाल उठाया जा रहा है कि इन संस्थाओं में उन्हीं चैनलों से जुड़े संपादक हैं जिनको लोकपाल के दायरे में लाने की बात की जा रही है। मैं इस सवाल को सिरे से नकारता हूं वे संपादक इसलिए इस संस्था में हैं क्योंकि उनको खबरों की संवेदनशीलता की परख है। उन्हें पता है कि कौन-सी खबर का समाज पर क्या असर पड़ेगा। इसीलिए जब यह संस्थाए कोई गाइडलाइन जारी करती हैं तो हम सभी उसे फॉलो करते हैं। विश्वभर में कोई ऐसा लोकतंत्र बताइये जहां मीडिया को सरकार के द्वारा नियंत्रित किया जाता हो। अगर ऐसा है फिर तो वह मीडिया न होकर सरकार का मुखपत्र होकर रह जाएगा। मैं यह नहीं कहता कि अगर देश में सौ न्यूज चैनल हैं तो कोई भी इन गाइडलाइन्स का वाइलेशन नहीं करता है, लेकिन उनकी संख्या मात्र एक दो ही हैं और एक दो के आधार पर सबको नहीं आंका जा सकता।
हां, यह बात सही है कि 2004 से लेकर 2008 के दौर में न्यूज मीडिया खबरों से भटका था, लेकिन अब सभी खबरों पर लौट रहे हैं। मुझे याद है इस दौर में हम जब राजनेताओं को डीबेट के लिए बुलाते थे तो वे कहते थे कि आप लोग खबर तो दिखाते नहीं, फिर ऐसी बहसों का क्या फायदा? लेकिन अब खबरों का दौर लौटा है, सब इसे स्वीकार कर रहे हैं और खबरों का दौर लाने में बीईए और एनबीईए की बड़ी भूमिका है।
सरकार कहती है कि मीडिया को मीडिया-मालिक चला रहे हैं तो मैं आपको बता दूं कि कंटेट को लेकर कभी किसी प्रमोटर ने अपने संपादकों के हाथ नहीं बांधे हैं, मीडिया ने हमेशा ही जनसरोकार की खबरों को प्रमुखता दी है और कभी भी किसी मालिक ने संपादकों को ऐसा करने से नहीं रोका है। टीआरपी की दौड़ ने भले ही खबरों का रूप बदला है, लेकिन प्रमोटरों ने कभी खबरों का रूप तय किया हो ऐसा कभी नहीं हुआ।
जीईसी में भी ब्रॉडकॉस्टर अपने कंटेट को लेकर सजग हैं। वहां भी बी ट्रिपल सी जैसी संस्थाएं काम कर रही हैं। वहां सवाल नैतिकता का उठाया जा सकता है, लेकिन उसके लिए प्रावधान किए जा रहे हैं। मैं फिर अपनी बात दोहराना चाहूंगा कि लोकपाल के दायरे में लाना ही एक मात्र विकल्प नहीं है सरकार इस बात को समझे की लोकपाल अगर लोकपाल अपनी जिम्मदारियों को ठीक ढंग से नहीं निभा पाता तो इसे सामने लानी की भी जिम्मेदारी मीडिया की है। इसलिए मीडिया के लिए सेल्फरेगुलेशन ही एक मात्र विकल्प है, जो मीडिया कर रही है।
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