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मीडिया में विविधता खत्म होने का खतरा
<p><b>आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी</b><br /> हिंदी हो या अंग्रेजी मीडिया, पत्र-पत्रिकाएं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
हिंदी हो या अंग्रेजी मीडिया, पत्र-पत्रिकाएं हों या टीवी चैनल. लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगर चौथे स्तंभ के रूप में आपको पहचान मिली है, तो इस पहचान के साथ सामाजिक जवाबदेही भी है. लेकिन पूंजी के प्रभाव में आज जवाबदेही बाजार से संचालित होने लगी है. जहां तक हिंदी पत्रकारिता का प्रश्न यह पूरी तरह उद्योग का हिस्सा बन चुकी है. लेकिन, इसमें संकेंद्रण की प्रवृत्ति भी दिख रही है.
हिंदी के मीडिया उद्योग में संकेंद्रण यानी कुछ बड़ी कंपनियों के और बड़ी होने और छोटी-मंझोली कंपनियों के खत्म होने की प्रवृति जोर पकड़ रही है, जिसके गहरे राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक निहितार्थ हैं. मीडिया उद्योग में बढ़ते कॉरपोरेटीकरण के साथ तेज होती संकेंद्रण की प्रक्रिया का सीधा अर्थ यह है कि पाठकों/दशर्कों को सूचनाओं, विचारों और मनोरंजन के लिए मुट्ठी भर कंपनियों पर निर्भर रहना होगा. यह संभव है कि उनके पास चयन के लिए मात्रत्मक तौर पर कई अखबार/पत्रिकाएं और चैनल उपलब्ध हों, लेकिन गुणात्मक तौर पर बहुत कम विकल्प उपलब्ध होंगे.
इसकी वजह यह होगी कि उनमें से कई अखबार/चैनल/फिल्म/रेडियो पर मालिकाना एक ही समूह का होगा. इसके परिणामस्वरू प जाहिर है कि उनका सुर कमोबेश एक-सा ही होगा. इस तरह मीडिया उद्योग में विविधता और बहुलता कम होगी, जो किसी भी गतिशील लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है. लोकतंत्र की बुनियाद विचारों की विविधता और बहुलता पर टिकी है और एक सर्व सूचित और सक्रिय नागरिक के लिए जरूरी है कि उसके पास सूचनाओं और विचारों के अधिकतम संभव स्रोत हों. साथ ही साथ यह भी देखने को मिलता है कि प्रतियोगिता में जितने ही कम खिलाड़ी रह जाते हैं उनमें विचारों और सृजनात्मकता के स्तर पर एक-दूसरे की नकल की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है और जोखिम लेने की प्रवृत्ति कम होती जाती है. यही नहीं, बड़ी कंपनियों के लिए दावं इतने ऊंचे होते हैं कि वे अकसर सत्ता और दूसरी प्रभावशाली शक्तियों के करीब दिखाई देती हैं. मीडिया के कॉरपोरेटीकरण के साथ यह भी खतरा जुड़ा होता है कि एक कंपनी के रूप में मीडिया घरानों के आर्थिक हित शासक वर्गो के साथ इतनी गहराई से जुड़े होते हैं कि वे आमतौर पर शासक वर्गो के भोंपू और यथास्थितिवाद के सबसे बड़े पैरोकार बन जाते हैं या अपने हितों के अनुकूल बदलाव के लिए लॉबिंग करते प्रतीत होते हैं.
ऐसे में इन समूहों में वैकल्पिक स्वरों के लिए न के बराबर जगह रह जाती है. यही नहीं, वे शासक वर्गो के पक्ष में जनमत बनाने से लेकर अपने राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अखबारों/चैनलों का इस्तेमाल भी करते हैं. इसके अलावा बड़ी मीडिया कंपनियों में मुनाफा मुख्य रूप से विज्ञापनों से आता है, इसलिए बड़े विज्ञापनदाता परोक्ष रूप से इन मीडिया कंपनियों के कंटेंट को भी नियंत्रित और प्रभावित करने लगते हैं.
बढ़ती प्रतिस्पर्धा वाले इस दौर में बड़े पैमाने पर विस्तार की ओर उन्मुख मीडिया और मनोरंजन उद्योग में जिस तरह से गलाकाट प्रतियोगिता बढ़ रही है और दावं ऊंचे-से-ऊंचे होते जा रहे हैं, उसमें अधिकांश कंपनियों के लिए बड़ी पूंजी की शरण में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है. आज मीडिया में बड़े उद्योग और कारोबारी समूहों की दिलचस्पी बढ़ी है. जैसे-जैसे इनका हस्तक्षेप बढ़ेगा पत्रकारिता अपने उद्देश्य से विमुख होगी और छोटे अखबारों के लिए बाजार में बना रहना मुश्किल होगा.
प्रभात खबर से साभार
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