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महज एक उत्पाद नहीं है अखबार

<p><b>प्रंजॉय गुहा ठकुराता, वरिष्ठ पत्रकार</b><br /> अखबार को उत्पाद की श्रेणी में रख भी सकते हैं और

समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago

प्रंजॉय गुहा ठकुराता, वरिष्ठ पत्रकार
अखबार को उत्पाद की श्रेणी में रख भी सकते हैं और नहीं भी. इसे उत्पाद की श्रेणी में रखने वाले तर्क दे सकते हैं कि चूंकि इसे बनने में कागज, रंग, स्याही, मशीन आदि (जो कि खुद एक उत्पाद है) का इस्तेमाल होता है, इसीलिए इसे उत्पाद माना जाना चाहिए.

लेकिन सिर्फ इस बिना पर ही हमें अखबार को उत्पाद नहीं मान लेना चाहिए. इसकी प्रकृति अन्य उत्पादों से भिन्न होती है. जिस प्रकार हम पेट भरने के लिए भोजन रू पी उत्पाद का इस्तेमाल करते हैं, उसी प्रकार अखबार दिमाग की जरू रतों को पूरा करने वाला एक उत्पाद है. यह सूचना देने के साथ ज्ञान भी देता है. किसी तात्कालिक विषय की पूरी जानकारी देता है.
 
इसके अलावा पाठकों को विभिन्न सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूक भी बनाता है. एक अन्य पैमाने पर भी यह उत्पाद की श्रेणी में नहीं आता है. एक उत्पाद साबुन का उदाहरण लेते हैं. इसे बनाने और उपभोक्ताओं तक पहुंचाने में लगे खर्च के आधार पर इसकी कीमत तय होती है. इसकी पूरी कीमत उपभोक्ताओं से वसूली जाती है. लेकिन 20 पेज के एक अखबार को पाठक तक पहुंचाने का खर्च करीब 20 रुपये आता है. जबकि उपभोक्ताओं को यह दो रुपये में मिलता है. इसकी लागत का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा विज्ञापनों से हुए आय से पूरा किया जाता है. यहां उपभोक्ता उत्पाद की कीमत नहीं चुकाता. इसीलिए वह बेहतर सामग्री की मांग भी नहीं करता है.
       
इस प्रकार हमें अखबार को महज एक उत्पाद की तरह नहीं देखना चाहिए, पत्रकारिता एक सेवा है. यह लोगों को सूचना देने का एक माध्यम है. लोगों के दुख, दर्द और उनकी समस्या को आवाज देने वाला एक मंच है. मीडिया संस्थानों को उत्पाद और अखबार में फर्क करना चाहिए. अपने आपको कॉरपोरेट घराना नहीं मानना चाहिए. अगर मीडिया संस्थान एक कंपनी की तरह काम करेंगे, तो मीडिया की प्रतिष्ठा कम होगी. अखबार की अपनी विश्वसनीयता रहनी चाहिए. पाठक अखबार समाचार के लिए पढ़ता है, न कि उसे उत्पाद मानकर विज्ञापन के लिए पढ़ता है. इसलिए खबर और विज्ञापन के बीच भी फर्क करना चाहिए. भारतीय पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए. पत्रकारों को खबर के मामले में पूरी नैतिकता बरतनी चाहिए. जो अखबार को उत्पाद की श्रेणी में रखता हो, ऐसी सनसनी फैलाने वाली और झूठी खबरों से बचना चाहिए. आज कॉरपोरेट घरानों की तर्ज पर काम करने वाले मीडिया संस्थानों की वजह से मीडिया कमजोर हुआ है, उसकी विश्वसनीयता में कमी आयी है. मीडिया में जो अच्छे लोग हैं, जो सीधे रास्ते पर चल रहे हैं, जो इस भाव के साथ काम करते हैं कि हमें समाज में परिवर्तन लाना है, उनको लोग आज भी श्रद्धा भाव से देखते हैं. लेकिन, कुछ लोगों द्वारा अखबार को उत्पाद मानने से समूची मीडिया जगत की आलोचना होने लगी है. कुल मिलाकर खबरों में संतुलन रहना चाहिए. खबर में आरोपी व्यक्ति का पक्ष भी रखने की कोशिश करनी चाहिए. खबर में विश्वसनीयता होनी चाहिए, वह झूठे तथ्यों पर आधारित नहीं होनी चाहिए. पत्रकारों को भी कानून के दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए.
       
दुनिया के सबसे बड़े मीडिया घराने के मालिक रुपर्ट मडरेक का उदाहरण हमारे सामने है. मडरेक की पत्रकारिता का फलसफा सीधा-सा था कि अखबार एक उत्पाद है और खबर उसकी सामग्री. उनकी नजर में अखबार उसी तरह एक उत्पाद है, जैसे साबुन और कपड़े. मडरेक मानते थे कि खबर अगर मिर्च-मसालेदार होगी, तो लोग उसे पढ़ेंगे, जिसकी वजह से अखबार बिकेगा और उसके बिकने से विज्ञापन मिलेगा, इससे मुनाफा बढ़ेगा, जिससे हम और मीडिया हाउस या कंपनियां खरीद सकेंगे. मडरेक पत्रकारिता को शुद्ध मुनाफा देने वाला एक व्यवसाय मानते रहे. मडरेक के अखबार ने एक कॉरपोरेट घराने की तर्ज पर काम किया. जिसका हश्र आज दुनिया के सामने है. सामाजिक जिम्मेदारी से काम करने का भाव मीडिया संस्थानों में होना चाहिए. दुर्भाग्य है, आज मीडिया में मडरेक जैसी सोच रखने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है. मीडिया संस्थानों को इस घटना से सबक लेते हुए सीख लेनी चाहिए कि अखबार को पाठकों के सामने मात्र एक उत्पाद की तरह नहीं परोसा जाना चाहिए.
 प्रभात खबर से साभार
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