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वैसाखी पर खड़ी है हिंदी पत्रकारिता
<p><strong>एस. एन. विनोद- संपादक, 1857</strong></p> <div>हिन्दी पत्रकारिता के कल और आज की तुलना करना
समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
एस. एन. विनोद- संपादक, 1857
हिन्दी पत्रकारिता के कल और आज की तुलना करना बेहद आवश्यक है क्योकि अतीत को हमेशा वर्तमान और भविष्य को संवारने के लिए याद किया जाता है। यह सच हिन्दी पत्रकारिता के साथ भी लागू होता है। जब हम बीते कल की बातें करते है तो यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि गुलाम भारत में स्वत्त्रता की लड़ाई का एक बड़ा हिस्सा हिन्दी पत्रकारिता के माध्यम से ही लड़ा गया। लेकिन विडंबना यह है कि आजादी के बाद लाभ की पत्रकारिता हावी हो गयी और यह भ्रम पैदा किया जाने लगा कि अब पत्रकारिता मिशन से अलग हटकर व्यवसायिकता की ओर बढ़ चली है।
चिंता करने की बात तो यह है कि आज आजादी के लगभग इतने वर्षो बाद भी व्यवहारिक रूप से भारत की कोई भी राष्ट्रभाषा नही है। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा अवश्य मिला है, लेकिन इसके साथ इतनी शर्ते जोड़ी गयीं कि अंग्रेजी को ही प्रमुखता मिल गई और हिंदी वैसाखी भाषा बन रह गई। दुखद रूप से आदाजी के बाद हिन्दी पत्रकारिता इसी वैसाखी के सहारे ही चल रही है। हिन्दी के खिलाफ जो षड़यंत्र रचा गया था उसने इसे अनुवाद की भाषा बना डाली। इसी अनुवाद की भाषा के चलते हिंदी पत्रकारिता में मौलिकता का अभाव हो गया।
आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर मै सभी पत्रकार बंधुओं से निवेदन करता हूं कि हिंदी की अनुवाद की भाषा के ठ्पपे से निकालकर उसमें मौलिकता लाने के लिए आगे आएं। हिंदी में प्रकाशित होने वाली पत्र पत्रिकाओ की समाचार में विस्तार हुआ है और इनकी संख्या अभी अंग्रेजी की तुलना में अधिक है। हमें इस स्थिति का लाभ उठाना चाहिए। इन प्रयासों से हिंदी पत्रकारिता निश्चित ही शीर्ष पर होगी। पाठकों का विश्वास अर्जित कर हिन्दी पत्रकारिता का एक स्वर्णिम इतिहास लिखा जा सकता है ।
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