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अभिव्यक्ति की आजादी और अवमानना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण व ‘तहलका’ मैगजीन के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल के मामले की सुनवाई कर रही थी सुप्रीम कोर्ट की बेंच
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और ‘तहलका’ मैगजीन के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल को स्पष्ट किया कि अगर वह उनके स्पष्टीकरण या माफी को स्वीकार नहीं करता है तो दोनों के खिलाफ 2009 के आपराधिक अवमानना के मामले की सुनवाई की जाएगी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रशांत भूषण को नसीहत देते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी और अवमानना में बारीक अंतर है। दरअसल, प्रशांत भूषण ने ‘तहलका’ मैगजीन को एक इंटरव्यू दिया था, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 16 जीफ जस्टिसों पर तमाम आरोप लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2009 में प्रशांत भूषण और तरुण तेजपाल के खिलाफ अवमानना के नोटिस जारी किए थे।
अब मंगलवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये मामले की सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण के वकील ने पक्ष रखा, जबकि तरुण तेजपाल ने माफी मांग ली। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है। न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि कोर्ट को प्रशांत भूषण और तेजपाल से अभी तक किसी भी तरह का स्पष्टीकरण अथवा माफीनामा नहीं मिला है और इसे स्वीकार करने या नहीं करने के बारे में वह अपना आदेश सुनाएगा। बेंच अब ये तय करेगी कि दोनों की माफी स्वीकार की जाए या फिर उन पर अवमानना की कार्रवाई हो।
सुनवाई के दौरान भूषण की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन का कहना था कि इसमें बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी भी है और न्यायालय की अवमानना भी है। पीठ ने कहा, ‘आप बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के लिये खड़े हुये हैं लेकिन हो सकता है कि आप अवमानना की बारीक लाइन लांघ गये हों। हम इस व्यवस्था की गरिमा की रक्षा कैसे करें? मैं न्याय मित्र के रूप में आपसे जानना चाहता हूं ताकि हम इस टकराव को टाल सकें। हमें आप कुछ सुझाव दीजिये क्योंकि यह व्यवस्था आपकी भी है।’ पीठ का यह भी कहना था कि वह बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी तरह का अंकुश नहीं लगाना चाहती लेकिन अवमानना के लिये बहुत बारीक लाइन है।
बता दें कि शुक्रवार को प्रशांत भूषण, वरिष्ठ पत्रकार एन राम और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी द्वारा एक याचिका दायर कर अवमानना कानून में सेक्शन 2(c)(i) की वैधता को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत उन्हें बोलने की आजादी है। इस पर मंगलवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रशांत भूषण से कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी और अवमानना के बीच बारीक अंतर है। वहीं इससे पहले 22 जुलाई को बेंच ने न्यायपालिका के कथित अपमान को लेकर किए गए प्रशांत भूषण के दो ट्वीट्स का स्वत: संज्ञान लिया था। उस दौरान बेंच ने कहा था कि प्रथम दृष्टया उनके बयानों से न्यायिक प्रशासन की बदनामी हुई है।
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