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मीडिया के तमाम पक्षों से रूबरू कराती है पद्मश्री आलोक मेहता की ये किताब
पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित और मीडिया जगत में 50 वर्षों से भी अधिक का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता अपनी नई पुस्तक को लेकर लोगों के बीच हाजिर हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago
पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित और मीडिया जगत में 50 वर्षों से भी अधिक का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता अपनी नई पुस्तक को लेकर लोगों के बीच हाजिर हैं। उनकी पुस्तक ‘पावर, प्रेस और पॉलिटिक्स‘ के विमोचन और उस पर चर्चा के लिए एक वेबिनार का आयोजन किया गया।
यह वेबिनार प्रतिष्ठित संस्थान ‘एक्सचेंज4मीडिया‘ द्वारा आयोजित किया गया। आपको बता दें कि इस वेबिनार का समय 14 अगस्त, 2021 की सुबह 11 बजे रखा गया, जिसका संचालन एक्सचेंज4मीडिया के सीनियर एडिटर रुहैल अमीन द्वारा किया। इस वेबिनार में वक्ता के तौर पर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा, ‘नेटवर्क18‘ के एग्जिक्यूटिव एडिटर आनंद नरसिम्हन, ‘मलयाला मनोरमा‘ व ‘द वीक‘ के रेजिडेंट एडिटर सच्चिदानंद मूर्ति और ‘एबीपी न्यूज‘ की वरिष्ठ पत्रकार रूबिका लियाकत ने हिस्सा लिया।
इस वेबिनार में आलोक मेहता की किताब की पृष्ठभूमि और वर्तमान मीडिया में उसकी प्रासंगिकता को लेकर चर्चा हुई। आलोक मेहता ने कहा कि इन दिनों हर कोई सामने आ रही चुनौतियों के बारे में बात कर रहा है। बहुत सारी समस्याएं सामने आ रही हैं। मीडिया के सामने भी कई चुनौतियां आई हैं। इन्हीं सभी चीजों को लेकर हमने इस किताब में लिखा है। नई पीढ़ी के बारे में भी इस किताब में जिक्र किया गया है। आलोक मेहता का कहना था, ‘मैंने बहुत समय मीडिया में बिताया है। बहुत सी धमकियां भी मिलीं कि क्या कर कर रहे हैं?, क्या समस्या है? ऐसे में मेरे पब्लिशर ने मुझे सुझाव दिया कि आप क्यों नहीं लिखते यह सब, आप अपने विचारों को लिखकर व्यक्त क्यों नहीं करते। मैंने कई अलग समाचारपत्रों के साथ काम किया, न्यूज एजेंसी ‘हिन्दुस्तान समाचार’ के साथ काम किया। इससे पहले ‘नईदुनिया’, इंदौर में काम किया। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ग्रुप के साथ काम किया, जर्मनी में ‘वॉयस ऑफ जर्मनी’ के साथ काम किया। इसके बाद टाइम्स ग्रुप के ‘नवभारत टाइम्स’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘दैनिक भास्कर’, ‘आउटलुक’ के साथ काम किया। एडिटर्स गिल्ड के साथ भी रहा। इस तरह से कई विभिन्न समाचारपत्रों और न्यूज एजेंसियों के साथ काम करके अलग-अलग तरह का अनुभव मिला और कई संपादकों को भी जान सका। लिहाजा मैंने भी सोचा कि काम करने के दौरान जो भी समस्याएं आती हैं वह सब इस किताब में लिखा जाए। मेरे कई पूर्व संपादकों को तरह-तरह की चुनौतियां से गुजरना पड़ा। मैंने कई बार कई लोगों का अखबार, टेलीविजन और डिजिटल के लिए इंटरव्यू किया। इसलिए मैंने सोचा कि क्यों नहीं भारतीय और देश के बाहर के पाठकों के लिए कुछ विचार व्यक्त करूं। मैं कैलाश सत्यार्थी जी को धन्यवाद देना चाहूंगा‘
वेबिनार में सच्चिदानंद मूर्ति ने कहा कि किताब से हमें एक चीज समझ आती है कि किसी भी मीडिया की आजादी बड़ी चीज है। आलोक जी की किताब में राज्यों और केंद्र की राजनीति को काफी बैलेंस तरीके से समझाया गया है। हर किसी मुद्दे को बड़ी बारीकी और गहन अध्ययन के साथ लिखा गया है। उनकी यह किताब पिछले 50 सालों की उन परिस्थिति का सही चित्रण करती है, जिस दौरान हमने तमाम संपादकों और मीडिया घरानों की कार्यप्रणाली को देखा है। आलोक मेहता जी की इस यात्रा में उन्होंने कई मीडिया घरानों के साथ काम किया है और इस किताब में मुझे वो सब अनुभव पढ़ने को मिले। मैं उनसे बहुत प्रभावित हुआ।
वहीं रूबिका लियाकत ने कहा कि आलोक मेहता जी जैसे व्यक्तित्व के साथ चर्चा करना बड़ी बात है। आलोक मेहता जी जिस कद्दावर तरीके से अपनी बात को रखते हैं और सच के लिए खड़े होते हैं, वो उन्हें प्रभावित करता है। मैं जब उनकी किताब पढ़ रही थी तो मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कि मैं किसी बिल्डिंग को बनते हुए देख रही हूं और आलोक जी मुझे उसका इतिहास बता रहे हैं। रूबिका लियाकत का कहना था, ‘आलोक मेहता जी की यह किताब हमें मीडिया के उस दौर में लेकर जाती है, जहां हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। उनकी किताब में कुछ चीजें ऐसी हैं, जो कभी नहीं बदलती हैं जैसे कि किसी मीडिया संस्थान या एंकर पर दबाब बनाने की कोशिश करना और वो कैसे उस दबाव से बाहर निकलता है। आज मैं देख पा रही हूं कि किस तरह सोशल मीडिया पर हर पार्टी के लोग दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जब आप सवाल पूछते हैं तो लोग आपसे नाराज होने लग जाते हैं, आपकी निंदा करने लग जाते हैं। इस किताब को जब लोग पढ़ेंगे तो वो पुराने समय में जाएंगे और उन्हें बड़ी खुशी होगी। ऐसा लगता है कि जैसे आपके सामने एक पूरी फिल्म चल रही है और मुझे पूरी उम्मीद है कि लोग इसे बेहद प्यार करेंगे।‘
आनंद नरसिम्हन का कहना था, ‘आलोक मेहता जी की यह किताब मीडिया के कई पक्षों से हमें रूबरू करवाती है। हमें ये समझने की जरूरत है कि दुनिया में कोई भी मीडिया स्वतंत्र नहीं है। मीडिया तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक कि उसे लगे कि हमें कमाना है। जिन पत्रकारिता के सिद्धांतों की हम बात करते हैं, आज उनके भी मायने बदल गए हैं। आलोक मेहता जी की किताब मेरे ऑफिस में मेरे पास रखी हुई है और जब भी समय मिलता है मैं उसे पढ़ता हूं और मुझे पढ़ने में बड़ा मजा आ रहा है। आलोक मेहता जी की किताब में उन 27 पत्रकारों के नाम हैं, जो आपातकाल के दौरान डटकर खड़े हुए लेकिन उनका नाम किसी मीडिया स्कूल में नहीं पढ़ाया जाता है। फिरोज गांधी के बारे में जो आपने लिखा या चारा घोटाला पर लिखने के कारण जो पटना में आपके साथ हुआ, वो सब पढ़ने के बाद समझ आता है कि लोकतंत्र की बात करने वाले कैसे अभिव्यक्ति की आजादी को प्रभावित करने की कोशिश करते थे। जहां तक पत्रकारों की बात है, उनको तो आजादी के पहले से ही प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। वर्तमान में यह देखने को मिल रहा है कि अगर किसी तथ्य को आप किसी एक विचारधारा के चश्मे से दिखाएं तो आप स्वतंत्र हैं, लेकिन उसी तथ्य के दूसरे पहलू को अगर आप उजागर कर देते हैं तो आप अचानक से किसी के पक्षधर बन जाते हैं। पत्रकार को नदी की तरह रहना चाहिए कि जहां जाए अपना रास्ता खुद बनाए।
इस दौरान डॉ. अनुराग बत्रा का कहना था, ‘आलोक मेहता जी को उनकी इस नई किताब के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं। मैं जब इस किताब को देख रहा था तो मैंने देखा कि इसमें 36 लोगों की acknowledgement है। इनमें से छह लोगों को मैं नहीं जानता था और ये चीज बताने के लिए काफी है कि ये किताब कितने बड़े स्तर पर और किन अनुभवों को आधार बनाकर लिखी गई है।‘ रूबिका ने कहा कि आलोक जी अपनी बात बड़ी ही बेबाकी से कहते हैं और उसमें भी एक बड़ी शालीनता और सौम्यता होती है। इस किताब में उन्होंने उस दबाब की बात की है, जो मीडिया ने सहा। उन्होंने यह भी बताया है कि पेड न्यूज आज का चलन नहीं है, ये कई दशकों से होता आ रहा है। इसके अलावा खोजी पत्रकारिता, स्टिंग, आर्थिक दबाब, न्यायपालिका के साथ मीडिया के संबंध जैसे विषयों पर भी बड़ी खूबसूरती से लिखा गया है। मुझे इस बात की खुशी है कि स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले हम इस आयोजन को कर रहे हैं और इस किताब के माध्यम से लेखकों को मीडिया जगत और उसके इतिहास के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।
इस वेबिनार में रूबिका लियाकत ने अपने जीवन से जुड़े कुछ अनुभव भी साझा किए। उन्होंने एक किस्सा शेयर करते हुए कहा कि जब वह कश्मीर में थीं तो वहीं कई बड़े अधिकारियों से मिलीं। एक सीनियर अधिकारी ने उनसे कहा कि पत्रकार किसी के सगे नहीं होते हैं। इस बात को आगे बढ़ाते हुए रूबिका ने स्वीकार किया कि पत्रकार किसी के सगे नहीं होते हैं। न वो किसी बिजनेसमैन के सगे हैं और न ही किसी राजनेता के। उन्होंने कहा कि मेरे दर्शक ही मेरा गर्व हैं। न तो मैं किसी को कह रही हूं कि उसे मत देखिए और न ही मैंने किसी को सम्मोहित किया हुआ है कि आप मुझे ही देखिए। दरअसल, हमारा दर्शक ही वह कड़ी है, जिससे हम असल में जुड़े हैं। अगर कश्मीर में कहीं कोई आतंकी मारा गया है तो मैं उसी तरह से उस न्यूज को दिखाउंगी जो उसका वास्तविक स्वरूप है। कई बार ये भी कहा जाता है कि एंकर कैसे अपने आयडिया को हम पर थोप सकते हैं तो ऐसा संभव नहीं है। कोई भी एंकर टीवी पर आकर कुछ भी नहीं कह देता है। उसके पीछे उसकी पूरी टीम लगी हुई होती है और जिस मीडिया हाउस में हम काम कर रहे हैं, उसकी पूरी एक नियमावली होती है, कुछ सिद्धांत होते हैं और एंकर उससे ही बंधा हुआ होता है। अगर कोई एंकर किसी और दल या विचारधारा के व्यक्ति को आमंत्रित ही न करे तो आप जरूर उस पर ये आरोप लगा सकते हैं, लेकिन जब वह एंकर सबको मौका दे रहा है तो आप कैसे कह सकते हैं कि वो किसी का पक्ष ले रहा है। हम सिर्फ अपने दर्शक को सच दिखाते हैं।
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