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HC ने कहा- आरोपी को दोषी मानने के लिए मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकती पुलिस
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को कहा कि पुलिस या कोई भी अन्य एजेंसी जनता की यह राय कायम करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकती
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को कहा कि पुलिस या कोई भी अन्य एजेंसी जनता की यह राय कायम करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकती कि आरोपी ही कथित अपराध का गुनहगार है वह भी तब जब मामले में जांच जारी हो, क्योंकि इसमें मासूमियत के अनुमान को रद्द करने की क्षमता है।
हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी जेएनयू छात्रा और पिंजरा तोड़ संगठन की सदस्य देवांगना कलिथा की याचिका पर की, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके खिलाफ कुछ साक्ष्यों को चयनात्मक तरीके से मीडिया में लीक किया।
कोर्ट ने कहा कि सांप्रदायिक दंगों से संबंधित मामला निसंदेह संवेदनशील है। सोमवार को हाई कोर्ट ने देवांगना कलिथा के खिलाफ मुकदमा शुरू होने तक किसी भी तरह की सूचना प्रसारित करने से दिल्ली पुलिस को रोक दिया है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में दर्ज की गई एफआईआर का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया जाता है। वह यह उचित मानती है कि प्रतिवादी (दिल्ली पुलिस) को यह निर्देश दिया जाए कि वह किसी आरोपी या गवाह को लेकर तब तक कोई और संवाद न जारी करे जब तक कि आरोप (यदि कोई है) तय नहीं कर लिये जाते और मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं होती। न्यायमूर्ति विभु बाखरू ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया।
पिछले साल दिसंबर में संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में हुई हिंसा से जुड़े एक मामले में, 23 मई को गिरफ्तार की गई कलिथा तिहाड़ जेल में बंद है। उनके खिलाफ कुल चार मामले दर्ज हैं जिसमें उत्तरपूर्वी दिल्ली में इस साल हुए दंगों से जुड़ा मामला भी है। आरोप है कि उन्होंने दंगे से पहले महिलाओं के एक बड़े समूह को भड़काया था जिसके बाद इलाके में दंगा हुआ। इस दंगे में 53 लोगों की मौत हुई थी और 250 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। पिंजरा तोड़ दिल्ली के विभिन्न कॉलेज की छात्राओं और पूर्व छात्रों का संगठन है।
कलिथा की याचिका पर पारित 33 पन्नों के अपने फैसले में न्यायमूर्ति विभु बाखरू ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई खुली अदालत में करने की जरूरत है जबतक कि इसके विपरीत कोई निर्देश नहीं दिया जाता और कहा कि फिलहाल अदालत नहीं मानती की मुकदमे की सुनवाई के चरण में पुलिस को बयान जारी करने से रोकना उपयुक्त है। अदालत यह भी मानती है कि किसी कथित अपराध के आरोपी के दोषी होने को लेकर लोगों की राय बनाने के उद्देश्य से सूचनाओं को चुनिंदा तरीके से उजागर करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए आदेश सुनाते हुए न्यायमूर्ति बाखरू ने यह भी कहा कि हालांकि मामले को लेकर दो जून को दिल्ली पुलिस द्वारा मीडिया को जारी प्रेस नोट को खारिज करने की कलिथा की याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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