'टेलीग्राम' बैन के बाद CEO का दावा: 'रिलायंस' कर रही है BGP हाइजैकिंग

भारत में 'टेलीग्राम' पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध के बाद सीईओ पावेल ड्यूरोव (Pavel Durov) ने 'रिलायंस इंडस्ट्रीज' (Reliance Industries) पर इंटरनेट कनेक्टिविटी में दखल देने का आरोप लगाया है।

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2026
telegram


RE-NEET परीक्षा से पहले भारत सरकार द्वारा 'टेलीग्राम' (Telegram) पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। 'टेलीग्राम' (Telegram) के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पावेल ड्यूरोव (Pavel Durov) ने दावा किया है कि पेपर लीक की समस्या का समाधान किसी ऐप को बैन करना नहीं है, क्योंकि लीक सामग्री किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए साझा की जा सकती है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर किए गए एक पोस्ट में ड्यूरोव ने 'रिलायंस इंडस्ट्रीज' (Reliance Industries) पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि कंपनी BGP हाइजैकिंग (BGP Hijacking) नामक तकनीक का इस्तेमाल कर 'टेलीग्राम' (Telegram) की इंटरनेट कनेक्टिविटी को प्रभावित कर रही है। उनके अनुसार यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ अन्य देशों में भी उपयोगकर्ताओं को ऐसी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है।

ड्यूरोव ने यह भी आरोप लगाया कि 'रिलायंस' (Reliance) के कारोबारी संबंध 'मेटा' (Meta) के साथ हैं, जो 'व्हाट्सऐप' (WhatsApp), 'फेसबुक' (Facebook) और 'इंस्टाग्राम' (Instagram) जैसे प्लेटफॉर्म संचालित करती है। हालांकि उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सार्वजनिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया।

गौरतलब है कि 'नेशनल टेस्टिंग एजेंसी' (National Testing Agency-NTA) के अनुसार RE-NEET 2026 परीक्षा से पहले कुछ 'टेलीग्राम' (Telegram) समूहों में संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी मिली थी। इसके बाद सरकार ने 'सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम' (Information Technology Act) के तहत कार्रवाई करते हुए प्लेटफॉर्म पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया।

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हिंदुस्तान डिजिटल को बाय बोलकर अब NDTV Digital (Hindi) से जुड़े सूर्य प्रकाश

करीब पांच वर्षों तक हिंदुस्तान डिजिटल से जुड़े रहे वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार सूर्य प्रकाश ने नई जिम्मेदारी संभालते हुए NDTV India की डिजिटल टीम में कदम रखा है।

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2026
Surya Prakash

डिजिटल मीडिया जगत के अनुभवी पत्रकार सूर्य प्रकाश ने अपने नए सफर की शुरुआत की है। उन्होंने हाल ही में NDTV India की डिजिटल टीम में डिप्टी एडिटर के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। इसकी जानकारी उन्होंने सोशल मीडिया के जरिये साझा की।

सूर्य प्रकाश ने अपने पोस्ट में लिखा कि पत्रकारिता के सफर में एक नया पड़ाव आया है और वह अब NDTV India की डिजिटल टीम का हिस्सा बन गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बीते पांच वर्षों से उनकी पेशेवर पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हिंदुस्तान डिजिटल का साथ अब छूट गया है और अब नई पारी की शुरुआत हो रही है।

सूर्य प्रकाश पिछले करीब पांच वर्षों से हिंदुस्तान डिजिटल से जुड़े हुए थे। वह वहां एसोसिएट एडिटर के रूप में कार्यरत थे और लाइव हिंदुस्तान के न्यूज ऑपरेशंस की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, वायरल और मौसम से जुड़ी खबरों के कंटेंट ऑपरेशंस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सूर्य प्रकाश को डिजिटल मीडिया क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर में हिंदुस्तान डिजिटल, इंडियन एक्सप्रेस समूह, नवभारत टाइम्स डॉट कॉम, टाइम्स इंटरनेट, अमर उजाला और दिव्य हिमाचल जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई हैं।

मास कम्युनिकेशन और पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले सूर्य प्रकाश की कंटेंट स्ट्रेटेजी, सोशल मीडिया स्ट्रेटेजी, एनालिटिक्स और एसईओ जैसे क्षेत्रों में भी विशेषज्ञता है।

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो सूर्य प्रकाश ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में ग्रेजुएशन और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है।

उन्होंने जम्मू कश्मीर में हाइब्रिड वारफेयर जैसे महत्वपूर्ण टॉपिक पर हाल ही में पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की है। समाचार4मीडिया की ओर से सूर्य प्रकाश को उनकी नई पारी के लिए ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।

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AI से बने विज्ञापनों की मानवीय समीक्षा जरूरी: 'ओपनएआई' ने जारी किए नए नियम

'ओपनएआई' (OpenAI) ने अपनी नई Ad Tools Terms जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि AI से तैयार विज्ञापनों की अंतिम जिम्मेदारी विज्ञापनदाताओं और मार्केटर्स की होगी।

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2026
openaiindia

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence-AI) आधारित विज्ञापन तेजी से विज्ञापन उद्योग का हिस्सा बन रहे हैं, लेकिन 'ओपनएआई' (OpenAI) ने अपनी नई Ad Tools Terms में साफ कर दिया है कि AI द्वारा तैयार किए गए विज्ञापनों की जिम्मेदारी पूरी तरह विज्ञापनदाताओं और मार्केटर्स की होगी।

कंपनी ने विज्ञापन निर्माण, ऑडियंस टार्गेटिंग, कस्टम ऑडियंस, कन्वर्जन मापन और AI आधारित क्रिएटिव टूल्स जैसी कई नई सुविधाएं पेश की हैं, लेकिन किसी भी जोखिम या गलती की जवाबदेही उपयोगकर्ताओं पर ही रहेगी।

नई नीति के अनुसार विज्ञापनदाताओं को AI द्वारा तैयार कंटेंट की सटीकता, उपयुक्तता और कानूनी अनुपालन की जांच स्वयं करनी होगी। 'ओपनएआई' (OpenAI) ने चेतावनी दी है कि AI जनरेटेड कंटेंट कभी-कभी गलत, भ्रामक, अपूर्ण या किसी विशेष उद्देश्य के लिए अनुपयुक्त हो सकता है। इसलिए किसी भी विज्ञापन को प्रकाशित करने से पहले मानवीय समीक्षा को अनिवार्य माना गया है।

कंपनी ने ऑडियंस डेटा के उपयोग को लेकर भी कड़े नियम लागू किए हैं। विज्ञापनदाता केवल उसी ग्राहक डेटा का उपयोग कर सकेंगे, जिसके लिए उनके पास स्पष्ट अनुमति और कानूनी आधार हो। डेटा ब्रोकर्स से प्राप्त ऑडियंस डेटा के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है। इसके अलावा जाति, धर्म, राजनीतिक विचार, स्वास्थ्य स्थिति, यौन अभिरुचि, बायोमेट्रिक जानकारी और अन्य संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा के आधार पर टार्गेटिंग की अनुमति नहीं होगी।

'ओपनएआई' (OpenAI) ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके टूल्स का इस्तेमाल फर्जी समर्थन (Endorsement), भ्रामक सामग्री, अनधिकृत पहचान या सिंथेटिक मीडिया तैयार करने के लिए नहीं किया जा सकता। कंपनी ने विज्ञापन प्रदर्शन, पहुंच, कन्वर्जन या व्यावसायिक परिणामों की कोई गारंटी भी नहीं दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति दर्शाती है कि AI भले ही विज्ञापन निर्माण को आसान बना रहा हो, लेकिन पारदर्शिता, सटीकता और कानूनी जिम्मेदारी की अंतिम जवाबदेही अब भी इंसानों और ब्रांड्स पर ही रहेगी।

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बढ़ते साइबर खतरों के बीच 'सॉफ्टबैंक' और 'ओपनएआई' ने शुरू की नई सेवा

'सॉफ्टबैंक' और 'ओपनएआई' ने जापान में AI आधारित साइबर सुरक्षा सेवा शुरू करने की घोषणा की है। इसका उद्देश्य कंपनियों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को उन्नत साइबर हमलों से सुरक्षित रखना है।

Last Modified:
Wednesday, 17 June, 2026
softbank

साइबर अपराधों और डिजिटल हमलों के बढ़ते खतरे के बीच जापान की प्रमुख टेक कंपनी 'सॉफ्टबैंक' (SoftBank) ने 'ओपनएआई' (OpenAI) के साथ मिलकर नई AI आधारित साइबर सुरक्षा सेवा शुरू करने की घोषणा की है। इस पहल का उद्देश्य कंपनियों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को तेजी से विकसित हो रहे साइबर खतरों से सुरक्षित रखना है।

टोक्यो में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान 'सॉफ्टबैंक' (SoftBank) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मासायोशी सोन (Masayoshi Son) ने कहा कि साइबर सुरक्षा अब जापान के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। उनके अनुसार, आज के साइबर हमले पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल, तेज और खतरनाक हो गए हैं, जिससे कंपनियों और सरकारी संस्थानों को बड़े जोखिम का सामना करना पड़ रहा है।

नई सेवा को जापान की लगभग 3,000 बड़ी कंपनियों और संस्थाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इनमें हवाई अड्डे, बिजली आपूर्ति नेटवर्क, परिवहन प्रणाली और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे से जुड़ी संस्थाएं शामिल हैं।

सेवा के तहत सबसे पहले किसी संगठन की डिजिटल सुरक्षा का विस्तृत आकलन किया जाएगा। इसके बाद AI की मदद से सिस्टम में मौजूद कमजोरियों और संभावित सुरक्षा खामियों की पहचान कर उन्हें दूर करने के लिए आवश्यक सुरक्षा सुझाव और पैच उपलब्ध कराए जाएंगे।

यह परियोजना 'सॉफ्टबैंक' (SoftBank) और 'ओपनएआई' (OpenAI) के संयुक्त उपक्रम 'एसबी ओएआई जापान' (SB OAI Japan) के तहत संचालित की जाएगी। इस संयुक्त उपक्रम की स्थापना जापानी बाजार के लिए विशेष AI सेवाएं विकसित करने के उद्देश्य से की गई थी।

कार्यक्रम में 'ओपनएआई' (OpenAI) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सैम ऑल्टमैन (Sam Altman) वीडियो संदेश के माध्यम से जुड़े, जबकि कंपनी के मुख्य शोध अधिकारी मार्क चेन (Mark Chen) ने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया।

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Waka Waka से Dai Dai तक: जब FIFA World Cup के गानों ने जीता दुनिया का दिल

फुटबॉल विश्व कप के इतिहास में अगर किसी एक गाने को सबसे बड़ा और सबसे लोकप्रिय वर्ल्ड कप एंथम कहा जाए, तो वह निस्संदेह शकीरा का "वाका वाका" है।

Last Modified:
Saturday, 13 June, 2026
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आर्येंद्र खान, कॉरेस्पोंडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।   

फुटबॉल विश्व कप के इतिहास में अगर किसी एक गाने को सबसे बड़ा और सबसे लोकप्रिय वर्ल्ड कप एंथम कहा जाए, तो वह निस्संदेह शकीरा का "वाका वाका (This Time for Africa)" है। यह गाना आज भी बाकी सभी विश्व कप गीतों से काफी आगे माना जाता है। "वाका वाका" के नाम Spotify पर सबसे ज्यादा स्ट्रीम किए गए FIFA World Cup Song का Guinness World Record दर्ज है। वहीं, YouTube पर इसे 4 अरब से अधिक बार देखा जा चुका है।

साल 2019 तक यह गाना दुनिया भर में 1.5 करोड़ से ज्यादा डिजिटल डाउनलोड हासिल कर चुका था, जिससे यह इतिहास के सबसे ज्यादा बिकने वाले डिजिटल सिंगल्स में शामिल हो गया। यह गीत ऐसे समय आया जब YouTube एक वैश्विक प्लेटफॉर्म के रूप में तेजी से उभर रहा था और इसी लहर पर सवार होकर "वाका वाका" ने सांस्कृतिक इतिहास में अपनी स्थायी जगह बना ली।

हालांकि इसकी सफलता का सफर विवादों से पूरी तरह अछूता नहीं रहा। जब FIFA ने अफ्रीकी महाद्वीप में पहली बार आयोजित होने वाले विश्व कप के लिए कोलंबियाई पॉप स्टार शकीरा को आधिकारिक गीत रिकॉर्ड करने के लिए चुना, तो कई लोगों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि उद्घाटन समारोह में अफ्रीकी कलाकारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इसके बाद FIFA और शकीरा की टीम ने दक्षिण अफ्रीका के Afro-fusion बैंड Freshlyground को भी इस गीत का हिस्सा बनाया।

इसके अलावा इस गीत पर साहित्यिक चोरी यानी प्लेजरिज्म के आरोप भी लगे। दावा किया गया कि इसका कोरस कैमरून के समूह Golden Sounds के 1980 के दशक के लोकप्रिय गीत "Zangaléwa" से लिया गया है। बाद में Sony Music और शकीरा की मैनेजमेंट टीम ने अदालत के बाहर समझौता किया और Zangaléwa के रचनाकारों को सह-लेखक का श्रेय दिया गया।

इन विवादों के बावजूद "वाका वाका" की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ा। 16 साल बाद भी जब कोई विश्व कप का नाम लेता है, तो सबसे पहले लोगों के दिमाग में यही धुन गूंजती है।

‘La Copa de la Vida’ जिसने बदल दिया वर्ल्ड कप म्यूजिक का इतिहास

1998 के फ्रांस विश्व कप के लिए रिकी मार्टिन का गीत "La Copa de la Vida (The Cup of Life)" आधुनिक वर्ल्ड कप एंथम का शुरुआती बिंदु माना जाता है।

इस गीत ने लैटिन पॉप और अंग्रेजी पॉप संगीत को एक साथ जोड़ दिया। यह सिर्फ विश्व कप का आधिकारिक गीत नहीं था, बल्कि इसी ने रिकी मार्टिन को क्षेत्रीय स्पेनिश भाषा के स्टार से वैश्विक सुपरस्टार बना दिया। 1990 और 2000 के दशक में लैटिन पॉप संगीत की जो वैश्विक लहर देखने को मिली, उसकी शुरुआत काफी हद तक इसी गीत से मानी जाती है।

गीत में इस्तेमाल हुआ "Ole, Ole, Ole" का नारा बाद में दुनिया का सबसे लोकप्रिय फुटबॉल नारा बन गया। आज भी FIFA के लिए बनने वाले लगभग सभी गीत किसी न किसी रूप में इसी फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश करते हैं।

‘Un'estate italiana’ से शुरू हुआ वर्ल्ड कप एंथम का दौर

1990 के इटली विश्व कप का गीत "Un'estate italiana (Notti Magiche)" वह मोड़ था जहां से आधुनिक वर्ल्ड कप एंथम की अवधारणा शुरू हुई।

यह गीत पूरे यूरोप में लोकप्रिय हुआ और एक सांस्कृतिक पहचान बन गया। इसी गीत ने वह फॉर्मूला तैयार किया जिसे बाद में लगभग हर वर्ल्ड कप गीत ने अपनाया- द्विभाषी कोरस, स्टेडियम में गूंजने वाली धुन और समापन समारोह में प्रस्तुति।

इटालिया 90 वास्तव में पहला FIFA World Cup था जिसने आधिकारिक गीत को औपचारिक रूप से अपनाया। 36 साल बाद भी "Notti Magiche" की शुरुआती धुन सुनकर फुटबॉल प्रेमियों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

‘We Are One’ ने दिखाई ब्राजील की रंगीन झलक

2014 विश्व कप के लिए पिटबुल, जेनिफर लोपेज और ब्राजीलियाई स्टार क्लाउडिया लिट्टे ने मिलकर "We Are One (Ole Ola)" पेश किया। अंग्रेजी, स्पेनिश और पुर्तगाली भाषाओं के मेल से बना यह गीत काफी भव्य और ऊर्जावान था। YouTube पर इसे एक अरब से ज्यादा बार देखा जा चुका है।

हालांकि "वाका वाका" के मुकाबले इसे उतनी भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान नहीं मिल सकी। कई लोगों के लिए यह वह दौर था जब वर्ल्ड कप गीत एक संगीत आयोजन की बजाय ब्रांड प्रमोशन जैसा महसूस होने लगा।

‘Dai Dai’ के साथ शकीरा की ऐतिहासिक वापसी

2026 विश्व कप के लिए शकीरा एक बार फिर आधिकारिक गीत "Dai Dai" के साथ लौटी हैं। हालांकि अभी इसकी लोकप्रियता का अंतिम मूल्यांकन करना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसकी टीम और पैमाना इसे शीर्ष वर्ल्ड कप गीतों में शामिल करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।

इस गीत में Afrobeats, Dance-Pop और Reggaeton का मिश्रण है। शकीरा ने इसे वैश्विक एकता के संदेश के साथ तैयार किया है। गीत के सह-लेखकों में Ed Sheeran भी शामिल हैं और इसके कोरस में कई भाषाओं का इस्तेमाल किया गया है।

"Dai Dai" का अर्थ इतालवी भाषा में "Come On, Come On" यानी "आगे बढ़ो, अपना सर्वश्रेष्ठ दो" होता है। इस गीत के साथ शकीरा विश्व कप संगीत के चार अलग-अलग दौरों का हिस्सा बनने वाली पहली कलाकार बन गई हैं।

‘Gloryland’ को नहीं मिला उसका हक

1994 विश्व कप अमेरिका में आयोजित हुआ और इसी के साथ आया "Gloryland"। रॉक, आरएंडबी और सोल संगीतकार Daryl Hall तथा संगीत समूह Sounds of Blackness द्वारा प्रस्तुत इस गीत में Gospel संगीत का प्रभाव साफ दिखाई देता था।

सैक्सोफोन की मधुर धुनों से सजा यह गीत गर्मजोशी, ईमानदारी और अमेरिकी सांस्कृतिक पहचान से भरपूर था। बावजूद इसके, वर्ल्ड कप एंथम की चर्चाओं में इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

‘Dreamers’ बना कतर विश्व कप का सरप्राइज हिट

2022 विश्व कप के दौरान BTS के सदस्य Jung Kook और कतरी गायक Fahad Al Kubaisi का गीत "Dreamers" सबसे चर्चित गीतों में से एक बन गया।

Jung Kook के वैश्विक फैनबेस ने इस गीत को सोशल मीडिया पर जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई। इतना ही नहीं, गीत में भावनात्मक गहराई भी थी, जिसकी वजह से समय के साथ इसकी लोकप्रियता और बढ़ी। कई लोगों का मानना है कि यह उस विश्व कप के मुख्य आधिकारिक गीत से भी ज्यादा सफल साबित हुआ।

‘The Time of Our Lives’ का अनोखा प्रयोग

2006 विश्व कप के लिए Il Divo और Toni Braxton ने मिलकर "The Time of Our Lives" रिकॉर्ड किया। कागज पर यह साझेदारी बेहद असामान्य लगती थी, लेकिन परिणाम काफी हद तक सफल रहा। गीत में ओपेरा और पॉप संगीत का मिश्रण था, जो उस समय की संगीत शैली को दर्शाता था।

‘Live It Up’ उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका

2018 विश्व कप के लिए Will Smith, Nicky Jam और Era Istrefi का गीत "Live It Up" काफी चर्चा में रहा। कई लोगों को लगा था कि Will Smith जैसे स्टार की मौजूदगी इस गीत को ऐतिहासिक बना देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गीत लोकप्रिय तो हुआ, लेकिन टूर्नामेंट खत्म होने के कुछ महीनों बाद ही लोगों की यादों से धुंधला पड़ गया।

इसके विपरीत, उसी विश्व कप के दौरान Coca-Cola के अभियान से जुड़ा K'naan का "Wavin' Flag" लोगों के दिलों में कहीं ज्यादा गहराई से बस गया।

‘Hayya Hayya’ छाया में रह गया

2022 विश्व कप में FIFA ने पहली बार एक मल्टी-सॉन्ग एल्बम फॉर्मेट अपनाया और "Hayya Hayya (Better Together)" उसका प्रमुख गीत था। हालांकि यह गीत अपने पूर्ववर्ती विश्व कप गीतों की छाया से बाहर नहीं निकल सका और समय के साथ लोगों की यादों में Jung Kook का "Dreamers" उससे ज्यादा मजबूत स्थान बनाने में सफल रहा।

शुरुआती दौर के गीतों ने रखी नींव

पॉप संगीत के दौर से पहले विश्व कप के गीत आज की तरह बड़े एंथम नहीं होते थे। वे अधिकतर ऑर्केस्ट्रा धुनों, मार्चिंग म्यूजिक और यादगार रिकॉर्डिंग्स के रूप में तैयार किए जाते थे। 1962 में चिली विश्व कप के लिए Los Ramblers का "El Rock del Mundial" पहला व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त आधिकारिक गीत माना जाता है।

1966 में इंग्लैंड के "World Cup Willie" ने पहली बार पॉप संगीत जैसी पहचान बनाई। वहीं 1978 विश्व कप की थीम प्रसिद्ध संगीतकार Ennio Morricone ने तैयार की थी।

ये गीत Spotify प्लेलिस्ट के लिए नहीं, बल्कि स्टेडियम और इतिहास के लिए बनाए गए थे। इन्हें असफलता नहीं बल्कि उस नींव के रूप में देखा जाना चाहिए, जिस पर आज का पूरा वर्ल्ड कप म्यूजिक उद्योग खड़ा है।

फुटबॉल के साथ-साथ संगीत का भी महाकुंभ

1962 की ऑर्केस्ट्रा धुनों से लेकर 2026 के Afrobeats फ्यूजन तक, विश्व कप गीत पिछले 64 वर्षों से यह दिखाते रहे हैं कि कौन-सा संगीत शैली दुनिया को सबसे ज्यादा जोड़ सकती है, जो सफर स्थानीय रिकॉर्डिंग्स से शुरू हुआ था, वह आज एक विशाल मनोरंजन उद्योग का रूप ले चुका है। अब विश्व कप संगीत में एल्बम, हाफटाइम शो, ब्रांड पार्टनरशिप और बौद्धिक संपदा (IP) से जुड़े समझौते भी शामिल हो चुके हैं।

आज स्थिति यह है कि विश्व कप के संगीत की रणनीति और फुटबॉल की रणनीति दोनों लगभग समान महत्व रखती हैं।

और अगर "वाका वाका" ने दुनिया को कुछ सिखाया है, तो वह यह है कि सही समय पर आया एक सही गीत सिर्फ टूर्नामेंट ही नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी और एक पूरे दौर से भी ज्यादा समय तक याद रखा जा सकता है।

 

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टीवी से मोबाइल तक: क्या यूट्यूब बन रहा है नई पत्रकारिता का सबसे बड़ा मंच?

भारत में खबरें देखने और समझने का तरीका तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले तक ज्यादातर लोग खबरों के लिए अखबार और टीवी न्यूज चैनलों पर निर्भर थे, लेकिन अब मोबाइल स्क्रीन उनकी पहली पसंद बनती जा रही है।

Last Modified:
Saturday, 13 June, 2026
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भारत में पत्रकारिता का तरीका तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले तक खबरों के लिए लोग अखबार और टीवी न्यूज चैनलों पर निर्भर रहते थे। बड़े-बड़े न्यूज स्टूडियो, तेज आवाज में बहस करते एंकर और “ब्रेकिंग न्यूज” की होड़ टीवी पत्रकारिता की पहचान बन चुके थे। लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है।

आज बड़ी संख्या में लोग मोबाइल पर खबरें देखना और समझना पसंद कर रहे हैं। बदलाव सिर्फ प्लेटफॉर्म का नहीं है, बल्कि खबर पेश करने के तरीके का भी है। अब दर्शक शोर-शराबे और लंबी बहसों की बजाय ऐसे लोगों को सुनना पसंद करते हैं जो सरल भाषा में, सीधे और तथ्यों के साथ अपनी बात रखें। वे ऐसे कंटेंट को ज्यादा पसंद कर रहे हैं जो उन्हें जानकारी देने के साथ किसी विषय को आसानी से समझाए भी।

यहीं से “क्रिएटर जर्नलिज्म” यानी क्रिएटर आधारित पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ है। यह पत्रकारिता बड़े टीवी स्टूडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि यूट्यूब चैनलों, पॉडकास्ट और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए लोगों तक पहुंच रही है।

भारत में यूट्यूब अब केवल मनोरंजन का मंच नहीं रह गया है। यह खबरों, विश्लेषण, एक्सप्लेनर वीडियो, इंटरव्यू और जनमत का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। यही वजह है कि आज पारंपरिक मीडिया संस्थानों और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स के बीच दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने की सीधी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है।

भारत और यूट्यूब: दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल दर्शक वर्ग

भारत आज यूट्यूब का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। स्टैटिस्टा और गूगल ऐड्स के अनुमान के मुताबिक 2026 में भारत में यूट्यूब की विज्ञापन पहुंच करीब 51 से 52 करोड़ यूजर्स के आसपास है। यानी दुनिया में सबसे ज्यादा यूट्यूब दर्शक भारत में मौजूद हैं।

दुनियाभर में यूट्यूब के करीब 2.5 से 2.7 अरब मंथली एक्टिव यूजर्स माने जाते हैं। भारत का योगदान इसमें लगातार बढ़ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है सस्ता मोबाइल इंटरनेट, किफायती स्मार्टफोन और क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट की तेज बढ़त।

कुछ साल पहले तक यूट्यूब को केवल गानों, कॉमेडी वीडियो या मनोरंजन मंच के तौर पर देखा जाता था। लेकिन अब लोग यहां न्यूज, राजनीति, करेंट अफेयर्स, वित्त, शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर भी बड़ी संख्या में वीडियो देख रहे हैं।

भारत में डिजिटल ऑडियंस खास तौर पर “वीडियो-फर्स्ट” हो चुकी है। यानी लोग खबरें पढ़ने से ज्यादा देखना पसंद कर रहे हैं। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट भी बताती है कि भारत समेत कई देशों में सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म्स न्यूज देखने का बड़ा माध्यम बनते जा रहे हैं।

यही वजह है कि आज यूट्यूब क्रिएटर्स का प्रभाव कई टीवी एंकरों के बराबर या कुछ मामलों में उससे भी ज्यादा दिखाई देता है।

क्रिएटर पत्रकारिता: नए दौर के डिजिटल पत्रकार

भारत में यूट्यूब आधारित पत्रकारिता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां दो तरह के लोग दिखाई देते हैं।

पहला वर्ग उन पत्रकारों का है जिन्होंने टीवी न्यूज छोड़कर स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किए। दूसरा वर्ग उन युवाओं का है जो कभी किसी न्यूज रूम का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन उन्होंने रिसर्च आधारित कंटेंट और एक्सप्लेनर वीडियो के जरिए बड़ी ऑडियंस बना ली।

रवीश कुमार: टीवी से डिजिटल तक

पूर्व एनडीटीवी पत्रकार रवीश कुमार इस बदलाव का बड़ा उदाहरण हैं। 2022 में एनडीटीवी छोड़ने के बाद उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया। कुछ ही समय में उनका चैनल भारत के सबसे बड़े स्वतंत्र न्यूज प्लेटफॉर्म्स में शामिल हो गया।

डिजिटल ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक उनके चैनल के सब्सक्राइबर्स करोड़ों में हैं और उनके वीडियो अरबों बार देखे जा चुके हैं। रवीश कुमार की लोकप्रियता यह दिखाती है कि दर्शक सिर्फ बड़े मीडिया ब्रांड को नहीं, बल्कि भरोसेमंद चेहरों को भी फॉलो करते हैं।

अजीत अंजुम: ग्राउंड रिपोर्टिंग का डिजिटल चेहरा

वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम भी उन बड़े नामों में शामिल हैं जिन्होंने डिजिटल पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई है। लंबे समय तक टीवी न्यूज इंडस्ट्री में काम करने के बाद उन्होंने यूट्यूब को अपना मुख्य मंच बनाया।

अजीत अंजुम की खास पहचान उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग और चुनावी कवरेज मानी जाती है। वे अक्सर छोटे शहरों, गांवों और आम लोगों के बीच जाकर रिपोर्टिंग करते हैं। यही वजह है कि उनकी पत्रकारिता को “ग्राउंड कनेक्टेड जर्नलिज्म” कहा जाता है।

उनके यूट्यूब चैनल पर लाखों सब्सक्राइबर्स हैं और चुनाव, राजनीति, किसान आंदोलन, बेरोजगारी और सामाजिक मुद्दों पर उनके वीडियो को बड़ी संख्या में देखा जाता है।

डिजिटल दौर में अजीत अंजुम की सफलता यह दिखाती है कि दर्शक आज भी फील्ड रिपोर्टिंग और जमीनी पत्रकारिता को महत्व देते हैं। जहां टीवी न्यूज पर स्टूडियो बहसों का दबदबा बढ़ा है, वहीं यूट्यूब पर ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को अलग पहचान मिल रही है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी: टीवी के तेज तेवर से डिजिटल पत्रकारिता तक

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी भी उन चर्चित चेहरों में शामिल हैं जिन्होंने टीवी न्यूज से आगे बढ़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मजबूत उपस्थिति बनाई। लंबे समय तक विभिन्न न्यूज चैनलों में एंकरिंग और राजनीतिक विश्लेषण करने के बाद उन्होंने यूट्यूब और डिजिटल माध्यमों पर अपनी अलग पहचान बनाई।

पुण्य प्रसून बाजपेयी अपने तीखे राजनीतिक विश्लेषण, सत्ता से सवाल पूछने की शैली और गहरे मुद्दों पर आधारित कार्यक्रमों के लिए जाने जाते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने के बाद उन्होंने लंबे फॉर्मेट वाले वीडियो, विश्लेषण और समसामयिक मुद्दों पर आधारित कंटेंट के जरिए बड़ी ऑडियंस तैयार की।

उनके वीडियो खास तौर पर उन दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं जो टीवी की तेज बहसों की बजाय विस्तार से मुद्दों को समझना चाहते हैं।

पुण्य प्रसून बाजपेयी का उदाहरण यह भी दिखाता है कि डिजिटल पत्रकारिता ने अनुभवी टीवी पत्रकारों को एक नया मंच दिया है, जहां वे बिना समय की पाबंदी के अपनी बात रख सकते हैं और सीधे दर्शकों से जुड़ सकते हैं।

ध्रुव राठी: एक्सप्लेनर पत्रकारिता का बड़ा चेहरा

ध्रुव राठी भारत के सबसे चर्चित डिजिटल क्रिएटर्स में गिने जाते हैं। उनके वीडियो राजनीति, प्रशासन, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक मुद्दों पर आधारित होते हैं। उन्होंने यूट्यूब पर “एक्सप्लेनर फॉर्मेट” को लोकप्रिय बनाया। यानी जटिल मुद्दों को आसान भाषा, ग्राफिक्स और रिसर्च के जरिए समझाना।

उनके अलग-अलग चैनलों और बहुभाषी ऑडियंस को मिलाकर करोड़ों सब्सक्राइबर्स हैं। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके वीडियो पर अरबों व्यूज आ चुके हैं। ध्रुव राठी की सफलता ने यह साबित किया कि यूट्यूब पर लंबी और रिसर्च आधारित पत्रकारिता भी बड़े स्तर पर सफल हो सकती है।

नितीश राजपूत: हिंदी डिजिटल ऑडियंस की नई पसंद

नितीश राजपूत ने हिंदी ऑडियंस के बीच एक्सप्लेनर और करेंट अफेयर्स वीडियो के जरिए मजबूत पहचान बनाई है। उनके वीडियो खास तौर पर युवा दर्शकों में लोकप्रिय हैं क्योंकि वे कठिन विषयों को सरल हिंदी में समझाने की कोशिश करते हैं।

डिजिटल एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक उनके सब्सक्राइबर्स करोड़ों के करीब पहुंच चुके हैं और उनके वीडियो लगातार हाई एंगेजमेंट हासिल करते हैं।

बरखा दत्त और मोजो स्टोरी

टीवी पत्रकारिता का बड़ा नाम रही बरखा दत्त ने भी डिजिटल प्लेटफॉर्म “मोजो स्टोरी” शुरू किया। कोविड महामारी के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग और फील्ड पत्रकारिता की वजह से इस प्लेटफॉर्म को काफी पहचान मिली। यूट्यूब पर मोजो स्टोरी ने स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता का एक अलग मॉडल पेश किया।

फेय डिसूजा: शांत और तथ्य आधारित पत्रकारिता

मिरर नाउ की पूर्व एग्जिक्यूटिव एडिटर फेय डिसूजा भी डिजिटल पत्रकारिता की बड़ी आवाज बन चुकी हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि वे सनसनीखेज पत्रकारिता से दूर रहकर शांत और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करती हैं।

डिजिटल ऑडियंस के एक बड़े वर्ग को यह तरीका ज्यादा भरोसेमंद लगता है।

आखिर दर्शक टीवी न्यूज से दूर क्यों जा रहे हैं?

यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि लोग टीवी छोड़कर मोबाइल पर न्यूज देखने लगे?

इसकी कई वजहें हैं।

  1. शोर और बहस से थक चुकी ऑडियंस

पिछले कुछ वर्षों में टीवी न्यूज पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वहां तथ्यों से ज्यादा चीख-पुकार दिखाई देती है। प्राइम टाइम बहसों में कई बार चर्चा से ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते हैं। इससे दर्शकों का एक वर्ग धीरे-धीरे टीवी से दूर हुआ। इसके मुकाबले यूट्यूब क्रिएटर्स लंबे फॉर्मेट में बिना रुकावट अपनी बात रखते हैं।

  1. मोबाइल-फर्स्ट पीढ़ी

भारत की नई डिजिटल पीढ़ी मोबाइल पर ही कंटेंट देखती है। आज बड़ी संख्या में युवा ऑडियंस टीवी नहीं देखती। उनके लिए यूट्यूब, इंस्टाग्राम और पॉडकास्ट ही सूचना के मुख्य स्रोत बन चुके हैं।

  1. व्यक्तिगत पसंद वाला कंटेंट

यूट्यूब एल्गोरिदम दर्शक की पसंद के हिसाब से कंटेंट दिखाता है। अगर कोई व्यक्ति राजनीति देखता है तो उसे उसी तरह के वीडियो ज्यादा दिखाई देते हैं। यही वजह है कि यूजर्स अपने पसंदीदा क्रिएटर्स से जुड़ाव महसूस करते हैं।

  1. लंबे फॉर्मेट वाले वीडियो

टीवी न्यूज में समय सीमित होता है। लेकिन यूट्यूब पर क्रिएटर्स 20 मिनट, 40 मिनट या एक घंटे तक किसी मुद्दे को विस्तार से समझा सकते हैं। यही वजह है कि एक्सप्लेनर पत्रकारिता तेजी से लोकप्रिय हुई है।

आईपीएल और डिजिटल बदलाव

भारत में मनोरंजन और खेल देखने का तरीका भी तेजी से बदल रहा है। इंडस्ट्री रिपोर्ट्स और मीडिया ट्रैकिंग डेटा बताते हैं कि आईपीएल जैसे बड़े आयोजनों में डिजिटल दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि पारंपरिक टीवी की वृद्धि धीमी पड़ रही है। जियोस्टार और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक आईपीएल के दौरान करोड़ों यूजर्स डिजिटल माध्यमों पर मैच देख रहे हैं।

इसका मतलब साफ है- दर्शक गए नहीं, बल्कि मंच बदल गया है। जहां पहले पूरा परिवार टीवी के सामने बैठता था, अब हर व्यक्ति अपने मोबाइल पर अलग-अलग कंटेंट देख रहा है।

 

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‘जोहो’ ने लॉन्च किया पहला स्वदेशी सर्वर ‘नाथू ला’ : विदेशी कंपनियों को मिलेगी चुनौती

‘जोहो’ (Zoho) ने अपना पहला स्वदेशी सर्वर प्लेटफॉर्म ‘नाथू ला’ लॉन्च किया है। कंपनी का दावा है कि यह सर्वर बिजली की खपत और रखरखाव लागत को कम करेगा।

Last Modified:
Friday, 12 June, 2026
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भारतीय टेक कंपनी ‘जोहो’ (Zoho) ने अपने पहले स्वदेशी सर्वर प्लेटफॉर्म ‘नाथू ला’ (Nathu La) को लॉन्च कर दिया है। अब तक मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर समाधान देने वाली कंपनी का यह कदम भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

खास बात यह है कि ‘नाथू ला’ (Nathu La) को बेंगलुरु या चेन्नई जैसे बड़े टेक केंद्रों में नहीं, बल्कि ‘जोहो’ (Zoho) के नागपुर स्थित सेंटर में डिजाइन किया गया है। इसे तैयार करने में कंपनी के ‘सेतु प्रोग्राम’ (Setu Program) से जुड़े युवा इंजीनियर्स ने ‘इंटेल’ (Intel) की टीम के साथ मिलकर काम किया। सर्वर में ‘इंटेल ज़िऑन 6’ (Intel Xeon 6) प्रोसेसर का उपयोग किया गया है।

कंपनी ने इस सर्वर का नाम हिमालय के प्रसिद्ध पहाड़ी दर्रे ‘नाथू ला’ के नाम पर रखा है, जो मजबूती और रणनीतिक महत्व का प्रतीक माना जाता है। ‘जोहो’ (Zoho) इस सर्वर को बाजार में बेचने की बजाय अपने 16 वैश्विक डेटा सेंटर्स (Global Data Centers) में इस्तेमाल करेगी। कंपनी का मानना है कि कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (Computing Infrastructure) पर अपना नियंत्रण भविष्य की तकनीकी जरूरतों के लिए बेहद अहम है।

कंपनी के अनुसार, ‘नाथू ला’ (Nathu La) सामान्य सर्वर्स की तुलना में 12 से 18 प्रतिशत तक कम बिजली की खपत करेगा। साथ ही रखरखाव लागत में 20 से 30 प्रतिशत तक की बचत संभव होगी। फिलहाल कंपनी ने कुछ सौ सर्वर तैनात किए हैं और साल के अंत तक इनकी संख्या 2,000 तक पहुंचाने की योजना है। AI के बढ़ते उपयोग के कारण सर्वर लागत में तेज बढ़ोतरी के बीच ‘जोहो’ (Zoho) का यह स्वदेशी समाधान उद्योग के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।

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'Zomato' की पैरेंट कंपनी 'Eternal' को GST विभाग का 9.63 करोड़ रुपये का नोटिस

‘जोमैटो’ (Zomato) की पैरेंट कंपनी ‘इटरनल’ (Eternal) को आंध्र प्रदेश GST विभाग से 9.63 करोड़ रुपये का टैक्स, ब्याज और जुर्माने से जुड़ा नोटिस मिला है। कंपनी ने कहा है कि उसका पक्ष मजबूत है।

Last Modified:
Thursday, 11 June, 2026
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‘जोमैटो’ (Zomato) की पैरेंट कंपनी ‘इटरनल’ (Eternal) को आंध्र प्रदेश के GST विभाग से 9.63 करोड़ रुपये की कर देनदारी (Tax Liability) से जुड़ा नोटिस मिला है। कंपनी ने बुधवार को नियामकीय फाइलिंग (Regulatory Filing) में इसकी जानकारी दी। फाइलिंग के मुताबिक, आंध्र प्रदेश के डिप्टी कमिश्नर (ST), स्टेट स्पेशल सर्किल-I (State Special Circle-I) ने अप्रैल 2023 से मार्च 2024 की अवधि के लिए 6.49 करोड़ रुपये की GST मांग को मंजूरी दी है। इसके अलावा 2.50 करोड़ रुपये ब्याज (Interest) और 64.87 लाख रुपये जुर्माना (Penalty) भी लगाया गया है।

कंपनी का कहना है कि मामले में उसका पक्ष मजबूत है और इससे किसी वित्तीय प्रभाव (Financial Impact) की उम्मीद नहीं है। कंपनी ने अपनी फाइलिंग में कहा, "हमें विश्वास है कि इस मामले में हमारा पक्ष मजबूत है और कंपनी पर इसका कोई वित्तीय असर पड़ने की संभावना नहीं है।" आदेश के तहत कुल देनदारी लगभग 9.63 करोड़ रुपये बनती है, जिसमें टैक्स, ब्याज और जुर्माना शामिल है।

दूसरी ओर, कंपनी के वित्तीय नतीजों में जनवरी-मार्च तिमाही (Q4 FY26) के दौरान मजबूत वृद्धि देखने को मिली। इस अवधि में कंपनी का कर पश्चात लाभ (Profit After Tax - PAT) 346.15 प्रतिशत बढ़कर 174 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि एक साल पहले समान अवधि में यह 39 करोड़ रुपये था। हालांकि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का PAT घटकर 366 करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 527 करोड़ रुपये था।

कंपनी का परिचालन राजस्व (Revenue from Operations) चौथी तिमाही में 196.4 प्रतिशत बढ़कर 17,292 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो एक साल पहले 5,833 करोड़ रुपये था। पूरे वित्त वर्ष में यह आंकड़ा बढ़कर 54,364 करोड़ रुपये रहा। कंपनी के फूड डिलीवरी बिजनेस (Food Delivery Business) यानी ‘जोमैटो’ (Zomato) ने तिमाही राजस्व में 33.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। यह बढ़कर 2,737 करोड़ रुपये हो गया, जबकि एक साल पहले यह 2,054 करोड़ रुपये था।

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क्विंट डिजिटल ने 100 करोड़ रुपये तक के NCD जारी करने की प्रक्रिया में बढ़ाया कदम

डिजिटल मीडिया कंपनी Quint Digital Limited ने 100 करोड़ रुपये तक के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (NCDs) जारी करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

Last Modified:
Wednesday, 10 June, 2026
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डिजिटल मीडिया कंपनी Quint Digital Limited ने 100 करोड़ रुपये तक के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (NCDs) जारी करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कंपनी ने इस संबंध में डिबेंचर ट्रस्ट डीड (DTD) पर हस्ताक्षर किए हैं।

कंपनी ने 8 जून 2026 को शेयर बाजार को दी गई सूचना में बताया कि उसने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के लिस्टिंग नियमों के तहत यह जानकारी साझा की है। यह अपडेट कंपनी की 22 मई 2026 की पूर्व सूचना के क्रम में जारी किया गया है।

क्विंट डिजिटल ने बताया कि उसने Catalyst Trusteeship Limited को डिबेंचर ट्रस्टी नियुक्त करते हुए डिबेंचर ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते में कंपनी के प्रमोटर राघव बहल, रितु कपूर और RB Diversified Private Limited भी पक्षकार हैं।

कंपनी अधिकतम 10,000 नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स जारी करेगी। प्रत्येक डिबेंचर का अंकित मूल्य 1 लाख रुपये होगा। इस तरह कंपनी कुल 100 करोड़ रुपये तक की राशि जुटा सकती है। यह इश्यू एक या अधिक चरणों (Tranches) में निजी प्लेसमेंट (Private Placement) के आधार पर किया जाएगा।

क्विंट डिजिटल ने स्पष्ट किया कि NCDs के प्रस्ताव, जारी करने और आवंटन की प्रक्रिया कंपनी अधिनियम, 2013, उससे संबंधित नियमों और अन्य लागू कानूनों के अनुसार की जाएगी।

कंपनी ने यह भी कहा कि NCDs के आवंटन के समय SEBI के लिस्टिंग नियमों और अनुसूची-III के तहत आवश्यक सभी विस्तृत जानकारियां अलग से स्टॉक एक्सचेंज को उपलब्ध कराई जाएंगी।

यह सूचना कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उपलब्ध कराई जाएगी। कंपनी ने शेयर बाजार से इस जानकारी को रिकॉर्ड में लेने का अनुरोध किया है।

यह खुलासा कंपनी सचिव एवं अनुपालन अधिकारी तरुण बेलवाल द्वारा किया गया है।

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'एचटी मीडिया’ का बड़ा फैसला: 'OTTplay' की सेवाएं होंगी बंद

‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ने अपने OTT एग्रीगेशन प्लेटफॉर्म OTTplay को बंद करने का फैसला लिया है। कंपनी का कहना है कि कई प्रयासों के बावजूद यह कारोबार टिकाऊ और लाभदायक मॉडल नहीं बन सका।

Last Modified:
Tuesday, 09 June, 2026
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‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ने अपने OTT एग्रीगेशन प्लेटफॉर्म OTTplay को बंद करने का फैसला लिया है। कंपनी ने कहा कि कारोबार को टिकाऊ और लाभदायक बनाने के लिए कई रणनीतियों पर काम किया गया, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

कंपनी ने अपने Q4 FY26 अर्निंग्स कॉल (Earnings Call) के दौरान इस फैसले की जानकारी दी। प्रबंधन ने इसे एक "सोच-समझकर लिया गया और मूल्य बढ़ाने वाला रीसेट" बताया, जो कंपनी की लाभदायक विकास रणनीति के अनुरूप है।

कंपनी के मुताबिक पिछले कई तिमाहियों के दौरान OTTplay के लिए कंटेंट (Content), कस्टमर एक्विजिशन (Customer Acquisition) और सब्सक्राइबर रिटेंशन (Subscriber Retention) से जुड़ी विभिन्न रणनीतियों का परीक्षण किया गया। हालांकि इनमें से कोई भी मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ साबित नहीं हो सका।

‘एचटी मीडिया’ (HT Media) के ग्रुप CEO पियूष गुप्ता (Piyush Gupta) ने कहा कि कंपनी ने प्लेटफॉर्म के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए कई विकल्पों पर विचार किया था, लेकिन अंततः संचालन बंद करने का फैसला लिया गया।

कंपनी ने OTT एग्रीगेशन बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को भी इस फैसले की एक बड़ी वजह बताया। खासतौर पर टेलीकॉम ऑपरेटर्स (Telecom Operators) द्वारा बंडल्ड सब्सक्रिप्शंस (Bundled Subscriptions) और व्यापक डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क्स (Distribution Networks) के जरिए अपनी एंटरटेनमेंट पेशकश बढ़ाने से प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई थी।

OTTplay ने टियर-II और टियर-III बाजारों पर फोकस करके खुद को अलग पहचान देने की कोशिश की थी, लेकिन कंपनी ने स्वीकार किया कि यह रणनीति टिकाऊ कारोबार में नहीं बदल सकी। कंपनी के अनुसार 31 मार्च 2026 के बाद OTTplay पर नए सब्सक्रिप्शंस (Subscriptions) बंद कर दिए गए हैं। हालांकि मौजूदा सब्सक्राइबर्स (Subscribers) अपने मौजूदा प्लान्स (Plans) की अवधि पूरी होने तक सेवाओं का लाभ लेते रहेंगे।

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क्या भारत दुनिया का अगला Animation Hub बनने की ओर बढ़ रहा है?

जब 1990 के दशक में भारत का IT सेक्टर उभर रहा था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन Infosys और TCS जैसी कंपनियां वैश्विक टेक इंडस्ट्री की रीढ़ बन जाएंगी।

Last Modified:
Tuesday, 09 June, 2026
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जब 1990 के दशक में भारत का IT सेक्टर उभर रहा था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन Infosys और TCS जैसी कंपनियां वैश्विक टेक इंडस्ट्री की रीढ़ बन जाएंगी। आज, ठीक उसी मोड़ पर Animation, Visual Effects, Gaming, Comics और Extended Reality यानी AVGC-XR सेक्टर खड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सरकार, इंडस्ट्री और युवा, तीनों एक साथ तैयार हैं।

मार्केट का आकार: आंकड़े क्या कहते हैं?

वैश्विक Animation, VFX और Gaming का संयुक्त मार्केट 2024 में 260 से 460 अरब डॉलर के बीच आंका गया है, अलग-अलग शोध एजेंसियां अलग-अलग दायरे में मापती हैं। इसमें भारत की हिस्सेदारी फिलहाल 2.5 से 3 अरब डॉलर के करीब है, जो वैश्विक मार्केट का एक बेहद छोटा हिस्सा है। लेकिन यही वह खाई है जो एक बड़े अवसर की तरह दिखती है।

Animation और VFX अकेले 2023 में 1.3 अरब डॉलर के थे और CII-GT की रिपोर्ट के अनुसार 2026 तक यह 2.2 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। ऑनलाइन गेमिंग 2026 तक 4.6 अरब डॉलर तक जाने की उम्मीद है। समग्र AVGC-XR सेक्टर 2026 में 3 अरब डॉलर पार कर जाएगा और 2030 तक 26 अरब डॉलर का इंडस्ट्री बन सकता है, यानी आज की तुलना में करीब 9 गुना वृद्धि।

हालांकि तस्वीर पूरी तरह गुलाबी नहीं है। FICCI-EY की मार्च 2025 की रिपोर्ट बताती है कि 2024 में समग्र Animation और VFX सेगमेंट में 9% की गिरावट आई, जिसमें Animation उपखंड में अकेले 19% और VFX उपखंड में 14% की गिरावट रही, मुख्यतः हॉलीवुड हड़ताल के बाद वैश्विक आउटसोर्सिंग में कमी के कारण। फिर भी AI-आधारित Animation का खंड तेज़ी से बढ़ रहा है, 2023 में $61.6 मिलियन से 47.9% CAGR से बढ़कर 2033 तक $931.5 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।

IT की तरह क्या Animation भी बदल देगा भारत की अर्थव्यवस्था?

IT सेक्टर ने 1990 और 2000 के दशक में जो किया, AVGC-XR वही दोहरा सकता है। भारत के पास वैश्विक Animation और VFX सेवाओं में 40 से 60 प्रतिशत लागत लाभ है। AVGC-XR सेक्टर का निर्यात 2025 में 1.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है और 2030 तक यह दोगुना हो सकता है।

भारतीय स्टूडियो पहले ही Disney, Warner Bros., DreamWorks, Sony, Netflix और Amazon जैसे वैश्विक दिग्गजों के साथ काम कर रहे हैं। BOT VFX जैसे स्टूडियो, जिनकी स्थापना 2008 में हुई, आज लगभग 800 कलाकारों की टीम के साथ Deadpool & Wolverine, Wicked और Twisters जैसे प्रोजेक्ट में योगदान दे रहे हैं। यह सफर IT की कहानी से बहुत अलग नहीं है।

रोजगार का महासंग्राम: 2 लाख से 23 लाख तक का सफर

फिलहाल AVGC-XR सेक्टर में लगभग 2.6 लाख पेशेवर काम कर रहे हैं। लेकिन अनुमान बताते हैं कि 2032 तक यह संख्या 23 लाख तक पहुंच सकती है। AVGC Promotion Task Force का लक्ष्य अगले दस वर्षों में 20 लाख AVGC-XR पेशेवर (प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष) तैयार करना है।

सरकार इस लक्ष्य को गंभीरता से ले रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम बजट 2026 में ₹250 करोड़ की राशि का प्रावधान किया है, जिससे देशभर के 15,000 माध्यमिक विद्यालयों और 500 कॉलेजों में AVGC कंटेंट क्रिएटर लैब स्थापित किए जाएंगे। इन लैब्स की जिम्मेदारी मुंबई स्थित Indian Institute of Creative Technologies (IICT) को दी गई है, जिसकी स्थापना पर सरकार ने ₹391.15 करोड़ का एकमुश्त बजटीय समर्थन दिया है।

राज्यों की दौड़: Animation Capital कौन बनेगा?

Animation Hub बनने की होड़ में भारत के राज्य एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में जुटे हैं।

महाराष्ट्र ने सितंबर 2025 में ₹3,268 करोड़ के वित्तीय परिव्यय के साथ अपनी AVGC-XR Policy 2025 को कैबिनेट से मंजूरी दिलाई। नीति का लक्ष्य 2050 तक ₹50,000 करोड़ का निवेश आकर्षित करना और अगले 25 वर्षों में 2 लाख हाई-टेक रोजगार पैदा करना है। AVGC-XR को इंडस्ट्री और इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा दिया गया है, जिससे स्टांप ड्यूटी में छूट और 24x7 संचालन की सुविधा मिलेगी। मुंबई और पुणे से आगे नाशिक, नागपुर, कोल्हापुर जैसे टियर-2 शहरों में भी AVGC-XR पार्क बनाए जाएंगे।

तमिलनाडु ने मार्च 2026 में AVGC-XR Policy 2026 अधिसूचित की, जिसका लक्ष्य 2030 तक 200 से अधिक स्टार्टअप, 2 लाख रोजगार और भारत के कुल AVGC-XR मार्केट का 20 प्रतिशत हासिल करना है। चेन्नई में ₹50 करोड़ का Center of Excellence बनेगा और R&D के लिए ₹250 करोड़ का फंड दिया जाएगा।

कर्नाटक देश का पहला राज्य है जिसने 2012 में AVGC नीति बनाई और अब कर्नाटक AVGC-XR Policy 2024-2029 के तहत बेंगलुरु को एशिया का प्रमुख Animation Hub बनाने की कोशिश चल रही है।

केरल का लक्ष्य 2029 तक 50,000 रोजगार और 250 प्रतिष्ठान तैयार करना है।

तेलंगाना पहले से IMAGE City के जरिए हैदराबाद को VFX हब के रूप में स्थापित कर चुका है।

राज्य

प्रमुख लक्ष्य

महाराष्ट्र

₹50,000 करोड़ निवेश, 2 लाख रोजगार (25 वर्षों में, 2050 तक)

तमिलनाडु

2 लाख रोजगार, 20% मार्केट हिस्सेदारी (2030 तक)

कर्नाटक

Policy 2024-2029, Operational CoE

केरल

50,000 रोजगार, 250 प्रतिष्ठान (2029 तक)

तेलंगाना

IMAGE City, Hyderabad VFX Hub

सरकार का बड़ा दांव: "Create in India"

साल 2022 में AVGC-XR Task Force के गठन के बाद से केंद्र सरकार Animation, VFX, Gaming और XR सेक्टर को लगातार बढ़ावा दे रही है। WAVES Summit का आयोजन, IICT (Indian Institute of Creative Technologies) की स्थापना और बजट 2026 में Creator Labs की घोषणा इस बात का संकेत हैं कि सरकार इस क्षेत्र को "Create in India" अभियान का अहम हिस्सा बनाना चाहती है, ठीक वैसे ही जैसे कभी IT सेक्टर को बढ़ावा दिया गया था।

इतना ही नहीं, भारत में Animation, VFX और अन्य क्रिएटिव प्रोजेक्ट्स लाने के लिए सरकार विदेशी प्रोडक्शन कंपनियों को भी प्रोत्साहन दे रही है। इसके तहत योग्य खर्च पर 40 प्रतिशत तक कैश रिइम्बर्समेंट (राशि वापस) की सुविधा दी जाती है। एक प्रोजेक्ट पर यह सहायता अधिकतम 3.6 मिलियन डॉलर, यानी करीब 30 करोड़ रुपये तक हो सकती है।

AI: खतरा या अवसर?

AI इस सेक्टर में सबसे बड़ा बदलाव लाने वाला फैक्टर बन गया है। Animation के कई दोहराव वाले काम, जैसे Rigging और In-Betweening, अब AI की मदद से तेजी से और कम समय में किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर AI नए अवसर भी पैदा कर रहा है। अनुमान है कि भारत में Generative AI Animation का बाजार 2023 के 61.6 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2033 तक करीब 931.5 मिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि AI सिर्फ नौकरियों को प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि नए तरह के काम और अवसर भी बना रहा है। हालांकि Roto, Paint और Camera Tracking जैसे मेहनत वाले कुछ कामों पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन जिन Animators के पास रचनात्मक सोच के साथ तकनीकी कौशल भी है, उनके लिए आने वाले साल काफी अच्छे साबित हो सकते हैं।

अपना 'Anime' कब बनाएगा भारत?

जापान ने Anime से और दक्षिण कोरिया ने अपने Gaming IPs से वैश्विक पहचान बनाई। भारत अभी मुख्यतः Outsourcing Model पर निर्भर है। लेकिन स्थिति बदल रही है। महाराष्ट्र की नई नीति में Homegrown AAA Gaming IPs की बात है जो भारतीय संस्कृति पर आधारित हों। 4,000 से अधिक स्टूडियो का ecosystem IP निर्माण के लिए तैयार खड़ा है, जरूरत है सिर्फ एक बड़े Original IP की जो दुनिया को पसंद आए।

छोटे शहरों का नया मौका

Animation अब सिर्फ मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु तक सीमित नहीं है। Online Training Platforms और Remote Work Culture ने Tier-2 और Tier-3 शहरों के युवाओं के लिए रास्ते खोले हैं। बजट 2026 के Creator Labs मुरादाबाद से मदुरई तक के स्कूलों में पहुंचेंगे। 15,000 स्कूलों में लैब का मतलब है कि अगली पीढ़ी के Animators शायद किसी महानगर में नहीं, बल्कि किसी छोटे जिला मुख्यालय में बैठकर दुनिया के लिए कंटेंट बना रहे होंगे।

अगला IT पल आ रहा है

आंकड़े साफ हैं: $3 अरब से $26 अरब का सफर, 2.6 लाख से 23 लाख नौकरियों की संभावना, 10 से अधिक राज्यों की नीतियां, और बजट 2026 में ₹250 करोड़ का सीधा निवेश। भारत के पास talent है, लागत का फायदा है, सरकार का समर्थन है और एक विशाल घरेलू मार्केट भी। जो कमी थी, वह नीति, निवेश और Infrastructure की थी, वह अब धीरे-धीरे भर रही है।

1990 के दशक में भारत ने IT में जो किया, वह आकस्मिक नहीं था, वह नीति, प्रतिभा और समय का संगम था। AVGC-XR में वही तीनों चीजें फिर मिल रही हैं। सवाल सिर्फ यह है कि भारत इस मौके को पकड़ पाता है या नहीं।

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