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1971 में युद्ध के बाद इंदिरा गांधी का क्या हश्र हुआ, करगिल वाजपेयी सरकार को बचा नहीं पाया: मुकेश कुमार
इसमें किसी को कोई संदेह कभी भी नहीं था कि भारतीय सेना बहादुर भी है और हर लिहाज़ से सक्षम भी है। पाकिस्तान को तीन युद्धों में हराकर वह साबित कर चुकी है...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
मुकेश कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
वैधानिक चेतावनी-कृपया भक्तगण इसे न पढ़ें। पढ़ें तो टिप्पणी न करें और करें तो मर्यादा में रहकर।
इसमें किसी को कोई संदेह कभी भी नहीं था कि भारतीय सेना बहादुर भी है और हर लिहाज़ से सक्षम भी है। पाकिस्तान को तीन युद्धों में हराकर वह साबित कर चुकी है और कारगिल से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर भी उसने दिखा दिया था कि उसका पराक्रम कैसा है। ये छोटी-मोटी सर्जिकल स्ट्राइक तो उसके लिए कुछ भी नहीं हैं। ये तो वह जब-तब करती रहती है-पहले भी की हैं।
संदेह तो उनकी नीयत पर है जो सेना और जंग का इस्तेमाल अपनी सत्ता को बचाने के लिए करना चाहते हैं, जो अपनी चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए युद्धोन्मत्त हैं और चाहते हैं कि पूरा देश युद्धं देहि पुकार उठे, जिनका सैन्यवादी राष्ट्रवाद सेना को अपनी राजनीति का विस्तार मानता है। संदेह उन पर है जो अंधराष्ट्रवादी चश्मे से सब कुछ देखते है और जिनके लिए युद्धवादी पैंतरा लोगों का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटाना है। संदेह उनके इरादों पर है जो अपनी असफलताओं को सेना के पराक्रम से ढंक देना चाहते हैं।
यही वे लोग हैं जिन्होंने युद्धोन्माद पैदा कर दिया है और लोगों के विवेक पर परदा डाल दिया है। लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ये युद्ध पिपासा कभी भी देश को और समूचे उपमहाद्वीप को भयानक युद्ध की आग में झोंक सकती है। वे इस युद्धवाद का विरोध करने वाले हर व्यक्ति के मुँह पर कालिख पोतकर खुद को उज्जवल दिखाना चाहते हैं।
सेना की कामयाबी से हम सब खुश हैं मगर जो उछल-उछलकर खुशी का इज़हार कर रहे हैं, वे वही लोग हैं जो अंबानी-अडानी और ब्राम्हणवादी सत्ता के समर्थक हैं। वे सेना की कामयाबी को सरकार की कामयाबी के रूप में दिखाकर भ्रम पैदा कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि इस क़दम से हारी बाज़ी जीती जा सकेगी इसलिए वे ढोल पीट रहे हैं।
युद्ध राजनीति का विस्तार है। इसका इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जा रहा है इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। ये भी नहीं मानना चाहिए कि इस हमले से पाकिस्तान सुधर जाएगा, आतंकवादी चुप बैठ जाएंगे या कश्मीर में विद्रोह थम जाएगा। ये एक चुनावी खेल है, एक दाँव है जो सीधा भी पड़ सकता है और उल्टा भी। 1971 के युद्ध के बाद अपराजेय लगने वाली इंदिरा गांधी का क्या हश्र हुआ था सब जानते हैं और करगिल युद्ध वाजपेयी सरकार को बचा नहीं पाया था।
साभार: फेसबुक
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