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कुलदीप नैयर को जानना चाहते हैं, तो जरूर पढ़ें अजीत अंजुम का ये लेख...

सुबह-सुबह बुरी खबर से सामना हुआ। कुलदीप नैयर के जाने की खबर आई...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

अजीत अंजुम

वरिष्ठ पत्रकार ।।

सुबह-सुबह बुरी खबर से सामना हुआ। कुलदीप नैयर के जाने की खबर आई। श्रद्धांजलि उस शख्स को, जिसका लिखा पढ़कर हम हमेशा देश-दुनिया, सियासत और समाज को समझते रहे। नैयर साहब कुछ दिनों से बीमार थे। अस्पताल में भर्ती थे। लड़ते-जूझते कुलदीप नैयर ने जब आखिरी सांसे ली, तो लगा कि एक ऐसा चिराग बुझ गया, जिसने कई दशकों तक अपनी कलम के दम पर पत्रकारिता को रोशन रखा।

95 साल के थे कुलदीप नैयर और उम्र के होश पड़ाव पर भी इस कदर होशमंद थे कि लगातार लिखने और पढ़ने में मशगूल थे। कुलदीप नैयर अपनी पीढ़ी के आखिरी पत्रकार थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के कब्जे भी हिन्दुस्तान को देखा और आजाद होते हुए भी। आजाद भारत के सत्तर साल की पत्रकारिता में नैयर साहब सबसे ऊंची मीनार की तरह थे। उम्र के हिसाब से देखें तो आखिरी ऊंची मीनार थे। 'द टाइम्स', ‘यूएनआई’, ‘द स्टैट्समैन' और ‘इंडियन एक्सप्रेस' के लिए अलग-अलग दौर में दशकों तक काम करने वाले कुलदीप नैयर का जाना पत्रकारिता के इतिहास पुरुष के जाने की तरह है।

कुलदीप नैयर ने देश के विभाजन का दंश भी झेला और अपनी जमीन से बेदखल होने का संताप भी। सियालकोट में जन्मे, लाहौर में पले बढ़े और सरहद की लकीरें खिची तो इस पार आ गए। नेहरु, गांधी, पटेल, शास्त्री, राजेन्द्र प्रसाद, पंत, मौलाना आजाद लेकर जेपी तक, सबके करीब रहकर सबको समझा और अपने जीवन को इस दौर के आजाद मुल्क के इतिहास से जोड़कर एक शानदार किताब लिखी- 'बियांड द लाइंस', जो हिंदी में अनुदित होकर ‘एक जिंदगी काफी नहीं' के नाम से छपी।

इस किताब के पहले चैप्टर- बचपन और बंटवारा में नैयर साहब ने अपने बारे में लिखा है- ‘जिंदगी में हर नई शुरुआत अपने आपमें अनोखी होती है। मेरी अपनी मिसाल भी एक नमूना है। मैं गलती से पत्रकारिता में आ गया। मैं वकालत के पेशे में आना चाहता था, जिसके लिए लाहौर यूनिवर्सिटी से डिग्री भी हासिल की, लेकिन इससे पहले कि मैं अपने शहर सियालकोट में अपने आपको एक वकील के रूप में रजिस्टर करवा पाता, इतिहास बीच में आ घुसा और भारत का बंटवारा हो गया। मैं दिल्ली आ गया, जहां मुझे एक उर्दू अखबार ‘अंजाम’ में नौकरी मिल गई। मैं पत्रकारिता के पेशे में आगाज की बजाय अंजाम से दाखिल हुआ। इसलिए मैं हमेशा कहता हूं कि मेरे सहाफात का आगाज अंजाम से हुआ ‘कुलदीप नैयर का जीवन, उनकी पत्रकारिता और आजादी के बाद की भारतीय सियासत को समझने के लिए ये एक बेहतरीन किताब है।

ऐसा मैं इसलिए भी कह रहा हूं कि क्योंकि नेताओं की बायोग्राफी तो लोग लाइब्रेरी की खाक छानकर भी लिख लेते हैं, कुलदीप नैयर सब कुछ देखकर लिख रहे थे। गांधी की हत्या के तुरंत बाद मौके पर पहुंचने वाले पत्रकारों में कुलदीप नैयर ही थे। उन दिनों नैयर साहब एक उर्दू अखबार ‘अंजाम’ में काम कर रहे थे। कुलदीप नैयर ने लिखा है- ‘30 जनवरी 1948 का दिन सर्दियों के किसी भी दूसरे दिन की तरह था। सुहानी धूप और ठंडक भरा। दफ्तर के एक कोने में पीटीआई का टेलिप्रिंटर लगातार शब्द उगल रहा था। डेस्क इंचार्ज ने मुझे लंदन की खबर अनुवाद करने के लिए दे दी। मैं धीरे-धीरे चाय पीते हुए काम कर रहा था कि टेलिप्रिंटर की घंटी बजी। मैं लपककर टेलिप्रिंटर के पास पहुंचा और मैंने उस पर उभरा फ्लैश पढ़ा- ‘गांधी शॉट’। मेरा एक सहकर्मी मुझे मोटरबाइक पर बिड़ला हाउस ले गया। मैंने शोक का माहौल देखा। गवर्नल जनरल लॉर्ड माउंटबेटन को वहां पहुंचते और महात्मा के शरीर को सलामी देते देखा ‘इसके बाद का पूरा घटनाक्रम कुलदीप नैयर ने अपनी किताब में चश्मदीद की तरह ही लिखा है।’


नेहरू की ताजपोशी और उनके ताज से झांकते कांटों को भी कुलदीप ने नैयर ने देखा और आजादी की लड़ाई के योद्धाओं से बनी उनकी कैबिनेट में चल रही भीतरी उठापटक को भी। कुलदीप नैयर ने बतौर सूचना अधिकारी प्रधानमंत्री नेहरू और उनके बाद पीएम बने लालबहादुर शास्त्री के दिनों को देखा-भोगा है। यहां तक कि जब 1966 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में रहस्यमय हालातों में निधन हुआ, तब भी कुलदीप नैयर उनके प्रेस सलाहकार के तौर पर साथ थे। 

शहीद भगत की जिंदगी और फांसी के मुकदमे पर कुलदीप नैयर की लिखी किताब WITHOUT FEAR को पढ़कर हम सबने भगत सिंह को करीब से जाना। इमरजेंसी के दौर में जब खुशवंत सिंह मठाधीश इंदिरा गांधी और संजय गांधी की शान में ढ़ोल-मजीरे बजा रहे थे, तब कुलदीप नैयर जैसे लड़ाके पत्रकार-संपादक ही थे, जो सलाखों की परवाह किए बगैर चौथे खंभे की बुनियाद थामे बैठे थे। एक तरफ अखबारों का गला घोंटकर घुटने पर लाने की कवायद में जुटी संजय गांधी की सेना और दूसरी तरफ कुलदीप नैयर जैसे इमरजेंसी पर लिखी उनकी किताब- EMERGENCY RETOLD के हर पन्ने पर उस दौर की दास्तान दर्ज है।


जब आजाद भारत के बुनियाद की इंटें रखी जा रही थी तो कुलदीप नैयर चश्मदीद बनकर इतिहास बनते देख रहे थे। उन्होंने पीआईबी में सूचना अधिकारी सरकारी नौकरी की। लाल बहादुर शास्त्री से लेकर पंत तक साथ बतौर सूचना अधिकारी रहे। उस दौर में पीटीआई के लिए काम किया। संसद, साउथ ब्लॉक और नार्थ ब्लॉक की सियासत को भीतरी दरवाजे में दाखिल होकर भी देखा और दूर रहकर भी। नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस को चढ़ते भी देखा और गिरते भी। जेपी आंदोलन और इमरजेंसी के दौर में कुलदीप नैयर देश के सबसे बड़े और चर्चित पत्रकारों में थे। वीपी सरकार बनने से पहले देवीलाल और चंद्रशेखर के दांव पेंच के भी चश्मदीद रहे। उसी दौर में इंगलैंड में भारत के राजदूत भी रहे। राज्यसभा सदस्य रहे। बदलती सियासत को देखते रहे और लगातार लिखते रहे। सभा-गोष्ठियों में जाकर अपनी बात कहते रहे। अस्सी-नब्बे साल का आदमी थक जाता है। मौन हो जाता है। चुप हो जाता है लेकिन कुलदीप नैयर नब्बे पार करके भी अपनी उम्र को चुनौती देकर सक्रिय बने रहे। 

मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना की वजह से कई बार सोशल मीडिया पर उन्हें भी गालियां दी गई, लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की। संघ और बीजेपी की विचारधारा से अपनी नाइत्तेफाकी का इजहार अपने आखिरी लेखों में भी करते रहे, तब भी जब बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह 'संपर्क फॉर समर्थन' अभियान' के तहत उनसे मिलने उनके दरवाजे तक गए। हिन्दू-मुसलमान के नाम पर होने वाली सियासत के खिलाफ आखिरी दम तक लिखने-बोलने वाले कुलदीप नैयर उस हिन्दुस्तानी तहजीब और रवायत के पैरोकार थे, जो बांटता नहीं, जोड़ता है।

कुलदीप नैयर ने 'बिटवीन द लाइन्स', ‘डिस्टेंट नेवर: ए टेल ऑफ द सबकॉन्टिनेंट', ‘इंडिया ऑफ्टर नेहरू', ‘वाल एट वाघा, इंडिया पाकिस्तान रिलेशनशिप', ‘इंडिया हाउस', ‘स्कूप' ‘द डे लुक्स ओल्ड' जैसी कई किताबें लिखी थीं।  

 


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