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जनता की निगाह से उतरने लगे हैं इस तरह के नेता, बताया वरिष्ठ पत्रकार अजय शुक्ल ने

मैं अचानक मर जाऊं, तो मेरी पत्नी विधवा हो जाएगी। मेरी बच्चियों और मेरे माता-पिता का...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

अजय शुक्ल

प्रधान संपादक, आईटीवी नेटवर्क।।

हास्यास्पद है विकल्प का सवाल!

मैं अचानक मर जाऊं, तो मेरी पत्नी विधवा हो जाएगी। मेरी बच्चियों और मेरे माता-पिता का क्या होगा? मेरे छोटे भाई-बहन क्या करेंगे, मेरे मित्रों और सहयोगियों के साथ क्या होगा? ये ऐसे सवाल हैं, जिसका सिर्फ एक जवाब है कि प्रकृति ने हर किसी को समर्थ बनाया है। वक्त के साथ बेहतर विकल्प तैयार हो जाते हैं। जब अचानक पंडित जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु हुई, तब पूरा देश सदमे में पहुंच गया। विकल्प कौन बने, इसको लेकर दो महीने मंथन चला और उस महानायक की जगह एक गुदड़ी के लाल (लाल बहादुर शास्त्री) ने ली। सजग, सतर्क और ईमानदार सरकार प्रस्तुत की। डेढ़ साल में ही उनकी भी मृत्यु हो गई, तब फिर संकट खड़ा हुआ मगर दो महीने में ही नए विकल्प के तौर पर इंदिरा गांधी आईं, जिनका विरोधी गूंगी गुड़िया कहकर उपहास करते थे। वह विश्व की सबसे ताकतवर महिला नेता के रूप में उभरीं। विपक्ष को भी उन्हें मां दुर्गा और आयरन लेडी की उपाधि देनी पड़ी। हमने यह सिर्फ देशी उदाहरण दिए हैं, क्योंकि बात 130 करोड़ की आबादी वाले देश की हो रही है।

इस वक्त देश में कुछ ऐसे ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि आखिर देश संभालने के लिए विकल्प क्या हैं? जो भी व्यक्ति या संस्था इस तरह का सवाल करता है, वह 130 करोड़ की आबादी वाले देश को निकम्मा और निर्लज्ज करार देता है। अगर इतनी जनसंख्या में कोई योग्य नहीं तो हम सभी को शर्म से डूब मरना चाहिए। हम कुछ पीछे चलें तो 2013 में लोग सवाल उठाते थे कि आखिर विकल्प क्या है? हमें एक अच्छा विकल्प मिला नरेंद्र मोदी के रूप में। अगर मोदी विकल्प हो सकते हैं, तो उनसे भी बहुत अच्छे और श्रेष्ठ लोग भाजपा और कांग्रेस सहित तमाम दलों में मौजूद हैं। वेद कहता है ‘जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत् द्विजः।वेद-पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः’। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जन्म से कोई व्यक्ति योग्य नहीं होता, बल्कि अपने कार्यों-संस्कारों से योग्य बनता है। प्रभुत्व स्थापित करने के लिए कालांतर में यह व्यवस्था बना दी गई कि लोग जन्म से ही योग्य होते हैं, क्योंकि वो कुलीन हैं। कमोबेश यही स्थिति हमारे यहां राजनीति में आ गई है और चाटुकार निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए इसे आगे बढ़ाते हैं।

भारत में जब स्वशासन का संघर्ष शुरू हुआ तब सिर्फ एक ही पार्टी थी, कांग्रेस। उसमें तमाम विचारधारायें थीं। हर विचारधारा ने एक दल का रूप ले लिया। कोई वामपंथी बन गया तो कोई दक्षिणपंथी। कोई जातिगत संगठन का हिस्सा तो कोई धर्मगत दल का। सभी हक की लड़ाई लड़ रहे थे और सभी ने विकल्प तलाशे। सबको साथ लेकर चलने की नीति के कारण सत्ता कांग्रेस के हाथ आई। देश ने उस पर यकीन किया। उस वक्त कांग्रेस का विकल्प क्या है? सवाल था मगर एक नहीं, कई विकल्प उभरे। अब कांग्रेस कुछ राज्यों में सिमट गई है, जबकि विकल्प डेढ़ दर्जन राज्यों में हैं। ऐसा भी नहीं है कि इन विकल्पों का विकल्प नहीं है। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में सबको ‘साफ’ करके बता दिया कि जनता जब चाहे, आमजन के बीच में ही विकल्प बना देती है। पंजाब में दशकों से धर्म की सियासत करने वाले अकाली-भाजपा गठबंधन को जनता ने तीसरे पायदान पर धकेल दिया। प्रतिपक्ष के रूप में पांच साल पहले उभरी आम आदमी पार्टी को बैठा दिया। डा. मनमोहन सिंह जैसे श्रेष्ठतम अर्थशास्त्री, जो बगैर कुछ बोले ईमानदारी से काम करने वाले नेता हैं, के विकल्प के रूप में सामने, बहुत अधिक बोलने वाले नरेंद्र मोदी को जनता ने नेता मान लिया मगर यह अंत नहीं है।

भाजपा में ही शैक्षिक, बौद्धिक और राजनीतिक खूबियों से परिपूर्ण दर्जनों नेता हैं। इसी तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर मणिशंकर अय्यर तक सैकड़ों योग्य नेताओं की भरमार है। सभी बहुत अधिक शिक्षित, बौद्धिक और राजनीतिक समझ रखने वाले हैं। किसी की बातों को तोड़मरोड़ के प्रस्तुत करने के अभियान भले ही कुछ देर किसी को अयोग्य बना दें मगर लंबे समय में यह सभी समझ जाते हैं कि कौन क्या है। किसी के कामों में अड़ंगा डालने से वह अयोग्य नहीं होता, बल्कि वह परिपक्व होता है। बीते कुछ वक्त में ऐसा ही हुआ है। सुरक्षा घेरे में कुछ अपनों से सदैव घिरे रहने वाले राहुल गांधी अब धूप-छांव और बारिश को झेलकर देश की समस्याओं को बारीकी से समझने लगे हैं। एक आंदोलन से राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल अब बक-बक नहीं करते, बल्कि काम के जरिए अपनी पहचान बनाते दिखते हैं। बक-बक करने वाले अब जनता की निगाह से उतरने लगे हैं। सियासी दांव और वादों के तो इतने अधिक विकल्प हैं कि उन्हें चुनने में ही मतदाता भ्रमित हो जाए। नई पीढ़ी के नेता अपने पहले की पीढ़ी से ज्यादा समझदार हैं। वो युवा देश के करोड़ों बेरोजगारों का दर्द भी समझते हैं और आमजन से जुड़कर खुद को खुशकिस्मत भी।

हमने दोनों राष्ट्रीय दलों सहित आधा दर्जन क्षेत्रीय दलों के दो सौ ऐसे नाम निकाले जो शैक्षिक से लेकर बौद्धिक रूप से नेतृत्व क्षमता वाले हों। किसी भी मानक पर उनकी योग्यता के आधार पर विकल्प होने से कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता, मगर सवाल विकल्प या योग्यता का नहीं, बल्कि जनता की स्वीकार्यता का है। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कर्मठ और विकासवादी सोच रखने वाले नेता के विकल्प के तौर पर सोनिया गांधी के नेतृत्व में चुनाव जीता गया। जनता ने सोनिया को स्वीकारा तो उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। 2009 का लोकसभा चुनाव राहुल गांधी के युवा चेहरे और मनमोहन सिंह के काम पर सोनिया के नेतृत्व में लड़ा गया और कांग्रेस की सीटें बढ़ीं। वजह साफ है कि दोनों की स्वीकार्यता थी मगर 2014 में वही राहुल गांधी पप्पू घोषित कर दिया गया और डा. मनमोहन सिंह जैसा काबिल व्यक्ति मौनी बाबा सहित न जाने कितनी संज्ञाओं से नवाज दिया गया। जनता ने नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत से नेता मान लिया।

हमें विकल्प का सवाल उठाने का न तो हक है और न ही ऐसा करके हमें 130 करोड़ नागरिकों का अपमान करना चाहिए। हमें गुण-दोष के आधार पर नेता का चयन करना चाहिए, क्योंकि भ्रष्ट भी सभी दलों में हैं और भ्रष्टाचार-अनैतिकता भी। इन सब बुराइयों से परे हमें वह विकल्प खोजना है जो जनहित को सर्वोपरि माने। वो हमारे देश के भविष्य के साथ छल न करे, बल्कि उसे सुदृढ़ बनाए। सच बोले और अगर कोई गलती हो जाए तो तो उसे स्वीकारने। भविष्य में उसे न दोहराने का संकल्प ले, वही नेता हमारा विकल्प होना चाहिए, न कि झूठ और प्रपंच का जाल बुनने वाला। आपस में लड़ाकर सत्ता सुख भोगने वाला हमारा विकल्प नहीं होना चाहिए। हम सबको जोड़कर ‘एक बड़े भारतीय परिवार’ में रहना सिखाने वाला ही हमारा विकल्प हो सकता है। एक वाक्य में बात यह है कि संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता, तो सर्वे भवंतु सुखिना, सर्वे भवंतु निरामया की सोच रखने वाला ही हमारा विकल्प होना चाहिए। 


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