मिस्टर मीडिया: पत्रकार साथियों, क्या आप भी तो नहीं करते हैं शब्दों की ये गलती?

एक ज़माना था, जब अंग्रेजी के सामने हिंदी दोयम दर्ज़े की भाषा मानी...

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 19 December, 2018
Last Modified:
Wednesday, 19 December, 2018
mister media

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार।।

एक ज़माना था, जब अँगरेज़ी के सामने हिंदी दोयम दर्ज़े की भाषा मानी जाती थी। आज ऐसा नहीं है। हिंदी शिखर पर है । मीडिया में भी। अख़बार हों या टेलिविजन। रेडियो हो या सोशल मीडिया के तमाम अवतार, हिंदी के बिना अधूरे हैं। हिंदी की आवाज़ को गंभीरता से लिया जाता है। अलबत्ता, मीडिया में उसका प्रयोग करने वाले गंभीर नहीं हैं। इस कारण अशुद्ध उच्चारण और शब्दों का ग़लत इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। नहीं जानता कि यह सिलसिला कब तक चलेगा?

मगर यह तय है कि इस बिगड़ी भाषा ने हमारी नई नस्लों में भी हिंदी की जड़ें कमज़ोर कर दी हैं। जो देश अपनी भाषाओं को लेकर संवेदनशील नहीं होते, वे संसार के किसी मंच पर अपनी बात ताक़त के साथ नहीं रख पाते। आज के मीडिया में भाषा की त्रुटियां अब अपनी सीमा पार कर रहीं हैं। बचपन में हम गिनती याद करते थे। सही उच्चारण नहीं करते थे तो मार पड़ती थी। आज चैनलों और रेडियो में गिनती सुनते हैं तो माथा पीटते हैं। हमारे अनेक सहयोगी- नवासी (89) उन्यासी (79) उनहत्तर (69) उनसठ (59) उनचास (49) उनतालीस (39) उनतीस (29) और उन्नीस (19) न सही लिखते हैं और न बोलते हैं।

इसी तरह बहुवचन के रूप में धड़ल्ले से अनेकों और कइयों चल रहा है। अगर एक का बहुवचन अनेक और कई हैं तो उसे अनेकों बना देने की आदत कहां से शुरू हुई-कोई बताएगा? राजनीतिक दलों के नाम भी इसी तरह अशुद्ध बोले जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी के स्थान पर जंता बोलना तो इतना आम है कि सब इसे सच समझने लगे हैं। अपने संवाददाता को संवादाता बोलना भी ग़लत नहीं माना जाता। प्रभावित-पीड़ित तथा संभावना-आशंका का फ़र्क़ तो जैसे समाप्त ही हो गया है। मानसून की संभावना भी होती है और बाढ़ की भी। तूफ़ान से प्रभावित भी होते हैं और एक दूसरे के व्यक्तित्व से भी हम प्रभावित हो जाते हैं। अज्ञान को छिपाने के लिए नुक्ते का प्रयोग भी कम हो रहा है।

एक बार कल्पना करें कि जलेबी को ज़लेबी बोलना कैसा लगता है। एक सुंदर फूल को फ़ूल (मूर्ख या बेवकूफ़) कहिए तो कोई समझता ही नहीं कि यह अशुद्ध है। फांसी को फ़ांसी, अजीब को अज़ीब, जुर्म को ज़ुर्म, फिर को फ़िर, फ़ादर को फादर और फल को फ़ल कहने में किसी को झिझक नहीं होती। एक शब्द और है- कार्रवाई और कार्यवाही। इसे आप एक ही अर्थ में सुन, देख और पढ़ सकते हैं। पुलिस एक्शन याने कार्रवाई और संसद की प्रोसीडिंग कार्यवाही है। यह भी देखा गया है कि हमारे कई पत्रकार साथी संसद भंग कर देते हैं। भंग तो सिर्फ़ लोकसभा होती है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के बारे में भी ऐसी ही गड़बड़ होती है। अख़बार, रेडियो और टीवी में अक्सर हम सुनते हैं- केंद्रीय रक्षा मंत्री, केंद्रीय विदेश मंत्री और केंद्रीय रेल मंत्री जैसे कुछ अन्य विभाग। ध्यान दीजिए कि ये मंत्रालय तो सिर्फ़ केंद्र के तहत ही होते हैं।

सड़क दुर्घटना के लिए कहा जाता है- दर्दनाक हादसे में पांच लोग मारे गए। हादसा तो दर्दनाक ही होता है, यह बात समझने की ज़रूरत है। संख्या के बारे में भी ग़लतियां होती हैं। जैसे एक दर्ज़न लोग घायल हो गए। गोया आदमी न हुए केले हो गए। उर्दू का एक शब्द है- अज़ीज़। इसका मतलब प्रिय से है। अब अगर इसे अजीज़ बोला, लिखा या सुनाया जाएगा तो इसका अर्थ नपुंसक या नामर्द हो जाता है। ग़लत उच्चारण से अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

उच्चारण और भाषा में गड़बड़ियों की यह तो एक बानगी है। अनगिनत ग़लतियां हैं जो हमारा दर्शक, श्रोता या पाठक अपने ग़ुस्से के साथ स्वीकार कर रहा है। मुझे कभी-कभी महसूस होता है कि इस मामले में हम लोगों से भी चूक हुई है। नए साथियों को उनकी अशुद्धियों के बारे में नहीं बताया। उनकी भाषा नहीं सुधारी। पर चैनलों, रेडियो और समाचारपत्रों के संचालक-मालिक और मीडिया शिक्षण संस्थान भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। उनके पाठ्यक्रमों में इसे प्रमुखता नहीं दी गई है। कहीं ऐसा न हो कि हिंदी की शुद्ध और सही जानकारी के लिए हमें विदेशों की तरफ़ देखना पड़े मिस्टर मीडिया!

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‘जब टीएन शेषन को सुनने के लिए लोग हो गए थे बेकाबू’

सर्वश्रेष्ठ शहरी रिपोर्टिंग का पुरस्कार मुझे मिला था, इसके बावजूद मुझे और मेरे परिवार को एंट्री में जद्दोजहद करनी पड़ी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
TN Seshan and Amitabh Shrivasta

टीएन शेषन नहीं रहे, जिन्होंने चुनाव आयोग के महत्व और अधिकारों को धरातल पर उतारा। ये स्मृति है तब की है, जब वे भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त थे। मौका था भोपाल के रवीन्द्र भवन में ‘भास्कर ग्रुप’ के द्वारका प्रसाद अग्रवाल स्मृति पुरस्कार का। सर्वश्रेष्ठ शहरी रिपोर्टिंग का पुरस्कार मुझे मिला था, इसके बावजूद मुझे और मेरे परिवार को एंट्री में जद्दोजहद करनी पड़ी, ये क्रेज था टीएन शेषन का।

रवीन्द्र भवन खचाखच भरा था, मध्यप्रदेश का मंत्रिमंडल, राजनीतिक हस्तियां, संपादक और तमाम जाने-माने लोग सिर्फ शेषन को देखने-सुनने आए थे। पास से एंट्री होने के बाद भी पास वाले बाहर खड़े थे। शेषन के आने के पहले ही हॉल भर चुका था। जब मैं पहुंचा तो सुरक्षाकर्मियों ने भीतर जाने से मना कर दिया। उनका कहना था कि आप अकेले जाएंगे, जबकि ‘भास्कर समूह’ की ओर से अपने परिवार सहित मुख्य पुरस्कार के लिए आमंत्रित था।

गेट पर मौजूद सुधीर अग्रवाल जी तक बात पहुंची और फिर वे आगे आकर हम सभी को भीतर ले गए। इस समारोह में देश के जाने-माने पत्रकार सूर्यकांत बाली को विचार लेखन के लिए पुरस्कार मिलना था। मुझे जो जानकारी मिली, उसके मुताबिक उन्होंने किसी राजनेता से सम्मानित होने से मना कर दिया था और इसलिए शेषन जी से ‘भास्कर ग्रुप’ ने संपर्क साधा।

ये ‘भास्कर ग्रुप’ का प्रभाव था कि वे इस प्रोग्राम में आने को तैयार हो गए और ये प्रोगाम सुपरहिट हो गया। रवीन्द्र भवन के बाहर जितनी लंबी कतार थी, वैसी मैंने इस तरह के प्रोग्राम में कभी नहीं देखी। हॉल के बाहर बड़े पर्दे पर लोग शेषन को देख-सुन सकते थे, लेकिन भीड़ उन तक पहुंचने को बेकाबू थी।

वही हुआ, जिसकी आशंका थी। हॉल के कांच तक टूट गए, लेकिन जल्द ही सब कुछ कंट्रोल हो गया। शेषन उसके पहले या बाद में शायद ही किसी कार्यक्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए नजर आए होंगे। ये पहला द्वारिका प्रसाद अग्रवाल स्मृति पुरस्कार था और पता नहीं क्यों आखिरी भी। ‘भास्कर ग्रुप’ ने कई दिनों तक अखबार में जोर-शोर से इसका प्रचार किया था। देश के जाने-माने लोगों ने पुरस्कारों का चयन किया। जिन्हें पुरस्कार मिलना था, उनकी और अतिथियों की तस्वीरें कई दिनों तक प्रकाशित कीं। ‘रसरंग’ में इंटरव्यू भी छापे। तो ये था शेषन का जलवा। नमन।

(वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से साभार)

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बिना मुस्कुराए न रह पाएंगे जब पढ़ेंगे- रामलला हम आएंगे TRP कमा के जाएंगे

दही ही दिखाओ और दही ही परोसो, रायता मत बनाओ। लेकिन ‘द शो मस्ट गो ऑन’ को ध्येय मानने वाले अब छन्नी से अयोध्या छान रहे हैं

प्रमिला दीक्षित by प्रमिला दीक्षित
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

सबसे पहले तो मैं ये स्पष्ट कर दूं कि मुद्दा आस्था का है और संवेदनशील जरूर,लेकिन जब आप इस विश्लेषण को पढ़ें तो रोहित शेट्टी की मूवी जितना दिमाग लगाएं, सत्यजीत रे न बनें। ओ रामजी बड़ी टीआरपी  दीना...आस्था के जिस मुद्दे पर चैनलों को आज तक बड़ी टीआरपी मिलती आयी थी, शनिवार उसके चरम का दिन था। चैनल नहा धोकर तैयार थे, पहले दिक्कत ये रही कि अचानक तारीख आई और चैनलों के बड़े चेहरे जो दिल्ली में या बाहर थे, सब आपाधापी में अयोध्या दौड़ाए गए।

जैसे शैतान बच्चे को मम्मी-पापा बताते हैं कि शैतानी नहीं करनी है। फिर वो घर में आने वाले हर शख्स को जैसे बताता है कि वो कितना अच्छा  बच्चा है, शैतानी नहीं करता है, शैतानी नहीं करनी चाहिए। चैनल सुबह से ही शांति बनाए रखने और सौहार्द कायम रखने की अपील करते रहे। लेकिन शांति बनाए रखने की अपील आप सबसे तो कर सकते हैं, अरनब से अलग से करनी चाहिए थी। आवाज की बुलंदी तो आप फिर भी किसी मीटर पे माप सकते हो, लेकिन जोश का वो सांचा ही नहीं बना, जो रिक्टर स्केल पर अरनब का जोश तौल सके।

मौत पर रूदाली, चन्द्रयान पर एस्ट्रोनॉट, ओलंपिक मेडल पर खुद ही खेल-खिलाड़ी बन जाने वाले चैनल समझ ही नहीं पा रहे थे कि आज क्या बनें! ‘आजतक’ पर अंजना ओम कश्यप ने जोश को गरम कर के तरल बनाकर गंभीरता के रूप में धारण कर लिया। सधे लफ्जों में ठहर-ठहर (वैसे भी आजकल वो फिसली जुबान के लिए जानी जाती हैं) शांति बनाए रखने की अपील के साथ खबर बताती रहीं। ‘आम आदमी पार्टी’ के पूर्व नेता आशुतोष जब भी ‘आजतक’ पर होते हैं, वो भूल जाते हैं कि अब वो गेस्ट हैं, खुद मैनेजिंग एडिटर नहीं। वो एंकर को बताने लगे कि ऐसे मामलों में पूरा फैसला आने के बाद ही खबर दिखानी चाहिए, एक-एक बिंदु बताने में गड़बड़ी होगी।

‘एबीपी’ में सुमित अवस्थी ने मोर्चा संभाला, लेकिन फैसला आने से पहले उनकी आवाज और लहजे में पैमाना सेट होने की कशमकश दिखी। कम जोश से मामला बोझिल हो जाता है और ज्यादा जोश से गाइडलाइन के बाहर। ये दिक्कत कई चैनलों-एंकरों की रही। लेकिन काउंटडाउन पढ़ते हुए आप रोमाना की आवाज में खनक दिखाई दी।

‘एनडीटीवी’ अपने अनुभवी चेहरों के साथ स्टूडियो में भी था और मैदान में भी। अरे हां! अब समझ आया, इतनी देर मैंने ‘एनडीटीवी’ क्यूं देखा? क्यूंकि वहां पूरी खबर थी, पूरा विश्लेषण, कोई मातम नहीं। बेरोजगारी और भुखमरी को पूरी खबर में कहीं जबरदस्ती नहीं डाला गया था। मनोरंजन, नगमा, निधि कुलपति, आशीष भार्गव, कादम्बिनी शर्मा और हिमांशु सब बधाई के पात्र हैं। जितनी देर वो रहे, स्क्रीन पर कोई विलाप नहीं हुआ। मोदी जी का जिक्र नहीं हुआ। बस फैसले, बस खबर पर बात हुई और बहुत शानदार हुई।

कई बार जिन बच्चों के नोट्स कमजोर होते हैं, वो कॉपी इतनी सजा देते हैं कि देखने वाला लुक पर ही रुक जाए। सो सुधीर चौधरी विहीन सुबह के लिए ‘जी’ ने ग्राफिक्स पर ही सारी मेहनत झोंक दी। लाल-पीली स्क्रीन और रामजी की मूरत देख, एक पल के लिए तो कोई भी श्रद्धालु रुक ही जाएगा और फिर फैसला आने के बाद ‘जी’ ही पहला था, जिसने स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा ‘मंदिर वहीं बनेगा’ लिखने की हिम्मत दिखाई।

‘एबीपी’ खबर के वक्त पेस पकड़ चुका था। निपुण सहगल की रिपोर्टिंग शानदार रही। खबर के बाद अब क्या? सोच-सोच कर ‘आजतक’ उतावला हुए जा रहा था। शांति बनाए रखने की अपील करने के साथ-साथ ओवैसी टाइप मसाला तो चाहिए ही था। सब तरफ से आती स्वागत की खबरों के बीच 'आजतक' ने ओवैसी को खबर की संभावना के तहत बराबर जगह दी। खैर, सलाह तो थी। 

खैर ये ऐसा दही है, बरसों बाद जमा है। दही ही दिखाओ और दही ही परोसो, रायता मत बनाओ। लेकिन ‘द शो मस्ट गो ऑन’ को ध्येय मानने वाले अब छन्नी से अयोध्या छान रहे हैं। कहीं राम जी खुद ही साक्षात टकरा जाएं और बोलें- ‘हे ब्रो आइ एम हियर’ और फिर चैनलवाले उनको पकड़ कर 'पीपली लाइव' का नत्था बना दें। 

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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‘SC के फैसले पर सटीक बैठती है अंग्रेजी की ये कहावत’

सच तो यही है कि इस समय देश में शांति और भाईचारा बनाये रखना ही हम देशवासियों का कर्तव्य है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 09 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 09 November, 2019
SC

निर्मलेंदु, वरिष्ठ पत्रकार।।

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला। विवादित जमीन का मालिकाना हक रामलला विराजमान को, मस्जिद के लिए दी जाएगी दूसरी जगह। मेरी नजर में यह एक उत्तम और ऐतिहासिक फैसला जरूर है, लेकिन मुस्लिम पक्ष फैसले से संतुष्ट नहीं है। हालांकि ऐसी स्थिति में भी उन्होंने देशवासियों से अपील की कि पूरा देश शांति बनाये रखे। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मील का पत्थर है, शांति व सद्भाव बनाए रखें।

जी हां, देर आयद दुरुस्त आयद, अंग्रेजी में कहते हैं कि इज बेटर लेट, दैन एवर, यानी फैसला देर से जरूर आया, लेकिन दुरुस्त फैसला है यह। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा। प्रधानमंत्री ने कहा, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या पर अपना फैसला सुना दिया है। पीएम ने यह भी कहा कि फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि न्याय के मंदिर ने दशकों पुराने मामले का सौहार्दपूर्ण तरीके से समाधान कर दिया। केंद्रीय गृहमंत्री और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, अरविंद केजरीवाल और कुछ लोगों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है।

कवि गुरु रबींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि तथ्य कई हो सकते हैं, लेकिन सत्य एक ही है और वह सत्य आज लोगों के सामने है। टैगोर ने यह भी कहा था कि जो अपना है, वह मिलकर ही रहेगा। अपना था, इसीलिए मिल गया। विदुर नीति में यह बात कही गयी है कि जिस व्यक्ति के पास ज्ञान है, वह समाधान निकाल ही लेता है। हमारे सुप्रीम कोर्ट के विचारकों के पास ज्ञान है, इसलिए उन्होंने समाधान निकाल ही लिया है। विदुर ने यह भी कहा था कि यदि बगैर किसी संघर्ष के आपको कोई चीज मिल जाती है, तो उसकी कीमत आपको समझ में नहीं आती है। वहीं, अगर आप अपने जीवन में किसी चीज को कड़ी मेहनत के बाद प्राप्त करते हैं, यानी उसे प्राप्त करने में बीस-तीस साल भी लग जाएं, तो उसका एक अलग ही महत्व आपके जीवन में होता है।

बापू यानी महात्मा गांधी ने कहा था, ‘आपको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए। मानवता सागर के समान है, यदि सागर की कुछ बूंदें गंदी हैं तो पूरा सागर गंदा नहीं हो जाता।’ गांधीजी ने यह भी कहा था कि विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए, क्योंकि जब विश्वास अंधा हो जाता है तो मर जाता हैं। जी हां, यहां भी विश्वास को तर्क के साथ तौला गया और इसीलिए वह विश्वास मरा नहीं। फैसला आया और ऐसा फैसला आया कि जिसकी कोई काट ही नहीं है। तर्क, कुतर्क और बोलवचन फेल हो गये और एक नया विश्वास पैदा हो गया, जो कि अटूट है, अकाट्य है, अमूल्य है और निश्छल है।

अब आइए जानते हैं कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि सबसे अनमोल धन है विद्या, क्योंकि इसके आने मात्र से ही सिर्फ अपना ही नहीं, अपितु पूरे समाज का कल्याण होता है। आज सुप्रीम कोर्ट के जजों ने यह साबित कर दिया कि उन्होंने सही विद्या हासिल की है। उन्होंने अपने इस निर्णय से पूरे समाज का कल्याण कर दिया। जी हां, समाज का कल्याण कर दिया है। इंसाफ के मंदिर के वे पांचों जज हीरो बन गये हैं। यह फैसला नहीं, एक नजीर, एक मिसाल है न्याय के मंदिर का। हमें सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का मिल-जुलकर सम्मान व आदर करना चाहिए।

सच तो यही है कि इस समय देश में शांति और भाईचारा बनाये रखना ही हम देशवासियों का कर्तव्य है। हमें अफवाहों से भी सावधान व सजग रहना होगा। इस समय हमें किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिए। अमन-चैन, शांति, आपसी भाईचारा, सद्भाव व सौहार्द हम बनाए रखेंगे, तो कोई भी हमारा नुकसान नहीं कर पाएगा। आज नफरत व वैमनस्य को परास्त करने का समय आ गया है।

हालांकि मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने कहा, ‘हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, कुछ गलत तथ्य पेश किए गए, हम उनकी जांच करेंगे।’ साथ ही उन लोगों ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय का फैसला है, इसलिए हम उसका सम्मान करते हैं। पूरे देश को शांति बनाए रखनी चाहिए। मुस्लिम पक्ष के एक वकील ने कहा, ‘फैसला हमें बाबरी मस्जिद नहीं देता, जो हमारे हिसाब से गलत है।‘ मुस्लिम पक्ष के दूसरे वकील ने कहा, ‘हमारे लिए पांच एकड़ जमीन के कोई मायने नहीं हैं। हम फैसले से जरा भी संतुष्ट नहीं हैं।‘ हालांकि साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हम नागरिकों से शांति बनाए रखने की अपील करते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

मेरा मानना है कि लोकतंत्र के गुलदस्ते में हर विचारधारा के फूल खिलते हैं

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 08 November, 2019
Last Modified:
Friday, 08 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अगर राज्यसभा टेलिविजन और लोकसभा टेलिविजन के विलय की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है। देश के बजट का आकार देखते हुए सौ-पचास करोड़ रुपए बचा लेना कोई तर्कसंगत इसलिए भी उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि ये दोनों कोई विशुद्ध खबरिया चैनल नहीं हैं। न ही इनके कोई छिपे हुए राजनीतिक हित होते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र के विराट आकार और प्राचीन महत्व को देखते हुए संसद के दोनों सदनों के अपने चैनलों ने संसार के तमाम लोकतांत्रिक देशों में भारत का मान बढ़ाया है। हिंदुस्तान के इन चैनलों की कामयाबी को देखते हुए अनेक देशों ने राज्यसभा टेलिविजन से सहयोग के लिए संपर्क भी किया था। इस चैनल का संस्थापक कार्यकारी निदेशक/संपादक होने के नाते मुझे यह अनुभव हुआ था।

सच तो यह है कि नई सदी में प्रवेश करने के साथ ही अनेक पश्चिमी और यूरोप के देशों की तर्ज पर भारत में भी संसद टीवी का विचार बहस के स्तर पर अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के दरम्यान आया था। उसके बाद यूपीए सरकार आई तो लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा टीवी को हरी झंडी दी। सरकार उन्हीं दिनों राज्यसभा टीवी भी शुरू करना चाहती थी, लेकिन राज्यसभा के तत्कालीन सभापति भैरों सिंह शेखावत इसके पक्ष में नहीं थे। इसलिए यह मामला लटक गया।

यूपीए के दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर यह बहस छिड़ी और 2010 में इसे शुरू करने का निर्णय हुआ। कार्यकारी संपादक के तौर पर मेरा अनुबंध हुआ। बाद में मेरा पदनाम कार्यकारी निदेशक कर दिया गया। 26 अगस्त 2011 को अत्यंत सीमित संसाधनों के साथ राज्यसभा टीवी शुरू हो गया। पहले दिन चार घंटे का प्रसारण किया। इसके बाद तो चैनल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। देखते ही देखते इसने आसमानी बुलंदियों को छुआ और इसके अनेक कार्यक्रम लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचे ।

मुझे लगता था कि एक तरफ तो भारतीय लोकतंत्र की तूती दुनिया में बोलती है, दूसरी ओर मुल्क के आम आदमी की संसद के कामकाज में दिलचस्पी घटती जा रही है। संसद के भीतर साल भर देश के भले के लिए अनेक समितियां किस तरह काम करती हैं, उसकी जानकारी भी लोगों तक पहुंचाने का कोई जरिया नहीं था। यह विरोधाभास था कि संसद को हम लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर कहते हैं, पर उस मंदिर में होने वाली गतिविधियों से वाकिफ ही नहीं रहते। चैनल शुरू करते समय हमारा बड़ा सरोकार यही था।

मेरा मानना है कि लोकतंत्र के गुलदस्ते में हर विचारधारा के फूल खिलते हैं। जिस तरह संसद की राष्ट्रीय गंगा में हर विचारधारा की नदी शामिल हो जाती है। चुनाव आयोग सारी विचारधाराओं वाली पार्टियों को संरक्षण देता है तो संसद के चैनल में सभी दलों और सभी राजनीतिक विचारों को जगह मिलनी चाहिए। हमने वही किया। नतीजा यह कि देश के करोड़ों दर्शकों का परिवार हमारे साथ जुड़ा। उन्हें ताज्जुब होता था कि इस चैनल पर सरकार की सख्त आलोचना कैसे हो रही है। चाहे वह यूपीए सरकार रही हो या एनडीए। अगर सदन के भीतर पक्ष और विपक्ष बोल सकते हैं तो सदन के चैनल पर क्यों नहीं? मुझे गर्व है कि मेरे कार्यकाल में अनेक वर्षों तक यूपीएससी तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हुए छात्र कहा करते थे कि परीक्षाओं की तैयारी के लिए उन्होंने केवल राज्यसभा टीवी देखा। अलग से पढ़ाई नहीं की ।

दरअसल, संसद एक तरह से देश की मां है। एक चैनल आठ सौ सांसदों की आवाज, उनके निर्वाचन क्षेत्र, उनके मुद्दे, जनता की आवाज, दोनों सदनों की कार्रवाई, स्थाई समितियों, लोकलेखा समिति, संयुक्त संसदीय समिति, प्रवर समिति तथा अनेक विभागीय समितियों का काम नहीं दिखा सकता। हमने राज्यसभा चैनल में फ़िल्में नहीं दिखाईं, फ़ूहड़ सीरियल नहीं दिखाए, विज्ञापन नहीं दिखाए, ब्रेक तक नहीं लिए।  हमारे समाचार तथ्यपरक और निष्पक्ष होने का पूरा प्रयास करते थे। हमारे एंकर अपने शो के लिए पूरी पढ़ाई करते थे। चीखपुकार और गाली गलौज संस्कृति को बढ़ावा नहीं देते थे और विषयों के विशेषज्ञ ही बुलाते थे ।

बहरहाल! अब यदि यह अतीत बनने जा रहा है तो भारत की संसदीय पत्रकारिता को बड़ा झटका है। वैसे भी अधिकतर पत्रकारिता शिक्षण संस्थानों में संसदीय पत्रकारिता नहीं पढ़ाई जाती। पत्रकारिता के छात्र इन चैनलों से काफी कुछ सीखते थे। पत्रकारिता के लिए ही नहीं, लोकतांत्रिक परिपक्वता के अनुष्ठान में भी बाधा पहुंचेगी मिस्टर मीडिया।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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दो खेमों में बंटी उप्र मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति

समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी और सचिव शिवशरण सिंह ने जारी किया अलग-अलग बयान

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 07 November, 2019
Last Modified:
Thursday, 07 November, 2019
Committee

‘उप्र राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति’ के आधे पदाधिकारियों की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद संवाददाता समिति के दो फाड़ होने के आसार पैदा हो गये हैं। आज संवाददाता समिति के सचिव शिवशरण सिंह के नेतृत्व में समिति के चंद पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात करके प्रदेश के पत्रकारों की जायज जरूरतों की मांग की थी। इनमें पत्रकारों के लिए सरकरी आवास और सुरक्षा की मांग प्रमुख थीं।

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद सचिव शिवशरण सिंह ने एक विज्ञप्ति जारी कर इस मुलाकात का विवरण पत्रकारों के समक्ष प्रस्तुत किया। इसके बाद उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने समिति के चंद पदाधिकारियों की मुख्यमंत्री से मुलाकात पर एतराज जताते हुए एक पत्र जारी किया। इसमें उन्होंने लिखा कि मुख्यमंत्री से समिति की मुलाकात आधिकारिक नहीं थी, बल्कि कुछ पदाधिकारी/सदस्य निजी एजेंडा पर मिले थे।

तिवारी ने समिति द्वारा जारी किए पत्र में लिखा कि उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के निर्वाचित प्रतिनिधियों के किसी आधिकारिक प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बुधवार को मुलाकात नही की है। समिति के पदाधिकारियों को इस संदर्भ में न तो बुलाया गया था नही समिति की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई ज्ञापन पत्रकारों से संबंधित मांगों का सौंपा गया है।

समिति अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने साफ किया है कि बुधवार को मुख्यमंत्री से समिति के मात्र चंद पदाधिकारी व्यक्तिगत स्तर पर मिले थे और अपनी निजी रुचि के अनुसार उन्होंने मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा था। तिवारी ने बताया कि संवाददाता समिति के सभी निर्वाचित पदाधिकारियों ने एक साथ मुख्यमंत्री से मुलाकात के लिए समय मांगा है, जो अब तक नहीं मिल सका है। इन परिस्थितियों में महज चार-पांच पदाधिकारियों की मुलाकात व्यक्तिगत तो हो सकती है, पर समिति की आधिकारिक नही।

उन्होंने कहा कि समिति की ओर मुख्यमंत्री से मुलाकात होने की दशा में सभी निर्वाचित पदाधिकारी जाएंगे और सबकी सहमति से पत्रकारों की मांगों से संबंधित ज्ञापन उन्हें सौंपा जाएगा। समिति अध्यक्ष ने खेद जताया कि मुख्यमंत्री के एक मीडिया सलाहकार कुछ चहेते पदाधिकारियों की मुलाकात करवा कर पत्रकारों की एकता को खंडित करना चाहते हैं जो प्रदेश अथवा सरकार के हित में नहीं है।

उन्होंने कहा कि समिति में सभी पदाधिकारी बड़ी संख्या में पत्रकार साथियों का विश्वास व मत पाकर जीते हैं और सभी को मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखने का समान हक होना चाहिए। उन्होंने प्रदेश सरकार को आगाह किया कि मीडिया सलाहकार को पत्रकारों के हितों के लिए कार्ययोजना बनाने और मुख्यमंत्री की छवि चमकाने के काम में गंभीरता से जुटना चाहिए न कि पत्रकारों के बीच गुटबाजी को प्रश्रय देने व अपनी मनमानी करने में। संवाददाता समिति अध्यक्ष ने सभी निर्वाचित पदाधिकारियों की ओर मुख्यमंत्री से मिलने का समय देने का अनुरोध करते हुए कहा कि पत्रकारों की कई समस्याओं पर विचार व उनकी मांगों का निराकरण अति आवश्यक है।

इससे पूर्व संवाददाता समिति के सचिव ने मुख्यमंत्री से मुलाकात के तुरंत बाद जो विज्ञप्ति जारी की वो इस प्रकार थी-

मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने पत्रकारों की समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री से की मुलाकात

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके आवास पर भेंट कर उन्हे एक अनुरोध पत्र सौंपा। इसमें पत्रकार की समस्याओं का उल्लेख किया गया। वार्ता के दौरान मुख्यमंत्री ने समिति के सदस्यों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और उनके निराकरण का आश्वासन दिया। समिति के सचिव शिवशरण सिंह के नेतृत्व में मिले इस शिष्टमंडल ने मुख्यमंत्री आवास पहुंचकर उनसे आग्रह किया कि राज्य मुख्यालय में कार्यरत पत्रकारों को आवास की भीषण समस्या का सामना करना पड़ रहा है। पूर्व में मुख्यमंत्री की तरफ से पत्रकारों को निजी आवास (फ्लैट) देने का मौखिक आश्वासन दिया गया था। जिस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी है। इस पर मुख्यमंत्री जी ने समिति को आश्वासन दिया कि सरकार पत्रकारों की समस्याओं को लेकर गंभीर है लेकिन उन्ही पत्रकारों को यह सुविधा दी जाएगी जो इसके योग्य होंगे।

इसके अलावा समिति ने पत्रकारों के उत्पीडन को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि पत्रकार समाज के प्रति भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी को निभाते हुए काम करें और आम जन के सरोकार से भी जुड़ें। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की भूमिका सरकार के कामों को जन-जन तक पहुंचाना तथा जन समास्याओं को सरकार तक पहुंचाने की होती है। इसलिए इस पर वह प्रभावी ढंग से काम करें। प्रतिनिधिमंडल में समिति के सचिव शिवशरण सिंह, उपाध्यक्ष आकाश शेखर शर्मा, संयुक्त सचिव श्रीधर अग्निहोत्री, सदस्य कार्यकारिणी अभिषेक रंजन और दया बिष्ट शामिल थे। अब देखना ये है कि समिति के अध्यक्ष और सचिव के बीच खींचतानी में दो खेमों में बंटे पदाधिकारियों/सदस्यों का अलगाव किस नतीज़े पर पहुंचता है।

(वरिष्ठ पत्रकार नवेद शिकोह की फेसबुक वॉल से साभार)

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‘साइबर नीति की समीक्षा कर उसे प्रासंगिक बनाने का सही समय’

सोशल मीडिया के माध्यमों में वॉट्सऐप को सबसे सुरक्षित और निजता बनाए रखने वाला ऐप माना जाता रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 02 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 02 November, 2019
Social Media

डॉ. बिजेंद्र कुमार।।

दो-तीन दिन पहले इस साल की सबसे बड़ी हैकिंग की खबर आई। खबर के अनुसार, 12 लाख से ज्यादा भारतीयों के डेबिट और क्रेडिट कार्ड के डाटा को चोरी कर लिया गया और इस डाटा को हैकर्स की वेबसाइट जोकर्स स्टेश पर बेचा जा रहा है। इससे भारतीय यूजर्स अभी उबर भी नहीं पाए थे कि वॉट्सऐप में सेंध लगने का मामला उजागर हो गया।

सोशल मीडिया के माध्यमों में वॉट्सऐप को सबसे सुरक्षित और निजता बनाए रखने वाला ऐप माना जाता रहा है। खुद वॉट्सऐप भी एंड टू एंड इंक्रिप्शन यानी संदेश के प्रेषक और प्राप्तकर्ता तक सीमित रहने का भरोसा देता है और दावा भी करता कि है वॉट्सऐप में जानकारी पूर्णतः सुरक्षित है। लेकिन 14 सौ से ज्यादा भारतीयों की जानकारी प्राप्त करने के लिए जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिये फोन हैक कर लिए गए।

जिन यूजर्स के वॉट्सऐप में सेंध लगी, उनमें सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हैं। स्पाइवेयर, मैलवेयर और वायरस के जरिये साइबर अपराध करना अब आम होता जा रहा है। भारत में साइबर अपराध के बढ़ते आंकड़े इसका प्रमाण हैं। स्पाइवेयर अब यूजर्स की तमाम गतिविधियों पर नजर रकने के साथ यूजर्स की  महत्वपूर्ण जानकारियां को फोन हैक कर चुरा लेते हैं। ऐसे में यूजर्स को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ उसके मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

सोशल मीडिया कंपनियां विकासशील देशों में साइबर सिक्योरिटी को लेकर उतनी गंभीरता नहीं दिखातीं, जितनी यूरोपीय देशों और अमेरिका को लेकर दिखाती हैं। इन कंपनियों ने यूरोप और अमेरिका के लिए अलग कानून बनाए हुए हैं और भारत जैसे देशों के लिए अलग तरह का कानून है।

वॉट्सऐप जासूसी मामले में विपक्ष ने भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। सरकार ने भी वॉट्सऐप को तलब कर पूछा है कि सेंध कैसे लगी और उसने यूजर्स की जानकारियां सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय किए हैं? जाहिर है वॉट्सऐप में सेंध लगना निजता के उल्लंघन का मामला है। इसमें सरकार को निजता और मौलिक अधिकार दोनों को सुरक्षित रखने के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। समय आ गया है सरकार साइबर नीति की समीक्षा कर उसे प्रासंगिक बनाएं।

(लेखक दिल्ली विश्विद्यालय से संबद्ध भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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‘वॉट्सऐप जासूसी कांड: याद आती है 32 साल पहले की वह घटना’

राजनीतिक गलियारों के अलावा सरकारी एजेंसियां और देश-विदेश की निजी एजेंसियां भी वर्षों से अधिकृत अथवा गैरकानूनी ढंग से भारत में जासूसी करती रही हैं

आलोक मेहता by आलोक मेहता
Published - Saturday, 02 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 02 November, 2019
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक बार फिर फोन से जासूसी पर हंगामा। कम से कम अनुभवी नेताओं और पत्रकारों को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मुझे 32 वर्ष पहले की घटना याद आती हैI उस समय ज्ञानी जैल सिंह देश के राष्ट्रपति थे। उनके करीबी वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल के साथ राष्ट्रपति भवन में बातचीत हो रही थी। पहले हम उनके स्टडी रूम में ही बात कर रहे थे।  फिर राजनीतिक उठापटक पर बात शुरू होने पर ज्ञानीजी ने हमसे कहा कि चलो बाहर लॉन में बात करेंगे।  मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। ज्ञानीजी ने बाहर निकलकर खुद ही बताया, ‘तुम्हें मालूम नहीं है,  आजकल दीवारों के कान भले ही न हों,  टेलिफोन उठाए बिना कोई दूर बैठा हमारी बात सुन लेगा या रिकॉर्ड भी कर लेगा।

उन दिनों ज्ञानीजी और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच मतभिन्नता और अविश्वास का दौर चल रहा था। उस दौरान इस तरह फोन टैपिंग से बचाव के रास्ते निकाले जाते रहे। राजनीतिक गलियारों के अलावा सरकारी एजेंसियां और देश-विदेश की निजी एजेंसियां भी वर्षों से अधिकृत अथवा गैरकानूनी ढंग से भारत में जासूसी करती रही हैं। 

अब इजरायल की एक कंपनी के आधुनिक उपकरण से दुनिया के 14 देशों के साथ भारत के भी लगभग 15 या उससे अधिक लोगों के फोन में सेंध लगाकर वॉट्सऐप के जरिये बातचीत अथवा दस्तावेजों की जासूसी का आधा अधूरा रहस्य मीडिया में उछला है। सरकार ने स्वयं इस मुद्दे पर वॉट्सऐप और एजेंसियों से जांच पड़ताल की घोषणा कर अपने हाथ झाड़ने का प्रयास किया है। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी और प्रतिपक्ष के अन्य दलों, मीडिया समूहों तथा कानूनविदों ने इसे निजता में हस्तक्षेप ठहराते हुए आशंका व्यक्त की है कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस जासूसी में सरकार का हाथ हो सकता हैI

असली मुद्दा यह है कि किसी एजेंसी ने इन चुनिंदा लोगों के फोन में ही सेंध क्यों लगाई? जो नाम सामने आए, उनमें से कुछ पर नक्सल संगठनों, उनसे जुड़े संदिग्ध व्यक्तियों और देश विदेश में मानव अधिकारों के नाम पर सहायता देने वालों से संपर्क और संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं। भारत सरकार भी वर्षों से ऐसे व्यक्तियों और संगठनों पर नजर रखती रही है। कांग्रेस गठबंधन की सरकार रही हो या भाजपा गठबंधन की, राष्ट्रीय अथवा प्रादेशिक सरकारों ने सुरक्षा व्यवस्था के लिए वैधानिक रूप से भी गुप्तचरी का इंतजाम किया है। लेकिन नए जासूसी कांड में बड़े पेंच हैं।

इजरायल की कंपनी एनएसओ ने कहा है कि वह आतंकवाद और गंभीर अपराधों के खिलाफ लड़ाई में मदद के लिए सरकारी खुफिया एजेंसियों को यह टेक्नोलॉजी देती है। यह टेक्नोलॉजी मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए डिजाइन नहीं की गई है। फिर भी जिन लोगों की जासूसी का मामला सामने आया है,  उनमें से कुछ भीमा कोरेगांव के हिंसक गंभीर मामलों के वकील अथवा मानव अधिकार कार्यकर्ता के रूप में चर्चित रहे हैं। रहस्य यह है कि  किसके कहने पर इनके फोन में सेंध लगाई गई। जासूसी भी 2019 के चुनाव से कुछ पहले की तारीखों में हुई है।

वॉट्सऐप यह दावा करता रहा है कि उसके संदेश पूरी तरह सुरक्षित होते हैं। दुनिया भर में उसके 150 करोड़ उपभोक्ता हैं। इनमें से करीब 40 करोड़ भारत में हैं। इसलिए वॉट्सऐप की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है और उसने बाकायदा अमेरिका की अदालत में इजराइल की कंपनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया है। यह मामला आसानी से निपटने वाला नहीं है। सरकार के अलावा भारतीय अदालतों में भी यह मामला जांच और न्याय के लिए सामने आने के पूरे आसार हैं।

यूं मजेदार बात यह है कि इससे पहले भी परस्पर विरोधी संस्थानों और लोगों ने जासूसी के आरोपों पर बड़ी हायतौबा मचाई, लेकिन कभी किसी पर गंभीर कार्रवाई नहीं हो सकी। कांग्रेस गठबंधन की सरकार के दौरान एक प्रभावशाली मंत्री द्वारा अपनी ही सरकार के सबसे वरिष्ठ मंत्री के कक्ष में जासूसी के उपकरण लगाने का  आरोप लगा था। सरकार ने अपनी इज्जत बचाने के लिए इस मामले को दबा दिया। इसी तरह तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह की जासूसी का गंभीर मामला भी सामने आया था। बड़ी कारपोरेट कंपनियों, नेताओं और नामी पत्रकारों की महीनों तक फोन पर होती रही बातचीत की जासूसी के टेप सामने आने पर हंगामा मच गया था।

आज तक उस जासूसी के सूत्रधारों के नाम सामने नहीं आए और न ही किसी पर कोई कार्रवाई हुई। कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में सत्ताधारियों द्वारा समय-समय पर अपने विरोधियों और अपने समर्थकों तक की जासूसी के आरोप सामने आते रहे हैं। शायद यही कारण है कि इस बार भी जासूसी कांड को लेकर राजनीतिक हंगामा हो रहा है।

इस विवाद से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि नक्सली हिंसा अथवा आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े लोगों की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहायता करने वालों पर सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर नजर रखने की पूरी संभावना रहती है। लेकिन देर सवेर यह खतरा बन सकता है कि देश के अंदर या बाहर से सहायता देने वाले लोगों से संपर्क होने पर वह भी संदेह के पात्र हो जाते हैं। नक्सली हिंसा में कांग्रेस के भी शीर्ष नेताओं की हत्या हुई है। अपने सत्ता काल में वह भी ऐसे लोगों पर नजर रखती रही है।

भारत ही नहीं, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी सत्ताधारियों अथवा कारपोरेट कंपनियों द्वारा जासूसी के मामले सामने आते रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय रहने पर अन्य खतरों के साथ इस तरह के खतरों का भी सामना करना होता है। बहरहाल यह उचित समय है, जब सरकार और संसद निजता के अधिकार की सीमाएं और किसी भी तरह की गुप्तचरी के नियमों को तय करे।

(लेखक पद्मश्री से सम्मानित है और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं।)

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मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छा

आज भी हमारे कई मीडिया शिक्षा संस्थान ऐसे मामलों की कवरेज का व्यावहारिक, नैतिक और सैद्धांतिक पक्ष नहीं पढ़ाते

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Thursday, 31 October, 2019
Last Modified:
Thursday, 31 October, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

वह 31 अक्टूबर 1984 की बेहद मनहूस सुबह थी। रात साढ़े तीन बजे अखबार का संस्करण प्रेस भेजा और गाड़ी मुझे घर छोड़ आई । सोते-सोते सुबह साढ़े चार बज गए। गहरी नींद में ही था कि दफ्तर की गाड़ी का भोंपू बजने लगा। उस गाड़ी का भोंपू ऐसी आवाज करता था कि घनघोर निद्रा भी उसके आगे दम तोड़ देती थी। आशंका हुई कि अखबार में कोई ब्लंडर तो नहीं हो गया। नौकरी बचेगी या नहीं? क्योंकि पहले कभी इतने सुबह प्रेस की गाड़ी लेने नहीं आई थी।

बाहर आया तो ड्राइवर ने कहा, ‘जैसी हालत में हों, तुरन्त चलिए।' मैंने पूछा, क्या हुआ? उसने कहा, ‘मुझे ज्यादा नहीं पता, पर दिल्ली में कुछ बड़ा हुआ है।’ शर्ट-पेंट पहनी। दफ्तर पहुंचा। न्यूजरूम खाली था। अकेले अखबार के प्रबंध संपादक अभय छजलानी टेलिप्रिंटर के पास खड़े थे। बदहवास। बोले, इंदिराजी को गोली मार दी। एक घंटे में छोटा अखबार निकालना है। टेलिप्रिंटर की घंटियां बज रहीं थीं। लाल रंग के रिबन से टाइप उभर रहे थे। मैं और वे खबर लिखने बैठे। कभी वे ले आउट रूम में जाते तो कभी मैं। एक घंटे में अठारह-बाइस साइज में हमारा अखबार बाजार में था-शीर्षक था इंदिराजी शहीद!

मेरी आंखों के सामने केवल एक सप्ताह पहले इंदिराजी की भीकन गांव की रैली की कवरेज याद आई। वह मध्य प्रदेश की अंतिम यात्रा थी और उसकी कवरेज करने तथा एक छोटा सा साक्षात्कार करने का मौका मुझे मिल गया था। उस रैली में भी उन्होंने कहा था कि मेरे खून का एक-एक कतरा देश के काम आएगा। हालांकि उससे पहले खजुराहो संसदीय क्षेत्र की दो चुनावी सभाओं को कवर करने और कुछ सवाल करने के अवसर आए थे, मगर भीकन गांव की कवरेज मेरे लिए यादगार है।

इसके बाद जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, बाकी संपादकीय सहयोगी भी आते गए। हम दिन भर छोटे संस्करण निकालते रहे। अखबार के गेट पर हॉकर्स की लंबी कतार लगी रही। शाम होते-होते देश अशांत हो गया। चारों तरफ हिंसा,लूट और आगजनी का दहशत भरा माहौल। ऐसे में शाम को हम लोग रिपोर्टिंग के लिए भेज दिए गए। उस रात घर नहीं जा सके। दिन भर पोहे-कचौरी और चाय चलती रही । अगले दिन स्थिति और बिगड़ गई। अगले दिन भी उसी हाल में रहे। शहर में कर्फ्यू था। तीसरे दिन घर जा पाए। रिपोर्टिंग और डेस्क वर्क एक साथ संभालना पड़ रहा था।

अपने ढंग का यह पहला अनुभव था। पत्रकारिता के नजरिये से काफी कुछ सीखने को मिला। खबर लिखने के नए अंदाज, धीरज और संयम की परीक्षा, संवेदनशील विषय पर सोच-समझकर शब्दों, भाषा और ले आउट की नसीहत हमारे वरिष्ठ सहकर्मी देते रहे। समाचार संपादक जयसिंह ठाकुर के हाथ में वह रिमोट था, जो हर कॉपी का एक-एक शब्द चेक करते थे। एक भी गलत शब्द का इस्तेमाल अर्थ का अनर्थ कर सकता था। कई तथ्य हमने बेहद अनुशासन का पालन करते हुए अखबार के पन्नों पर परोसे। आज वे नसीहतें, प्रशिक्षण और जिम्मेदारी की भावना का जगाए रखना याद आता है। लेकिन, किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का अवसर न मिले तो अच्छा। आज भी आंखों के सामने वे अशांत दृश्य सिहरन पैदा कर देते हैं।

इस घटना को पैंतीस बरस बीत चुके हैं। मगर आज भी हमारे कई मीडिया शिक्षा संस्थान ऐसे अति संवेदनशील मामलों की कवरेज का व्यावहारिक, नैतिक और सैद्धांतिक पक्ष नहीं पढ़ाते। कम से कम बीस विश्वविद्यालयों के साथ उनके पाठ्यक्रमों का अध्ययन करने के बाद कह सकता हूं कि इनमें बहुत सुधार की जरूरत है। हमारे अनेक वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों को इस तरह की कवरेज का व्यापक अनुभव है। वे कम से कम इस मामले में पहल कर सकते हैं। मैं तो अपने स्तर पर काम कर ही रहा हूं। अप्रिय हालात में संयम और जवाबदेही के साथ खबर संकलन का काम सिखाना बहुत आवश्यक है मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

मिस्टर मीडिया: राजदीप के विडियो और अजीत अंजुम के खुलासे के मायने भी समझिए

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‘हमें केवल राहुल चाहिए और वह भी सही सलामत’

जौनपुर में न्यूज 24 चैनल के युवा रिपोर्टर नीतीश कुमार (राहुल) एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए हैं

Last Modified:
Monday, 28 October, 2019
Journalist Rahul

कुमार सौवीर, वरिष्ठ पत्रकार।।

पत्रकार को सामान्य तौर पर दलाल और ब्लैकमेलर की तरह देखा और प्रचारित किया जाता है। लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता में समर्पित अधिकांश युवा मूलतः पत्रकार होते हैं, जो अपने समाज, देश ही नहीं, अपनी पत्रकारिता के धर्म के प्रति समर्पित और निष्ठावान होते हैं। हां, वे अपने बीच के दलालों, चोरों और मठाधीशों का विरोध करने का साहस नहीं दिखा पाते।

राहुल यानी नीतीश कुमार उसी पवित्र पत्रकारिता का जोशीला सेनानी है। अभी खबर मिली है कि जौनपुर में न्यूज 24 चैनल के युवा रिपोर्टर नीतीश कुमार (राहुल) बीती रात एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। घटना के तत्काल बाद राहुल को वाराणसी के शिवपुर स्थित नोवा हॉस्पिटल पहुंचाया गया, जहां अब वे आईसीयू में भर्ती हैं। आजतक के रिपोर्टर राजकुमार सिंह ने बताया कि डॉक्टरों के मुताबिक राहुल के सिर और जबड़े में गंभीर चोटें आई हैं।

राहुल के लिए हम तीन काम फौरन कर सकते हैं। एक तो तत्काल ईश्वर से राहुल को अतिशीघ्र स्वस्थ करने की प्रार्थना करें। दूसरा यह कि राहुल के इलाज के लिए डीएम के माध्यम से एक अनुरोध मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दें। शीघ्रातिशीघ्र।

मेरा सुझाव है कि नीतीश के इलाज के लिए हॉस्पिटल में इलाज से संबंधित जो भी एस्टीमेट बन सकता हो, उसे नत्थी करके एक अर्जी जिलाधिकारी को फौरन भेज दो। डीएम से कहो कि वो तत्काल लखनऊ में शासन के लिए लेटर तैयार करें। मैं लखनऊ में उसकी मुख्यमंत्री कोष से भरसक पैरवी करवा दूंगा, ताकि नीतीश कुमार के इलाज में कोई आर्थिक समस्या न आ पाए।

और तीसरा काम तत्काल करें कि एक आर्थिक ढांचा खड़ा करें। सभी पत्रकार इसमें अपना यथायोग्य योगदान करें और विज्ञापनदाताओं को भी इसके लिए प्रेरित करें। कोशिश करें कि इस अभियान में उन तथाकथित पत्रकार-नुमा दलालों-चोरकटों को दूर रखा जाए, जिन्होंने, जन-चर्चा के मुताबिक, एक मृत पत्रकार के शोक-संतप्त परिवार को आर्थिक सहयोग दिलाने के नाम पर बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय जैसे कई ऑफिसों, नेताओं और अन्यत्र बाजारों से भी मोटी उगाही कर डाली, और फिर नौ-दो-ग्यारह हो गए थे।

हम सब परस्पर छोटे-मोटे सहयोग से एक फंड खड़ा कर सकते हैं। इसकी शुरुआत के लिए दो हजार रुपयों का एक छोटा सा गिलहरी-प्रयास जैसा योगदान मेरी ओर से। राजकुमार सिंह या जो भी पत्रकार इस फंड का प्रबंधन सम्भालने को तैयार हों, मैं तत्काल उपलब्ध करा दूंगा। हमें केवल राहुल चाहिए, और वह भी सही-सलामत तथा यथाशीघ्र स्वस्थ नीतीश कुमार राहुल।

(वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की फेसबुक वॉल से)  

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मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

मीडिया और अवाम अपने कंधों का इस्तेमाल न होने दे तो ही इस तरह की स्थिति पर कुछ लगाम लग सकती है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Thursday, 24 October, 2019
Last Modified:
Thursday, 24 October, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े चौंकाते हैं। तीन राज्यों में खबरों की जालसाजी 73 फीसदी। देश भर में फेक न्यूज के 257 मामले दर्ज हुए। इनमें 138 मध्य प्रदेश में, 32 उत्तर प्रदेश में और 18 केरल में पंजीकृत किए गए। सत्रह राज्यों में कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। अर्थात ये राज्य दूध से धुले हैं।

इस कारोबार से क्या किसी को पैसा मिलता है? अगर उत्तर नहीं में है तो फिर इन खबरों का लाभ क्या है और इसे कौन करता है? मेरी समझ से इसका फायदा सिर्फ़ दो श्रेणी के लोगों को हो सकता है। एक तो राजनेता और दूसरे समाज को भटकाने या बांटने वाले लोग। सियासी शतरंज पर चालें चलने वाले इससे अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करते हैं। अपने महिमा मंडन को नए-नए रूपों में पेश करते हैं। अपना वोट बैंक सुरक्षित रखने के लिए सामाजिक समरसता और सदभाव के समीकरण बिगाड़ने पड़ते हैं। इसका अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि समाज के कुछ वर्गों का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए हो रहा है। सामाजिक सदभाव और सौहार्द्र को आघात पहुंचाने वाली फेक खबरें प्रसारित हो रही हैं तो उससे केवल राजनेता लाभान्वित होते हैं या फिर शत्रुदेश।

प्रश्न यह है कि इस कारोबार में कौन लिप्त हैं? क्या वे भी पत्रकार हैं? फर्जी खबरों का काम कपड़ा कारोबारी नहीं करता। कोई हलवाई नहीं करता। कोई जूता बनाने वाली कंपनी नहीं करती। टीवी या फर्नीचर तैयार करने वाले लोग यह काम नहीं करते। किसी डॉक्टर की इसमें दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही कोई बैंकर इसमें शामिल हो सकता है। कम्प्यूटर व्यवसायी नहीं कर सकते और न ही इंजीनियर इसमें लगे हुए हैं। संकेत साफ़ है कि राजनेता ही परदे के पीछे होते हैं और इस काम में वे पत्रकारों की मदद भी लेते हैं। कुछेक स्तर पर बेरोजगार भी इसमें योगदान करते हैं। उन्हें कुछ पारिश्रमिक मिल जाता है।

आपको याद होगा कि लोकसभा चुनाव से पहले बंगाल के एक जिले में एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने पूछताछ में बताया था कि उसने करीब एक हजार वॉट्सऐप समूह बनाए हैं। अब कोई सामाजिक संवाद के लिए एक हजार समूह क्यों बनाएगा? मध्यप्रदेश के गांव-गांव में वॉट्सऐप समूह बनाए गए हैं। इनकी संख्या हजारों में है। एक फेक न्यूज फैलाने में एक मिनट भी नहीं लगता। यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

समाधान क्या है? बाड़ ही खेत को खाने लग जाए तो उस खेत की रक्षा कौन करेगा? भारतीय दंड विधान में संशोधन करके उसे अधिक सख्त बनाया जाना चाहिए। उसे गैरजमानती होना चाहिए और अपराध सिद्ध होने पर कम से कम दस साल की कैद का प्रावधान होना चाहिए। लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? फेक न्यूज से अगर सियासी नफा होता है तो सख्त कानून बनाने वालों का अंतरिक्ष से आयात तो नहीं हो सकता। मीडिया और अवाम अपने कंधों का इस्तेमाल न होने दें तो ही कुछ लगाम लग सकती है। यह बात ध्यान देने की है मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: राजदीप के विडियो और अजीत अंजुम के खुलासे के मायने भी समझिए

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मिस्टर मीडिया: गांधी से साहसी पत्रकार कौन?​​​​​​​

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