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'मठी समाजवादियों ने पूंजी, जाति, वंश से इसे वैसे ही निरर्थक किया, जैसे संकीर्णतावादियों ने गांधी के रामराज्य को'
डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर उनकी यादें ताजा करने की कोशिश के बीच...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
‘उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे दो बड़े राज्यों में अरसे तक ‘लोहियावादी’ सरकारें रहने के बावजूद लोहिया की प्रखर वैचारिक विरासत अपने पवित्र उद्देश्य में ‘असफल’ होकर रह गई है तो उनके अनुयायी किसी भी तरह इसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते।’ ये कहना है हिंदी अखबार दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित लेख के जरिए वरिष्ठ पत्रकारकृष्ण प्रताप सिंह का। उनका पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं-
वारिसों के वार से आहत लोहिया की विरासत
हाल ही में डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर उनकी यादें ताजा करने की कोशिश के बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा अप्रैल, 2015 में विदेशी निवेश जुटाने के लिए की गई जर्मनी की महत्वाकांक्षी यात्रा का जिक्र आ गया। तब वे खुद को डॉ. लोहिया और उनके विचारों की सबसे बड़ी वारिस बताने वाली समाजवादी पार्टी के युवा मुख्यमंत्री थे। यात्रा के दौरान उन्हें पता चला कि डॉ. लोहिया ने बर्लिन के फ्रेडरिक विलियम विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट प्राप्त करने के लिए 1929 से 1933 के बीच महात्मा गांधी के सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण को केन्द्र में रखकर ‘भारत में नमक पर कराधान’ शीर्षक से जो थीसिस लिखी थी, वह विश्वविद्यालय के अभिलेखागार से गायब हो गई है। उन्होंने ट्वीट करके इस पर गहरा दुख और नाराजगी जताई।
कई सपाई-गैरसपाई नेता इसे लेकर बहुत रोना-धोना मचाने लगे तो एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने फेसबुक पेज पर व्यंग्यात्मक लहजे में थीसिस का सुराग देते हुए लिखा- ‘वह थीसिस तो उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में अधबने कनहर बांध में उन आदिवासियों व किसानों के खून से लिथड़ी पड़ी है जो अपने विस्थापन का विरोध करते हुए पुलिस की बेंतों व बन्दूकों के शिकार होकर रह गये। उसके कुछ पन्ने वहां पुलिस की संगीनों पर भी चिपके दिखे हैं। मुख्यमंत्री चाहें तो उसे वहां से बरामद करवाकर बचा लें।’
ज्ञातव्य है कि उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश-छत्तीसगढ़ सीमा पर बन रहे कनहर बांध का विरोध कर रहे विस्थापन के शिकार आंदोलनकारियों पर एक हफ्ते में दो बार उत्तर प्रदेश पुलिस का कहर बरपा था। पत्रकार की उक्त टिप्पणी के बाद सरकारी-गैरसरकारी समाजवादी हलकों में जैसी चुप्पी छायी, उससे जो एक बात सबसे ज्यादा स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है, वह यह कि 12 अक्टूबर, 1967 को नई दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में हुआ डॉ. लोहिया की पौरुष ग्रंथि का विफल ऑपरेशन सिर्फ उनकी जान ले सका था, लेकिन अब उदारीकरण के सर्वथा अनुदार दौर में जब राजनीतिक शुचिता, न्याय, समता और समाजवाद की उनकी व्याख्याएं गम्भीर खतरों का सामना कर रही हैं, उनके विचारों की हत्या में उनके विरोधियों जितनी ही भूमिका उनके अनुयायियों की भी है।
डॉ. लोहिया ‘मार्क्स, गांधी एंड सोशियलिज्म’ शीर्षक पुस्तक लिख रहे होंगे तो उन्हें कतई इल्म नहीं रहा होगा कि एक दिन उनके अनुयायी भी उनके साथ एकदम वैसे ही सलूक पर आमादा हो जाएंगे, जैसा गांधी या कार्लमार्क्स के अनुयायी उनके साथ अरसे से करते आ रहे हैं। पूंजीवाद के शोषक चरित्र से वाकिफ डॉ. लोहिया उसकी साम्राज्यवादी जड़ें उखाड़ने के लिए मार्क्सवाद व गांधीवाद के कथित ‘अधूरेपन’ को दूर करके भारतीय संदर्भ में उनके समन्वय की जरूरत जताते और समाजवादियों का हठी व मठी में वर्गीकरण करते थे। अब हठी समाजवादी तो जैसे रहे ही नहीं, मठी समाजवादियों ने उनके समाजवाद का कॉरपोरेटीकरण करके उसे भाई-भतीजावादी पूंजीवाद का सगा बनाकर और अस्मिता, जाति, वंश व परिवार के काकटेल में बदलकर आमजन के लिए वैसे ही निरर्थक कर डाला है, जैसे संकीर्णतावादियों ने गांधी के रामराज्य को।
उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे दो बड़े राज्यों में अरसे तक ‘लोहियावादी’ सरकारें रहने के बावजूद लोहिया की प्रखर वैचारिक विरासत अपने पवित्र उद्देश्य में ‘असफल’ होकर रह गई है तो उनके अनुयायी किसी भी तरह इसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। डॉ. लोहिया के लिए चुनावों में अपनी नीतियों को लेकर जनता के बीच जाना उनके नतीजे यानी हार या जीत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था, लेकिन इन अनुयायियों के लिए जीत बड़ी और नीतियां गौण हो गई हैं। पिछड़ों को सौ में साठ की गांठ बांधने वाले लोहिया जाति तोड़ने का आन्दोलन चलाते थे और ये अनुयायी जातीय गोलबन्दियों को सत्ता की सबसे मुफीद सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करने के अभ्यस्त हो चले हैं।
लोहिया के निकट सच्चे लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी यह थी कि जिस
पार्टी की सरकार हो, उसके कार्यकर्ता भी उसकी खराब रीति-नीति
की निर्मम आलोचना करें। उन्होंने खुद एक गोलीकांड के बाद अपनी पार्टी की केरल
सरकार से इस्तीफा मांग लिया था। लेकिन अब उन्हें अपना आराध्य बनाने वाले कई
महानुभाव अपनी पार्टियों के अध्यक्ष नहीं, सुप्रीमो हैं और
उनकी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र लेशमात्र भी नहीं बचा।
23 मार्च, 1910 को
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अकबरपुर कस्बे में जन्मे लोहिया का पौरुष ग्रंथि
के आपरेशन के बाद फैले संक्रमण से देहांत हो गया। विदेश जाकर आपरेशन कराने की
डॉक्टरों की सलाह उन्होंने मानी नहीं थी। वे तो रिक्शे की सवारी तक नहीं करते थे
क्योंकि उनके अनुसार यह बहुत अमानवीय था कि एक आदमी दूसरे को खींचे। उनके निधन के
बाद विलिंगडन अस्पताल को उनका नाम देकर खुद को कृतकृत्य समझने वाली सत्ताओं ने कभी
भी गरीबी, गैरबराबरी, आर्थिक मंदी या
कश्मीर जैसी समस्याओं पर उनके दो टूक नजरिये और स्पष्ट चिंतन को स्वीकार नहीं
किया।
लोहिया ‘हर संभव समानता’ के पक्षधर थे। वे मानते थे कि असमानता से गुलामी, दमन और युद्ध का ही रास्ता साफ होता है लेकिन अब ‘हर संभव विषमता’ को अभय करने और आदरणीय बनाने के लिए जनता को न सिर्फ उसकी अभ्यस्त बल्कि विकल्पहीन बनाकर विभिन्न खांचों में बांटने और सुलाने के जो अनेक उपक्रम चल रहे हैं, वे लोहिया के उस कथन के तो विलोम ही हैं कि जिन्दा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं किया करतीं। ऐसे में उस ‘सप्तक्रांति’ की बात भी कौन और कैसे करेगा, जिसे वे भारतीय अर्थव्यवस्था के गरीब व ग्रामीण हितकारी पुनर्गठन का माध्यम बनाना चाहते थे।
साफ कहें तो इस कठिन समय में भी लोहिया को उनके विरोधियों से इसलिए कोई खतरा नहीं है क्योंकि उनकी विचारधारा समयसिद्ध और वैज्ञानिक है। अलबत्ता, पूछना जरूरी है कि उनको उनके उन अनुयायियों से कौन बचा सकता है जो चुनावी क्रांतियों से संतुष्ट या असंतुष्ट होकर उनके सारे किए-कहे की स्वार्थी व्याख्याएं कर लोगों को भरमा रहे हैं। परिवर्तन की बात करते-करते व्यवस्था के पैरोकार बन गए और निजी नफे व नुकसान की अवसरवादी राजनीति की ओर चल पड़े हैं!
डॉ. लोहिया की सिद्धांतनिष्ठा अनुकरणीय है जो उन्होंने फर्रुखाबाद के ऐतिहासिक उपचुनाव के दौरान प्रदर्शित की थी। दरअसल, उनकी जन्मभूमि में उनके एक अभिन्न मुस्लिम सहयोगी थे चौधरी सिब्ते मोहम्मद नक़वी। डॉ. लोहिया उनको उपचुनाव में प्रचार में योगदान के लिए फर्रुखाबाद ले जा रहे थे तो किसी साथी ने कह दिया कि सिब्ते भाई चल रहे हैं, अब मुसलमानों के वोट हमें आसानी से मिल जाएंगे। इतना सुनना था कि डॉ. लोहिया ने मोटर रुकवाकर सिब्ते को उतारा और अकबरपुर लौट जाने का आदेश सुना दिया। साथियों से बोले-जो भी वोट मिलने हैं, हमारी पार्टी की नीतियों और सिद्धांतों के आधार पर मिलें तो ठीक। कार्यकर्ताओं के धर्म, सम्प्रदाय या जाति के नाते वोट मिले तो क्या मिले! सिब्ते और साथियों ने बहुतेरा कहा कि वे अपने फैसले पर एक बार फिर सोच लें, लेकिन लोहिया अडिग रहे और सिब्ते को लौट जाना पड़ा।
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