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‘हर शाख पर उल्लू बैठा है’ जैसी क्यों बन रही है लोगों की सोच, बताया वरिष्ठ पत्रकार अजय शुक्ल ने

एक वक्त था जब किसी संवैधानिक संस्था की बात चलती थी तो स्वतः ही उसके प्रति सम्मान में...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

अजय शुक्ल

प्रधान संपादक, आईटीवी नेटवर्क ।।

संवैधानिक संस्थाओं की साख गिराने के लिए जिम्मेदार कौन?

एक वक्त था जब किसी संवैधानिक संस्था की बात चलती थी तो स्वतः ही उसके प्रति सम्मान में सिर झुक जाता था। सदैव से यह विश्वास किया जाता रहा है कि संवैधानिक संस्थायें किसी सरकार, राजनेता या अन्य प्रलोभन में नहीं फंसतीं। वो अपनी पूरी दक्षता से न्यायहित के लिए सिर्फ विधि सम्मत कार्य करती हैं, चाहे उनके सामने कोई भी क्यों न हो।

संवैधानिक संस्थाओं की ‘निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और अध्यवसाय’ पर कोई भी सवाल नहीं उठा सकता। इस विचार के साथ स्थापित की गईं इन संस्थाओं की बीते कुछ सालों में दशा यह हो गई है कि वे सवालों के घेरे में हैं। हालात ये हैं कि सामान्य बुद्धि ज्ञान वाला व्यक्ति भी उन पर चर्चा करने लगा है। अब लोगों के दिल में इन संस्थाओं के लिए सम्मानजनक शब्द नहीं निकलते, बल्कि उनकी सोच ‘हर शाख पर उल्लू बैठा है’ पर आधारित हो रही है।

आखिर कुछ सालों में ऐसा क्या हो गया कि हमारी वो संस्थायें दागदार हो रही हैं, जो कभी दागदारों को सजा देने का माध्यम बनती थीं?  जिन संवैधानिक संस्थाओं में शिकायतें करके और उनकी कार्यवाहियों को आधार बनाकर जो सियासी दल सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे, वही उसको कमजोर करने में लग गए। अगर यही हालात रहे तो हमारे लोकतंत्र और विधि स्थापित तंत्र के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने से कोई नहीं बचा सकता।

आपके साथ यह चर्चा शुरू करने का वाजिब कारण हमारे पास मौजूद है। 23 अक्टूबर का दिन भारतीय संवैधानिक और लोकतंत्र के इतिहास का वह काला दिन था, जब सीबीआई के जिम्मेदार अधिकारियों की तरफ से हाईकोर्ट में कहा गया कि देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी का दफ्तर भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया था। इन शर्मनाक शब्दों के जगजाहिर होने से यह भी साफ हो गया कि कभी सरकार का तोता कहलाने पर सुधार की बात करने वालों के वक्त में यह हाल हुआ है।

देश के इतिहास में 1941 का बड़ा महत्व है, क्योंकि इसी साल ‘स्पेशल पुलिस स्टैबिलिसमेंट’ बना था,  जिसके तहत विशेष पुलिस बल का काम कुछ क्षेत्रों में भ्रष्टाचार रोकना था। इसे वृहद रूप देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में सीबीआई के रूप में स्थापित कराया। सीबीआई के पहले निदेशक डीपी कोहली ने इस जांच संस्था के वह आयाम स्थापित किए, जो लंबे समय तक देश के लिए गौरव का विषय रहे। डीपी कोहली ने सीबीआई का मार्गदर्शन करते वक्त कहा था कि ‘जनता आपसे पूरी दक्षता और  सत्यनिष्ठा के साथ उच्चतम मानदंडों की अपेक्षा करती है। हमें उस विश्वास को बनाए रखना है। सीबीआई का ध्येय उद्यमता, निष्पक्षता और ईमानदारी हो, जो हमेशा आपके काम का मार्गदर्शन करे। आपकी कर्तव्यनिष्ठा हर जगह,  हर समय और हर परिस्थितियों में दिखनी चाहिए।‘

अपने पांच साल के सत्यनिष्ठ कार्यकाल के बाद जब कोहली ने उत्तराधिकारी को पद सौंपा तब, सीबीआई की साख यह थी कि कोई भी आईपीएस इस पद पर काम करना गर्व समझता था। कोहली को पदम् विभूषण से सम्मानित किया गया।  कोहली ने 1968 में जब पद छोड़ा था, तब शायद ही किसी ने यह सोचा होगा कि 50 साल बाद देश की सबसे अहम जांच एजेंसी सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) की साख इस हद तक दागदार होगी। संस्था के दो वरिष्ठतम अधिकारियों के आरोपों-प्रत्यारोपों ने संस्था पर पड़े शर्म के पर्दे को तार-तार कर दिया।

कई बार किसी संस्था के शीर्ष अफसरों या उनके कार्य करने के तरीकों को लेकर वैचारिक टकराव हुए हैं,  मगर अब जो हो रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ। आखिर ऐसी नौबत क्यों आई?  यह हालत एक दिन में नहीं हुई है, बल्कि कुछ सालों के दौरान जिस तरह से सीबीआई को सियासी हित साधने का टूल बना लिया गया। अफसरों की तैनाती जब स्वार्थों को लेकर होती है, तब यही परिणिति होती है।

पिछले साल फरवरी में आलोक वर्मा को जब सीबीआई का निदेशक बनाया गया, उस वक्त ‘सरकार’ के चहेते राकेश अस्थाना कार्यवाहक निदेशक थे। उनके ऊपर अपने पूर्ववर्तियों के कार्यकलापों के कारण सीबीआई की गिरती साख को बचाने और पुनः ईमानदार, सत्यनिष्ठ जांच एजेंसी के तौर पर स्थापित करने की जिम्मेदारी थी। सीबीआई को सरकार और सियासी दल के तोते की छवि से बाहर निकालना था।

आलोक ने जब सीबीआई के हाल देखे तो उन्हें लगा कि पूर्व में तैनात कुछ अफसरों का अतीत दागदार है, जिन्हें बाहर जाना चाहिए मगर सरकार ने उनकी रिपोर्ट को नजरांदाज करके ऐसे अफसरों को न केवल बनाए रखा, बल्कि प्रोन्नति भी दी।

हालात यहीं से बिगड़े और सीबीआई मुख्यालय के भीतर पक्षपात, भ्रष्टाचार, संदिग्ध सत्यनिष्ठा ही कर्तव्य बन गए। यह सब सर्वोच्च सियासी संरक्षण का प्रतिफल था। संस्था की विश्वसनीयता तब भी उतनी नहीं गिरी थी, जब उसे सुप्रीम कोर्ट ने ‘पिंजरे का तोता’ कहा था। 21वीं सदी में प्रवेश करते ही देश के लोग यह मानकर चलने लगे थे कि जिसकी सरकार बनती है, सीबीआई उसके हित में काम करती है। अब हालात बद से बदतर हो चले हैं।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती है। हमें यह भी गौर करना पड़ेगा कि बाकी संवैधानिक संस्थाओं का क्या हाल है? केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी), जिसको सीबीआई रिपोर्ट करती है, उसकी क्या हालत है? जिस सर्वोच्च न्यायपालिका के प्रति सीबीआई की जवाबदेही है, उसकी क्या हालत है? यहां तक कि जिस चुनाव आयोग को टीएन शेषन ने लोकतंत्र के नीति नियंता आयोग की तरह स्थापित किया, उसकी क्या हालत है?

चुनाव आयोग अब शायद निष्पक्ष संवैधानिक संस्था से पहले सियासी एजेंट नजर आता है। सत्तारूढ़ दल के पदाधिकारी चुनाव की तिथियां पहले ही घोषित कर देते हैं और आयोग बाद में लकीर पीटता है। सीवीसी सरकार से दिशा निर्देश लेता दिखता है। सुप्रीम कोर्ट के जजों को सियासी एजेंट बना दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की साख बचाने के लिए उसके तीन शीर्ष न्यायमूर्तियों को जनता जनार्दन के समक्ष मीडिया के जरिए जाना पड़ता है। ऐसा तब हुआ, जब कुछ सालों में सरकार संविधान सम्मत चलाने के बजाय मनमानी और स्वतंत्र संस्थाओं पर हुक्म चलाने का क्रम शुरू हुआ। ये लोग भी कहीं बाहर से नहीं आए, बल्कि समाज का हिस्सा हैं और समाज भी ‘भ्रष्ट’ हो चुका है।

नैतिकता, मौलिकता, सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी किताबी बातें रह गई हैं। अब जिम्मेदार लोग भी सिर्फ फायदे के लिए ही काम करते हैं। अगर यही हाल रहा तो हम कब विखंडित हो जाएंगे, पता ही नहीं चलेगा।


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