उद्योग हमारी जीविका है और पर्यावरण हमारा जीवन है: पूरन डावर

पर्यावरण और उद्योग दोनों कि बिना जीवन संभव नहीं है। पर्यावरण संरक्षण...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 31 October, 2018
Last Modified:
Wednesday, 31 October, 2018
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पूरन डावर

अध्यक्ष,आगरा डेवलपमेंट फाउंडेशन।।

पर्यावरण और उद्योग दोनों के बिना मानव के लिए मुश्किल है, क्योंकि उद्योग हमारी जीविका है और पर्यावरण हमारा जीवन है। पर्यावरण संरक्षण उद्योगों की उत्पादन प्रक्रिया का भाग है। जो उद्योग पर्यावरण के प्रति जागरूक नहीं हैं उनका समय के साथ अंत निश्चित है। उन्हें दूसरे के जीवन के साथ खेलने का अधिकार भी नहीं दिया जा सकता। पर्यावरण हमारे जीवन के लिए हैं, न कि प्रशासनिक अधिकारियों के लिए और न ही अदालतों के लिए। अधिकारी आते जाते रहेंगे,मीटिंग पर मीटिंग होती रहेगी, फिर स्थानान्तरण, फिर नए अधिकारी, नए सिरे से मीटिंग, सिलसिला चलता रहेगा।

हमें पर्यावरण के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। यह समझने संशय या संकोच नहीं होना चाहिए,पर्यावरण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है,लेकिन जीवन हमारा है यदि व्यवस्था की मजबूरी है और हमें नजराना देना भी पड़ता है फिर भी पर्यावरण से समझौता नहीं होना चाहिए। आगरा सन् 1996 से इस समस्या से जूझ रहा है। स्थिति यह है ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की’ स्पष्ट है इलाज गलत हो रहा है।समस्या कहां हैं यहां यह समझना आवश्यक है।

हिमालय की गोद से उत्पन्न यमुना नदी के किनारे बसा ऐतिहासिक नगर आगरा,ताज नगरी के नाम से विश्वविख्यात,1 करोड़ से अधिक पर्यटकों का आकर्षित करने वाला यह शहर आज पर्यावरण की मार से कराह रहा है। पर्यावरण जीवन है,उसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है, जहां देश के दो सबसे बड़ी और पवित्र नदियों गंगा और यमुना में से एक यमुना के तट पर है। मुगल काल की राजधानी,तीन-तीन यूनेस्को संरक्षित प्राचीन इमारतें, ताज महल जैसा सात अचरजों में से एक इमारत,सैकड़ो की संख्या में छोटे-बड़े उद्यान,फिर भी पर्यावरण के प्रदूषण के क्षेत्र में देश में आठवें स्थान पर। चारों ओर गंदगी का राज है। 

एक समय था सड़को पर पानी के छिड़काव मशकों से होता था। नालियों की तल्ली झाड़ सफाई होती थी। बरसात भी खूब होती थी। सड़के लबालब भरती थी, लेकिन एक घंटे बाद सब खाली। नालियों का पानी सीधे डिग्गियों में पहुंच जाता था। आज सारी डिग्गियां भ्रष्टाचार की भेंट चड़ चुकी हैं। सीवर सिस्टम ध्वस्त हो चुका है। सीवर लाइन सीधे नालों में है और नाले यमुना में खुलते हैं। अनेको बार सीवर के सिस्टम के लिए बड़ी राशि, जल निगम एवं यमुना एक्शन प्लान के तहत आती है, पर विडम्बना यह है कि सड़के खुदी-धूल उड़ी,सालो पूरा शहर धूल ग्रस्त रहा। पाइप गड़े कभी किसी इलाके में, तो कभी किसी इलाके में आज तक जुड़े नहीं। करोड़ो रुपए की राशि दफन हो गई। शहर धूल से कराह रहा है, सीवर समस्या वहीं की वहीं है, क्या कर रहे हैं हमारे नेता और अधिकारी।

प्रदूषण एवं पर्यावरण विभाग के अनुसार, आगरा में सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा नियंत्रित है। पीएम-10 और पीएम-2 की मात्रा अनियंत्रित है जो धूल के कण है,पूरे शहर की टूटी-फूटी सड़के,जगह-जगह मिट्टी,कूड़े के ढेर,कोई भी निर्माण हो मलवा सालों तक सड़को पर। न कूड़ा एकत्रीकरण की व्यवस्था न निस्तारण की,न सड़के वाल-टू-वाल, सड़को पर घास,फूल तो दूर की कौड़ी हैं। सेंट्रल चैनलो का टूटना-बनना एकीकृत निर्माण प्राधिकरण का न होना, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, जल निगम, जल संस्थान, पीडब्लूडी, एनएचएआई, संचार विभाग, विद्युत विभाग रोज अपने हिसाब से सड़को को खोदते व बनाते हैं और कभी न खत्म होने वाली निर्माण प्रक्रिया, अनियोजित विकास पर्यावरण में जहर घोल रहा है।

ठीकरा उद्योगों पर, पर्यावरण और उद्योग एक दूसरे के पूरक हैं। पर्यावरण के बिना पर्यावरण संरक्षण नहीं हो सकता। 1996 में एम.सी. मेहता की पीआईएल के माध्यम से आगरा के पर्यावरण पर चिंता जाहिर की गई थी। चिंता होनी चाहिए थी, हम धन्यवाद करते हैं एम.सी. मेहता का। लेकिन लगता है पीआईएल का उद्देश्य मात्र उद्योगों को निशाना बनाना और उनका दोहन था। फाउन्ड्री उद्योग आगरा का मुख्य उद्योग था जो आज पर्यावरण की भेंट चढ़ चुका है।कई उद्योगों को बंद और बाकियों को गैस आधारित भट्टियों में परिवर्तित कर अपने को बचा पाए।

प्रदूषित उद्योग बंद हो गए, बचे गैस आधारित हो गए। ईट भट्टे से लेकर छोटे-छोटे चाय स्टॉल भी गैस आधारित हो गए। यह बात अलग है कि विकसित देशों में भी आज भी अच्छे रेस्तरां लकड़ी पर खाना पकाते हैं, इटैलियन पिज्जा आज भी ओवन में लकड़ी के ही माध्यम से ही पकता है।

आगरा में चमड़ा उद्योग मुगल काल से पारम्परिक था, सारी टेनरियां बंद हो गई। एक भी टेनरी आगरा में नही है तो फिर प्रदूषण और पर्यावरण का ठीकरा उद्योगों पर क्यों? ले देकर आगरा में जूता उद्योग एवं पर्यटन उद्योग बचे हैं उन पर भी चोट जारी है।

जूता उद्योग में न किसी प्रकार के तरल का प्रयोग होता है, न निस्तारण,न किसी मिट्टी, न किसी भट्टी का प्रयोग,न ध्वनि प्रदूषण,न सॉलिड वेस्ट,लेदर की कतरन भी महंगे रेट पर बिकती है,फिर भी निशाने पर ग्रीन कैटेगरी उद्योग होते हुए भी विस्तार पर प्रतिबन्ध।

होटल उद्योग जो आतिथ्य उद्योग है जिसमें स्वच्छता एवं पर्यावरण ही बेचा जाता है, उस पर भी रोक। 100 कमरे से ऊपर के होटल मल निस्तारण के कारण रेड कैटेगरी में क्या कोई 100 कमरे से ऊपर का होटल बिना एसटीपी के सम्भव है और यह सारे होटल किसी न किसी अन्तराष्ट्रीय चेन से अनुबंधित है, क्या कोई अनुबन्ध पर्यावरण की अनदेखी कर सम्भव है, हर होटल न केवल एसटीपी, बल्कि इसी पानी को ग्रीनरी में प्रयोग करता है और बचे हुये को आरओ से साफ कर पुनः प्रयोग में लाता है। पीएम-10 और पीएम-2 से दूर-दूर का सम्बन्ध नहीं है।

कुल मिलाकर निष्कर्ष ये निकलता है कि आज आवश्यकता है प्रशासन को संवेदनशील होने की। निम्न बिन्दुओं पर काम कर हम ग्रीन आगरा-क्लीन आगरा के नारे को वाकई सच में तब्दील कर नई पीढ़ी को स्वस्थ वातावरण दे सकते हैं...

  • शहर में कूड़ा एकत्रीकरण एवं निस्तारण की व्यवस्था हो। 
  • सड़के वाल-टू-वाल हो।
  • सड़को पर जहां सम्भव हो ग्रीनरी हो।
  • एकीकृत विकास प्राधिकरण हो जिसके सभी विभागों के प्रतिनिधि हो या सब विभागो को एक कर एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर विभाग हो।
  • उद्यानों एवं पार्को का प्रबन्धन हो।
  • निर्माण के लिये गाइड लाइन एवं समयबद्ध हो।
  • तालाबों और डिग्गियों का पुर्नउद्दार आधुनिक रूप में हो, वह शहर का सौन्दर्य बनें।
  • यमुना की ड्रेजिंग हो।
  • शहर की पूरी सीमा में कैलाश से लेकर ताज तक यमुना तट बने, गहरायी और चैड़ायी निर्धारित हो। 
  • यमुना पर बैराज और पर्याप्त पानी ताकि रेत और धूल न उड़े।
  • रिंग रोड पूरी हो, उत्तरी बाई पास समयबद्ध बने।
  • 24 घंटे बिजली की व्यवस्था हो, बिजली की कमी न होते हुये भी अव्यवस्था की भेंट चड़ा हुया है।
  • उद्योगों में पर्यावरण सहित कम्पलाइंस आडित स्वतन्त्र ऐजेंसियो द्वारा हो, और यह एजेंसियां अन्तराष्ट्रीय स्तर की हो।
  • उद्योगो में प्रदूषण मीटर लगें, जो सीधे सर्विलांस पर हो।

पर्यावरण हमारा जीवन है और उद्योग पर्यावरण सुधार एवं संरक्षण पर कन्धा से कन्धा मिलाकर साथ है। बस लागू करने में नेक नीयती हो, दोहन नहीं।

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