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टीवी स्क्रीन पर 'हथौड़े' वाले मिलिंद खांडेकर ने न कभी समझौता किया, न कभी करेंगे...
मिलिंद जी से मेरा परिचय ‘हथौड़े’ की वजह से हुआ। वो टीवी स्क्रीन पर हाथ में हथौड़ा लिए...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
भव्य श्रीवास्तव
पूर्व एबीपी पत्रकार ।।
मिलिंद जी से मेरा परिचय ‘हथौड़े’ की वजह से हुआ। वो टीवी स्क्रीन पर हाथ में हथौड़ा लिए खड़े थे और मैं यहां दिल्ली में उनकी दहाड़ सुन रहा था। स्टार न्यूज के एक सर्वे से नाराज शिवसेना ने हमारे मुंबई ऑफिस पर हमला बोल दिया था, तोड़फोड़ की थी और इसके बाद पत्रकारिता की इस लड़ाई में इसी हमले में इस्तेमाल हुए हथौड़े को हाथ में लेकर मिलिंद जी ललकार रहे थे। 2007 में स्टार न्यूज का मुख्यालय मुंबई से दिल्ली आ गया। ये बड़ा बदलाव था। चैनल उस समय उदय शंकर जी देख रहे थे। जब मिलिंद जी नोएडा आए तो यहां बहुत कुछ ऐसा चल रहा था जो उनके ‘टेस्ट’ (Taste) का नहीं था। विनोद कापड़ी जी टीआरपी के मास्टर थे और वे समाचार की दुनिया में मनोरंजन को चाशनी के साथ परोस रहे थे। चैनल के कुछ शो की टीआरपी आसमान छू रही थी। संपादक शाजी जमां जी के दिए कुछ नए विचारों से समाचार जगत स्टार न्यूज को फॉलो कर रहा था, चाहे बात सास बहु साजिश की हो, या सनसनी की।
मिलिंद जी खबरों को लेकर शायद सबसे सक्रिय शख्स थे हमारे न्यूजरूम में। उनके खून में खबर करंट की तरह दौड़ती थी। वे अपने कमरे से एक घंटे में साठ बार बाहर आकर असाइनमेंट और आउटपुट को चौंकाते रहते थे। लोग उनसे भय भी खाते थे कि एक गलती की, तो जान जानी तय है वाला माहौल था। ऐसे दौर में जब टीआरपी ही भगवान माना जाता रहा हो, मिलिंद जी ने खबरों को नए और पारंपरिक तरीके से पेश करने पर जोर दिया। मैं फीचर्स में था और धर्म, ज्योतिष और योग के शो से जुड़ा था, पर वे उसे भी न्यूजी बनाने की बात हमेशा कहते थे। धर्म के शो समर्पण भी रोजाना की खबरों के अनुसार बनने लगा था। ये उनका असर ही था। मिलिंद जी के लिए न्यूजरूम के माहौल को बदलना सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसमें वो बहुत हद तक सफल रहे। स्लग्स और शो को कैची बनाने के चक्कर में प्रड्यूसर्स हमेशा टीआरपी की बात कहके बचते रहे। वे खबरों को खेलने में ज्यादा यकीन रखते थे, जबकि मेरी समझ में मिलिंद जी की सोच खबर को उसके मारक असर से पेश करने की रही। खबर वो जो चोट करे। शायद अब जब हम बाहर से एबीपी न्यूज को देखते हैं तो हमे लगता है कि हर खबर को धारदार बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही।
मिलिंद जी से मिलने वाले उन्हें प्राय: शुष्क ही मानते थे, पर खबरों की दुनिया में एक रिपोर्टर की तरह शुरुआत करने वाले वे एक संपादक के तौर पर शायद दो ही बातें समझते थे, एक खबर कवर होनी चाहिए, दूसरा खबर जोरशोर से दिखनी चाहिए। मेरे और चैनलों में रहने के दौरान उनकी मेहनत का नतीजा ये रहा कि ब्रेकिंग न्यूज के लिए दूसरे चैनल एबीपी ही देखते और लाइव कवरेज की प्लानिंग भी स्क्रीन देखकर कई बार करते। ये उनकी पूंजी थी, तपस्या थी, जिसे उन्होंने बेलाग तरीके से किया। मिलिंद जी के कार्यकाल में एबीपी में सत्ता केन्द्रीकरण की बात कई बार कही जाती रही, पर शाजी जमां जी के रहने तक मिलिंद जी हर घंटे उनके कमरे में जाकर खबरों को पेश या दिखाने की बात करते देखे जाते थे। उन्हें लोगों की गहरी समझ है, खासकर उनकी जो खबरों को समझते है। चुनावों या बड़ी घटनाओं की कवरेज में उनकी ऊर्जा और कई और लोगों की सोच साफ दिखती है। आज भी एबीपी का लाइव कवरेज सबसे जोरदार माना जाता है।
मिलिंद जी का इस्तीफा पूरे संस्थान पर गाज की तरह गिरा है। लोग हताश भी हैं निराश भी। एक पुराने साथी ने कहा कि जब वो कल आखिरी बार मिलने आए तो कहा कि ‘तुममे बड़ा पोटेंशियल है’, ऐसी बातें सुनकर आंखों में पानी आ गया। हम जानते है कि गणेश चतुर्थी पर जब मिलिंद जी सबको साल में एक बार अपने घर बुलाते थे, तब वे एक दोस्त बड़े भाई जैसे लगते थे। ये उनके व्यक्तित्व का अलग ही रूप होता था। स्टार न्यूज की पहचान एक खबरदार चैनल के तौर पर रही थी और जब वो एबीपी में बदला तो सबसे बड़ी चुनौती थी उस धार को बरकरार रखना। मिलिंद जी की जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि आज एबीपी खबरों की दुनिया में स्टार न्यूज से ज्यादा बड़ा ब्रैंड साबित हुआ है।
किसी संपादक का अचानक इस्तीफा देना बहुत सारे कयासों को जन्म देता है। कई बार ऐसे मैनेजमेंट और उसके बीच के टकराव को ही कारण माना जाता है। पर मेरा मानना है कि जिम्मेदारियों को सही से निभाने के बावजूद कई बार परिस्थियां आपके हाथ में नहीं होती हैं। आज पत्रकारिता के सामने नए संकट है जो राजैनितक रुझान और झुकाव से प्रेरित हैं। ऐसे दौर में असली खालिस पत्रकारिता कठिन है। कई मूल्य समय के साथ बदलाव की डिमांड करते हैं और ऐसे में नैतिकता के साथ समझौता करना पड़ता है। मेरा मानना है कि मिलिंद जी ने किसी भी नैतिकता के साथ कभी भी समझौता नहीं किया और न करेंगे।
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