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'मिस्टर मीडिया': कितना क्रूर और असंवेदनशील चेहरा हो गया है तुम्हारा!

जी हां! मुझे पता है, शीशा टूटेगा/ लेकिन पत्थर सा सन्नाटा टूटेगा/ बाहर वाले...

राजेश बादल 7 years ago

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार ।।

जी हां! मुझे पता है, शीशा टूटेगा/ लेकिन पत्थर सा सन्नाटा टूटेगा/ बाहर वाले आज़ादी के क़ैदी हैं/ भीतर से ही ये दरवाज़ा टूटेगा/

फ़र्ज़ के तख़्ते पर एक और क़ुर्बानी। नौजवान विडियो पत्रकार अच्युतानंद साहू की शक़्ल में। इस बार मौत राइफ़ल की नाल से निकली। गणतंत्र के अनुष्ठान पर गन तंत्र भारी। हमने दो-चार दिन टेसुए बहाए। दो चार शोक सभाएं कीं। फिर काम पर लग गए। साहू का शोक मनाने की ड्यूटी अब उसके परिवार की है।

अगले दिन से पत्रकार संगठन भूल गए। नेता भूल गए। अफसर भूल गए। पिछले चुनाव में लोकतंत्र के इसी यज्ञ में अनेक कांग्रेसी नेता मारे गए थे। तब विधायिका के लोग मारे गए थे। अब चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के। गृहमंत्री एक बार फिर गाल बजाने लगे- नक्सलियों को बख्शा नहीं जाएगा। पांच साल से वे यही कर रहे हैं लेकिन हम क्या कर रहे हैं? क्या हमारे भीतर भी संवेदना के सारे स्रोत सूख गए हैं। हम इंसान के तौर पर बचे हैं या हर महीने देह-मशीन की ख़ुराक़ जुटाने वाला सिर्फ़ एक पुर्ज़ा। अपनी संवेदनाओं को भावुकता का मुलम्मा नहीं चढ़ाना चाहते, लेकिन यह सवाल तो बनता ही है कि आखिर कितनी और क़ुर्बानियों के बाद हम पत्रकार जागेंगे?

किसी को याद है माधव राव सिंधिया के साथ चुनाव अभियान में कवरेज में गए ‘आजतक’ के रंजन झा, गोपाल बिष्ट, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के संजीव सिन्हा और ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के अंजू शर्मा की? किसी को याद है संसद पर उग्रवादियों के हमले के दौरान ‘एएनआई’ के शहीद विडियो पत्रकार विक्रम सिंह विष्ट की? किसी को याद है साहसी पत्रकारिता के कारण बिहार में कुचल दिए गए नवीन निश्चल और विजय सिंह की? किसी को याद है मध्य प्रदेश के भिंड में रेत माफिया के हाथों कुचले गए पत्रकार संदीप शर्मा की? किसे याद है मध्य प्रदेश में ही रेत- खनन माफिया के शिकार बने  बालाघाट के साहसी नौजवान पत्रकार संदीप कोठारी की? किसे याद है मध्य प्रदेश के झाबुआ में व्यापम घोटाले की पड़ताल कर रहे ‘आजतक’ के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह की रहस्यमय मौत की? और क्या अब भी हम याद करते हैं अपनी पत्रकारिता के लिए प्राणों की आहुति देने वाली गौरी लंकेश की? इससे बड़ी पेशेवर शर्म और क्या है कि हुक़ूमत पर दबाव डालना तो दूर, इनको हम अपनी यादों के संसार में भी जगह नहीं देना चाहते। शर्म नहीं, यह पेशेवर कृतघ्नता है। हम अपने साथियों की विराट मूर्तियां नहीं लगवाना चाहते। उनके नाम पर सम्मान और अवार्ड्स भी नहीं चाहते। हम उनके परिवार वालों के लिए मदद की भीख भी नहीं मांगते। वे तो इतने समय से गुज़ारा कर ही रहे हैं और करते रहेंगे। पर यह आवाज़ कोई उठाएगा कि इस क्रूर व्यवस्था में पत्रकारिता करना कितना ज़ोख़िम भरा है। यह व्यवस्था जो पत्तों पर पानी छिड़ककर पेड़ को हरा भरा रखने की कोशिश कर रही है। जड़ें सूख रही हैं। बोलिए हुज़ूर! कुछ तो बोलिए।

आज भारत में पत्रकारिता करना बेहद ख़तरनाक़ हो गया है। दुनिया में आठवें स्थान पर हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान भारत में काम करने वाले अपने पत्रकारों को सावधानी की सलाह देते हैं। भारतीय संस्थान तो इसकी आवश्यकता भी नहीं समझते।  

कहां गए वे संगठन और कहां गए वे लोग, जो बिहार प्रेस बिल के ख़िलाफ़ कश्मीर से कन्याकुमारी तक उठ खड़े हुए थे? वे कहां हैं जो प्रेस विधेयक के विरोध में सड़कों पर आते थे? कौन सी थी वो देह जो ‘पंजाब केसरी’ के लाला जगत नारायण और बाद में उनके बेटे रमेश चंदर की आतंकवादियों के हाथों हत्या के बाद अपनी नसों में ख़ून को उबलते हुए देखती थी? ये कोई ग़ुलामी के दौर की दास्तानें नहीं हैं। मीडिया के इंडस्ट्री बनने के दरम्यान के क़िस्से हैं सब। मीडिया इंडस्ट्री बनता रहा। हम इंसान से मशीन बनते रहे। आज हम जहां आकर खड़े हो गए हैं वहां मूल्यों और सरोकार के लिए जगह कहां शेष है? भारत में श्रमजीवी पत्रकारों के लिए क़ानून बनवाने वाले और उनके लिए आजीवन लड़ते रहने वाले बनारसी दास चतुर्वेदी होते तो शायद दो तीन बार आत्महत्या कर लेते। कुछ समझ रहे हैं मिस्टर मीडिया?  


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