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कार्टूनिस्ट सुधीर धर: दुनिया को ‘बदसूरत’ बनाने वाला इंसान

उनके निधन की इतनी बड़ी खबर को शायद हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने टीआरपी लायक नहीं समझा

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

इरफान खान, मशहूर कार्टूनिस्ट।।

कार्टून जगत के सुपरस्टार सुधीर धर का दुनिया से विदा होना ऐसे समय हुआ, जब कार्टून जगत को मजबूती और संबल की सख्त जरूरत है। उनके निधन की इतनी बड़ी खबर को शायद हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने टीआरपी लायक नहीं समझा। सुधीर धर साहब से मेरी पहली मुलाकात 1989 में हुई थी। उन दिनों मेरी कार्टून प्रदर्शनी श्रीधरणी गैलरी में लगी थी, मुझे पता चला कि ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के प्रख्यात कार्टूनिस्ट सुधीर धर रोजाना लंच करने त्रिवेणी में आते हैं। यह सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अगले ही दिन मैंने उन्हें त्रिवेणी के गेट पर रोका। अपना परिचय दिया।

मैंने उनसे अपनी कार्टून प्रदर्शनी देखने का आग्रह किया, वह फौरन तैयार हो गए। सभी कार्टून देखकर मुझ कस्बाई कार्टूनिस्ट को प्रोत्साहन दिया। यह मेरे लिए तब बहुत बड़ी बात थी। बड़े-बड़ो का 'कार्टून' बनाने वाले वह देखने में बेहद खूबसूरत, ऊंची कद-काठी के कश्मीरी ब्राह्मण थे। मजाक-मजाक में कई बार हम दोस्त कह ही देते हैं कि खूबसूरत चेहरों को 'बदसूरत' बना देते हैं कार्टूनिस्ट। वे अंग्रेजी फर्राटे से बोलते थे। शायद अपने स्टारडम की वजह से ही उन्हें एक बार फेमिना मिस इंडिया की जूरी का मेंबर बनाया गया था, ऐसा सुना है। 

अपने साफ-सुथरे और फनी सोशल कार्टूनों से उन्होंने घर-घर में अपनी जगह बना ली थी। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ उस समय दिल्ली का सबसे ज्यादा बिकने वाला अंग्रेजी अखबार था, वहां 20 साल उनका एकछत्र राज कायम रहा। उनकी कलम कई बार कार्टून के जरिए ऐसा तीखा प्रहार करती थी कि बड़े बड़े खूबसूरत चेहरे 'बदसूरत' नजर आने लगते थे भारत में जब भी कभी कार्टूनिस्टों का जिक्र होता था, तो लोग छूटते ही कहते थे कि ‘एक तो लक्ष्मण हैं और एक सुधीर धर  कार्टूनिस्ट हैं।’

सुधीर धर और लक्ष्मण में वही फर्क है, जो लता मंगेशकर और आशा भोसले में है। अगर आशा भी लता की तरह गाना गातीं तो शायद उन्हें वो मुकाम नहीं मिलता, जिसकी वो हकदार थीं। इसलिए उन्होंने गाने की अपनी एक अलग शैली ईजाद की। उसी तरह चूंकि राजनीतिक कार्टूनों में उस वक्त लक्ष्मण का बोलबाला था, उन्होंने अपने कार्टूनों का माध्यम सोशल खबरें चुना। यकीनन इसमें उनकी महारत थी। चाहे वह दिल्ली की बसों में अव्यवस्था हो, सड़कों के गड्ढे, बिजली-पानी की किल्लत हो अथवा अन्य समस्याएं।

ऐसे तमाम मुद्दे थे, जिनसे लोग आज भी रोजमर्रा तौर पर दो-चार होते हैं। वह रोजाना इन मुद्दों पर कार्टून बनाते थे। एक कार्टून जो मुझे हमेशा याद रहता है, एक ऑफिस में नेताजी के सामने कई अफसर खड़े हैं। नेताजी अपने सहायक से पूछते हैं, ‘क्या तुम्हें लगता है कि यह सब ‘फ्री एंड फेयर इलेक्शन’ करवा पाएंगे?’ सहायक बोला-जी, बिलकुल। नेताजी बोले, तो इन सबका तबादला कर दो।

मुझे एक बार उनका साक्षात्कार करने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने बताया, ‘मैं मर्लिन मुनरो का बहुत बड़ा फैन हूं और शुरुआत में रेडियो में था। मैं अपनी आवाज के जरिये उन्हीं की तरह मशहूर होना चाहता था।‘

वह राजनैतिक डिस्प्ले (बड़े बॉक्स नुमा) कार्टून कम ही बनाते थे। उनके कार्टून के ऊपर कोने में खबर लिखना पाठक को कार्टून से जुड़ने में आसानी देता था। बाद में बहुत से कार्टूनिस्टों ने इस शैली को अपनाया।  उनकी स्केचिंग ऐसी थी कि कोई भी नया कार्टूनिस्ट उसे देखकर आसानी से कार्टून बनाना सीख सकता है। हाल ही में कई नामी कार्टूनिस्टों अबू, रंगा, लक्ष्मण, राजिंधरपुरी, सुधीर तैलंग के बाद अब सुधीर धर के भी जाने से कार्टून जगत में कार्टूनिस्टों की कमी का अहसास और गहरा हो गया है, जो कभी नहीं भर सकता।

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