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समय की मांग: हिंदी न्यूज प्लेटफॉर्म्स को अब अपनाना चाहिए सब्सक्रिप्शन मॉडल- सुधीर झा
कुछ साल पहले तक, यदि कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट ऐसा ट्रेंडिंग लेख छाप देती जो गूगल की रुचियों के अनुरूप होता, तो उस पर ट्रैफिक की बाढ़ आ जाती थी।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago
कुछ साल पहले तक, यदि कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट ऐसा ट्रेंडिंग लेख छाप देती जो गूगल की रुचियों के अनुरूप होता, तो उस पर ट्रैफिक की बाढ़ आ जाती थी। जितने ज्यादा पेजव्यू, उतनी ही ज्यादा विज्ञापन से कमाई, और वही सफलता का पैमाना था। लेकिन "Google-first journalism" का वो जमाना अब तेजी से ख़त्म हो रहा है। हिंदी न्यूज पब्लिशर्स को अब ये मानना बंद करना होगा कि ट्रैफिक अपने आप आता रहेगा। अब सवाल यह नहीं रह गया कि कितने लोगों ने आपका लेख पढ़ा, बल्कि यह है कि उन्होंने क्यों पढ़ा, कहां पढ़ा, और क्या वे कल फिर लौटेंगे?
गूगल ट्रैफिक की नाजुकता:
गूगल के एल्गोरिद्म एक "ब्लैक बॉक्स" जैसे हैं- अस्थिर और अप्रत्याशित। एक अपडेट से आपकी स्टोरी लाखों लोगों तक पहुंच सकती है, लेकिन अगला अपडेट उसे पूरी तरह ग़ायब भी कर सकता है।
गूगल का ट्रैफिक मॉडल अब न्यूज पब्लिशर्स के लिए बेहद अस्थिर हो गया है- खासकर उनके लिए जो Discover या Top Stories जैसी गूगल सुविधाओं पर ज्यादा निर्भर हैं। एल्गोरिद्म में मामूली बदलाव भी महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकता है।
हिंदी डिजिटल न्यूज क्षेत्र में कई पब्लिशर्स ने बताया है कि गूगल के कोर अपडेट्स के बाद उनकी साइट की दृश्यता में तेज गिरावट आई। कुछ की Discover ट्रैफिक तो रातों-रात 60–80% तक गिर गई। सबसे चिंताजनक बात यह है कि न तो इसकी पारदर्शिता है और न ही कोई रिकवरी का रोडमैप। ऐसे अपडेट्स के बाद संपादकीय टीमों में भ्रम, निराशा और संरचनात्मक असमर्थता पैदा हो जाती है।
यह कोई एक बार की घटना नहीं है। यह बार-बार होने वाली हकीकत बन चुकी है। चाहे कोई बड़ा नेशनल पोर्टल हो या तेजी से उभरती को ईरीजनलय वेबसाइ। संदेश साफ है, जब आपकी ऑडियंस तक पहुंच पूरी तरह उस प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो जिसे आप नियंत्रित नहीं करते, तो आपका बिजनेस एक बेहद कमजोर नींव पर टिका होता है।
प्लेटफॉर्म पर निर्भरता = खोता नियंत्रण
यदि आप गूगल, फेसबुक या यूट्यूब जैसे किसी बाहरी प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं, तो आप अपनी ऑडियंस पर खुद का नियंत्रण खो देते हैं। हो सकता है न्यूजरूम आपका हो, लेकिन यूजर तक पहुंच का दरवाजा किसी और के हाथ में होता है।
नियंत्रण वापस पाने का एक ही रास्ता है- अपनी सब्सक्रिप्शन आधारित ऐप बनाना।
सब्सक्रिप्शन = वफादार पाठक + स्थिर कमाई
जब कोई यूजर कंटेंट के लिए पैसे देता है, तो वह सिर्फ एक्सेस नहीं खरीदता। वह एक रिश्ते में निवेश करता है। ऐसे यूजर्स कंटेंट को ज्यादा समय देते हैं, गहराई से पढ़ते हैं और बार-बार लौटकर आते हैं, जबकि गूगल या सोशल मीडिया से आए यूजर ज्यादातर एक बार ही पढ़ते हैं और चले जाते हैं।
हाल के वर्षों में कुछ हिंदी न्यूज ऐप्स ने पेड कंटेंट का प्रयोग किया है और उनमें कुछ साफ पैटर्न देखने को मिले हैं:
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जो यूजर पैसे देकर सब्सक्राइब करते हैं, वे ऐप पर फ्री यूजर्स की तुलना में 2 से 3 गुना ज्यादा समय बिताते हैं।
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सब्सक्राइबर यूजर्स की retention rate (बार-बार लौटने की दर) 4–5 गुना ज्यादा होती है बनिस्पत गूगल या सोशल मीडिया से आए यूजर्स के।
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जब कंटेंट मौलिक, गहरा और कहीं और उपलब्ध न हो, तो लोग उसके लिए पैसे देने को तैयार होते हैं।
इस बदलाव से एक अहम बात सामने आती है कि जब आप सिर्फ क्लिक के पीछे भागना छोड़ देते हैं और असल मूल्य (value) बनाना शुरू करते हैं, तो लोग आपकी पत्रकारिता को सीधे सपोर्ट करने लगते हैं।
आपकी साख को खत्म करता Clickbait (भ्रामक हेडलाइन)
“आज रात 12 बजे खुल जाएगा किस्मत का ताला…”
“इस लड़की ने मंदिर में किया कुछ ऐसा कि देखकर रह जाएंगे दंग!”
हम रोज ऐसे शीर्षक देखते हैं। लेकिन यह पत्रकारिता नहीं है, यह केवल ट्रैफिक खींचने का दिखावा है। जब आपकी कमाई पेजव्यू पर निर्भर होती है, तो ऐसे भड़काऊ हेडलाइन बनाना लाजमी हो जाता है। लेकिन हर बार जब आप ऐसी अतिरंजित हेडलाइन लगाते हैं, तो आप कुछ बहुत कीमती चीज खोते हैं- विश्वसनीयता। लिहाज, यूजर ऐसी हेडलाइन पर एक बार तो क्लिक करेगा, लेकिन दोबारा नहीं आएगा।
वहीं, इसके उलट, सब्सक्रिप्शन मॉडल गहराई, विश्वसनीयता और भरोसे को बढ़ावा देता है।
बदल चुका है डिजिटल उपभोक्ता, लेकिन हम क्यों नहीं बदले?
आज का यूजर Netflix, Hotstar या Spotify जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट के लिए पैसे देना सीख चुका है। तो फिर अच्छी पत्रकारिता के लिए पैसे क्यों नहीं देगा? परिवर्तन शुरू हो चुका है। अब सवाल यह है कि क्या हिंदी न्यूज पब्लिशर्स समय रहते खुद को बदल पाएंगे?
अब क्या बदलना जरूरी है?
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आपकी न्यूज ऐप सिर्फ वेबसाइट की कॉपी न हो, बल्कि आपका मुख्य मंच होनी चाहिए।
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पत्रकारिता पर ध्यान दें, न कि वायरल होने पर। यूजर "अंदर की बात" के लिए पैसे देता है, शोर के लिए नहीं।
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सब्सक्रिप्शन को सिर्फ एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक रिश्ते की तरह देखें।
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अपने मूल्य को स्पष्ट करें- रोज की सामान्य खबरें मुफ्त रखें, लेकिन गहरी रिपोर्टिंग, जांच-पड़ताल और खास विश्लेषण को पेड वॉल के पीछे रखें।
सिर्फ कंटेंट ही देना नहीं, पाठकों से रिश्ता भी बनाना जरूरी
गूगल से मिला ट्रैफिक दरअसल उधार ली गई ऑडियंस होती है। सब्सक्रिप्शन से बनी ऑडियंस आपकी अपनी होती है। ऐसे दौर में, जब लोगों का ध्यान क्षणिक होता जा रहा है और एल्गोरिद्म अस्थिर होते जा रहे हैं, सिर्फ विश्वास ही टिकाऊ होता है।
हिंदी न्यूज वेबसाइट्स को अब तात्कालिक वायरल हेडलाइंस से आगे बढ़कर दीर्घकालिक वफादारी में निवेश करना होगा- एक ऐसी ऐप-आधारित सब्सक्रिप्शन रणनीति के जरिए जो पत्रकारिता और पाठक- दोनों का सम्मान करे।
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