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आधुनिक दौर में समाचार पत्र वितरण और प्रिंट मीडिया का बदलता भविष्य

जब दुनिया सो रही होती है, तब आपके दरवाजे पर 'सूचना का पुल' तैयार किया जा रहा होता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago

राजू सिंह ।।

जब दुनिया सो रही होती है, तब आपके दरवाजे पर 'सूचना का पुल' तैयार किया जा रहा होता है। डिजिटल क्रांति और 5G के इस दौर में, जहां खबरें एक सेकेंड में मोबाइल स्क्रीन पर आ जाती हैं, वहीं कागज पर छपी खबरों को घर-घर पहुंचाने की पूरी व्यवस्था आज भी पूरी मजबूती से काम कर रही है। 

एक अखबार का सफर प्रिंटिंग प्रेस से लेकर पाठक की दहलीज तक कई चरणों से होकर गुजरता है। रात करीब 1 से 3 बजे के बीच ताजा खबरों के साथ अखबार छपते हैं। इसके बाद ट्रक और वैन के जरिए इन्हें शहर के अलग-अलग वितरण केंद्रों तक पहुंचाया जाता है। सुबह लगभग 4 बजे मुख्य एजेंट और हॉकर इन केंद्रों पर अखबारों की छंटाई करते हैं और स्थानीय विज्ञापन पर्चे अखबारों के बीच डाले जाते हैं। फिर सुबह 5 से 7 बजे के बीच हॉकर साइकिल या मोटरसाइकिल से हर घर और अपार्टमेंट तक अखबार पहुंचा देते हैं।

डिजिटल युग में यह व्यवस्था केवल ‘डिलीवरी’ तक सीमित नहीं रही है। अब ई-पेपर और डिजिटल सब्सक्रिप्शन वितरण का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। कई पाठक सुबह चार बजे ही मोबाइल ऐप पर अखबार पढ़ लेते हैं। वहीं कुछ शहरों में वितरण एजेंसियां क्विक कॉमर्स के साथ मिलकर दूध, ब्रेड जैसी जरूरी चीजों की डिलीवरी के मॉडल पर भी काम कर रही हैं। 2026 तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल पाठकों की पसंद के आधार पर वितरण रूट तय करने और मांग का अनुमान लगाने में होने लगा है।

डिजिटल दौर में अखबार और मैगजीन की पहुंच के तरीके भी बदल रहे हैं। अब कई शहरों में ब्लिंकिट और जेप्टो जैसे क्विक कॉमर्स ऐप्स के जरिए भी अखबार और मैगजीन घर तक पहुंचाने की पहल शुरू की जा रही है। खासकर वीकेंड एडिशन, मैगजीन और स्पेशल इश्यू को इन प्लेटफॉर्म्स पर ऑर्डर किया जा सकता है, जो कुछ ही समय में घर तक डिलीवर हो जाते हैं। इससे उन पाठकों तक भी प्रिंट पहुंचेगा, जो नियमित हॉकर सिस्टम से नहीं जुड़े हैं या जिन्हें तुरंत कॉपी चाहिए होती है। यह मॉडल भले ही अभी शुरुआती चरण में हो, लेकिन इससे साफ है कि प्रिंट मीडिया वितरण अब पारंपरिक ढांचे से निकलकर नए डिजिटल और ऑन-डिमांड रास्ते तलाश रहा है।

अखबार वितरण सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था भी है। भारत में आज भी लाखों परिवार इसी नेटवर्क के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं। छोटे शहरों और कस्बों में हॉकर आज भी सूचना का सबसे भरोसेमंद माध्यम माने जाते हैं। सोशल मीडिया पर फेक न्यूज के बढ़ते दौर में, प्रिंट अखबार की भौतिक प्रति अब भी विश्वसनीयता की कसौटी मानी जाती है।

डिजिटल युग ने प्रिंट मीडिया के विज्ञापन राजस्व के ढांचे को भी पूरी तरह बदल दिया है। 2024–25 तक डिजिटल विज्ञापन खर्च ने टेलीविजन और प्रिंट दोनों को पीछे छोड़ दिया। अनुमान है कि 2026 तक भारत के कुल विज्ञापन खर्च का 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के पास होगा। वहीं प्रिंट मीडिया का हिस्सा, जो कभी 30–35 प्रतिशत हुआ करता था, अब घटकर 13–17 प्रतिशत के बीच सिमट गया है। इसके बावजूद वैश्विक औसत की तुलना में भारत में प्रिंट अब भी मजबूत स्थिति में है।

प्रिंट विज्ञापन की मजबूती के पीछे उसकी विश्वसनीयता, क्षेत्रीय भाषाओं की पकड़ और सरकारी व राजनीतिक विज्ञापन बड़ी वजह बने हुए हैं। बड़े ब्रांड लॉन्च, सरकारी योजनाओं और चुनाव प्रचार के लिए आज भी अखबारों को प्राथमिक माध्यम माना जाता है। हालांकि डिजिटल मीडिया की सटीक टार्गेटिंग, इंटरएक्टिविटी और कम लागत प्रिंट के सामने बड़ी चुनौती बन चुकी है।

2025–26 के दौर में मीडिया हाउस खुद को बचाने के लिए नई रणनीतियां अपना रहे हैं। अब विज्ञापन केवल अखबार के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रिंट, वेबसाइट और सोशल मीडिया को मिलाकर पैकेज के रूप में बेचा जा रहा है। सरकार द्वारा DAVP दरों में संभावित बढ़ोतरी से छोटे और मध्यम अखबारों को राहत मिलने की उम्मीद है। वहीं ई-कॉमर्स सेल और बड़े लॉन्च के समय पहले पन्ने पर पूरे विज्ञापन यानी ‘जैकेट एड’ आज भी प्रिंट मीडिया के लिए बड़ा राजस्व स्रोत बने हुए हैं।

डिजिटल दौर में अखबारों के खत्म होने की भविष्यवाणी गलत साबित हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े समूह अब खुद को सिर्फ अखबार नहीं, बल्कि मल्टी-प्लेटफॉर्म कंटेंट हब के रूप में स्थापित कर चुके हैं। एक ओर विशाल ई-पेपर नेटवर्क, सब्सक्रिप्शन मॉडल और क्रॉस-प्लेटफॉर्म कंटेंट है, तो दूसरी ओर SEO, पॉडकास्ट, डेटा एनालिटिक्स और प्रीमियम बिजनेस न्यूज पर फोकस किया जा रहा है।

आने वाले समय में प्रिंट मीडिया के सामने चुनौती अस्तित्व की नहीं, बल्कि बदलाव के साथ खुद को ढालने की है। कागज की बढ़ती लागत, युवा पीढ़ी की प्रिंट से दूरी और डिजिटल आदतें बड़ी चुनौतियां हैं। इसी वजह से अब प्रिंट के साथ-साथ न्यूज रील्स, शॉर्ट वीडियो और ऑडियो न्यूज जैसे नए प्रयोग भी तेजी से बढ़ रहे हैं।

(लेखक एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल हैं और यह उनके निजी विचार हैं। उन्होंने 'भारत24' में डिस्ट्रीब्यूशन हेड के रूप में अपनी पहचान बनाई है। इसके अतिरिक्त उन्होने 'जी मीडिया', 'आजतक', 'हिन्दुस्तान टाइम्स' व 'मेल टुडे' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को मजबूत करने में अहम योगदान दिया है। किसी भी तरह के सवाल-जवाब के लिए उनसे इस ई-मेल आईडी पर editor.rajusingh@zohomail.in संपर्क कर सकते हैं)


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