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तेजस्वी-राहुल के बयान और माओवादी समानता पर विश्लेषण: आलोक मेहता
बिहार चुनाव बहिष्कार की धमकी और नक्सली भाषा में बात करते नेता ,क्या कांग्रेस और आरजेडी नेताओं का रवैया भारत में लोकतंत्र के लिए खतरा बन रहा है? पढ़िए इस गंभीर विश्लेषण में।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago
आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार, पद्मश्री, लेखक।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले तेजस्वी यादव द्वारा चुनाव बहिष्कार की धमकी और राहुल गांधी के रुख के साथ कांग्रेसी नेताओं का समर्थन नक्सली-माओवादी रास्ता दिखाने लगा है? इसलिए यह सवाल उठ रहा है कि बिहार एक बार फिर चुनावी राजनीति के बजाय हिंसा और अराजकता की तरफ बढ़ सकता है। बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का विरोध कर रहे राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने चुनावों के बहिष्कार की धमकी देते हुए कहा है, “हम लोग मिलकर चुनाव बहिष्कार पर विचार कर सकते हैं। यह विकल्प हमारे पास खुला है।” बिहार कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने भी चुनाव बहिष्कार के सवाल पर कहा कि सभी विकल्प खुले हैं, हम मिल-जुलकर निर्णय लेंगे। उन्होंने कहा कि यह चुनाव आयोग और (मुख्य चुनाव आयुक्त) ज्ञानेश कुमार की वोटर लिस्ट है। उन्होंने आगे कहा कि हम यह संघर्ष जारी रखेंगे और आवश्यकता पड़ी तो बड़ा से बड़ा निर्णय लेंगे। आने वाले समय में एक बड़ी लड़ाई की तैयारी है।
राहुल गांधी एक बार कह चुके हैं कि वह भारतीय राज्य से लड़ रहे हैं। यही भाषा माओवादियों की भी है। जिस कांग्रेस के छत्तीसगढ़ नेतृत्व का माओवादियों ने खात्मा कर दिया था, उसी कांग्रेस के नेता और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ‘नक्सल आंदोलन’ को सामाजिक आंदोलन बता रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों की वापसी कहीं दिख नहीं रही, लेकिन कुछ मामलों में उनकी और कांग्रेस की भाषा एक सी रहती है। एक समय में छत्तीसगढ़, बंगाल, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के बड़े हिस्सों पर उनका प्रभाव रहा था।
मोदी सरकार के सत्ता में आने के समय देश के लगभग एक-चौथाई जिलों में लाल आतंक कायम था। गृह मंत्रालय के अनुसार, 2013 में माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या 126 थी। अप्रैल 2025 के आंकड़ों के अनुसार अब मात्र 18 जिलों में ही माओवाद का प्रभाव है। माओवाद कितना दुस्साहसी है, इसका अंदाज़ा दो घटनाओं से लगाया जा सकता है।
चुनाव बहिष्कार पर विचार करने के आरजेडी और कांग्रेस नेताओं के बयानों पर बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा कि तेजस्वी को हार सामने दिख रही है, इसलिए बहाना बना रहे हैं। या तो उन्हें समझ आ गया है कि अगला चुनाव हाथ से निकल चुका है, इसलिए पहले ही मैदान छोड़ दो... या फिर कोई बड़ी राजनीति करना चाहते हैं।
निर्वाचन आयोग के अनुसार, बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण अभियान के तहत घर-घर जाकर किए गए सर्वेक्षण में अब तक 52 लाख से ज़्यादा मतदाता अपने पते पर मौजूद नहीं पाए गए हैं और 18 लाख से ज़्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी है। चुनाव आयोग ने पुनः या नए नाम जोड़ने के लिए हर नागरिक और राजनीतिक पार्टी को एक महीने का समय और दिया है। जब राजनीतिक पार्टियां लाखों सदस्य होने का दावा करती हैं, तो चुनाव मतदाता सूची में सुधार और नाम जुड़वाने में अपने कार्यकर्ता अथवा किसी प्राइवेट कंपनी से किराए पर लोग क्यों नहीं लगातीं? बिहार में मतदाता सूची संशोधन के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का भी रुख किया गया है। अदालत या चुनाव आयोग आखिर बिहार के कर्मचारियों की ही सहायता ले सकता है।
वास्तव में बिहार में नक्सलियों का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है। वर्ष 2000 में बिहार-झारखंड राज्य विभाजन के बाद विशेष कार्य बल का गठन किया गया था। बिहार में नक्सल, वामपंथी, उग्रवादी संगठनों और संगठित अपराधी गिरोहों की गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए इसका गठन किया गया था। वर्ष 2004 में बिहार के 14 जिले उग्रवाद प्रभावित थे। विशेष कार्य बल की ओर से भारत सरकार के केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के सहयोग से उग्रवाद पर निरंतर कार्रवाई की गई।
इसका परिणाम यह हुआ कि कई नक्सल प्रभावित जिले नक्सल श्रेणी से बाहर हो गए। यह संख्या लगातार घटती हुई 2018 में 16 और 2021 में 10 रह गई। वर्तमान में बिहार के 8 जिले — मुंगेर, लखीसराय, जमुई, नवादा, गया, औरंगाबाद, रोहतास और कैमूर को गृह मंत्रालय (भारत सरकार) ने अति नक्सल प्रभावित जिलों की श्रेणी से हटाकर सीमित श्रेणी में रखा है। बिहार में पिछले पाँच वर्षों में नक्सली घटनाओं में 72% की गिरावट दर्ज की गई है। वांछित हार्डकोर नक्सल सशस्त्र दस्ते के सदस्यों की संख्या भी लगातार घट रही है। 2020 में इनकी संख्या 190 थी, जो दिसंबर 2024 में घटकर मात्र 16 रह गई है। वर्तमान में झारखंड से सटे बिहार के दो सीमावर्ती क्षेत्रों में ही नक्सल प्रभाव शेष है।
फिलहाल नक्सल गतिविधि मुख्यतः बिहार-झारखंड के सीमावर्ती इलाकों के दो क्षेत्रों में केंद्रित है। गया-औरंगाबाद एक्सिस – इस क्षेत्र में बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी (BJSAC) सक्रिय है। लगातार नक्सल-रोधी अभियान और शीर्ष नक्सलियों की गिरफ्तारियों के चलते गया-औरंगाबाद क्षेत्र में वामपंथी उग्रवाद की गतिविधियों में काफी कमी आई है। वर्तमान में इस क्षेत्र में 7 सशस्त्र माओवादियों के 3 छोटे समूहों के सक्रिय होने की सूचना है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को समाप्त करने का संकल्प लिया है। सुरक्षा बलों की सफलता दर को देखते हुए यह संभव प्रतीत होता है, परन्तु चुनौतियाँ शेष हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हाल ही में नक्सल प्रभावित रहे गढ़चिरौली में कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि राज्य के बाहर से आए शहरी नक्सली धन का उपयोग अफवाहें फैलाने और गढ़चिरौली के लोगों को विकास के रास्ते से भटकाने में कर रहे हैं। यह बयान उन्होंने गढ़चिरौली ज़िले के एक कार्यक्रम में दिया, जो नक्सलियों का गढ़ रहा है।
भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और अन्य एजेंसियों ने शहरी नक्सलवाद के मुद्दे को उठाया। एजेंसियों ने बताया कि कैसे शहरों में रहने वाले लोग जंगलों में अपने सहयोगियों के लिए प्रचार और धन जुटा रहे थे। जब गृह मंत्री द्वारा समयसीमा तय की गई और सुरक्षा बलों ने उस पर कार्य करना प्रारंभ किया, तब खुफिया ब्यूरो ने चेतावनी दी थी कि जंगलों में लड़ाई भले ही कम हो जाए, परंतु दुष्प्रचार तंत्र गलत सूचनाएं फैलाना जारी रखेगा।
महाराष्ट्र विधानसभा में ‘महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा विधेयक’ पारित होने के कुछ दिनों बाद मुख्यमंत्री फडणवीस ने 22 जुलाई 2025 को यह भी बताया कि राज्य के बाहर के "शहरी नक्सली" अफवाहें फैलाने और विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए विदेशी धन का उपयोग कर रहे हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण से देश के अधिकांश हिंसाग्रस्त क्षेत्रों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। वामपंथी उग्रवादियों ने समर्थकों अथवा ग्रामीणों के खातों में अवैध धन जमा किया था। विमुद्रीकरण के पश्चात विभिन्न वामपंथी उग्रवादी समूहों से लाखों रुपये जब्त किए गए। इसके अलावा, उन्होंने विमुद्रीकरण का विरोध किया, जिससे उनकी असहजता स्पष्ट हुई। चूँकि नकदी ही इन गतिविधियों का मुख्य आधार थी, विमुद्रीकरण के पश्चात उनका अधिकांश धन बेकार हो गया। इससे पाकिस्तान में छपे नकली नोटों का प्रवाह भी बंद हुआ।
अधिकारियों को विश्वास है कि जंगलों में नक्सलियों के विरुद्ध लड़ाई 2026 तक समाप्त हो जाएगी। इन क्षेत्रों के लोग अब सुरक्षा बलों का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि वे सुरक्षित महसूस करते हैं और विकास देख रहे हैं। 2019 में एनआईए की जांच और विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण के बाद शहरी नक्सल समस्या में काफी कमी आई है। तथापि, अभी भी कई तत्व ऐसे हैं जो समस्या उत्पन्न करते रहेंगे।
केंद्रीय गृह मंत्रालय 2026 के बाद की योजना पर पहले से कार्य कर रहा है, जिसमें शहरी क्षेत्रों में सक्रिय नक्सल समर्थकों को भी शामिल किया गया है। सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली सामग्री पर निगरानी के लिए टीमें गठित की जा रही हैं। फर्जी विरोध प्रदर्शन भड़काकर लोगों को गुमराह किया जा सकता है। ये टीमें इन तत्वों को मिलने वाले धन पर भी निगरानी रखेंगी, जिसका प्रयोग बड़े स्तर पर दुष्प्रचार अभियानों में किया जा सकता है।
पिछले वर्ष लोकसभा चुनावों से पूर्व भारतीय संविधान को लेकर एक बड़ा अभियान प्रारंभ हुआ था। नक्सलवादी आंदोलन के समर्थक इसी कड़ी में लोगों को संविधान के विरुद्ध भड़काने की योजना बना रहे थे। ये तत्व सोशल मीडिया का तीव्र उपयोग कर सकते हैं। वे जानते हैं कि यदि दुष्प्रचार अभियान शुरू हो गया और लोग भड़क गए, तो सारा अच्छा कार्य व्यर्थ हो सकता है। उन्होंने पहले भी ऐसा किया है और आगे भी ग्रामीण जनता को गुमराह करने का प्रयास करते रहेंगे।
तो तेजस्वी यादव और राहुल गांधी क्या उसी दिशा को अपनाकर देश को अराजकता की ओर ले जाना चाहते हैं?
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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