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सोनम रघुवंशी मामला भारतीय मां-बाप के लिए सबक : नीरज बधवार

एक इंसान अगर इस उम्र तक अपने लिए सही जीवनसाथी चुनने की ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकता या उसे ऐसा करने की छूट नहीं है तो ये उस बच्चे और मां-बाप दोनों के लिए सोचने की बात है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago

नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

सोनम रघुवंशी का मामला एक आपराधिक मामले से कहीं ज़्यादा एक सामाजिक समस्या का मामला है। ये मामला बताता है कि मोटे तौर पर भारतीय मां-बाप की परवरिश के साथ क्या दिक्कत है। और उस दिक्कत पर बात करने के बजाए अगर हमने इसे सिर्फ एक 'हत्यारिन दुल्हन' की चटखारेदार स्टोरी मानकर छोड़ दिया तो ऐसे मामले फिर होते रहेंगे।

अब जो मैं कहने वाला हूं वो बातें बहुत लोगों को अच्छी नहीं लगेंगी लेकिन अच्छा लगने की सोचकर अगर बात की गई तो फिर कुछ कहने का मतलब ही क्या है। तो पहली बात तो ये है कि भारतीय समाज अभी भी बुरी तरह से जातिवाद से जकड़ा हुआ है। ज़्यादातर भारतीय मां-बाप को पता ही नहीं बच्चों को बड़ा कैसे करना है। उन्हें ज़िम्मेदार कैसे बनाना है। उन्हें अपने फैसले कैसे लेने देने हैं और किस वक्त उनकी ज़िंदगी में दखल देना बंद कर देना है। और जो भी मां-बाप अपने बच्चों की ज़िंदगी को जकड़कर रखते हैं तो वहां बच्चे या तो कुंठित होकर बेहद आक्रामक हो जाते हैं या फिर एकदम ही दब्बू और डरपोक बन जाते हैं। और सोनम और राजा इसी अतिवाद के, इसी Extreme के दो उदाहरण हैं।

सोनम और राजा के केस में दोनों ही सम्पन्न परिवारों से आते हैं। दोनों अच्छे स्कूल-कॉलेजों में भी गए होंगे। दोनों के दोस्त भी रहे होंगे। फिर आखिर वो कौन सी मजबूरी आ जाती है कि 27-28 साल के बच्चों की शादी के वक्त आपके 'उचित रिश्ता' ढूंढने के लिए समाज के रजिस्टर में नाम लिखवाना पड़ता है। एक इंसान अगर इस उम्र तक अपने लिए सही जीवनसाथी चुनने की ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकता या उसे ऐसा करने की छूट नहीं है तो ये उस बच्चे और मां-बाप दोनों के लिए सोचने की बात है।

अगर आपको एक शर्ट भी खरीदनी होती है तो आप ये चेक करते हैं कि शर्ट का साइज़, रंग और फैब्रिक आपकी पसंद हो। आप शर्ट खरीदने मां-बाप को नहीं भेजते खुद जाते हैं। तो फिर जिस इंसान के साथ आपको सारी ज़िंदगी निभानी है। उसकी तरबीयत आपके जैसी है या नहीं, उसके जीवन मूल्य आपसे मेल खाते हैं या नहीं। उसकी वेव लेंथ आपसे मिलती है या नहीं, ये आपके मां-बाप या समाज के रजिस्टर में नाम लिखवाने पर हुई एक-आध मुलाकात कैसे तय कर सकती है!
सोनम के पिता से जब एक रिपोर्टर ने पूछा कि क्या उसकी किसी लड़के से दोस्ती थी, तो उनका जवाब था कि नहीं 'हमारी बच्ची तो बड़ी सीधी है'। वो तो भाई के साथ ऑफिस जाती थी और वहीं से वापस आ जाती थी। वो ऐसे किसी 'फालतू काम' में नहीं थी।

उनका ये बयान बहुत कुछ बताता है। अगर मां-बाप की नज़र में 26-27 साल के लड़के या लड़की का किसी से दोस्ती करना फालतू चीज़ है, तो ऐसा बच्चा किसी से दोस्ती होने पर भी कभी घर पर बताने की हिम्मत नहीं करेगा और शादी करने की तो भूल ही जाओ। ऐसे में फिर होता ये है कि आप जिस भी पहले मर्द या औरत के साथ संपर्क में आते हैं, आपको उसमें ही आकर्षण लगने लगता है।

चूंकि आपके पास opposite gender के साथ एक सहज संवाद का कोई अनुभव नहीं है, आपकी किसी से दोस्ती नहीं रही इसलिए ऐसा पहला अनुभव ही आपको रोमांचित कर देता है। उस रोमांच की तीव्रता, उसकी शिद्दत इतनी ज़्यादा हो जाती है कि अगर उसकी नाक टेढ़ी है, तो दो-चार दिनों में वो सीधी हो जाती है। उसकी देह दुर्बल सुडौल हो जाती है। उसकी आवाज़ दबी हुई है तो उसमें एक बैरी टोन आ जाती है और देखते-देखते ही वो इंसान आपको अपने सपनों के राजकुमार या राजकुमारी जैसा लगने लग जाता है।

मतलब आप सामने वाले से नहीं, जीवन में पहली बार 'चुनाव करने की अपनी स्वतंत्रता' से प्यार करने लगते हो। और किसी भी इंसान को गुलामी का चयन भी थोपी हुई स्वतंत्रता से प्यारा लगता है।

इसी के उलट अगर आप पर कोई बंधन न हो। आपको पता हो कि मैं वयस्क हूं। मैं अपने हिसाब से किसी से भी दोस्ती कर या तोड़ सकता हूं। नए दोस्त बना सकता हूं और अपना जीवनसाथी खुद चुन सकता हूं। तो आप अपने फैसलों में उतने भावुक और जल्दबाज़ नहीं होते। लेकिन सोनम जैसे केस में जब इंसान पहली बार कोई रिश्ता बनाता है और उस पर भी आपको पता हो कि घरवाले इसके लिए तो नहीं मानेंगे, तो आप दिमाग से नहीं पूरी तरह दिल से सोचने लगते हो।

फिर आप अपनी कंपनी के औसत दिखने वाले एक छोटे कर्मचारी के लिए अपने करोड़पति अच्छे दिखने वाले पति तक को मरवाने के लिए तैयार हो जाते हो।
जिन भी लोगों ने ज़िंदगी में प्यार किया है वो जानते हैं कि पहला ब्रेकअप बहुत मुश्किल होता है। फिर चाहे वो किसी भी उम्र में क्यों न हो। आप अपने रिश्ते को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार होते हैं। आप emotionally vulnerable होते हैं। अब इस emotional vulnerability की स्टेज में कौन आदमी कैसे रिएक्ट करेगा ये उसके मूल स्वभाव पर निर्भर करता है।

ज़्यादातर मामलों में लड़के-लड़कियां इसे अपनी नियति मानकर उससे समझौता कर लेते हैं। शादी के कुछ वक्त बाद तक सामने वाले को याद कर भावुक भी होते हैं। मगर फिर बच्चे होने पर धीरे-धीरे सामान्य जिंदगी में लौट जाते हैं और एक वक्त आता है जब आपको अपने उस प्यार की याद भी नहीं आती।

लेकिन कुछ केस सोनम जैसे भी होते हैं। जब लड़का और लड़की दोनों अपनी-अपनी वजहों से रिश्ते में बने रहने के लिए क्राइम तक करने के लिए तैयार हो जाते हैं। और वही इस केस में हुआ भी। लेकिन जैसा मैंने शुरू में कहा कि अगर इस मामले को हमने एक हत्यारिन बहू की कहानी भर बताकर पल्ला झाड़ लिया तो इससे कुछ बदलेगा नहीं। समस्या इससे बहुत गहरे बच्चों की परवरिश में है। जैसा कि खलील जिब्रान ने कहा था कि हर मां-बाप को ये समझना चाहिए कि बच्चे आपके माध्यम से इस दुनिया में आए हैं लेकिन वो आपके नहीं हैं! वो अपनी स्वतंत्र चेतना, स्वतंत्र आत्मा लेकर पैदा हुए हैं। लेकिन जब आप 28-30 के बच्चों को भी ऐसे ट्रीट करते हैं जैसे वो 10-12 साल के हों, तो आप बच्चों और अपनी दोनों की ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हो।

हमने सोनम की बात की, उनके पिता की भी बात की। मगर राजा रघुवंशी की माताजी की मैंने जितनी बातें सुनी हैं वो भी इसी समस्या की तरफ इशारा करती हैं। फोन पर बेटे को इस बात पर डांट रही हैं कि मैंने तुझे कहा था कि सोने की चेन मत पहनकर जाना, फिर क्यों गया। अरे तुमने अभी तक अपने वीडियो नहीं भेजे, अब तुम्हारे वापसी को कितने दिन रह गए। घूमने गई बहू से पूछ रही हैं कि मुझे याद आया कि आज तो तुम्हारा व्रत होगा, तुमने कुछ खाया या नहीं। अब ये सब बातें बहुत सारे लोगों को मां का बच्चों के लिए प्यार लगेंगी लेकिन यकीन मानिए दोस्तों, इसे प्यार नहीं घुसपैठ कहते हैं।

अगर बहू ने कह दिया कि तुम सोने की चेन पहनकर चलना, तो बेटे को क्या करना है ये उस पर छोड़ दीजिए। अगर वो पहनकर चला जाता है तो उसे दस साल के बच्चे की तरह डांटिए मत। अगर हनीमून के दौरान कोई व्रत पड़ भी गया तो खुद बहू को कहिए कोई बात नहीं बेटा तुम व्रत मत रखना। हनीमून आदमी ज़िंदगी में एक बार जाता है। जब इंसान घूमने जाता है तो असली मज़ा खाने-पीने का ही होता है। ऐसे में तुम व्रत नहीं रखोगे तो कोई बात नहीं। तुमने वीडियो नहीं भेजे, तुम कब आओगे ,मैं जानता हूं ये सब सवाल भारतीय घरों में बहुत सामान्य हैं। लेकिन इसे ही रिश्तों में overlapping कहते हैं।

सामने वाले को स्पेस दीजिए। फिर चाहे वो आपके बच्चे हों या आपके मां-बाप। अपनी सारी भावनात्मक ऊर्जा बच्चों में मत खपा दीजिए। उम्र होने के बावजूद अपनी ही भी एक लाइफ रखिए। कुछ शौक रखिए। और बच्चों को भी क्लियरली पता हो कि मां-बाप की भी अपनी ज़िंदगी है। वो हर वक्त हमें बैकअप देने के लिए या हमारे बच्चों की रखवाली के लिए नहीं हैं। इस तरह के स्पेस से हर किसी की ज़िंदगी खुशहाल रहती है।

अगर आप 30 साल के शादीशुदा आदमी को भी हर चीज़ के लिए टोकेंगे तो उसमें कॉन्फिडेंस कहां से आएगा। मैं कुछ दिन पहले एक पेरेंटिंग कोच से पॉडकास्ट कर रहा था, उन्होंने कहा कि एक लेडी अपने 36 साल के लड़के को मेरे पास लेकर आई। साथ में उसके बेटे के बच्चे भी थे। कोच ने बताया कि उस 36 साल के बच्चों में उस आदमी से ज़्यादा कॉन्फिडेंस था और वो मां अपने 36 साल के लड़के के बारे में ऐसे बात कर रही थी जैसे वो 15 साल का हो।

राजा के एक करीबी दोस्त का मैं टीवी पर इंटरव्यू सुन रहा था। वो बता रहे थे कि वो तो बहुत शरीफ था। कुछ हद तक डरपोक भी था। और यही बात मैंने शुरू में कही थी कि अगर मां-बाप बहुत dominating होंगे तो या तो बच्चा कुंठित होकर बागी हो जाएगा या फिर वो दब्बू बन जाएगा। लेकिन वो सहज नहीं बन पाएगा। उसकी पर्सनैलिटी में खुलापन नहीं होगा।

अब ये सवाल किया जा सकता है कि लेकिन जिन घरों में मां-बाप बच्चों को छूट देते हैं वो भी तो एग्रेसिव बन जाते हैं या कुछ बच्चे तमाम छूट के बाद भी दब्बू रह जाते हैं। इस पर यही कहूंगा कि स्वतंत्रता ultimate चीज़ है। एक उम्र के बाद पूरी तरह आज़ाद होकर अपने लिए हर तरह के फैसले कर पाना हर इंसान का हक है। अब वो उस स्वतंत्रता के साथ क्या करता है, ये उसका चयन है। किसी के खराब चयन से स्वतंत्रता बदनाम नहीं हो जाती। उसी तरह अगर लोकतंत्र में कुछ खामियां हैं तो ये अपने आप में कोई दलील नहीं है कि तानाशाही या राजशाही ज़्यादा बेहतर व्यवस्था है।

असल चुनौती है राष्ट्रों या व्यक्तियों को मिली स्वतंत्रता का ज़िम्मेदार इस्तेमाल। और राष्ट्रों या व्यक्तियों को ये बात समझ एकदम से नहीं आती। अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे आधुनिक देश को आज़ाद होने के 146 साल बाद समझ आया कि महिलाओं को भी वोटिंग का अधिकार देना चाहिए। अमेरिका को अपनी आज़ादी के 90 साल बाद समझ में आया कि दासप्रथा को ख़त्म करना चाहिए।

इसी तरह हाइवे में ज़मीन आने पर मिले पैसों से थार लेकर हुड़दंग करने वाली एक पूरी पीढ़ी को भी ये समझने में वक्त लगेगा कि पैसा आने के मतलब ये नहीं कि सड़क पर गंदे तरीके से गाड़ी चलाओ। बॉडी बनाकर किसी से लड़ने का बहाना ढूंढो। कॉरपोरेट में नौकरी कर मोटा पैसा कमाने वालों की भी एक पूरी पीढ़ी को ये पता लगने में वक्त लगेगा कि जीवन का मतलब सिर्फ उस पैसे के दम पर भौतिकता खरीदना नहीं है। स्टार्टअप के नाम पर सिर्फ फंडिंग उठाकर खुद की वैल्यूएशन 100 करोड़ दिखाने वालों की भी पूरी एक-दो पीढ़ी के बाद पता लगेगा कि धंधा बनाने और सोसाइटी के लिए वैल्यू क्रिएट करने में क्या फर्क है।

इसी तरह हमें अपने बच्चों को बिना घबराए एक दोस्त की तरह उनके साथ चलते-चलते, दुनिया के लिए उन्हें तैयार करते-करते, एक वक्त बाद उन्हें आज़ाद कर देना चाहिए। और यकीन मानिए इस देश की सारी आर्थिक तरक्की, सारा इनोवेशन, सारी क्रिएटिविटी और सारा नैतिक विकास उस आज़ादी से ही निकलेगा। और जब तक हम ऐसा नहीं करते तब तक सामाजिक समस्याओं को क्राइम थ्रिलर मानकर उसके चटखारे लेते रहेंगे। इससे हमें तो मज़ा तो बहुत आएगा मगर हकीकत वैसी ही बेस्वाद बनी रहेगी।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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