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शिवाजी मध्ययुगीन भारत के महान रचनात्मक जीनियस थे : समीर चौगांवकर
भारत के इतिहास में केवल एक ही शिवाजी हैं। वे अतुल्य और अद्वितीय हैं। महाराष्ट्र में वे देवतुल्य पूजनीय हैं ही, सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए भी अगाध सम्मान के सुपात्र हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 year ago
समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
शिवाजी केवल मराठा राष्ट्र के निर्माता नहीं थे, वे मध्ययुगीन भारत के सबसे महान रचनात्मक जीनियस भी थे। राज्यों का पतन हुआ, साम्राज्य विखण्डित हुए, वंश लुप्त हो गए परतु एक सच्चे नायक के रूप में शिवाजी महाराज की स्मृति सारी मानव जाति के लिए अखण्ड ऐतिहासिक विरासत बन गई। जब हम भारत के सुदीर्घ इतिहास में झांककर देखते हैं तो अनेक राजा और महाराजा हमें दिखलाई देते हैं। अनेक सम्राट और नरेश, अनेक भूपति और नृपति। किंतु छत्रपति की उपाधि केवल एक ही को मिली है।
भारत के इतिहास में केवल एक ही शिवाजी हैं। वे अतुल्य और अद्वितीय हैं। महाराष्ट्र में वे देवतुल्य पूजनीय हैं ही, सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए भी अगाध सम्मान के सुपात्र हैं। बात केवल इतनी भर नहीं है कि उन्होंने महान मराठा साम्राज्य की स्थापना की, या वे एक अद्भुत प्रशासक और रणनीतिकार थे। छत्रपति की उपाधि प्राप्त करने में उनके चरित्रगत गुणों और नैतिक निष्ठा का केंद्रीय महत्व था।
भारतीय इतिहास के एक ऐसे कालखंड में अग्नि-शलाका की तरह देदीप्यमान हैं, जब इस पुण्यभूमि का अभिमान पददलित हो रहा था। उन्होंने भारत को उसका गौरव लौटाया, आत्मविश्वास दिया, उन्होंने असम्भव लड़ाइयां लड़कर यशस्वी विजय हासिल कीं, और जाने कितनी किंवदंतियों के केंद्र वे बने। भारतीय इतिहास के शलाका-पुरुष न सिर्फ हमारे सामने एक आदर्श प्रस्तुत करते रहे हैं, बल्कि वे अपनी व्यक्ति-व्यंजना में एक ग़ज़ब का जादुई आकर्षण भी लिए होते हैं, जो आज भी हमें सम्मोहित किए हुए हैं। छत्रपति शिवाजी इन्हीं में से एक हैं।
सत्रहवीं शताब्दी के इस महानायक ने पूना की एक छोटी-सी जागीर से उठकर एक वृहत् मराठा साम्राज्य की स्थापना की थीं, वह भी मुगल, बीजापुर और यूरोपीय शक्तियों के मध्य। यह एक कठिन कार्य तो था ही किंतु उससे भी बढ़कर यह था कि यह वीरोचित कार्य उन्होंने उच्च नैतिक मानदंडों को अक्षुण्ण रखते हुए किया। जबकि उस युग में छल-कपट, षड्यंत्र एवं अनैतिक आचरण सर्वत्र छाया हुआ था।
दमित भारत-राष्ट्र में स्वाभिमान और संघर्ष की भावना उत्पन्न करना उनकी महानतम उपलब्धि थी.वे आज भी प्रासंगिक हैं और उनके मूल्य और आदर्श सदैव शाश्वत रहेंगे।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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