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हिंदी टीवी पत्रकारिता को सम्मान दिलाने वाले विनोद दुआ को आखिरी सलाम: विजय त्रिवेदी

विनोद दुआ हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम यूं ही नहीं थे। उनसे ज़्यादा कैमरा फ्रेंडली एंकर शायद ही कोई दूसरा रहा हो।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

विजय त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मेरे पत्रकार और फ़िल्मकार मित्र जो एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, ने ट्विटर पर लिखा- ‘विनोद मरा नहीं, विनोद मरते नहीं।’ सच ही लिखा है, भले ही यह खबर सच हो कि वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने शनिवार को साढ़े चार बजे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में आखिरी सांस ली, लेकिन विनोद दुआ, उनकी पत्रकारिता, उनकी जांबाज़ी, उनकी हिम्मत मर नहीं सकती। अपने 35 साल के करियर में उनका यह अंदाज़ सैकड़ों पत्रकारों में छूट गया है, जो खत्म नहीं हो सकता। उसे खत्म किया नहीं जा सकता।

विनोद दुआ हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम यूं ही नहीं थे। उनसे ज़्यादा कैमरा फ्रेंडली एंकर शायद ही कोई दूसरा रहा हो। आज के दौर में जब ज़्यादातर एंकर टीवी प्रॉम्पटर के बिना नहीं चल सकते हों, उसमें विनोद दुआ ने कभी प्रॉम्पटर का इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि किसी भी कार्यक्रम या स्टोरी के लिए उनके दिमाग में तस्वीर साफ होती थी और वो वही बोलते थे, चाहे आपको पसंद आए या नहीं।

दुआ साहब यूं तो खुद को पत्रकार नहीं कहते थे, और प्रजेंटर बोलते थे, क्योंकि उस ज़माने में दूरदर्शन पर एंकर प्रजेंटर ही होते थे, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ और पत्रकारिता की पैनी धार ऐसी रही, जिसका तोड़ पाना आसान काम नहीं था। कैमरे के सामने उनका दुस्साहस और बेलागमपन उन्हें सबसे अलग करता है, उनका अपना खास अंदाज़ था, बेफिक्री का अंदाज़। दूरदर्शन पर चुनाव विश्लेषणों ने उनको ऐसी पहचान दी कि वो हर हिन्दुस्तानी घर में सेलेब्रिटी हो गए। प्रणव रॉय और उनकी जोड़ी खूब जमती थी। दिल्ली के हंसराज कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक और दिल्ली विश्वविद्यालय से लिट्रेचर में एम ए कर चुके दुआ की अंग्रेजी और हिंदी दोनों पर जबरदस्त पकड़ थी। प्रणव रॉय के अंग्रेजी प्रजेंटेशन को भी वे तुरंत बड़ी खूबसूरती से हिंदी में समझा देते थे। हिंदी टीवी पत्रकारिता को सम्मान दिलाने में उनकी भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकेगा।

क्या अब विनोद दुआ जैसी हिम्मत कोई एंकर दिखा सकता है

कम लोगो को याद होगा कि जिस जमाने में दूरदर्शन अकेला टीवी चैनल होता था और वो भी सरकार के अधीन, उस दूरदर्शन पर उनका प्रोग्राम जनवाणी खासा लोकप्रिय था। इस कार्यक्रम में वो सरकार के नुमाइंदों और मंत्रियों को बुलाते थे और जनता के सवाल भी शामिल करते थे। कुछ लोग अब भी चाहें तो उस प्रोग्राम से दुस्साहसी होने के लिए हिम्मत जुटा सकते हैं। उस कार्यक्रम में दुआ साहब मंत्रियों से जैसे सवाल पूछते, टिपप्णी करते, जनता को मौका देते, वो तब तो मुश्किल काम था ही, अब असंभव सा लगता है। क्या आज कोई प्राइवेट न्यूज चैनल पर भी किसी मंत्री के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए, उसे दस में से तीन अंक देने की हिम्मत दिखा सकता है, वो काम उन्होंने सरकारी चैनल दूरदर्शन पर किया। दुआ साहब ने शायद कभी इस बात की परवाह नहीं की कि सत्ता का व्यवहार उनके साथ कैसा रहेगा। 2008 में जब मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान किया, उनकी सूची में कुछ और नाम भी थे। उस हिसाब से विनोद दुआ के लिए वो बहुत छोटा सम्मान था।

संवाददाताओं का देश भर में जाल बिछाया

दूरदर्शन पर प्राइवेट प्रॉडक्शन के तौर पर वह पहली साप्ताहिक पत्रकारिता थी– ‘परख’, नवम्बर 1992 में शुरू हुए इस कार्यक्रम के लिए लोग पूरे सप्ताह इंतज़ार करते थे। मेरा सौभाग्य है कि उस प्रोग्राम की शुरुआत से मैं उसमें जुड़ा रहा, पहले दिन से, पहले कार्यक्रम से। उस कार्यक्रम में भी हर सेगमेंट का नाम उन्होंने बेहद खूबसूरत तरीके से चुना था। वो उस कार्यक्रम के ना केवल निर्माता निर्देशक थे, बल्कि इसके माध्यम से उन्होनें देश भर में संवाददाताओं का ऐसा जाल बिछाया, जो बाद में आने वाले न्यूज चैनलों के आधार स्तम्भ बन गए। आज भी यह जानकार अच्छा महसूस होता है कि परख की टीम के उन पत्रकारों ने पत्रकारिता के मानदंडों को नहीं छोड़ा और आगे बढ़ाने की कोशिश ही की। देर रात तक उस कार्यक्रम पर चर्चाओं में उनका सहभागी और प्यार का हकदार बना। उन चर्चाओं के बीच इतिहास, विदेश नीति और संगीत पर उनका ज्ञान अदभुत था।

पढ़ने लिखने और गाने के शौकीन दुआ

पढ़ने लिखने और गाने के शौकीन। गाने के शौक और एक कार्यक्रम से ही उनकी मुलाकात बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनी डॉ पद्मावती से हुई। प्यार से उन्हें लोग चिन्ना दुआ के नाम से जानते हैं और वो नेवीगेटर थीं विनोद दुआ की, शायद यही वजह रही कि इस साल कोरोना की वजह से जून में चिन्ना जी के जाने के बाद दुआ साहब ना केवल टूट गए, बल्कि शायद जीने की इच्छा ही छोड़ दी और वो बीमारी की इस लड़ाई से वैसे नहीं लड़ रहे थे, जैसे उन्होंने अपने करियर में बड़े बड़े लोगो से लड़ी थीं। नौकरी करना उन्हें पसंद नहीं था, बल्कि यूं कहना चाहिए कि उनका स्वभाव नही था। कोई ना तो उन्हें बांध सकता था और ना ही उनके विचारों को रोक सकता था, किसी गहरी और बड़ी नदी की तरह उनका विस्तार तो था ही, पत्थर उनका रास्ता नहीं रोक सकते थे, सिर्फ बहते रहे अपने अंदाज़ में।

लोकप्रियता के शिखर पर रहते वक्त भी वो ओढ़ी हुई गंभीरता के साथ नहीं रहते थे, एक जिंदादिल इंसान, जोश खरोश से भरा हुआ, अपने सहयोगियों को दोस्त मानने वाला। सड़क पर भुट्टा खाने, नमक मसाले वाली मूली खरीदने और गोल गप्पे खाने वाला दुआ साहब बनना मुश्किल काम है। लोकप्रियता जब दूसरों से दरवाज़े बंद करती हो, उस वक्त भी वो सबके लिए खुले हुए, हर चर्चा के लिए। हिंदी,उर्दू और अंग्रेजी साहित्य जितना पढ़ते थे, उतना ही ज्ञान उन्हें संगीत और नाटक में था। फ़िल्मों और गीतों के साथ सूफी संगीत उनका शौक था। सुनना भी, गाना भी और उसमें उनकी जबरदस्त जोड़ी सहयोगी चिन्ना दुआ। अक्सर बुल्ले शाह और बाबा फरीद का ज़िक्र और गीत उनकी बातचीत में शामिल होते थे। खाने खिलाने के शौकीन।

‘जायका’ शो आपको खाने का जायका महसूस कराता था

विनोद दुआ का मतलब पार्टियां, हर मौके, बेमौके पार्टियां लेकिन अनौपचारिक बिना दिखावे की। किस्से, लतीफे और चुटकियां, हंसना, हंसाना, और बेलौस जीना। उनकी बेटी स्टैंड-अप मल्लिका में यह गुण शायद उनसे ही आया होगा। पत्रकारिता से दूर जब उन्होंने हिन्दुस्तान की सड़कों और गलियों और ढाबों के लोकल फूड पर एनडीटीवी पर कार्यक्रम किया ज़ायका इंडिया का, तो उसे सिर्फ़ देखना नहीं होता था, आप उसमें उस फूड का ज़ायका महसूस कर सकते थे। उनकी दूसरी बेटी बकुल क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट हैं, शायद वो किसी दिन बेहतर तरीके से समझा पाएं। विनोद दुआ का परिवार विभाजन के वक्त पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान से आया था। बचपन मुश्किलों में बीता। उनकी विनम्रता, उनकी हंसी, उनकी पत्रकारिता यदि आपने महसूस नहीं की, तो पक्का मानिए आप बहुत कुछ हासिल करने से रह गए हैं।

(साभार:  tv9hindi.com)


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