रवीश कुमार ने किया कटाक्ष- पीएम इस 'कबाड़' को देखने आए थे, सवालों के जवाब देने नहीं

शुक्रवार को हुई प्रेस कांफ्रेंस में नरेंद्र मोदी ने एक भी सवाल का नहीं दिया जवाब

Last Modified:
Saturday, 18 May, 2019
Ravish Kumar

ख़ान मार्केट गैंग नहीं है, गैंग है तो मोदी का मीडिया सिस्टम है

जगह-जगह पहली बार पहुंचने का इतिहास बनाने के शौक़ीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी के मुख्यालय में ही पहली बार का इतिहास बना दिया। प्रधानमंत्री के नाम पर हुई प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री ने एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया। यह पहली बार हुआ है। यह भी पहली बार हुआ कि दर्शकों ने प्रधानमंत्री मोदी को 22 मिनट तक चुप देखा और 22 मिनट तक दूसरे को सुनते देखा। अमित शाह 22 मिनट तक बोलते गए। लगा कि अमित शाह जल्दी माइक प्रधानमंत्री को सौंप देंगे और सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू होगा।

अमित शाह ऐसा कुछ भी नहीं बता रहे थे जो भाजपा कवर करने वाले पत्रकारों को पता नहीं था। जो जानकारियां चुनाव शुरू होने से पहले की थीं, उसे ख़त्म होने के बाद बता रहे थे। प्रधानमंत्री इस तरह से सुन रहे थे जैसे उन्हें भी पहली बार पता चल रहा हो। इस तरह इंटरव्यू के बाद दोनों ने प्रेस कांफ्रेंस की गरिमा भी समाप्त कर दी। बता दिया कि प्रधानमंत्री दिख रहे हैं आपके सामने, यही बहुत है और यही न्यूज़ है। चैनलों पर चला भी कि यह प्रधानमंत्री की पहली प्रेस कांफ्रेंस है। पांच साल में उन्होंने एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। कांफ्रेंस हॉल में प्रधानमंत्री का दिखना अब प्रेस कांफ्रेंस कहलाएगा। हिंदी में इसे प्रेस-दर्शन कहा जाएगा।

इस प्रेस कांफ्रेंस में प्रेस प्रधानमंत्री को कवर करने गया था, लेकिन अमित शाह प्रधानमंत्री को कवर करने आए थे। अमित शाह ने पहले 22 मिनट और बाद में 17 मिनट बोलकर प्रधानमंत्री को ख़ूब कवर किया। अपने नोट्स से लगातार 22 मिनट तक बोलकर उन्होंने बता दिया कि उनके दिमाग़ में राजनीति की रेखाएं कितनी स्पष्ट हैं। उन्होंने राजनीति को निर्जीव बना दिया है, जिसमें सिर्फ संख्या प्रमुख है। अमित शाह ख़ुद को प्रमाणित कर रहे थे कि उन्होंने एक अच्छे प्रबंधन की भूमिका निभाई है। जिस तरह से बूथों की संख्या गिना रहे थे, मुझे उम्मीद हो गई थी कि वे शामियानों और उनमें लगी बल्लियों की संख्या भी बता देंगे। पंखे कितने लगे और कुर्सियां कितनी लगीं, ये भी बता देंगे। मैं थोड़ा निराश हुआ। उन्होंने यह नहीं बताया कि प्रधानमंत्री की सभाओं में गेंदे की माला पर कितना ख़र्च हुआ।

अमित शाह जो जानकारी दे रहे थे, वो नई नहीं थीं। भाजपा कवर करने वाले पत्रकार यही सब तो रिपोर्ट करते रहे हैं। पार्टी के भीतर की कब आपने कोई बड़ी ख़बर देखी। कब आपने देखा कि पत्रकारों ने अपनी तरफ से सवालों की बौछारें कर दी हों। मोदी-शाह के कार्यकाल में क्या आपको भाजपा की एक भी प्रेस कांफ्रेंस याद है, जिसमें सवालों की बौछार हुई है। जो काम पांच सालों से बंद पड़ा था वो अचानक कैसे शुरू हो जाता। बीजेपी ने अपने पत्रकारों को रैलियों की संख्या और उनका विश्लेषण करने वाले संपादक में बदल दिया है। 17 मई को लगा कि अमित शाह उन पत्रकारों की कापी चेक कर रहे हैं कि जो बताया है वो ठीक से याद है कि नहीं। नहीं याद है तो फिर से सुनो। भाव ऐसा था कि आप लोगों को पता ही नहीं चला कि हमने चुनाव कैसे लड़ा। मोदी ने भी कहा कि हम बहुत पहले से तैयारियां करते हैं। आपको पता नहीं चलता है। इस तरह दोनों ने औपचारिक और सार्वजनिक रूप से प्रमाणित किया कि आप भाजपा कवर तो करते हैं लेकिन भाजपा के बारे में ख़बर नहीं रखते, क्योंकि ख़बर तो हम देते नहीं हैं।

जैसे इम्तिहान में फेल होने पर मास्टर लेक्चर देता है कि छुट्टियों में किताबें पढ़ लेना, उसी तरह प्रधानमंत्री ने रिपोर्टिंग में फेल पत्रकारों को लेक्चर दिया कि बाद में रिसर्च कर लेना कि हम चुनाव कैसे लड़ते हैं। साफ-साफ कह रहे थे कि आप किस बात के पत्रकार हो, हमने आपको कुछ भी ख़बर नहीं लगने दी। प्रधानमंत्री ने जिस प्रेस को ख़त्म कर दिया है, उसे कंफर्म किया कि ये पूरी तरह कबाड़ में बदला है या नहीं। 17 मई को प्रधानमंत्री उस कबाड़ को एक कमरे में देखने आए थे न कि उसके सवालों का जवाब देने।

प्रधानमंत्री 12 मिनट बोले। सट्टा बाज़ार से लेकर कुछ भी कि चुनाव के समय आईपीएल भी हुआ, रमज़ान भी हुआ और हनुमान जयंती भी हुई। पत्रकार भी कंफ्यूज़ हो गए कि यह सब मोदी सरकार करा रही थी। चुनाव तो पहले भी हुए और पहले भी चुनावों के दौरान इम्तिहान से लेकर रमज़ान तक हुआ होगा। 17 मई को मोदी शाह ने साबित किया कि उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस को ही ख़त्म कर दिया है तो करें क्या। वे प्रेस-डिक्टेशन करते हैं, कांफ्रेंस नहीं करते हैं। हैरानी की बात यह है कि सवाल न पूछे जाने की पूरी गारंटी के बाद भी प्रधानमंत्री ने सवालों को प्रोत्साहित नहीं किया।

पांच साल पहले मोदी की यात्रा को याद कीजिए। उन्होंने यकीन दिलाया था कि वे बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं। वे मौन-मोहन नहीं हैं। किसी की बोलने की क्षमता का मज़ाक उड़ाया गया। कहा गया कि मनमोहन लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं। दस जनपथ से जो लिख कर आता है, वही पढ़ते हैं। धीमे-धीमे पढ़ते हैं। पांच साल ख़त्म होते होते देश ने देखा कि हमने बोलने वाला प्रधानमंत्री मांगा था, मगर मिला बड़बोला प्रधानमंत्री। उनके जवाब के मज़ाक उड़े। बादल और रडार से लेकर डिजिटल कैमरा और ईमेल के जवाब से साबित हुआ कि प्रधानमंत्री कुछ भी बोलते हैं। यही नहीं, देश ने यह भी देखा कि प्रधानमंत्री लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं। उनकी रैलियों में टेलिप्राम्टर लग गया। यकीन जानिए कि यह टेलिप्राम्टर अगर मनमोहन सिंह लगाकर बोलते या राहुल गांधी तो मीडिया रोज़ इस पर बहस करता और आप रोज़ इसकी चर्चा करते। मगर मीडिया ने आपको सिखा दिया है कि कैसे मोदी की कमज़ोरी को ताकत और उनके झूठ को सत्य समझना है।

जो लोग प्रेस कांफ्रेंस में अमित शाह और मोदी की देह-भाषा की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं, उन्हें अपनी समझ ताज़ा कर लेनी चाहिए। दोनों ने कहा कि 300 सीटें आएंगी। दोनों को मतलब शपथ लेने और सरकार बनाने से है। सवालों और जवाब से नहीं है। किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि 22 मिनट बोलकर अमित शाह प्रधानमंत्री मोदी के बॉस हो गए हैं। इन दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई देखने वाले इनके रिश्तों की गहराई नहीं जानते। प्रधानमंत्री भरी सभा में इस तरह से अपने वर्चस्व की हार का लाइव टेलिकास्ट कराने नहीं आएंगे। आइये, देखिए, अमित शाह ने मोदी को जवाब नहीं देने दिया। अमित शाह का युग शुरू हो रहा है। मोदी का युग जा रहा है। थोड़ा सब्र रखिए। ऐसा कुछ नहीं होगा। नरेंद्र मोदी को लालकृष्ण आडवाणी समझने की भूल न करें। अमित शाह को नरेंद्र मोदी समझने की महाभूल कभी न करें। मोदी का मन किया होगा कि आज अमित शाह 22 मिनट बोलकर दिखाएंगे। वही सवालों के जवाब देंगे।

मोदी और मीडिया की समझ बहुत ज़रूरी है। जैसे दिल्ली में सल्तनत कायम करने के लिए बल्बन सज़दा और पायबोश की फ़ारसी परंपरा ले आया था, वैसे ही कांग्रेसी राज को सल्तनत कहने वाले मोदी ख़ुद भी बादशाही मिज़ाज के शिकार हो गए। बल्बन ऊंचाई पर बैठता था। उसके दरबार में आने वाला सर झुका कर सलाम करता था। दूरी और ऊंचाई की रेखा उसने साफ साफ खींच दी थी। उसी तरह से मीडिया को लेकर एक मोदी सिस्टम कायम हुआ। इस मोदी सिस्टम में दूरी की अपनी जगह है। आप प्रधानमंत्री के सारे इंटरव्यू देखिए। उसमें दूरी और भव्यता का भाव दिखेगा। उनके दफ्तर का सेट एक सा होता है। कुर्सियां कभी इस तरफ होती हैं तो कभी उस तरफ, मगर सवाल पूछने वाला एक ख़ास दूरी पर बैठा होता है। हर इंटरव्यू का फ्रेम और शॉट एक सा होता है।

मैं नहीं जानता तो नहीं कहूंगा कि रिकार्डिंग भी प्रधानमंत्री के कैमरे से होती होगी। अगर सारे चैनल अपने कैमरे से करते हैं तो यह भी कमाल है कि हर किसी का फ्रेम एक सा होता है। आप व्हाइट हाउस में ट्रंप की प्रेस कांफ्रेंस याद कीजिए। प्रेस और राष्ट्रपति के बीच की दूरी कम होती है। लगता है कि राष्ट्रपति प्रेस के बीच हैं। आप प्रेस के सामने मोदी की मौजूदगी देखिए, लगता है कि अवतार पुरुष हैं। देश कभी तो उनके इंटरव्यू की सच्चाई जानेगा। जो आज मजबूर हैं, वही लिखेंगे।

मोदी सिस्टम ने इंटरव्यू की कला को समाप्त कर दिया। उन्होंने साबित किया कि सवाल नहीं भी पूछा जाएगा तो भी दर्शक देखेगा। क्योंकि वे मोदी हैं, दर्शक उनका भक्त है। आम, बटुआ, पतंग, रोटी से लेकर न जाने कितने बकवास सवाल उनसे पूछे गए। मोदी ने उन सवालों का गंभीरता से जवाब देकर स्थापित किया कि यही पूछा जाएगा और ऐसे ही पूछा जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में उनका जवाब ख़तरनाक है। उन्होंने कहा है कि न्यूज़ छपे या न छपे लोकतंत्र में सिर्फ यही एक काम नहीं है। इसके बाद भी प्रेस उनके इंटरव्यू के लिए गिड़गिड़ा रहा है। मोदी न्यूज़ देने के लिए कैमरे के सामने नहीं आते हैं, बल्कि कैमरे को दर्शन देने आते हैं।

इंटरव्यू और प्रेस कांफ्रेंस मीडिया के ये दो आधार स्तंभ हैं। मोदी सिस्टम ने इन दोनों को समाप्त कर दिया। बड़े-बड़े न्यूज़ चैनलों ने मोदी सरकार की योजनाओं की कमियों और धांधलियों की रिपोर्टिंग बंद कर दी। यह तीसरा हमला था। सवाल की हर संभावना कुचल दी गई। उनके इंटरव्यू को लेकर यह धारणा बन गई है कि सवाल ही नहीं थे और जो थे वो पहले से तय किए गए थे। न्यूज़ नेशन पर कविता वाले सवाल ने इस धारणा को साबित कर दिया। बस, अब एक जवाब और चाहिए। प्रधानमंत्री के इंटरव्यू से पहले पत्रकार सवाल लिखकर देता है या प्रधानमंत्री पत्रकार को सवाल लिख कर देते हैं कि क्या पूछना है।

मीडिया के सामने मोदी एक्सपोज़ हो चुके हैं। मोदी के सामने मीडिया एक्सपोज़ हो चुका है। दोनों के बीच कोई राज़ नहीं है। दोनों के सामने दोनों नहीं हैं। उन्होंने यह साबित किया है कि बग़ैर सवाल के भी इंटरव्यू एक्सक्लूसिव हो सकता है। मीडिया को लेकर जो मोदी सिस्टम बना है, वो मोदी को ही एक्सपोज़ कर देगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। 2019 के चुनाव की सबसे बड़ी देन यही है। 2019 आपको बता गया कि जिस मीडिया ने मोदी को बनाया अब उसी मीडिया में मोदी को देख लो। उस झूठ को देख लो।

मोदी-सिस्टम एक गैंग की तरह काम करता है। ज़रूर प्रधानमंत्री ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि सवाल पूछने वाले ख़ान मार्केट गैंग हैं। उन्हें फर्क नहीं पड़ता है। हो सकता है कि कोई ख़ान मार्केट गैंग रहा हो, जिसे मोदी ने ध्वस्त कर दिया। मगर मोदी के आसपास मीडिया का जो गैंग दिख रहा है, उसका नाम भले ही आज़ादपुर मंडी गैंग नहीं है, लेकिन वह काम करता है गैंग की तरह ही है।

मीडिया के मालिकों को धंधा देकर एंकरों से भजन कराने का एक सिस्टम अब मान्यता प्राप्त हो चुका है। मीडिया मालिकों की आज़ाद हैसियत मोदी ने समाप्त कर दी। मोदी के सामने मालिक और एंकर अब एक समान नज़र आते हैं। मोदी ने ऐसे पत्रकारों का गैंग खड़ा कर दिया है, जो सवाल के नाम पर आम और इमली के औषधीय गुण पूछते हैं। मोदी सिस्टम भी एक गैंग है, जो किसी भी हाल में पता नहीं चलने देता है कि अक्षय कुमार का इंटरव्यू किसने रिकार्ड किया। किसने एडिटिंग की, लेकिन न्यूज़ एजेंसी एएनआई के ज़रिये सारे चैनलों पर चल जाता है। क्या वह कार्यक्रम हवा में बन गया था?

मोदी ने प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। यह तथ्य है। यह भी एक तथ्य है कि मोदी से पूछने वाला प्रेस ही नहीं है। होता तो उसे प्रेस कांफ्रेंस की ज़रूरत नहीं होती। वह अपनी ख़बरों से मोदी को जवाब के लिए मजबूर कर देता। न्यूज़ चैनल आप देखते हैं, यह आप दर्शकों की महानता है। इसकी शिकायत मुझसे न करें। मैंने तो न्यूज़ चैनल न देखने की अपील की है। मोदी सिस्टम में जब न्यूज़ की जगह मोदी को ही देखना है तो क्यों न आप अपने घर में चारों तरफ मोदी की तस्वीर लगा दें। अख़बार और टीवी पर ख़र्च होने वाला पैसा गौशाला को दान दे दें।

(वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की फेसबुक वॉल से)

रवीश कुमार ने द टेलिग्राफ अखबार में छपे इस प्रेस कांफ्रेंस का स्क्रीनशॉट भी अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर किया है, जिसे आप यहां देख सकते हैं-

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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का पीएम मोदी से सवाल- आगे बढ़ने से क्यों डर रहे हैं आप?

मैं यह सोचता हूं कि मोदी को यह घोषणा करने की क्या जरूरत है कि वे धारा 370 और नागरिकता संशोधन कानून के मामले में अपने कदम पीछे नहीं हटाएंगे?

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 18 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 18 February, 2020
modi

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में अपनी सरकार की कई उपलब्धियां गिनाईं, जो उन्हें गिनानी ही चाहिए, क्योंकि वह उनका चुनाव क्षेत्र है। इसमें शक नहीं कि गंगा की सफाई, तीर्थ-यात्री एक्सप्रेस और राममंदिर का निर्माण-कार्य आदि इस सरकार की रचनात्मक उपलब्धियां हैं। मैं यह भी मानता हूं कि धारा 370 का खात्मा और कश्मीर का पूर्ण विलय भी एक साहसिक और यथार्थवादी कदम है। हमने ‘आजाद कश्मीर’ जैसा पाकिस्तानी ढोंग खड़ा नहीं कर रखा है और कश्मीर की जनता की सेवा में केंद्र सरकार पूरी तरह से लगी हुई है लेकिन फिर भी मैं यह सोचता हूं कि मोदी को यह घोषणा करने की क्या जरूरत है कि वे धारा 370 और नागरिकता संशोधन कानून के मामले में अपने कदम पीछे नहीं हटाएंगे?

कौन नेता, कौन पार्टियां, कौन संगठन मांग कर रहे हैं कि धारा 370 के मामले में आप अपना कदम पीछे हटाएं? विदेशों में भी दो-तीन राष्ट्रों के अलावा, जिन्होंने रस्मी बयान जारी कर दिए, लगभग सभी राष्ट्र धारा 370 के खात्मे को भारत का आतंरिक मामला मान रहे हैं। कश्मीर के मामले में दुनिया के बड़े राष्ट्र और भारत के मित्र राष्ट्र भी मांग कर रहे हैं कि कश्मीरियों के मानव अधिकारों की रक्षा हो, गिरफ्तार नेताओं की रिहाई हो और आम कश्मीरी को उसके रोजमर्रा की जीवन में राहत मिले। इसके विरुद्ध आप क्यों डटे रहना चाहते हैं? इस मामले में रियायत देना पांव पीछे हटाना नहीं है बल्कि आगे बढ़ाना है।

कश्मीरी नेताओं और शाहीन बागियों से सीधा संवाद कर आप आगे क्यों नहीं बढ़ते? इसी प्रकार नागरिकता संशोधन कानून की भावना नेक है और उसे आप ने संसद से पारित करवाया, यह भी ठीक है। इस बात का कौन विरोध कर रहा है कि पड़ोसी मुस्लिम देशों से आकर शरण मांगने वाले हिंदू, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख और पारसियों को आप शरण देना चाहते हैं? इसकी तारीफ तो पड़ोसी मुस्लिम देश भी अंदर ही अंदर कर रहे हैं, क्योंकि आप उनका ‘बोझ’ थोक में उतार रहे हैं। लेकिन देश और सारी दुनिया में विरोध सिर्फ एक छोटी-सी बात का हो रहा है। वह यह कि आपने इस सूची में से मुसलमान शरणार्थियों को बाहर क्यों कर दिया? मैं आपसे पूछता हूं शरणार्थियों कि उन छह नामों में सातवां नाम जोड़ना क्या पीछे हटना है? अरे भाई, 6 को 7 करना तो आगे बढ़ना है। आगे बढ़ने से नरेंद्र भाई आप क्यों डर रहे हैं? जो लोग अपनी भूल-सुधार कर लेते हैं वे बहुत आगे बढ़ते हैं। उनके प्रति लोगों का प्रेम और सम्मान भी बढ़ता है।

(साभार: फेसबुक)

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भारत के पत्रकार क्या इससे सबक लेंगे मिस्टर मीडिया!

यह नौबत भी आ गई। दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम आए तो मीडिया मुद्दों पर दो फाड़ हो गया

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 18 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 18 February, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

यह नौबत भी आ गई। दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम आए तो मीडिया मुद्दों पर दो फाड़ हो गया। एक वर्ग ऐसा था, जो खुलकर अरविंद केजरीवाल की जीत के लिए मतदाताओं को ही कोस रहा था। उसका कहना था कि अवाम आम आदमी पार्टी के मुफ्तखोरी के झांसे में आ गई। उसकी कवरेज को देखकर लगा कि जैसे दिल्ली के मतदाताओं ने कोई बहुत बड़ा जुर्म कर दिया है। उसे इस पार्टी के धोखे में नहीं आना चाहिए था। आज़ादी के बाद संभवतया यह पहली बार हुआ है कि दुनिया के सबसे विराट लोकतंत्र के संचालकों से कहा जा रहा है कि उन्हें सही निर्णय करना नहीं आता। नहीं भूलना चाहिए कि यही मतदाता हैं, जो हिन्दुस्तान पर तानाशाही के आक्रामक घुड़सवारों को अब तक रोकते रहे हैं। जम्हूरियत की सलामती इसलिए है कि भारत का अशिक्षित मतदाता भी अपने पास अच्छा-बुरा सोचने, समझने का हक रखता है और उसने 1977 और 1989 में भी अपना जनादेश इस देश को सौंपा था।

महान विचारक और संपादक राजेंद्र माथुर कहा करते थे कि पत्रकारिता में सौ फ़ीसदी निष्पक्षता संभव नहीं है। कभी पत्रकारों को महसूस हो कि किसी अप्रत्याशित स्थिति में उनके लिए निष्पक्ष रहना मुश्किल है तो उन्हें आंख मूंदकर अवाम के साथ खड़े हो जाना चाहिए, लेकिन दिल्ली प्रसंग में तो उल्टा हुआ है। ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) को रिकॉर्ड मतों से प्रचंड जीत दिलाने वाले वोटरों को ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। इस मानसिकता का क्या किया जाए?

यह स्थापित तथ्य है कि प्रजातंत्र में तंत्र प्रजा के सेवक के रूप में होता है। प्रजा तंत्र का चुनाव करती है। ऐसे में मीडिया का एक वर्ग अगर लोक को नसीहत दे कि उसे तंत्र के हिसाब से मत देना चाहिए तो यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है। एक मायने में तो यह पत्रकारिता की गणतांत्रिक समझ पर भी सवाल खड़े करता है। भारत ही क्या दुनिया के किसी देश में मतदाताओं को कोसना या गरियाना अच्छा नहीं माना जाता। यह ठीक वैसा ही है कि जिस डाल पर हम बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। इस जनादेश के लिए वोटरों को दोषी ठहराकर कहीं हम अपने पूर्वाग्रह तो दर्शकों या पाठकों पर नहीं थोप रहे हैं?

इसी सप्ताह न्यूयॉर्क टाइम्स ने पूरे दो पन्ने डोनाल्ड ट्रंप के पाखंड को उजागर करते हुए छापे हैं। इनमें अमेरिकी राष्ट्रपति के बोले गए झूठ तारीखवार प्रकाशित किए गए हैं। चुनाव से ठीक पहले इस खुलासे से लोग स्तब्ध हैं। पत्रकारिता का तकाजा सच के साथ खड़े होने का है। महात्मा गांधी की पत्रकारिता से इसी कारण सत्याग्रह शब्द निकला है। यानी सत्य का आग्रह ही सार्थक पत्रकारिता है। भारत के पत्रकार क्या इससे सबक लेंगे मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए, मिस्टर मीडिया!

चुनाव कवरेज के सारे नियम-संतुलन टूट रहे हैं, मिस्टर मीडिया!

पत्रकार पर हमला स्वीकार्य नहीं, लेकिन छिपी चेतावनी भी समझनी होगी मिस्टर मीडिया!

अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

 

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'13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने के पीछे ये है वजह'

महान भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीश चंद्र बोस ने सबसे पहले रेडियो की खोज की, परन्तु आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह इसे व्यावहारिक रूप नहीं दे सके।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 13 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 13 February, 2020
amita kamal

अमिता कमल, आरजे, आकाशवाणी, ज्ञान वाणी एफएम।।

हर दिन कोई न कोई दिवस होता ही है। वर्ष 2012 से पहले रेडियो का कोई दिवस नहीं था, तो इस कमी को पूरा करने की दृष्टि से 20 अक्टूबर 2010 में स्पेनिश रेडियो अकादमी के अनुरोध पर स्पेन ने संयुक्त राष्ट्र में रेडियो को समर्पित विश्व दिवस मनाने के लिए सदस्य देशों का ध्यान आकर्षित किया। जिसे स्वीकार कर लिया गया और संयुक्त राष्ट के शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने पेरिस में आयोजित 36वीं आमसभा में 3 नवंबर 2011 को घोषित किया कि प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी का दिन 'विश्व रेडियो दिवस' के तौर पर मनाया जायेगा।

यह दिन इसलिए चुना गया, क्योंकि इसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ के 'रेडियो यूएनओ' की वर्षगांठ भी होती है। इसी दिन 13 फरवरी 1946 को यह रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ था, उसी की याद में इस दिवस के तौर पर मनाया जाता है। विश्व के सभी देशों के रेडियो प्रसारकों और श्रोताओं को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से शुरू की गई यह पहल अपने उद्देश्यों में सफल रही है।

महान भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीश चंद्र बोस ने सबसे पहले रेडियो की खोज की, परन्तु आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह इसे व्यावहारिक रूप नहीं दे सके। आधुनिक रेडियो की खोज इटली के महान वैज्ञानिक मार्कोनी ने की। उन्होंने रेडियो का अविष्कार किया। मार्कोनी को उनके अविष्कार के लिए वर्ष 1909 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

परन्तु टीवी के आविष्कार के बाद से रेडियो सुनने वाले श्रोताओं में कमी आई है। गांव में इसकी लोकप्रियता वैसी ही है। शायद यही कारण रहा कि माननीय प्रधानमंत्रीजी ने अपने मन की बात पहुंचाने का जरिया रेडियो को ही चुना।

कुछ देशों में रेडियो शिक्षा पहुंचाने का काम करता है। भारत में इसी बात को ध्यान में रखकर वर्ष 2000 में भारत का पहला शैक्षणिक रेडियो स्थापित किया गया। इसका उद्देश्य देश के जन-जन तक शिक्षा का प्रचार प्रसार करना है। इस रेडियो का नाम दिया गया 'ज्ञान वाणी।' ज्ञान वाणी अपने कई कार्यक्रमों के साथ लोगों का मनोरंजन तो कराता ही है, साथ ही शैक्षणिक जानकारी भी अपने श्रोताओं तक पहुंचाता है।

एक सर्वे के अनुसार सबसे ज्यादा रेडियो भारत के किसान और फौजी वर्ग के लोग सुनते हैं। इस बात की प्रमाणिकता उनके द्वारा आये फोन कॉल्स और संदेशों से होती है। यह एक मात्र ऐसा माध्यम है, जिसकी पहुंच अन्य माध्यमों के मुकाबले काफी अधिक है। सरकार को इस सुन्दर माध्यम की ओर ध्यान देना चाहिए।

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'लगता है कि मोदीजी सरकारी कागजी आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं’

समय रहते ध्यान न दिया गया तो अगली बारी उत्तर प्रदेश की है। आज की स्थिति को बचाया नहीं जा सकता।

पूरन डावर by
Published - Monday, 10 February, 2020
Last Modified:
Monday, 10 February, 2020
Narendra Modi

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

भाजपा ने केजरीवाल (आप) को वाकओवर दिया है। सात-सात सांसद होते हुए भी दिल्ली, दिल्ली नेतृत्वविहीन है। एक समय होता था, जब देश के चुनिंदा सांसद दिल्ली से होते थे। बलराज मधोक, मनोहर लाल सोंधी, विजय कुमार मल्होत्रा, डॉ.भाई महावीर जैसे कद्दावर सांसद होते थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी भी दिल्ली से सांसद रहे। मदन लाल खुराना जैसे जुझारू नेता  मुख्यमंत्री रहे।

आखिर क्या कारण है कि आज दिल्ली जैसे प्रदेश या कहें कि देश की राजधानी में किराये के या गायकों/अभिनेताओं को ढूंढा जाता है। दिल्ली के कोर वोट जो पक्के भाजपाई हैं, को छोड़कर भोजपुरी,पूर्वांचल की गायकी से राजनीति हो रही है। अभिनेताओं और दलबदलुओं पर भरोसा किया जाता है। हद तो तब हो जाती है जब देश के कद्दावर नेता, दिल्ली के मूल निवासी, दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे अरुण जेटली (अब दिवंगत) को दिल्ली छोड़कर अमृतसर से लड़ाया जाता है। क्या अच्छा होता कि परिचित कद्दावर चेहरों को दिल्ली से लड़ाया जाता।

दिल्ली की रही सही छवि दिल्ली नगर निगम ने समाप्त कर रखी है, जो देश के सर्वाधिक भ्रष्ट निगमों में से एक है। मोदीजी के नाम पर सांसद तो चुने जा सकते हैं। राज्य एक बार चुने जा सकते हैं, लेकिन दोबारा नहीं। राज्यों को कार्य करना ही होगा। समय रहते ध्यान न दिया गया तो अगली बारी उत्तर प्रदेश की है। आज की स्थिति को बचाया नहीं जा सकता। लगता है कि मोदीजी सरकारी कागजी आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं। शौचालयों से लेकर, PMY आवास, मुद्रा ऋण, बिजली कनेक्शन सभी फ़र्जी आंकड़े हैं। ऐसे ही नसबंदी के आंकड़े अधिकारी संजय गांधी को दिया करते थे।

केंद्रीय मंत्रालयों को छोड़कर बाकी सभी भाजपा राज्यों में भ्रष्टाचार चरम पर है। आम जनता को घोटालों से सीधे अंतर नहीं पड़ता, लेकिन रोजमर्रा में राहत कतई नहीं है। कर विभाग फेसलेस में जाने के कारण आखिरी दिनो में खुलेहाथों से लूट रहे हैं। पर्यावरण लागू करने की प्रभावी नीति न बनाकर दोहन और उद्योगों को बंद किया जा रहा है और बेरोजगारी की समस्या बढ़ रही है।

जो दिखता है, वो बिकता है। उत्तराखंड को स्विट्जरलैंड बनाने की बात हो। जैसे- वॉटरफ़्रंट, गंगा की सफाई हो, अभी कोई दिशा या मॉड्यूल  ही नहीं है। स्मार्ट सिटी का जो हश्र है, समय रहते वास्तविक जामा न पहनाया गया तो केजरीवाल जैसा व्यक्ति आसानी से पछाड़ सकता है दिल्ली के चुनाव परिणाम सबक हैं। वैसे भी भारत की राजनीति संगठन आधारित कम नेतृत्व आधारित है। यहां चुनाव नेहरू जीतते थे, इंदिरा जीतती थीं, मायावती जीतती हैं, मुलायम जीतते हैं और आज मोदीजी जीत रहे हैं।

मोदीजी का नेतृत्व अदित्वीय है, निर्णय अभूतपूर्व है, लेकिन ये संवेदनशील मुद्दे लंबे समय तक तभी कारगर हो सकते हैं कि विकास सड़क पर दिखे। जो दिखता है वो बिकता है। उत्तर प्रदेश 30 जून तक गड्ढा मुक्त...से अधिक वीभत्स उदाहरण हो नहीं सकता। घोषणाएं और दावे नहीं, कार्य होने चाहिए। जब सड़कें गड्ढामुक्त होंगी तो दिव्यांग को भी दिखायी देंगी। उसकी लाठी भी गड्ढे में नहीं जाएगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए, मिस्टर मीडिया!

समाज में हर क्षेत्र के पूर्वजों के प्रति इतनी उदासीनता शायद ही किसी अन्य देश में होगी

राजेश बादल by
Published - Monday, 10 February, 2020
Last Modified:
Monday, 10 February, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने जाने-माने साहित्यकार और चर्चित उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ के लेखक पद्मश्री गिरिराज किशोर के निधन की खबर प्रकाशित की तो उसमें विश्व हिंदू परिषद के गिरिराज किशोर की तस्वीर चस्पा थी। लाखों पाठकों के लिए यह झटका था। क्या इसके पीछे हिंदी के लेखकों को नहीं जानने की कमजोरी है अथवा अखबार के प्रकाशन में देरी न हो, इसलिए जल्दी-जल्दी में क्रॉस चेक करने की अनिवार्यता का नियम टूट गया।

दूसरी बात पर यकीन नहीं किया जा सकता, क्योंकि गिरिराज किशोर का देहांत सुबह साढ़े नौ बजे ही हो गया था और अखबार अगले दिन सुबह ही प्रकाशित होना था। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि छपते-छपते सूचना मिली थी। पहली बात ही सच है कि अखबार के पत्रकार ने लापरवाही की। विडंबना है कि इस तीन कॉलम की खबर में शीर्षक में लिटरेचर की स्पेलिंग भी गलत है। तुर्रा यह है कि अंग्रेजी समाचारपत्रों के पत्रकारों का वेतन हिंदी की तुलना में अधिक होता है।

लेकिन मैं इस आधार पर हिंदी के समाचारपत्रों को भी बरी नहीं कर सकता। हिंदी के अनेक रिसालों ने इसी समाचार के साथ न्याय नहीं किया है। महात्मा गांधी के डेढ़ सौवें साल पूरे होने पर भी इस खबर के साथ अन्याय अफसोसजनक है। महात्मा गांधी पर केंद्रित ‘पहला गिरमिटिया’ उनकी कलम से तीन दशक पहले निकला। उसे साहित्य अकादमी का सम्मान मिला। भारतीय साहित्य और इतिहास में इसे बेजोड़ रचना माना गया। इसके बाद भी हिंदी के पत्रकारों ने गिरिराज जी को यथोचित नहीं दिया। बहुत से लोग तो ऐसे भी होंगे, जिन्हें गिरमिटिया का मतलब ही पता न हो। इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए? समाज में हर क्षेत्र के पूर्वजों के प्रति इतनी उदासीनता शायद ही किसी अन्य देश में होगी।

इसी तरह बरसों पहले बिहार के एक केंद्रीय मंत्री का निधन हुआ तो उनके स्थान पर उसी नाम के अन्य राजनेता की फोटो प्रकाशित हो गई थी। यह परंपरा केवल मुद्रित माध्यम में ही नहीं है। टेलिविजन और डिजिटल माध्यमों में भी इस तरह के कई उदाहरण हैं। टेलिविजन चैनलों में आपसी होड़ के चलते हड़बड़ी स्थाई भाव बन गया है। ऐसा अपराध होता है तो उसे भूल का प्रमाणपत्र दे दिया जाता है। पढ़ने-लिखने की छूटती जा रही आदत भी दूसरा बड़ा कारण है। चैनल संपादक अथवा अखबार संपादक भी अपने सहयोगियों के अल्पज्ञान के लिए जिम्मेदार हैं।  

नहीं भूलना चाहिए कि प्रकाशन के बाद कोई भी रिसाला एक दस्तावेज हो जाता है। अगले दिन के अंक में भूल सुधार या खंडन कितने लोग पढ़ते हैं। आज मेरे पुस्तकालय में आजादी से पहले की अनेक पत्र पत्रिकाएं हैं। इनमें कितनी सूचनाओं में तथ्यात्मक त्रुटियां हैं-कौन जानता है। मगर आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्रामाणिक संदर्भ सामग्री है। इसे ध्यान में रखिए मिस्टर मीडिया!

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चुनाव कवरेज के सारे नियम-संतुलन टूट रहे हैं, मिस्टर मीडिया!

दिल्ली चुनाव में अब लगभग सौ घंटे बचे हैं। डेढ़-दो महीने तक प्रचार की हड़बोंग में इस बार पत्रकारिता की अनेक परंपराएं और नियम टूट गए और आत्म अनुशासन के किले ढह गए

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 04 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 04 February, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

दिल्ली चुनाव में अब लगभग सौ घंटे बचे हैं। डेढ़-दो महीने तक प्रचार की हड़बोंग में इस बार पत्रकारिता की अनेक परंपराएं और नियम टूट गए और आत्म अनुशासन के किले ढह गए। मौजूदा तौर तरीकों को देखकर नहीं लगता कि कभी अखबारों के पन्नों और टेलिविजन के परदे पर समय का मीटर लगाकर कवरेज किया गया होगा।

याद आता है कि समाचार पत्रों में निर्देश जारी होते थे कि किसी विधानसभा क्षेत्र अथवा लोकसभा क्षेत्र का विश्लेषण एक ही उम्मीदवार या पार्टी के ब्यौरे से पूरा नहीं होगा। कम से कम तीन प्रत्याशियों की स्थिति किसी भी संवाददाता की कॉपी में शामिल होगी, तभी उसे जगह मिलेगी। इसी तरह ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जाएगा, जिससे किसी भी उम्मीदवार के हारने या जीतने का संकेत मिले। राजनीतिक दल को दी जाने वाली लाइनें गिन-गिनकर प्रकाशित की जाती थीं।

कमोबेश यही हाल आकाशवाणी का था। पार्टियों के सेकंड गिने जाते थे। बुलेटिन की लाइनें और कॉपी दो-तीन बार चेक होती थी। उसके बाद ही ऑन एयर होती थी। संतुलन का अतिरेक यहां तक होता था कि कई बार मूल खबर का रूप रंग ही बदल जाता। आकाशवाणी के संवाददाता कवरेज के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में जाते तो राजनीतिक दल उन्हें उपकृत करने के लिए खोजते फिरते और संवाददाता बचते फिरते।

उन दिनों चैनल उद्योग स्थापित नहीं हुआ था। केवल दूरदर्शन हुआ करता था। उस दौर में दूरदर्शन की आचार संहिता बड़ी सख्त होती थी। सरकार भी एक तरह से असहाय नजर आती थी। चुनाव आयोग की आचार संहिता लागू होते ही उसे तोड़ने का दुस्साहस तो दूर, पत्रकार और संपादक उससे थर थर कांपते थे। निजी चैनल आए तो उसके बाद भी कई साल तक चुनाव के दिनों में कवरेज शांत, संयत, शालीन और मर्यादित रहता था। मगर आज एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब आचार संहिता की धज्जियां न उड़ाई जाती हों। आयोग बेबस सा दिखाई देता है ।

विडंबना यह है कि पत्रकारिता में अपने विवेक का इस्तेमाल भी जैसे सिकुड़ता जा रहा है। यदि प्रचार अभियान में भाषा का संयम टूटा है और नेता गाली गलौज पर उतर आए हैं तो हम भी उसे दोगुने आवेग के साथ प्रकाशित या प्रसारित करते हैं। यदि कोई आपत्तिजनक दृश्य होता है तो उसे भी परदे पर पेश करने में परहेज नहीं करते।

अक्सर इस तरह के दृश्य सिर्फ पब्लिसिटी का हिस्सा होते हैं और हम उसका शिकार बन जाते हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि देशद्रोही नारे पहचान छिपाए लोग लगाते हैं और टीवी पर वे उस समूह के हिस्से में चले जाते हैं, जिसे उनका विरोधी बदनाम करना चाहता है। असलियत तो यह है कि विरोधी ही ऐसे नारों को प्रायोजित करता है। हम उसकी चाल में आ जाते हैं। उसका षड्यंत्र कामयाब हो जाता है। हम उसके पीछे की मंशा भी नहीं समझ पाते। हमें संयम, विवेक और अक्ल से काम लेना होगा मिस्टर मीडिया!

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‘पार्किंग ओनर के रिस्क पर और रिपोर्टिंग रिपोर्टर के रिस्क पर’

देश के सबसे तेज चैनल की एंकर अंजना ओम कश्यप जब शाहीन बाग पहुंचीं तो शाहीन बाग ने आंचल खोलकर उनका स्वागत किया।

प्रमिला दीक्षित by
Published - Friday, 31 January, 2020
Last Modified:
Friday, 31 January, 2020
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

तालों में नैनीताल बाकी सब तलैया...

बागों में शाहीन बाग बाकी सब हैं बगिया!

प्रश्न-जब एनआरसी है ही नहीं तो आप विरोध क्यूं कर रहे हैं?

उत्तर-ये भगत सिंह का देश है।

देश के सबसे तेज चैनल की एंकर अंजना ओम कश्यप जब शाहीन बाग पहुंचीं तो शाहीन बाग ने आंचल खोलकर उनका स्वागत किया। दस लोग जवाब देने के लिए नियुक्त कर दिए और पांच-छह लोग उनके बगल में खड़े हो गए, जो हर सवाल के जवाब के लिए इशारा करके निर्धारित करते थे कि जवाब कौन देगा।

मजेदार बात ये कि पगड़ीधारी सिख, सफेद लबादे में ईसाई धर्मप्रचारक और गेरुए वस्त्र में एक संत-इस तरह तैनात थे कि शाहीन बाग की इस धर्मनिरपेक्षता पर किसी का भी दिल बाग बाग हो जाए।

सत्रह साल की एक बच्ची से जब कई दफा तर्कों के साथ एंकर ने पूछा- बेटा जब एनआरसी है ही नहीं और सीएए में किसी की नागरिकता नहीं जा रही तो फिर आप किसकी मुखालिफत कर रहे हो? तो बात ‘वो सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में’ टाइप तर्क पर आ गई।

इसलिए तो सीएए समर्थक कह रहे हैं कि अगर ऐसी ही बात है तो सभी का टैक्स शामिल है इसमें, जो घेरी है सड़क वो भी तो किसी के बाप की नहीं है!

कमाल करते हो यार!

सत्रह साल की उस बच्ची से लेकर नब्बे साल की दादी तक की बातों से साफ था, कितने गुमराह कितने अंधेरे में हैं वो कानून को लेकर। एक घंटे के टेलिकास्ट ने साफ कर दिया कि ये धरना-प्रदर्शन महज आशंका पर आधारित धरना है।

बहुत शानदार आजतक! ज्यादा तर्क-वितर्क तो वहां मुमकिन थे नहीं, लेकिन आपने कम से कम लोगों को दिखा दिया कि शाहीन बाग का धरना आशंका का धरना ही है। ज्यादा तर्क-वितर्क से माहौल बिगड़ने की आशंका होते ही अंजना नजारे दिखाने लगतीं कि देखिए दूर-दूर तक, सिर्फ मोबाइल फोन की लाइटें बता रही हैं कि कितने लोग यहां जुटे हैं।

खैर ये अंजना के शो तक ही सीमित रहा। आजतक के ही अंग्रेजी चैनल ने जब मेहमानों के साथ वहां अभिव्यक्ति की आजादी को पर लगाने की कोशिश की तो मेहमानों को सिर पर पैर रखकर भाग खड़े होना पड़ा।

इस्लाम खतरे मे दिखा तो शाहीन बाग एकजुट हो गया और हिंदू खतरे में दिखा तो दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी एकसाथ आ गए। टीआरपी के कलयुग में जब एक रिपोर्टर पिटता है तो दूसरा चैनल सुध तक नहीं लेता। ऐसे में दीपक चौरसिया को अकेले टीआरपी लूटते देख, जी न्यूज का न्यूज नेशन के साथ आना नया प्रयोग बन गया।

शाहीन बाग में सबका स्वागत खुले दिल से हो ऐसा नहीं है। अलग-अलग बैरिकेड और दूरी निर्धारित हैं। जी न्यूज का रिपोर्टर 500 मीटर दूर तक, रिपब्लिक का 800 मीटर और न्यूज नेशन वालों की तो अब दूर से ही नमस्ते है।

एबीपी न्यूज के रिपोर्टर्स के कुदरती खाने वाले विडियो वायरल हैं। जब शाहीन बाग में एक शख्स से पूछा गया कि खाना कहां से आ रहा है, उसने कहा रात में कुदरती आ जाता है। बड़ा दिलचस्प विडियो है। इस विडियो को देखकर प्रसंग संदर्भ समेत व्याख्या की जा सकती है कि जहां तर्क दम तोड़ दें, वहां से रिपोर्ट करना कितना आसान या कितना मुश्किल है।

हालांकि दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी के बाद आजतक और आजतक के बाद रवीश कुमार के बाद एबीपी न्यूज के बाद राहुल कंवल के बाद इंडिया टीवी के सौरव शर्मा के बाद और टीवी भारतवर्ष के बाद एकाध रिपब्लिक भारत या सीएनबीसी आवाज को ही मलाल रह गया होगा कि हाय हुसैन, हम क्यों न हुए शाहीन!

जैसे दिल्ली में पार्किंग ओनर के रिस्क पर होती है। शाहीनबाग में रिपोर्टिंग रिपोर्टर के रिस्क पर। संपादक प्राइम टाइम में टीवी पर बैठकर शाहीन बाग, जामिया या नागरिकता कानून विरोधियों की जितनी लानत-मलानत करते हैं, अगले दिन इन इलाकों की सड़कों पर उनके रिपोर्टर उतनी ही तेजी से दौड़ा लिए जाते हैं!

जी न्यूज के कैमरामैन को जामिया में भीड़ ने घेरकर मारा। दाद देनी होगी रिपोर्टर की जो मौके से भागा नहीं, बल्कि पिटते कैमरामैन को बचाने के लिए हिंसा पर उतारू भीड़ के बीच घुस गया। रिपब्लिक भारत की एक महिला रिपोर्टर को भी दल्ले-दल्ले के नारों के बीच किसी तरह अपनी इज्जत बचाने की जद्दोजहद करते देखा।

वैसे जितनी मारपीट, गालीगलौज, छीनाझपटी जी न्यूज और रिपब्लिक भारत के रिपोर्टर्स के साथ हो रही है, उसका एक दो परसेंट भी एनडीटीवी जैसे किसी चैनल के रिपोर्टर के साथ हुआ होता तो टीवी कितने दिन काला रहता?

खैर.....हम सहिष्णु हैं हम देखेंगे। टीवी जो जो दिखाएगा, हम देखेंगे। बस बांचने की आजादी बनी रहे।

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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पत्रकारिता धर्म भी विकट है। अगर किसी जन आंदोलन का कवरेज छोड़ दिया जाए तो आरोप लगने लगते हैं।

राजेश बादल by
Published - Monday, 27 January, 2020
Last Modified:
Monday, 27 January, 2020
mister-media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कमाल का लोकतांत्रिक विरोध है। धरना, अनशन, प्रदर्शन, रैली और सभाएं सरकार या सिस्टम के प्रति विरोध करने के औपचारिक तरीके हो सकते हैं। गांधी युग से लेकर आज तक इन्हें असहमति की सार्थक शैली माना गया है। लेकिन जब इन आंदोलनों की गाड़ी पटरी से उतर जाए और उसमें हिंसा दाखिल हो जाए तो उस असहमति को नैतिक समर्थन कौन देगा? महात्मा गांधी अपने किसी आंदोलन में हिंसा उभरते देखते थे तो या तो उसे समाप्त कर देते अथवा उससे खुद को अलग कर लेते थे। यही उनकी ताकत थी। इस ताकत को नपुंसक स्वरूप क्यों दिया जाना चाहिए?

पत्रकारिता धर्म भी विकट है। अगर किसी जन आंदोलन का कवरेज छोड़ दिया जाए तो आरोप लगने लगते हैं। अगर कोई पत्रकार आंदोलन स्थल पर जाए और वहां उसकी पिटाई हो, कैमरे छीन लिए जाएं और उसे जान बचाकर वापस आना पड़े तो उस विरोध को कोई जायज नहीं कहेगा। दीपक चौरसिया के साथ जो व्यवहार प्रदर्शनकारियों ने किया, वह इस बात का सबूत है कि वे स्वयं तो अपनी असहमति को व्यक्त करने के सारे हथियार चलाना चाहते हैं, लेकिन पत्रकारिता धर्म पर डटे संवाददाताओं से पार्टी बनकर उनके साथ खड़े होने की अपेक्षा करते हैं। आखि़र वे अपने ऑर्केस्ट्रा से वही धुन क्यों निकलते देखना चाहते हैं, जिसका उपयोग वे सरकार के खिलाफ कर रहे हैं। यह कोई फरमाइशी कार्यक्रम नहीं है कि जो गीत आपको पसंद है, वही पत्रकारिता गाती रहे। मत भूलिए कि सरकार के इसी रवैए का तो आप प्रतिरोध कर रहे हैं कि वह भी अपने पसंद की धुन सुनना चाहती है। तरकश के तीर जब आप आंदोलन में निकालते हैं और धनुर्धर अनाड़ी हो तो तीर उलट कर खुद को ही लगने का खतरा रहता है। गांधीजी उलट कर लगने वाले इसी तीर से बचते थे।

लेकिन दीपक चौरसिया पर आक्रमण के पीछे पत्रकारिता करने वालों के लिए भी एक संदेश छिपा है। आज का समाज पचास साल पहले का समाज नहीं है, जब पत्रकारों की भूमिका और उनके लेखन पर जन मानस की अगाध श्रृद्धा थी। पन्ना और परदा अब किसी पत्रकार की नीयत को छिपाता नहीं है। छपा शब्द और स्क्रीन पर बोले गए लफ्जों का पोचापन अब दर्शक और पाठक पकड़ लेते हैं। अगर मीडिया ऐसी पत्रकारिता करेगा, जिसका रिमोट किसी और के हाथ में होगा तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। अफसोस यह है कि इन दिनों पत्रकारिता में पक्ष और प्रतिपक्ष के खेमे बन गए हैं। दोनों खेमे जंग के मैदान में अपने अपने औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। याद रखिए वे औजार आप चलाएं या सामने वाला खेमा- नुकसान तो पत्रकारिता का ही होगा। चाकू तरबूजे पर गिरे या तरबूजा चाकू पर- कटेगा तो तरबूजा ही मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

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मिस्टर मीडिया: साल भर जहरीली सांसें छोड़ता रहा मीडिया!

मिस्टर मीडिया: समय का संकेत नहीं समझने का है ये नतीजा

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सलिल सरोज का बड़ा सवाल, क्या वीर सपूतों ने इसी आशा में खून बहाया था?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि गणतंत्र लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा किया जाने वाला शासन है अर्थात अंत:रूप में जनता ही सर्वोपरि होती है

Last Modified:
Monday, 20 January, 2020
Salil Saroj

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि गणतंत्र लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा किया जाने वाला शासन है अर्थात अंत:रूप में जनता ही सर्वोपरि होती है। जिस शासक को शासन करने के लिए चुना जाता है, वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके तानाशह न बन जाए,इसलिए उसको चुनने और उसको हटाने की सारी संभावनाओं को जनता के हाथ में सौंपा गया है। अब्राहम लिंकन ने यह कथन अमेरिका के सन्दर्भ में जरूर कहा था, लेकिन दुनिया के तमाम देशों ने कतिपय इसी रूप में इसे अपनाया है । भारत और अमेरिका के बीच भाषा,संस्कृति,समाज समेत और भी कई तरह की असमानताएं हैं, लेकिन अमेरिका और भारत दोनों ही गणतंत्र की मजबूत नींव को पकड़कर आगे बढ़ रहे हैं और दूसरे राष्ट्रों को भी गणतंत्र होने के लिए सम्बल प्रदान कर रहे हैं।

भारतीय गणतंत्र को अभी आठ दशक से भी कम समय हुआ है, लेकिन इस समय अवधि में भारत के कई पड़ोसी मुल्क जैसे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान, म्यांमार धार्मिक हिंसा, तानाशाही, जातीय नरसंहार या वंशवाद से अभिशप्त हो गए, लेकिन भारत एक जिम्मेदार गणतंत्र के रूप में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता ही चला गया। आखिर भारत ने भी इंग्लैंड से ही प्रेरित गणतंत्र को अपनाया, लेकिन किस तरह अपनाया कि यह विश्व के सबसे विशाल और सुदृढ़ गणतंत्र के रूप में परिणत हुआ, यह अवश्य जानकारी का विषय है। इसे बनाने में हमारे पूर्वजों और स्वतंत्रता सेनानियों ने किन बातों का ध्यान रखा, इसका अध्ययन परम आवश्यक है।

सन् 1929 के दिसंबर में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वायत्तयोपनिवेश (डोमीनियन) का पद नहीं प्रदान करेगी, जिसके तहत भारत ब्रिटिश साम्राज्य में ही स्वशासित इकाई बन जाता, तो भारत अपने को पूर्णतः स्वतंत्र घोषित कर देगा। 26 जनवरी 1930 तक जब अंग्रेज सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।

इसके पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। भारत के आजाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। संविधान निर्माण में कुल 22 समितियां थीं, जिनमें प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) सबसे प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण समिति थी और इस समिति का कार्य संपूर्ण ‘संविधान लिखना’ या ‘निर्माण करना’ था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष विधिवेत्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। प्रारूप समिति ने और उसमें विशेष रूप से डॉ. आंबेडकर ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में भारतीय संविधान का निर्माण किया और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान सुपुर्द किया। इसलिए 26 नवम्बर को भारत में संविधान दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है।

संविधान सभा ने संविधान निर्माण के समय कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के 308 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की दो हस्तलिखित कॉपियों पर हस्ताक्षर किये। इसके दो दिन बाद संविधान 26 जनवरी को यह देश भर में लागू हो गया। 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए इसी दिन संविधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई।

भारत अपार संभावनाओं से परिपूर्ण राष्ट्र है और इसकी सबसे बड़ी शक्ति है इसकी विभिन्नता। यहां हर तरह के लोगों ने इस देश को विश्व में एक मुकम्मल गणतंत्र बनने में मदद की है। यह जमीन गौतम बुद्ध,महावीर,गुरु नानक,भीकाजी कामा,हेनरी लुइस विवियन दरोज़ीयो, महात्मा गांधी, वीर कुंवर सिंह, भगत सिंह, मौलाना अबुल कलाम, खां अब्दुल गफ्फार खां के द्वारा पाली और पोसी गई है। इसकी हवाओं में अनेकता में एकता का राग घुला है और हर विषम परिस्थिति में यह चीज रामबाण की तरह साबित हुई है। चाहे वह 1971 का पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध हो,चाहे भूख से निजात पाने की कोशिश हो,चाहे उत्तर पूर्व में अपनी अस्मिता को बचाने की चाह हो, चाहे बारिश से डूबते हुए चेन्नई और मुंबई की जनता की जान बचाने की गुहार हो या फिर निर्भया को इन्साफ दिलाने की अदम्य इच्छाशक्ति हो,हर बार हर जाति,धर्म,लिंग,प्रान्त,समुदाय के लोगों ने मिलकर यह जिम्मा उठाया है।

‘यूनान,मिश्र,रोमां सब मिट गए जहां से
बाकी मगर है फिर भी नामों-निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा।।

आजादी के 73 सालों में हम खाद्य सम्पन्न राष्ट्र बने और दूसरे देशों को आज भुखमरी से निजात दिलाने में मदद कर रहे हैं। आज हम विश्व में इसरो जैसे संस्था के पुरोधा है दूसरे देशों के कृत्रिम उपग्रह छोड़ने में मदद पहुंचा रहे हैं। पूरे विश्व के लिए हम सबसे युवा और सस्ता वर्क फोर्स दे रहे हैं और पूरी दुनिया भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर टेक्निशियंस का लोहा मानती है। पूरे विश्व में एम्स, आईआईएम, आईआईटी ने भारत को एक ब्रैंड के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अपनी कार्यशैली में बेहतरीन हैं। हमारी साक्षरता दर लगभग आजादी के समय की तिगुनी हो गई है। लोगों के जीवन स्तर में आमूल परिवर्तन हुआ है। हम प्राकृतिक संसाधन से परिपूर्ण राष्ट्र बन कर उभरे है। हम सबसे कम ऊष्मा उत्सर्जन और सबसे अधिक वन संरक्षण करने वालों देशों में शामिल होते हैं। दक्षिण अमेरिका,अफ्रीका,एशिया सहित हम विश्व के तमाम फोरम पर आज अगुवाई कर रहे हैं। जिस राष्ट्र की कल्पना महान देशप्रेमियों ने की थी, उसकी तरफ इंच दर इंच बढ़ते जा रहे हैं। परन्तु क्या यह सब आत्ममुग्धता के सिवाय कुछ भी नहीं है!

‘कहां तो तय था चिरागां हर घर के लिए,
पर आज रोशनी मयस्सर नहीं पूरे शहर के लिए।’

इतनी तरक्कियों के वाबजूद एक बहुत बड़ा भाग हर रात खाली पेट फुटपाथों पर सोने को बाध्य है। जवान पढ़े-लिखे बच्चे अपनी काबिलियत के अनुसार काम पाने को भटक रहे हैं। देश के कुछ समुदाय डर के साये में जीने को विवश हैं। स्वास्थ्य के नाम पर सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। सरकारी नियमों के नाम पर जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है। वोट के नाम पर हर तरह के दुराचार फैलाए जा रहे है। 70 साल बाद भी चुनाव का मुद्दा रोटी,कपड़ा और मकान ही दिखता है। औरतों के प्रति बढ़ती हिंसा के कारण देश की राजधानी दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ की संज्ञा तक दे दी गई है। हमारे जल,जंगल,जमीन,हवा सब प्रदूषित हो चुके हैं। हम आज भी बाह्य आडम्बर से ज्यादा दूर नहीं निकल पाए हैं और रोज किसी ढोंगी साधु के पकड़े जाने की खबर पढ़ते हैं। हमारे बुजुर्ग एकाकी जीवन बिताने को संघर्षरत हैं। बच्चियां आज भी अपने हक के लिए बिलख रही हैं। हमारे अच्छे फल, फूल, सब्जी, कपड़े, पानी, पेट्रोल सब दूसरे राष्ट्र को निर्यात किए जाते हैं और हम अपने देश में ही द्वितीय नागरिक की तरह खराब और बचे-खुचे हुए सामान पाने की कतार में खड़े हैं। तो आखिर हम हैं कहां? क्या इस दिन के सपने देखे गए थे? क्या हमारे वीर सपूतों ने इसी आशा में खून बहाया था?

‘उतरा कहां स्वराज, बोल दिल्ली तू क्या कहती है
तू तो रानी बन गई,वेदना जनता क्यों सह्ती है
किसने किसके भाग्य दबा रखे हैं अपने कर में
उतरी थी जो विभा वन्दिनी,बोल हुई किस घर में’

एक गणतंत्र के रूप में हमने जितना हासिल किया है, अभी उससे ज्यादा हासिल करना बाकी है। राष्ट्र का निर्माण केवल गगनचुंबी मीनारों से नहीं होता, बल्कि देश के हर नागरिक की चाहतों की पूर्ति से होता है। हर एक को खुश रख पाना किसी के लिए सम्भव नहीं, लेकिन गणतंत्र संख्या का खेल है। यदि अधिकतम जनसंख्या की बातों को लेकर एक सहमति बनाई जा सकती है तो वास्तविकता में वही गणतंत्र की जीत है। सरकार हर तौर पर कई फैसले ले रही है, जो जनता की भलाई और इस राष्ट्र के उत्थान के लिए हैं। जनता को अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करना चाहिए।

‘हम ने बहुत सोच-समझ और देख-भाल के रखा है
अपने सीने में हमने गणतंत्र को पाल के रखा है।’

परिस्थितियां कितनी भी कठिन रही हों, भारतीय गणतंत्र ध्रुव तारे की तरह अटल रहा है। इसकी शास्वतता का कारण लोगों के दिलों में इस तंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास है। जब तक यह विश्वास बना रह्ता है, इसको कोई भी हिला नहीं सकता। इस विश्वास को बनाए रखने की जिम्मेदारी सरकार और जनता दोनों की है और इसका मूल मंत्र बस एक है-

‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,
हम बुलबुले हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा।’

(लेखक लोकसभा सचिवालय में कार्यकारी अधिकारी हैं)

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अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

इस कॉलम के जरिये मैंने कई बार इसका इजहार किया कि अब मीडिया को अपनी आचार संहिता तैयार करने का समय आ गया है

राजेश बादल by
Published - Monday, 20 January, 2020
Last Modified:
Monday, 20 January, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

तो वही हुआ,जिसका डर था। पत्रकारिता के तमाम रूपों में बढ़ रही गैर जिम्मेदारी चिंता में डालती थी। इस कॉलम के जरिये मैंने कई बार इसका इजहार किया कि अब मीडिया को अपनी आचार संहिता तैयार करने का समय आ गया है। अब भी अगर न चेते तो फिर विस्फोटक स्थिति बन जाएगी। बयालीस साल के पत्रकारिता जीवन में मैंने पाया कि आचार संहिता बनाने पर विचार तो हुआ, लेकिन अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। सब यह भी कहते रहे कि यह काम सरकार की ओर से नहीं होना चाहिए। सरकारी आचार संहिता एक किस्म की सेंसरशिप ही होती है।सरकार को आपकी नब्ज पर हाथ रखने का अवसर मिल जाता है।

अब केंद्र सरकार के चार मंत्रालय-सूचना और प्रसारण, आईटी, क़ानून और गृह मंत्रालय सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश बना रहे हैं। इनके आकार लेने के साथ ही पत्रकारिता के इस ताकतवर प्लेटफॉर्म पर सरकारी निगरानी बढ़ जाएगी। सूचना प्रसारण विभाग  पेशेवर पत्रकारिता के कान पकड़ेगा तो आईटी उसके हाथ-पैर काटने में सक्षम होगा। कानून मंत्रालय इस पत्रकारिता को कोर्ट के चक्कर लगवाएगा और गृह मंत्रालय अंत में आपका खात्मा कर देगा। इस तरह से भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले अंग ने जानबूझकर खुद को सरकारी हिरासत में सौंप दिया है।

वैसे तो मामला 2012 में ही शुरू हो गया था, जब चुनाव आयोग से निर्देश मिलने के बाद केंद्र सरकार ने अपने दिशा निर्देश तैयार कर लिए थे। भारी विरोध के मद्देनजर यह टलता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट बीच में आ गया तो 15 जनवरी तक केंद्र सरकार को इन्हें बना लेना था। अब इस महीने के अंतिम सप्ताह में एक तरह से यह आचार संहिता सर्वोच्च अदालत को सौंप दी जाएगी ।

आजादी के बहत्तर साल बाद भी अगर भारतीय पत्रकारिता का यह चेहरा है तो विनम्रता से निवेदन करना चाहता हूं कि हमने अपने घर को ठीक करने पर ध्यान नहीं दिया है। खतरे की घंटियां तो कब से बज रही थीं, हम ही उनकी अनदेखी करते रहे। इस लापरवाही और अक्षम्य कृत्य का फायदा कोई भी सरकार क्यों नहीं उठाना चाहेगी? अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए। फिर भी कहूंगा कि सोशल मीडिया के अलावा टीवी और प्रिंट पत्रकारिता पर लटकी तलवार की चिंता कर लीजिए मिस्टर मीडिया!

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