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मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?
मीडिया और अवाम अपने कंधों का इस्तेमाल न होने दे तो ही इस तरह की स्थिति पर कुछ लगाम लग सकती है
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े चौंकाते हैं। तीन राज्यों में खबरों की जालसाजी 73 फीसदी। देश भर में फेक न्यूज के 257 मामले दर्ज हुए। इनमें 138 मध्य प्रदेश में, 32 उत्तर प्रदेश में और 18 केरल में पंजीकृत किए गए। सत्रह राज्यों में कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। अर्थात ये राज्य दूध से धुले हैं।
इस कारोबार से क्या किसी को पैसा मिलता है? अगर उत्तर नहीं में है तो फिर इन खबरों का लाभ क्या है और इसे कौन करता है? मेरी समझ से इसका फायदा सिर्फ़ दो श्रेणी के लोगों को हो सकता है। एक तो राजनेता और दूसरे समाज को भटकाने या बांटने वाले लोग। सियासी शतरंज पर चालें चलने वाले इससे अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करते हैं। अपने महिमा मंडन को नए-नए रूपों में पेश करते हैं। अपना वोट बैंक सुरक्षित रखने के लिए सामाजिक समरसता और सदभाव के समीकरण बिगाड़ने पड़ते हैं। इसका अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि समाज के कुछ वर्गों का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए हो रहा है। सामाजिक सदभाव और सौहार्द्र को आघात पहुंचाने वाली फेक खबरें प्रसारित हो रही हैं तो उससे केवल राजनेता लाभान्वित होते हैं या फिर शत्रुदेश।
प्रश्न यह है कि इस कारोबार में कौन लिप्त हैं? क्या वे भी पत्रकार हैं? फर्जी खबरों का काम कपड़ा कारोबारी नहीं करता। कोई हलवाई नहीं करता। कोई जूता बनाने वाली कंपनी नहीं करती। टीवी या फर्नीचर तैयार करने वाले लोग यह काम नहीं करते। किसी डॉक्टर की इसमें दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही कोई बैंकर इसमें शामिल हो सकता है। कम्प्यूटर व्यवसायी नहीं कर सकते और न ही इंजीनियर इसमें लगे हुए हैं। संकेत साफ़ है कि राजनेता ही परदे के पीछे होते हैं और इस काम में वे पत्रकारों की मदद भी लेते हैं। कुछेक स्तर पर बेरोजगार भी इसमें योगदान करते हैं। उन्हें कुछ पारिश्रमिक मिल जाता है।
आपको याद होगा कि लोकसभा चुनाव से पहले बंगाल के एक जिले में एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने पूछताछ में बताया था कि उसने करीब एक हजार वॉट्सऐप समूह बनाए हैं। अब कोई सामाजिक संवाद के लिए एक हजार समूह क्यों बनाएगा? मध्यप्रदेश के गांव-गांव में वॉट्सऐप समूह बनाए गए हैं। इनकी संख्या हजारों में है। एक फेक न्यूज फैलाने में एक मिनट भी नहीं लगता। यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?
समाधान क्या है? बाड़ ही खेत को खाने लग जाए तो उस खेत की रक्षा कौन करेगा? भारतीय दंड विधान में संशोधन करके उसे अधिक सख्त बनाया जाना चाहिए। उसे गैरजमानती होना चाहिए और अपराध सिद्ध होने पर कम से कम दस साल की कैद का प्रावधान होना चाहिए। लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? फेक न्यूज से अगर सियासी नफा होता है तो सख्त कानून बनाने वालों का अंतरिक्ष से आयात तो नहीं हो सकता। मीडिया और अवाम अपने कंधों का इस्तेमाल न होने दें तो ही कुछ लगाम लग सकती है। यह बात ध्यान देने की है मिस्टर मीडिया!
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