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सिर्फ नाम के ही नहीं, बल्कि जीते-जागते ‘विनोद’ थे विनोद दुआ जी: कमर वहीद नकवी

वह 1991 का जून का महीना था, जब विनोद जी से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। तब तक वह खासे मशहूर और सेलिब्रिटी एंकर बन चुके थे। तीन दिनों तक मैं उनके साथ रहा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार।।

वह 1991 का जून का महीना था, जब विनोद जी से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। तब तक वह खासे मशहूर और सेलिब्रिटी एंकर बन चुके थे। तीन दिनों तक मैं उनके साथ रहा। 'बहुत बड़ा आदमी' होने की कोई रत्ती भर भी हनक उनमें नहीं दिखी। हुआ यूं कि ‘एनडीटीवी‘ को ‘दूरदर्शन‘ पर दसवीं लोकसभा की मतगणना का तीन दिनों तक लगातार सीधा प्रसारण करना था। उन दिनों वोट बैलट पेपर पर डाले जाते थे और लोकसभा चुनाव के वोटों की गिनती पूरी होने में तीन दिन लग जाया करते थे। प्रणय रॉय और विनोद दुआ इस शो के एंकर थे। विनोद जी हिंदी की एंकरिंग का जिम्मा संभाल रहे थे और मुझे उनके लिए हिंदी में इनपुट और रिसर्च का काम करना था।

टीवी पत्रकारिता के भारी-भरकम तामझाम, लकदक स्टूडियो, स्क्रीन पर कुलाँचे भरते ग्राफिक्स की चकाचौंध से यह मेरा पहला सामना था। मैं था निपट हिंदीभाषी और मेरे चारों तरफ पूरी की पूरी टीम फर्राटेदार अंग्रेजी वाली। विनोद जी ने शायद पहली ही नजर में मेरी परेशानी भांप ली और फिर इस बात का पूरा ख्याल रखा कि मैं कोई परेशानी महसूस न करूं, यहां तक कि यह भी उनकी चिंता में शामिल होता कि मैंने ठीक से नाश्ता कर लिया या नहीं।

विनोद जी बहुत बड़े पत्रकार तो थे ही, बहुत बड़े इंसान भी थे। वह नाम के ही विनोद नहीं थे, बल्कि जीते-जागते विनोद थे। उनसे दो मिनट की भी बातचीत हो, तो आप हंसे-मुस्कराए बिना लौट ही नहीं सकते। गजब की हाजिरजवाबी और उनकी चुटकियों की गजब की धार। अपने चार दशक से ज्यादा के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने राजनीति की हर परत उधेड़ी, हर राजनीतिक दल, हर सरकार और हर बड़े नेता को अपने तीखे सवालों के कटघरे में खड़ा किया। उनके सवाल बड़े तीखे और चुटीले होते थे, ठीक निशाने पर जाकर लगते थे, लेकिन सवाल बड़ी मिठास से पूछे जाते थे, चुटकियां लेते हुए, मुस्कराते हुए। लेकिन, कभी किसी ने विनोद दुआ की पत्रकारीय ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, कभी किसी ने यह लांछन नहीं लगाया कि वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं या इस या उस पार्टी के साथ पक्षपात करते हैं या किसी को जानबूझ कर बदनाम करते हैं। दुर्भाग्य है कि अभी हाल के एक-दो बरसों में उन पर देशद्रोह तक के फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए।

अगर मैं कहूं कि विनोद दुआ हिंदी में टीवी पत्रकारिता के जनक थे, तो शायद अतिश्योक्ति न होगी। उनके कार्यक्रम 'जनवाणी' और उसके बाद 'परख' ने हिंदी के असंख्य पत्रकारों को टीवी रिपोर्टिंग और एंकरिंग का ककहरा सिखाया और देश के दूरदराज हिस्सों तक से टीवी पत्रकारों की बिलकुल नई पौध तैयार हुई। भारत में रंगीन टीवी तो 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों के साथ ही शुरू हुआ था और जब 1985 में विनोद जी के कार्यक्रम 'जनवाणी' में केंद्र सरकार के मंत्रियों को सीधे जनता के सवालों का जवाब देना पड़ा, वह देखना अपने आप में अद्भुत था, वह भी एक सरकारी समाचार माध्यम पर! आज तो बहुतेरे प्राइवेट चैनलों पर ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते! 1992 में उनके साप्ताहिक कार्यक्रम 'परख' में देश के कोने-कोने से आनेवाली टीवी रिपोर्ट्स तो बड़ी ही चर्चित रहीं।

विनोद जी टीवी पत्रकारिता के एक ऐसे प्रकाशस्तंभ थे, जिन्होंने अपने समय की पूरी की पूरी पीढ़ी के पथ को अपनी पत्रकारीय विश्वसनीयता, दायित्व-बोध, बेबाकी, और आचरण की शालीनता जैसे मूल्यों से सदा आलोकित किया। सादर नमन।


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