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‘मीडिया में यह ट्रेंड मुझे आने वाले समय में और बढ़ता नजर आ रहा है’
साल 2022 खबरों के लिहाज से कई मायनों में अलग रहा और नए रास्ते भी बनाता दिखा। वैसे तो हर साल ही क्यों, हर दिन खबरों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago
जयंती रंगनाथन।।
सुनिए, देखिए, पढ़िए सब, पर यकीं कीजिए प्रिंट पर
साल 2022 खबरों के लिहाज से कई मायनों में अलग रहा और नए रास्ते भी बनाता दिखा। वैसे तो हर साल ही क्यों, हर दिन खबरों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। पर पिछले कुछ सालों से तेजी से तकनीक खबरों को एक नया चेहरा देती नजर आ रही है। अपने तीन दशक के मीडिया करियर में तकनीक के हर नए बदलावों के साथ मैं यह सुनती आ रही हूं कि प्रिंट मीडिया ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाला। लेकिन साथ में यह भी देखा और पाया कि प्रिंट मीडिया ही है, जिसका प्रचार और प्रसार तेजी से बढ़ा।
पिछले कुछ सालों की बात करें तो कोरोना महामारी की शुरुआत के बाद जब प्रिंट मीडिया पर आफत का साया उभर आया, लोगों ने घरों में अखबार लेने बंद कर दिए। बेहद सहजता और सरलता से ऑनलाइन की तरफ मुड़ गए। उन दिनों एकबारगी लगा कि क्या अब खबरों को नए तरह से पढ़ा, सुना व देखा जाएगा?
यह भी सच है कि स्मार्ट फोन के चलते अब हर पल आपको खबरें मिलती हैं। तुरंत। लेकिन क्या यह काफी है? अगर न्यूज चैनल्स पर 24 घंटे खबर चलने और ऑनलाइन हर क्षण खबरें मिलने के बावजूद प्रिंट मीडिया महामारी को झेलकर अपने पुराने आंकड़ों के करीब लौट आया है, तो इसकी मुख्य वजह यही है कि आज भी हम और हमारे जैसे कई-कई लोग मानते हैं कि यकीन तो प्रिंट मीडिया पर ही करना है।
न्यूज चैनल्स में खबरों से ज्यादा बहसबाजी और चिल्लमचिल्ली है। ऑनलाइन में सबसे आगे रहने की आपाधापी। अगर आप ऐसे व्यक्ति हैं, जो किसी तरह की दौड़ में शामिल नहीं हैं, तो आज भी प्रिंट मीडिया यानी समाचार पत्र ही खबर देने का ऐसा जरिया हैं, जो स्तरीय और यकीन करने योग्य हैं।
इस जाते हुए साल में इस बात की पुष्टि भी हुई है कि खबरों को सुनने-समझने पढ़ने के लिए अब कोई एक चैनल नहीं है। इस साल सोशल मीडिया भी खबरों को लेकर अपनी भूमिका निभाता नजर आया। यहां हर किसी के पास खबर बनाने और कहने के लिए मंच है। हर कोई अपनी तरफ से कुछ न कुछ कह रहा है। पर इस पर कितना यकीं करें, यह विवादास्पद है। एक पूरी पीढ़ी है, जो खबरों को पढ़ने के बजाय सुनना या देखना चाहती है। उनके लिए खबरों की सत्यता उतनी महत्वपूर्ण शायद अब नहीं रह गई। दुनिया भर में यह ट्रेंड देखा जा रहा है। खबरिया चैनल और अखबार भी फेक न्यूज से बुरी तरह जूझते नजर आ रहे हैं। यह ट्रेंड मुझे आने वाले समय में बढ़ता नजर आ रहा है।
क्या इससे डरने की जरूरत है? मेरे ख्याल से नहीं। खबरों को सेंसेशनलाइज यानी सनसनीखेज बनाने की हमारी आदत है। हम ऐसे देश में रहते हैं, जहां खबरें बनाना और सुनाना हमारे ‘डीएनए’ में है। ये बात कभी खत्म नहीं होगी। हम चौबीस घंटे के हजार न्यूज चैनल्स पचा लेंगे, उतनी ही संख्या में ऑनलाइन खबरिया पोर्टल भी। लेकिन इन सब तंत्रों के काम करने के बावजूद सुबह-सवेरे के अखबार जो खबर, एनालिसिस और आंकड़े लाएंगे, उन पर यकीन अधिक होगा। इस साल के कई सर्वे इस बात की पुष्टि करते हैं।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और ’हिन्दुस्तान' में एग्जिक्यूटिव एडिटर हैं।)
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