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‘कोविड की चुनौतियों के बीच अडिग रहा देश का मीडिया, बखूबी निभाया अपना उत्तरदायित्व’

वर्ष 2020 की शुरुआत में जब वुहान, चाइना से आती महामारी की खबरों को अखबारों में लिखा व टीवी चैनल्स में दिखाया जा रहा था तो इसे अधिकांश लोगों ने सामान्य खबर ही समझा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

ब्रजेश मिश्रा।।

वर्ष 2020 की शुरुआत में जब वुहान, चाइना से आती महामारी की खबरों को अखबारों में लिखा व टीवी चैनल्स में दिखाया जा रहा था तो इसे अधिकांश लोगों ने सामान्य खबर ही समझा। लेकिन, समय बीतने के साथ बढ़ती विभीषिका ने सबको स्तब्ध कर दिया और वो दिन भी आ गया, जिसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।

24 मार्च 2020 को बढ़ते कोरोना संक्रमण को देखते हुए सरकार ने जब  पूरे देश में तीन हफ्ते के लॉकडाउन की घोषणा की तो पूरे देश की गतिविधिया तो रुक गईं, लेकिन पत्रकारिता के लिए नई चुनौतियों ने जन्म लिया। पत्रकारिता के क्षेत्र में किए जा रहे अधिकतर कार्य फील्ड के हैं, जिनमें रिपोर्टर, कैमरामैन, सीनियर व जूनियर ब्यूरो सभी लगातार बाहर रहकर काम करते हैं। जितना काम इन-ऑफिस है, उससे कहीं ज्यादा फील्ड का है। अब ऐसे में काम कैसे हो, जबकि बाहर निकलना भी मुश्किल और पत्रकारिता की मौलिक नैतिकता को देखें तो खबरें देना भी जरूरी। एक पत्रकार का ये नैतिक कर्तव्य है कि वो जनता तक सही खबर पहुंचाएं और ऐसे समय जितना हो सके, लोगों की मदद भी करे।

कोरोना संक्रमण के शुरुआती समय में दुनियाभर की मीडिया से जो जानकारी मिल रही थी, वो और भी चिंताजनक थी, क्योंकि बीमारी के बारे में किसी के पास कोई सटीक जानकारी या अनुमान नहीं था। ऐसे में भारतीय मीडिया उन खबरों को कितनी प्राथमिकता दे, ये तय कर पाना मुश्किल था, क्योंकि एक गलत या बढ़ा-चढ़ाकर लिखी गई खबर का लोगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की ज्यादा आशंका थी। साथ ही, सोशल मीडिया पर अनेक खबरें भी चल रही थीं, जिनमें बिना किसी प्रमाण के कोरोना के इलाज या फिर लोगों की मृत्यु के बारे में बताया जा रहा था।

ऐसे में एक पत्रकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि जो भी लिखा या बताया जाए, वो पूरी तरह से सत्य हो। सभी रिपोर्टर्स को विशेष सावधानी बरतते हुए काम करने को कहा गया और लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों और डिजिटल कंटेंट पर नजर रखी जा रही थी। सरकार अतिरिक्त संवेदनशीलता के साथ काम कर रही थी। केंद्र से लेकर राज्य और जिला स्तर तक संबंधित अधिकारियों द्वारा कोविड के बारे में समय-समय पर अपडेट दिए जा रहे थे। दूसरे राज्य या शहरों में  काम करने गए मजदूरों ने अपने घरों की ओर चलना शुरू किया तो उनसे जुडी अनेक खबरें आनी शुरू हुईं।

कोई मां अपने बच्चे को एक बैग पर लिटाकर खींचकर ले जा रही थी तो कहीं एक अल्पवयस्क बेटी अपने बीमार पिता को साइकिल पर लेकर जा रही थी। कहीं किसी राज्य के बॉर्डर पर एकत्रित हुई भीड़ को प्रवेश करने से नियंत्रित किया जा रहा था तो कहीं सुनसान पड़े नेशनल हाईवे पर रात-दिन लोग पैदल चलते जा रहे थे। ये सब खबरें ऐसी थीं, जो किसी को भी बेचैन कर दे। जब ऐसी खबरें न्यूज रूम आना शुरू हुईं तो उनको प्रसारित करना एक मीडिया संस्थान व पत्रकार का नैतिक धर्म था, जिसका पालन करते हुए खबरों को लिखना-दिखाना शुरू किया गया, जो कि लगातार जारी रहा।

दुनिया भर में कोई भी देश इस महामारी का सामना करने के लिए पहले से तैयार नहीं था। विकसित देशों में बढ़ते कोरोना संक्रमण और ध्वस्त होती चिकित्सा सुविधाओं की खबरें जब ‘द गार्डियन’ और ‘डेली टेलीग्राफ’ से दी जाने लगीं तो इन खबरों को भारतीय पत्रकारों द्वारा भी कवर करना जरूरी हो गया। डर के उस माहौल में, जहां हम विकसित देशों की मेडिकल फैसिलिटी से बहुत पीछे थे, इस महामारी का सामना कैसे करेंगे, सबके लिए चिंता का विषय था।

इन खबरों को जब भारतीय मीडिया ने कवर किया तो उससे सरकार और प्रशासन के कामों में तेजी देखने को मिली और पत्रकारों के इस प्रयास ने पॉजिटिव प्रेशर डेवलप करने का काम किया। इसका परिणाम ये रहा कि कई मौकों पर प्रशासन और मीडिया के लोगों ने मिलजुलकर ऐसे रिलीफ वर्क किए, जिन्हें सामान्य स्थिति में करना संभव नहीं था। इन सब के बीच कई बार ऐसा भी हुआ, जब पत्रकारों को प्रशसनिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। इसमें उन पर ये आरोप भी लगे कि वे खबर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हैं। लेकिन, सामान्य लोगों की पीड़ा देखकर कोई पत्रकार अपने उत्तरदायित्व बोध से कैसे विचलित हो सकता था?

ऐसे में प्रशासन और पत्रकारों के बीच का संघर्ष भी होता रहा, लेकिन जो भी था उसके परिणाम उत्तरोत्तर सकारात्मक ही निकले। इन प्रयासों से लाखों जिंदगियां बचाई जा सकीं और लोगों तक समय रहते सूचना का त्वरित प्रवाह हुआ। हमारे डॉक्टर्स, मेडिकल स्टाफ ने उल्लेखनीय काम किए और उनके इन कार्यो को आगे पॉजिटिव न्यूज के रूप में पत्रकार बंधुओं द्वारा प्रसारित किया गया। इनसे अनेक लोग, संस्थाएं सामने आईं और उन्होंने भी इस कठिन समय में अपना अमूल्य योगदान दिया। 

मार्च 2021 के अंत में जब कोविड के एक नए डेल्टा वेरिएंट का पता चला तो यह अंदाजा लगाया गया कि अब ये असर नहीं करेगा, क्योंकि पहली लहर के बाद अधिकतर जनसंख्या में इम्युनिटी विकसित हो चुकी है। इस समय भारत में जनवरी में कोविड की वैक्सीन सामान्य लोगों को देना शुरू किया जा चुका था। लेकिन, इन सब आकलनों से अलग डेल्टा वेरिएंट ने बहुत तेजी से फैलना शुरू किया और अप्रैल में सरकार को फिर से लॉकडाउन लगाना पड़ा।

इस बार बीमार होने वालों की संख्या बहुत ज्यादा थी। अस्पतालों में बेड नहीं थे और जो मरीज भर्ती थे, उनके लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति का सप्लाई पैदा हो गया। चारों तरफ लोग ऑक्सीजन सिलिंडर और कॉन्सेंट्रेटर के लिए परेशान हो रहे थे। ऐसे में पत्रकारों को एक नए संघर्ष से गुजरना पड़ा, जबकि पत्रकारिता भी करनी थी और लोगों की मदद भी करनी थी। कई मीडिया संस्थानों और पत्रकारों ने इस समय आगे बढ़कर लोगों की मदद की। इस विभीषिका की रिपोर्टिंग जब की जा रही थी, तब उसके फोटो, वीडियो और खबरें दिल दहला देने वाली थीं।

लेकिन, इन खबरों ने लोगों को वास्तविकता से अवगत कराया, जो कि जरूरी था। क्यूंकि जब किसी समस्या को छुपाकर या दबाकर हल नहीं किया जा सकता है तो फिर किसी खबर को दबाए रखने या प्रकाशित/प्रसारित न करने का कोई औचित्य नहीं बनता। जो भी वास्तविकता हो, उसे जानने का हक डेमोक्रेसी में सभी को है। अगर चीन के परिपेक्ष्य में देखें तो अगर कोविड की खबरों को छुपाया या दबाया न होता तो शायद इस महामारी को बहुत पहले ही नियंत्रित कर लिया गया होता।

इस महामारी के समय अनेक मीडियाकर्मियों ने फील्ड में काम करते हुए अपनी जान गंवा दी। वह पत्रकारिता जगत की अमूल्य धरोहर थे। वे  इस कठिन समय भी काम कर रहे थे, क्यूंकि उनका उद्देश्य लोगों को सही खबर देना था। वे किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं थे। वे तो सत्य के साथ खड़े थे और उसी के निर्वहन में उन्होंने अपनी जान तक कुर्बान कर दी। अनगिनत कठिनाइयों के बीच काम करना, सत्ता या प्रशासन से सीधे सवाल जबाब करना किसी पत्रकार का व्यक्तिगत मामला नहीं है। वह तो सत्य के उस शीर्ष को पाने की कोशिश करता है, जिसके लिए उसकी कलम प्रतिबद्ध है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ’भारत समाचार' के एडिटर-इन-चीफ हैं।)


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