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‘उम्मीद है कि भारत में मीडिया के इतिहास पर जब कभी चर्चा होगी, ये सवाल जरूर उठेगा’

न्यूज चैनल्स पर होने वाली टेलिविजन डिबेट किसी की जिंदगी भी बर्बाद कर सकती हैं, ये हमने साल 2022 में देखा। मुझे लगता है कि मीडिया के माथे पर लगा ये कलंक साल की सबसे बड़ी खबर है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

अशोक श्रीवास्तव।।

न्यूज चैनल्स पर होने वाली टेलिविजन डिबेट किसी की जिंदगी भी बर्बाद कर सकती हैं, ये हमने साल 2022 में देखा। मुझे लगता है कि मीडिया के माथे पर लगा ये कलंक साल की सबसे बड़ी खबर है। कल तक नूपुर शर्मा भाजपा की एक उभरती हुई तेजतर्रार प्रवक्ता थीं, प्रतिभाशाली वकील थीं, लेकिन आज वो कहीं नहीं हैं। एक न्यूज चैनल की डिबेट में तस्लीम रहमानी के आपत्तिजनक बयान पर नूपुर शर्मा ने जो कुछ कहा उसने उनके करियर के साथ-साथ उनकी सुरक्षा पर भी जिंदगी भर के लिए सवालिया निशान लग गया है।

सुरक्षा के लिहाज से अब वह सार्वजनिक जीवन में कहीं नजर नहीं आतीं। ये हालत कभी बदलेंगे, दुर्भाग्य से इसकी उम्मीद किसी को नहीं है। हालांकि ये बहस भी हर रोज टीवी चैनल्स पर होने वालीं दर्जनों डिबेट्स की तरह इतिहास के पन्नों में दबकर रह जाती, लेकिन ये ‘श्रेय’ भी एक कथित मीडियाकर्मी (कृपया ‘कथित’ कहने का दोष मुझे न दें, यहां मैं जिनका जिक्र कर रहा हूं, वे स्वयं भी कहीं खुद को पत्रकार बताने के मौन समर्थक हो जाते हैं तो कहीं खुलकर खुद को मीडियाकर्मी मानने से इनकार कर देते हैं) को ही जाता है कि उसने इस डिबेट्स के कुछ हिस्से इस तरह से वायरल किए कि न सिर्फ नूपुर शर्मा की जिंदगी दांव पर लग गई बल्कि भारत में रातों रातों एक ‘सर तन से जुदा’ गैंग खड़ा हो गया और जिसने नफरत से भरे नारे ही नहीं लगाए बल्कि एक गरीब टेलर मास्टर सहित कुछ सरों को तन से जुदा भी कर दिया।

क्या इन सारी हत्याओं का जिम्मेदार मीडिया है? साल 2022 में तो कभी इस पर बहस नहीं हुई पर मैं उम्मीद करता हूं कि भारत में मीडिया के इतिहास पर जब कभी चर्चा होगी तो देर सबेर ये सवाल जरूर उठेगा। इस घटना से इतर बात करूं तो साल के शुरू में भारतीय मीडिया यूपी चुनावों में उलझा रहा तो साल के अंत में गुजरात चुनावों में। अब क्यूंकि भारत में हर साल एक या दो ‘सेमीफाइनल’ होते ही रहते हैं तो मीडिया भी उसमें रमे रहना खूब सीख गया है।

इसी साल एक चैनल भी बिक गया, जिसने कुछ लोगों को फिर से ‘डर‘ का माहौल बनाने का मौका दे दिया कि भारत में पत्रकारिता अब तो बस खत्म हो ही गई। ये तो अच्छा हुआ कि साल खत्म होने से पहले-पहले चैनल के संस्थापक ने बयान जारी करके स्पष्ट कर दिया कि रचनात्मक बातचीत के बाद पूरा ‘लेन-देन’ हुआ। खैर, जो हुआ सो हुआ...पर पत्रकारिता जिंदा है। साल 2023 में पत्रकारिता भी चलती रहेगी, ‘लेन-देन’ भी चलता रहेगा और एजेंडा कुछ ज्यादा रफ्तार से चलेगा..देखते रहिये।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ’डीडी न्यूज' में सीनियर कंसल्टिंग एडिटर हैं।)


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