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'2022 में बहुत अच्छे नहीं रहे मीडिया के हालात, चुनौतियों के साथ उम्मीदों का साल होगा 2023'
मैं दरअसल रुदन में बहुत अधिक विश्वास नहीं रखता हूं कि हालात बहुत खराब रहे। लेकिन मीडिया के हालात सचमुच धीरे-धीरे बहुत आशाजनक नहीं रहे हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago
अकु श्रीवास्तव।।
मैं दरअसल रुदन में बहुत अधिक विश्वास नहीं रखता हूं कि हालात बहुत खराब रहे। लेकिन मीडिया के हालात सचमुच धीरे-धीरे बहुत आशाजनक नहीं रहे हैं। खासकर 2022 की बात करें तो कोरोनाकाल खत्म होने की आहट के बीच में ऐसा लग रहा था कि स्थितियां बहुत तेजी से सामान्य होंगी, जो हुई नहीं। इस वजह से मीडिया पर बहुत सारे दबाव रहे हैं। सबसे बड़ा दबाव जो आने वाले दिनों में देखने में आ रहा है कि भारतीय अखबारों की स्थिति खराब रहने के हालात हैं।
चूंकि बदलाव का दौर चल रहा है। इस दौर में तमाम मुश्किलें सामने आने वाली हैं। इनका अहसास अभी से शुरू हो गया है। हमारे यहां ज्यादातर अखबार विज्ञापन पर आश्रित होते हैं। इस साल तो ऐसा हुआ है कि अखबारी कागज 80-85 रुपये प्रति किलो तक बिका है। यह स्थिति अपने आप में बहुत डराने वाली थी। अखबारी कागज की बढ़ती कीमतों को देखते हुए धीरे-धीरे अखबार में पन्नों की संख्या कम की गई, कंटेंट कम किया गया और कोशिश की गई कि अखबार में कम से कम पेज रखे जाएं।
हालांकि, अब धीरे-धीरे थोड़ी सी सामान्य स्थिति हुई है। लेकिन इससे पहले स्थितियां बहुत खराब रही हैं और इस वजह से जो अखबार के साथ में होता है कि उसकी बैलेंसशीट देखी जाती है, उसकी लाभ-हानि देखी जाती है, जो अखबार को चलाए रखने के लिए बहुत जरूरी भी है, तो वह संकट अभी बहुत बड़ा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, न्यू मीडिया और वेबसाइट्स के पास तो किसी तरह पैसा जा रहा है, लेकिन प्रिंट मीडिया के पास बहुत कम पैसा बचा है, जिससे काम चलना नहीं है। लेकिन ये मजबूरी है, क्योंकि तमाम विज्ञापनदाताओं को चल रहा है कि उन प्लेटफॉर्म्स की रीच यानी पहुंच ज्यादा है, इसलिए वे उस तरफ जा रहे हैं।
अंग्रेजी अखबार भी धीरे-धीरे सर्कुलेशन में कम हुए, लेकिन उन्होंने अपनी क्रेडिबिलिटी बनाए रखी है। कुछ अखबारों ने अभी भी सच्ची और निर्भीक पत्रकारिता की ज्वाला जलाए रखी है। हिंदी में भी कुछ ऐसे अखबार हैं। हिंदी के अखबारों के अस्तित्व पर संकट तब तक नहीं है, जब तक देश में इंफ्रॉस्ट्रक्चर बहुत मजबूत नहीं हो जाता है। यहां इंफ्रॉस्ट्रक्चर से मेरा आशय कम्युनिकेशन और कम्युनिकेशन के विस्तार से है और वह जैसे-जैसे बढ़ेगा, अखबार का असर कम होगा, लेकिन उसमें अभी बहुत समय लगेगा।
प्रादेशिक अखबार और हिंदी के ज्यादातर अखबार अभी चलते रहेंगे, लेकिन अंग्रेजी के अखबारों में गिरावट रुकने के आसार अभी मुझे नहीं दिख रहे हैं। वर्ष 2023 में मीडिया से तमाम उम्मीदें हैं। स्वतंत्र मीडिया ज्यादा बड़ा काम कर रहा है, ज्यादा अच्छे से काम कर रहा है। इसके साथ-साथ ये दुर्भाग्य हो रहा है कि देश में दो खेमे बंट गए हैं। ये एक बड़ा और खतरनाक परिवर्तन हो रहा है। खतरनाक इसलिए कि आपको किसी न किसी एक का पक्ष लेना पड़ेगा।
बीच के ऐसे लोग, जो खरी बात कह सकें। दोनों की आलोचना कर सकें, उन्हें अब कहीं जगह नहीं मिल रही है। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी दिक्कत है। सरकार कोई अच्छा काम करे तो उसकी सराहना की जानी चाहिए और यदि कुछ गलत करे तो उसे भी उठाना चाहिए। ऐसा ही विपक्ष के मामले में भी होना चाहिए। लेकिन, किसी न किसी एक का पक्ष लेने की मजबूरी तो रहेगी ही रहेगी। हालांकि, मैं इसके बावजूद मुद्दों के साथ खड़े रहना ज्यादा पसंद करूंगा।
नए साल की चुनौती की बात करें तो निष्पक्ष रहना ही सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि, निष्पक्ष रहना काफी मुश्किल काम हो जाएगा। फिर भी नए साल से काफी उम्मीदें हैं, क्योंकि नए रास्ते खुल रहे हैं, नया मीडिया आ रहा है। उसके खतरे भी हैं, लेकिन उसके लाभ ज्यादा हैं। स्वतंत्र मीडिया यदि बनी रहती है, हालांकि यह काफी मुश्किल है, लेकिन यदि ऐसा होता है और इस दिशा में रास्ते खुलते हैं तो शायद स्थिति सुधरेगी। फिर भी नए साल में कुछ अच्छी बातें सोचिए। कोरोना न आए, कोरोना का आतंक न आए और उससे हम प्रभावित न हों, ये ज्यादा बड़ी चीज है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक 'पंजाब केसरी' और 'नवोदय टाइम्स' के कार्यकारी संपादक हैं।)
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