अंग्रेजी के वरिष्ठ पत्रकारों ने कुछ यूं दी विनोद दुआ को श्रद्धांजलि

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। अंग्रेजी के तमाम बड़े पत्रकारों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना की। 

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
VinodDua32659

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। अंग्रेजी के तमाम बड़े पत्रकारों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति व शोकाकुल परिवार को इस दुःख की घड़ी को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है। 

‘एनडीटीवी’ (NDTV) के फाउंडर्स-प्रमोटर्स डॉ. प्रणॉय रॉय ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया है, ‘विनोद दुआ को खोने का काफी गहरा दुख है। वह न सिर्फ महान लोगों में शामिल थे, बल्कि अपने समय की सबसे महान शख्सियत थे। वह सबसे बड़ी एक अद्भुत प्रतिभा थे, जिसकी मैंने हमेशा प्रशंसा की और सम्मान किया और जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। हमने साथ मिलकर कई साल काम किया। अलविदा मेरे दोस्त, भगवान आपको अपने श्रीचरणों में स्थान दें।’

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया है। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ‘विनोद दुआ जैसी स्वभाविक टीवी पर्सनेलिटी कोई नहीं है। वह ट्रेंड स्थापित करने वाले पत्रकार थे, जिन्होंने पॉलिटिक्स, फूड, म्यूजिक आदि पर समान रूप से बेहतरीन कार्यक्रम पेश किए। 80-90 के दशक में दुआ-रॉय की इलेक्शन जुगलबंदी काफी खास थी। दूरदर्शन पर आम चुनाव को लेकर उनकी लाइव कवरेज कमाल की थी। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।’ 

जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और लेखक वीर सांघवी ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्विटर पर लिखा है, ‘देश में टेलीविजन न्यूज के अग्रणी और शायद हमारे समय के सबसे महान टीवी प्रजेंटर विनोद दुआ के निधन से काफी दुखी हूं।’ पहली बार जब मैं टीवी पर आया तो विनोद जी एंकर थे और मैंने उनकी स्वाभाविक और खास स्टाइल की प्रशंसा की, जिसे आने वाले दशकों में हममें से कोई भी मैच नहीं कर सका। उनका निधन अपूरणीय क्षति है।

न्यूज एजेंसी ‘एएनआई’ (ANI) की एडिटर स्मिता प्रकाश ने ट्वीट किया है, 'अलविदा विनोद, तुम और चिन्ना वहां अपने गानों और व्यवहार से भगवान को भी अपना बना लोगे।’

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, ‘वैमनस्यता रोको। विनोद दुआ पर आज के घटिया ट्वीट्स उतने ही निंदनीय हैं, जितने रोहित सरदाना के निधन पर किए गए थे।’

वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज एंकर स्मिता शर्मा ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए अपने ट्वीट में लिखा है, ‘पत्रकारों की पीढ़ियों के वह प्रेरणास्रोत थे। हमें आईबीएन7 में कुछ साल तक साथी एंकर के रूप में काम करने का सौभाग्य मिला। हमें उनके साथ फूड, म्यूजिक, कला, आर्ट और उनके रोमांचक सफर के बारे में बात करना काफी अच्छा लगता था। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। विनोद दुआ आप अनंत में चिन्ना जी के साथ जाकर मिल गए हैं। आपको हाथ जोड़कर नमन।‘

बता दें कि करीब 67 साल के विनोद दुआ पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। हालत ज्यादा गंभीर होने पर उन्हें दिल्ली के अपोलो अस्पताल में आईसीयू (ICU) में भर्ती कराया गया था, जहां पर शनिवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। विनोद दुआ का अंतिम संस्कार रविवार दोपहर 12 बजे लोधी रोड श्मशान घाट में किया जाएगा।

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‘सच कमाल! तुम बहुत याद आओगे’

कमाल खान अब नहीं है। भरोसा नहीं होता। दुनिया से जाने का भी एक तरीका होता है। यह तो बिल्कुल भी नहीं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 15 January, 2022
Last Modified:
Saturday, 15 January, 2022
Kamal Khan Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

मैं पूछता हूं तुझसे, बोल माँ वसुंधरे,

तू अनमोल रत्न लीलती है किसलिए?

कमाल खान अब नहीं है। भरोसा नहीं होता। दुनिया से जाने का भी एक तरीका होता है। यह तो बिल्कुल भी नहीं। जब से खबर मिली है, तब से उसका शालीन, मुस्कुराता और पारदर्शी चेहरा आंखों के सामने से नहीं हट रहा। कैसे स्वीकार करूं कि पैंतीस बरस पुराना रिश्ता टूट चुका है। रूचि ने इस हादसे को कैसे बर्दाश्त किया होगा, जब हम लोग ही सदमे से उबर नहीं पा रहे हैं। यह सोचकर ही दिल बैठा जा रहा है। मुझसे तीन बरस छोटे थे, लेकिन सरोकारों के नजरिये से बहुत ऊंचे। 

पहली मुलाकात कमाल के नाम से हुई थी, जब रूचि ने जयपुर नवभारत टाइम्स ने मेरे मातहत बतौर प्रशिक्षु पत्रकार जॉइन किया था। मैं वहां मुख्य उप संपादक था। अंग्रेजी की कोई भी कॉपी दो, रूचि की कलम से फटाफट अनुवाद की हुई साफ सुथरी कॉपी मिलती थी। मगर, कभी-कभी वह बेहद परेशान दिखती थी। टीम का कोई सदस्य तनाव में हो तो यह टीम लीडर की नजर से छुप नहीं सकता। कुछ दिन तक वह बेहद व्यथित दिखाई दे रही थी। एक दिन मुझसे नहीं रहा गया। मैंने पूछा, उसने टाल दिया। मैं पूछता रहा, वह टालती रही।

एक दिन लंच के दरम्यान मैंने उससे तनिक क्षुब्ध होकर कहा, ‘रूचि! मेरी टीम का कोई सदस्य लगातार किसी उलझन में रहे, यह ठीक नहीं। उससे काम पर उल्टा असर पड़ता है।‘ उस दिन उसने पहली बार कमाल का नाम लिया। कमाल नवभारत टाइम्स, लखनऊ में थे। दोनों विवाह करना चाहते थे। कुछ बाधाएं थीं। उनके चलते भविष्य की आशंकाएं रूचि को मथती रही होंगी। एक और उलझन थी। मैंने अपनी ओर से उस समस्या के हल में थोड़ी सहायता भी की। वक्त गुजरता रहा।

रूचि भी कमाल की थी। कभी अचानक बेहद खुश तो कभी गुमसुम। मेरे लिए वह छोटी बहन जैसी थी। पहली बार उसी ने कमाल से मिलवाया। मैं उसकी पसंद की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। मैंने कहा,  तुम दोनों के साथ हूं। अकेला मत समझना। फिर मेरा जयपुर छूट गया। कुछ समय बाद दोनों ने ब्याह रचा लिया। अक्सर रूचि और कमाल से फोन पर बात हो जाती थी। दोनों बहुत खुश थे। 

इसी बीच विनोद दुआ का दूरदर्शन के साथ साप्ताहिक न्यूज पत्रिका परख प्रारंभ करने का अनुबंध हुआ। यह देश की पहली टीवी समाचार पत्रिका थी। हम लोग टीम बना रहे थे। कुछ समय वरिष्ठ पत्रकार दीपक गिडवानी ने परख के लिए उत्तर प्रदेश से काम किया। अयोध्या में बाबरी प्रसंग के समय दीपक ही वहां थे। कुछ एपिसोड प्रसारित हुए थे कि दीपक का कोई दूसरा स्थाई अनुबंध हो गया और हम लोग उत्तर प्रदेश से नए संवाददाता को खोजने लगे।

विनोद दुआ ने यह जिम्मेदारी मुझे सौंपी। मुझे रूचि की याद आई। मैंने उसे फोन किया। उसने कमाल से बात की और कमाल ने मुझसे। संभवतया तब तक कमाल ने एनडीटीवी के संग रिश्ता बना लिया था। चूंकि परख साप्ताहिक कार्यक्रम था, इसलिए रूचि गृहस्थी संभालते हुए भी रिपोर्टिंग कर सकती थी। कमाल ने भी उसे भरपूर सहयोग दिया। यह अदभुत युगल था। दोनों के बीच केमिस्ट्री भी कमाल की थी। बाद में जब उसने इंडिया टीवी जॉइन किया तो कभी-कभी फोन पर दोनों से दिलचस्प वार्तालाप हुआ करता था।

एक ही खबर के लिए दोनों संग-संग जा रहे हैं। टीवी पत्रकारिता में शायद यह पहली जोड़ी थी, जो साथ-साथ रिपोर्टिंग करती थी। जब भी लखनऊ जाना हुआ, कमाल के घर से बिना भोजन किए नहीं लौटा। दोनों ने अपने घर की सजावट बेहद सुरुचिपूर्ण ढंग से की थी। दोनों की रुचियां भी कमाल की थीं. एक जैसी पसंद वाली ऐसी कोई दूसरी जोड़ी मैंने नहीं देखी। जब मैं आजतक चैनल का सेट्रल इंडिया का संपादक था, तो अक्सर उत्तर प्रदेश या अन्य प्रदेशों में चुनाव की रिपोर्टिंग के दौरान उनसे मुलाकात हो जाती थी।

कमाल की तरह विनम्र,शालीन और पढ़ने लिखने वाला पत्रकार आजकल देखने को नहीं मिलता। कमाल की भाषा भी कमाल की थी। वाणी से शब्द फूल की तरह झरते थे। इसका अर्थ यह नहीं था कि वह राजनीतिक रिपोर्टिंग में नरमी बरतता था। उसकी शैली में उसके नाम का असर था। वह मुलायम लफ्जों की सख्ती को अपने विशिष्ट अंदाज में परोसता था। सुनने देखने वाले के सीधे दिल में उतर जाती थी।

आजादी से पहले पद्य पत्रकारिता हमारे देशभक्तों ने की थी। लेकिन, आजादी के बाद पद्य पत्रकारिता के इतिहास पर जब भी लिखा जाएगा तो उसमें कमाल भी एक नाम होगा। किसी भी गंभीर मसले का निचोड़ एक शेर या कविता में कह देना उसके बाएं हाथ का काम था। कभी-कभी आधी रात को उसका फोन किसी शेर, शायर या कविता के बारे में कुछ जानने के लिए आ जाता। फिर अदबी चर्चा शुरू हो जाती। यह कमाल की बात थी कि रूचि ने मुझे कमाल से मिलवाया, लेकिन बाद में रूचि से कम, कमाल से अधिक संवाद होने लगा था।

कमाल के व्यक्तित्व में एक खास बात और थी। जब परदे पर प्रकट होता तो सौ फीसदी ईमानदारी और पवित्रता के साथ। हमारे पेशे से सूफी परंपरा का कोई रिश्ता नहीं है, लेकिन कमाल पत्रकारिता में सूफी संत होने का सुबूत था। वह राम की बात करे या रहीम की, अयोध्या की बात करे या मक्क़ा की, कभी किसी को ऐतराज नहीं हुआ। वह हमारे सम्प्रदाय का कबीर था।

सच कमाल! तुम बहुत याद आओगे। आजकल, पत्रकारिता में जिस तरह के कठोर दबाव आ रहे हैं, उनको तुम्हारा मासूम रुई के फाहे जैसा नरम दिल शायद नहीं सह पाया। पेशे के ये दबाव तीस बरस से हम देखते आ रहे हैं। दिनों दिन यह बड़ी क्रूरता के साथ विकराल होते जा रहे हैं। छप्पन साल की उमर में सदी के संपादक राजेंद्र माथुर चले गए। उनचास की उमर में टीवी पत्रकारिता के महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एसपी चले गए। असमय अप्पन को जाते देखा, अजय चौधरी को जाते देखा, दोनों उम्र में मुझसे कम थे। साठ पार करते-करते कमाल ने भी विदाई ले ली। अब हम लोग भी कतार में हैं। क्या करें? मनहूस घड़ियों में अपनों का जाना देख रहे हैं। याद रखना दोस्त। जब ऊपर आएं तो पहचान लेना। कुछ उम्दा शेर लेकर आऊंगा। कुछ सुनूंगा, कुछ सुनाऊंगा। महफिल जमेगी।

अलविदा कमाल!

हम सबकी ओर से श्रद्धांजलि।

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न्यूज चैनल्स की रेटिंग जारी करने के फैसले को लेकर डॉ. अनुराग बत्रा ने उठाए ये बड़े सवाल

करीब एक साल पूर्व रेटिंग्स को लेकर विवाद उठने के बाद न्यूज जॉनर की रेटिंग्स को निलंबित (suspend) कर दिया गया था। तब से क्या बदल गया है? अब क्या बदलने की जरूरत है?

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 13 January, 2022
Last Modified:
Thursday, 13 January, 2022
DrAnnuragBatra

डॉ. अनुराग बत्रा।।

आज लोहड़ी है और यह काफी शुभ दिन है। इस शुभ दिन पर सरकार ने टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) को तत्काल प्रभाव से न्यूज व्युअरशिप डेटा जारी करने का निर्देश दिया है। BARC की साइट और होमपेज पर लिखा गया है, पारदर्शी, सटीक, समावेशी, टीवी दर्शकों की माप प्रणाली (transparent, accurate, inclusive, TV audience measurement system)।

16 दिसंबर को सरकारी अधिकारियों के साथ एक बैठक में BARC के सीईओ नकुल चोपड़ा ने मंत्रालय से एजेंसी को और समय देने पर विचार करने के लिए कहा था। उनका कहना था कि BARC अपने सभी हितधारकों (stakeholders) को बोर्ड में लाना चाहती है और न्यूज रेटिंग्स को फिर से शुरू करने के लिए 10 सप्ताह का समय चाहिए। सवाल यह उठता है कि सरकार ने उस अनुरोध के बावजूद यह निर्णय क्यों लिया और BARC को जल्द से जल्द टीआरपी फिर से शुरू करने का निर्देश दिया?

BARC के चेयरमैन ‘जी’ के पुनीत गोयनका हैं। BARC के बोर्ड में ‘सोनी‘ के एनपी सिंह, ‘प्रसार भारती‘ के सीईओ शशि शेखर वेम्पती, ‘स्टार और डिज्नी इंडिया‘ के के. माधवन, ‘प्रॉक्टर एंड गैंबल‘ के पूर्व सीएमडी भरत पटेल, ‘गोदरेज‘ के सुनील कटारिया, ‘इंडिया टुडे ग्रुप‘ की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी, ‘मलयाला मनोरमा‘ के जयंत मैथ्यू, ‘Publicis Groupe‘ की अनुप्रिया आचार्य और ‘आईपीजी ब्रैंड्स‘ के शशि सिन्हा के साथ-साथ इंडस्ट्री के दिग्गज नकुल चोपड़ा इसमें सीईओ हैं। उन्होंने सुनील लुल्ला से यह बागडोर संभाली है।

सवाल यह है कि जब BARC ने 16 दिसंबर की बैठक में और समय मांगा था, तो केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने 12 जनवरी को तत्काल प्रभाव से BARC को न्यूज रेटिंग्स को फिर से शुरू करने का निर्देश देने का फैसला कैसे किया? इसके साथ ही मासिक प्रारूप (monthly format) में इस जॉनर के लिए पिछले तीन महीने का डेटा भी जारी करने के लिए कहा गया है। इसके साथ ही मंत्रालय ने टीआरपी सेवाओं के उपयोग के लिए रिटर्न पाथ डेटा (आरपीडी) क्षमताओं का लाभ उठाने के लिए प्रसार भारती के सीईओ की अध्यक्षता में एक 'वर्किंग ग्रुप' (Working Group) भी गठित किया है।

करीब एक साल पूर्व रेटिंग्स को लेकर विवाद उठने के बाद न्यूज जॉनर की रेटिंग्स को निलंबित (suspend) कर दिया गया था। तब से क्या बदल गया है? अब क्या बदलने की जरूरत है? सवाल यह है कि अब न्यूज रेटिंग्स फिर से शुरू करने की जल्दबाजी क्यों? यह किसकी मदद करता है? मोटे तौर पर BARC में पांच हितधारक न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, नॉन-न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, एडवर्टाइजर्स, व्युअर्स और एक तरह से सरकार शामिल है।

भले ही इस जानकारी की पुष्टि नहीं की जा सकती है, लेकिन यह एक ऐसा निर्णय था, जो एक दिन में लिया गया था और ऊपर से निर्देश के तौर पर इसे जल्दी से लागू किया जाना था। क्या यह सरकार द्वारा अगले 30 दिनों में उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे प्रमुख राज्यों में होने वाले चुनावों के कारण लिया गया राजनीतिक निर्णय है? न्यूज रेटिंग्स को जल्द से जल्द फिर से शुरू करना है या नहीं, इस पर ब्रॉडकास्टर्स के बीच एक अनकही भिन्नता थी। ऐसा लगता है कि रेटिंग्स को वापस पाने का विचार प्रबल हो गया है।

न्यूज चैनल्स पर कंटेंट की गुणवत्ता पिछले एक साल में व्यापक रूप से अपरिवर्तित रही है। यह स्थापित प्रोग्रामिंग फार्मूलों और परीक्षण किए गए साधनों पर जारी थी। हालांकि, कोई भी पूरे विश्वास के साथ कह सकता है कि कंटेंट में तीखापन कम हो गया था। कंटेंट पहले से बेहतर हो गया था, क्योंकि रेटिंग्स का पीछा करना अब एकमात्र उद्देश्य नहीं रह गया था। विज्ञापन की दरें मोटे तौर पर पिछले प्रदर्शन और ब्रैंड की ताकत व ऐतिहासिक डेटा के आधार पर काफी सुरक्षित थीं।

क्या इस नए डेवलपमेंट से न्यूज चैनल्स पहले की तरह एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करेंगे और कंटेंट को अधिक तीखा व अधिक विभाजनकारी बनाएंगे? वास्तव में पूर्व के सूचना एवं प्रसारण मंत्रियों ने न्यूज चैनल्स के लिए टीआरपी या रेटिंग्स न होने की वकालत की है। न्यूज चैनल्स के कंटेंट में सुधार के लिए ‘रामबाण’ के रूप में पूर्व में इसकी वकालत की गई है। 

क्या न्यूज चैनल्स पर कंटेंट एंकर्स और प्रवक्ताओं के लिए हंगामेदार, तीखा और अजीब सा होगा? क्या हर तरह से राय का ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दे न्यूज कवरेज पर हावी होंगे?

एक दशक से अधिक समय पहले मेरे साथ बातचीत में बाबा रामदेव ने कहा था कि टीआरपी ‘तत्कालीन राष्ट्र पतन' (देश का विनाश) है। ऐसा लगता है कि उनका पूर्वानुमान गलत नहीं था। 

प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए खतरे की स्टोरी पिछले चार दिनों में दम तोड़ चुकी है। क्या यह मान लेना उचित है कि स्टोरी प्रसारित होने के दौरान रेटिंग्स निर्धारित की गई। क्या यह स्टोरी कम से कम एक सप्ताह या 10 दिनों में खत्म हो जाती? इसके बजाय उत्तर प्रदेश में विधायकों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) छोड़ने की स्टोरी अब लगभग सभी न्यूज चैनल्स पर प्रसारित की जा रही है। क्या यह पुरानी पृथा को वापस पाने का एक तरीका है? क्या यह मीडिया को फिर से विभाजित करने और उस पर और अधिक प्रभावी ढंग से शासन करने का एक तरीका है?

दो अन्य बिंदु हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।  पहला सरकारी निर्देश की वैधता है। मैं कहना चाहूंगा कि यह BARC पर एक तरह से बाध्यकारी है। 2006 के ‘ट्राई’ के दिशानिर्देशों के अनुसार और 2008 में लागू और स्वीकृत, रेटिंग एजेंसी या एजेंसियों को सरकार मान्यता देगी और BARC एमआईबी से रेटिंग का लाइसेंस धारक है। हालांकि, BARC इसे चुनौती दे सकता है, और अगर वह ऐसा करता है, तो उसे एमआईबी की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस का जवाब देना होगा। यदि BARC ने ऐसा किया, तो वह दो महीने या उससे भी अधिक समय तक खरीद सकता है लेकिन BARC ऐसा नहीं करना चाहेगा। BARC को मुद्रा और उसके अस्तित्व की चिंता करनी होगी।

हालांकि दूसरी बात यह है कि BARC बोर्ड और सीईओ संभवत: सूचना प्रसारण मंत्रालय के इस आदेश से बहुत खुश होंगे,  क्योंकि BARC का राजस्व और बकाया राशि उसकी चिंता का कारण था।

अब न्यूज रेटिंग्स के वापस आने के साथ ब्रॉडकास्टर्स को पिछले बकाया के साथ-साथ वर्तमान रेटिंग्स के लिए शुल्क का भुगतान करना होगा। BARC इस आदेश से खुश हो सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि उसने सूचना प्रसारण मंत्रालय से आदेश प्राप्त करने के लिए BARC बोर्ड के सदस्यों के प्रभाव का भी इस्तेमाल किया हो। यह स्पष्ट रूप से BARC और सरकार दोनों के लिए फायदे का सौदा है।

अगले 30 दिनों के लिए खासतौर से न्यूज चैनल्स और सामान्य रूप से डिजिटल चैनल्स के लिए राजनीतिक दलों का बजट काफी ज्यादा है, क्या इस कदम से राजनीतिक दलों के नेताओं को न्यूज चैनल्स से बेहतर सौदेबाजी करने में भी मदद मिलेगी?

वास्तव में ये काफी विचारणीय और तीखे सवाल हैं।

(लेखक ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं।)

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प्रचार अभियान में पत्रकारिता के लिए इन खतरों को ध्यान में रखना जरूरी है मिस्टर मीडिया!

विधानसभा चुनावों के लिए पांच प्रदेशों में प्रचार का आगाज हो चुका है। लेकिन, चुनाव आयोग ने रैलियों,रोड शो और सभाओं पर पंद्रह तक रोक बढ़ाई है।

राजेश बादल by
Published - Monday, 10 January, 2022
Last Modified:
Monday, 10 January, 2022
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

विधानसभा चुनावों के लिए पांच प्रदेशों में प्रचार का आगाज हो चुका है। लेकिन, चुनाव आयोग ने रैलियों,रोड शो और सभाओं पर पंद्रह तक रोक बढ़ाई है। जैसी कि स्वास्थ्य एजेंसियां गंभीर चेतावनी दे रही हैं, उससे लगता है कि एक सप्ताह के भीतर कोरोना की तीसरी लहर का भारी प्रकोप देखने को मिलेगा। ऐसे में चुनाव आयोग के सामने प्रचार पर बंदिशें मतगणना तक लगाने में भी कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।

इन स्थितियों के कारण भारतीय पत्रकारिता के सामने निर्वाचन कवरेज में अनेक नई चुनौतियां सामने आ गई हैं। यह सच है कि उसे रैलियों, सभाओं, रोड शो और बड़े नेताओं के आगे-पीछे दिन रात नहीं भागना पड़ेगा और धन, समय, शक्ति और ऊर्जा की भी बचत पत्रकार तथा प्रबंधन कर सकेंगे। मगर प्रचार अभियान के वर्चुअल और डिजिटल तरीकों में परदे के पीछे अनेक गंभीर संदेश छिपे हैं। पत्रकारिता के लिए इन खतरों को ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि उसके सामने भी आज तक कभी इतनी असाधारण नौबत नहीं आई है।

अव्वल तो यह है कि समूचा प्रचार अब एक मोबाइल फोन में सिमट कर रह जाएगा। इंटरनेट, वर्चुअल रैली, वॉट्सऐप, फेसबुक, सामान्य संदेश, मेल संदेश, यू ट्यूब, इंस्टाग्राम और ट्विटर अब मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने का बड़ा स्रोत होंगे। वॉट्सऐप, ट्विटर, फेसबुक और यू ट्यूब तो पहले ही ‘सड़ांध’ फैलाने के लिए बदनाम थे। जिस तरह गालीगलौज, जहर बुझे नफरती तीरों का आदान-प्रदान तथा सांप्रदायिक तनाव भड़काने का काम सोशल मीडिया के ये अवतार कर रहे थे, उससे मतदाता पहले ही त्रस्त थे। अब प्रचार मुहिम के दरम्यान जब इन ‘विषाक्त हथियारों‘ का इस्तेमाल होगा तो पत्रकारिता को मोहरा बनाए जाने का अंदेशा बढ़ गया है। उसके कंधे से बंदूक चलाने की साजिशें राजनीतिक पार्टियां कर सकती हैं ।

पत्रकारों और संपादकों को इन माध्यमों से प्राप्त जानकारी का उपयोग बहुत सावधानी से और क्रॉस चेक करके ही करना होगा। अधिकांश सूचनाएं रद्दी की टोकरी में फेंकना उचित है। स्पष्ट है कि सोशल मीडिया पर डाली जाने वाली जानकारियां अनुबंधों, पैसों, गंदे और अश्लील तथ्यों तथा चरित्र हनन का घालमेल होगा, जिनका न चुनाव आयोग संज्ञान ले सकेगा और न ही संबंधित दल उसका कभी खंडन करेगा। नया आईटी एक्ट भी इस मामले में बहुत कारगर साबित नहीं होगा, क्योंकि जो दल इन माध्यमों का दुरुपयोग करेंगे, उनमें सत्तारूढ़ पार्टी भी है। इसलिए काजल की कोठरी में घुसने का इरादा ही मत कीजिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

राष्ट्रहित में ऐसे समाचारों को रद्दी की टोकरी में डालना ही उचित है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: पत्रकारों के प्रति ममता का यह व्यवहार आपातकाल के दिनों की याद दिला रहा है

यह स्थिति पत्रकारों के लिए खतरे की घंटी है मिस्टर मीडिया!

यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

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'सरकार-समाज तय करे कि कोई भी गेरुआ वस्त्र धारण कर संन्यासी न बन सके'

राजनीति का अपना एक धर्म होता है, लेकिन राजनीति में धर्म की घुसपैठ शायद ही कोई पसंद करेगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 04 January, 2022
Last Modified:
Tuesday, 04 January, 2022
saint6456

राजनीति का अपना एक धर्म होता है, लेकिन राजनीति में धर्म की घुसपैठ शायद ही कोई पसंद करेगा। भारतीय संस्कृति में ऋषि-मुनि और साधु-संत समाज और देश को आध्यात्मिक तथा धार्मिक नेतृत्व प्रदान करते आए हैं। इस कारण भारत की ऋषि परंपरा समंदर पार ख्याति पाती रही है। अतीत में राजे-महाराजे अपने राजकुमारों को ऋषि मुनियों के पास नैतिक और आध्यामिक आचरण की शिक्षा प्राप्त करने भेजते थे। लेकिन अपने इस विशेष प्रभाव और दरबार संपर्क का किसी भी संत ने कभी सियासी इस्तेमाल नहीं किया और न ही किसी राजा ने उन्हें ऐसा करने की इजाजत दी। मगर हालिया दौर में साधु-संतों ने जिस तरह सियासत में दखलंदाजी बढ़ाई है, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को धक्का लगा है। 

इसके अलावा सरकार के बारे में भी धारणा बनती है कि वह आंतरिक मामलों और मसलों को कूटनीतिक-प्रशासनिक तरीके से निपटाने में कमजोर साबित हो रही है और उज्ज्वल छवि के लिए संत समाज का सहारा ले रही है।

एकबारगी इसे स्वीकार भी कर लिया जाए कि संतों की राय से कोई राष्ट्रीय नुकसान नहीं होता और वे अपने पांडित्य से राष्ट्र की प्रत्येक समस्या का समाधान खोज सकते हैं तो निवेदन यह है कि साधु-संत सीधे-सीधे चुनाव मैदान में उतरकर सियासी शतरंज खेलें और अपने को राजनीति के काबिल बनाएं। 

बीते दिनों राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को सार्वजनिक मंच से अपमानित करने और उनके हत्यारे को महिमामंडित करने वाले कथित संत की इन दिनों निंदा हो रही है। यह संत आठवीं कक्षा तक शिक्षित है। उसके खिलाफ महाराष्ट्र में मामले दर्ज हैं। पार्षद के चुनाव में नाकाम रहने पर उसने धर्म का चोला पहन लिया। 

महात्मा गांधी के समूची विश्व मानवता के लिए योगदान को किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी उनके आलोचक रहे, लेकिन सबसे पहले महात्मा कहकर उन्होंने ही गांधीजी को संबोधित किया था। जिस महापुरुष के निधन पर करीब डेढ़ सौ देशों ने शोक मनाया, उसी के अपने मुल्क में नासमझ लोग ऐसी टिप्पणियों से भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपहास का केंद्र बना रहे हैं। 

यह और भी खेदजनक है कि महात्मा गांधी अपने अपमान का उत्तर देने के लिए इस लोक में नहीं हैं। कोई भी संस्कृति अपने स्वर्गीय पूर्वजों की इस तरह निंदा का हक नहीं देती।

इन कथित संतों के ऐसे व्यवहार के अनेक उदाहरण हैं। मध्यप्रदेश में एक व्यक्ति ने एक राजनीतिक पार्टी से चुनाव का टिकट मांगा। उनका आपराधिक रिकॉर्ड था। इसलिए उनका आवेदन निरस्त हो गया। इसके बाद कुछ साल वे गायब रहे। जब प्रकट हुए तो संत बन चुके थे। अब करोड़ों में खेल रहे हैं। उनकी सिफारिश पर सियासी पार्टियां चुनाव में टिकट देती हैं। जिसे मिलता है, उसके लिए ये संतजी अपील करते हैं और उनका उम्मीदवार जीत जाता है। 

विडंबना यह है कि ऐसे संतों को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की कोई जानकारी नहीं होती और न ही समकालीन इतिहास तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की समझ होती है। वे संसार में प्रचलित तमाम राजनीतिक विचारधाराओं से भी अपरिचित होते हैं। यहां तक कि भारतीय संस्कृति पर उनकी जानकारी और धार्मिक पौराणिक ज्ञान भी सवालों के घेरे में होता है। 

फिर भी हजारों लोग उनके अनुयायी बन जाते हैं और उनके टोटकों पर अंधा भरोसा करने लगते हैं। अपने अज्ञान से रोजगार हासिल करने का यह अद्भुत उदाहरण भारत में ही मिल सकता है।    

हिंदुस्तान की संत परंपरा को कभी समूचे विश्व में प्रतिष्ठा प्राप्त थी। स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, रामकृष्ण परमहंस और महर्षि महेश योगी से लेकर अनेक संत हैं, जिन्होंने भारत का सम्मान विदेशों में बढ़ाया है। पर आज के भारत में कई तथाकथित संत इन दिनों गंभीर आरोपों में कारागार की शोभा बढ़ा रहे हैं। 

यह प्रमाण है कि भारतीय समाज अपने आध्यात्मिक नेतृत्व में आई नैतिक और शैक्षणिक गिरावट को कितने हल्के-फुल्के ढंग से ले रहा है। करोड़ों श्रद्धालुओं को आस्था के नाम पर गलत जानकारी देना जायज नहीं ठहराया जा सकता। 

भारतीय संस्कृति में अभी भी शंकराचार्य जैसी शिखर पदवी आसानी से हासिल नहीं होती और न ही उनकी योग्यता पर कभी कोई प्रश्नचिह्न् खड़ा किया गया। मगर निचले स्तरों पर ऐसे तत्वों की भरमार है, जो धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करते हैं और हर पार्टी के राजनेता भी वोट हासिल करने के लिए उनका दुरुपयोग करते हैं। गांव-गांव में उनका नेटवर्क है।  

आग्रह है कि आधुनिक हिंदुस्तान में जब जीवन के प्रत्येक क्षेत्न में प्रोफेशनल सेवाओं का महत्व बढ़ गया है तो धर्म भी उससे अलग नहीं रहा है। यदि एक डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, आईएएस, चार्टर्ड अकाउंटेंट और शिक्षक तक के लिए प्रवेश परीक्षाएं और पेशेवर प्रशिक्षण जरूरी है तो धर्म का क्षेत्र कैसे अछूता रह सकता है। वह तो औसत भारतीय को सबसे आसानी से प्रभावित करता है। 

इसलिए हर किसी को साधु-महात्मा बना देने पर सख्त पाबंदी क्यों नहीं होना चाहिए? जब यह पूर्ण कारोबार की शक्ल ले चुका है तो उसके लिए बाकायदा प्रवेश परीक्षा और प्रशिक्षण के लिए पाठ्यक्रम की व्यवस्था शैक्षणिक संस्थानों में होनी चाहिए। कोई भी गेरुआ वस्त्र धारण करके संन्यासी न बन सके, यह सरकार और समाज को सुनिश्चित करना होगा। अन्यथा इस मुल्क को मजहब के नाम पर अराजकता भरा झुंड बनने में देर नहीं लगेगी।

(साभार: लोकमत)

 

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राष्ट्रहित में ऐसे समाचारों को रद्दी की टोकरी में डालना ही उचित है मिस्टर मीडिया!

भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने बुधवार को एक कार्यक्रम में आज के दौर की पत्रकारिता पर चिंता प्रकट की है। इस चिंता का स्वागत किया जाना चाहिए।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 30 December, 2021
Last Modified:
Thursday, 30 December, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने बुधवार को एक कार्यक्रम में आज के दौर की पत्रकारिता पर चिंता प्रकट की है। इस चिंता का स्वागत किया जाना चाहिए। समूची पत्रकार बिरादरी को एहसानमंद होना चाहिए कि उन्होंने पत्रकारिता के धर्म और कर्तव्य को न्यायपालिका के बराबर मानते हुए इसकी पवित्रता की हिफाजत करने पर जोर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता को स्वस्थ्य लोकतंत्र की बुनियादी शर्त बताया लेकिन आगाह किया कि खबरों को पाठक और दर्शक तक जल्द पहुंचाने की होड़ में उनकी सच्चाई जांचने के आवश्यक सिद्धांत का पालन नहीं हो रहा है। यह घातक है। डिजिटल माध्यमों के जरिये असत्य और फर्जी कल्पित समाचार अवाम तक पहुंच जाते हैं।

विडंबना यह है कि जो चीज फर्जी है, उसे खबर की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है? जो घटना हुई ही नहीं, उसे पैदा कर देना ही गलत है। वह तो एक किस्म से अपराध है, जो जानबूझकर किसी छिपे इरादे से किया जाता है। उससे समाज तथा देश में अशांति फैलती है। ऐसे तत्वों के खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता के तहत सीधी और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। सोशल मीडिया का अवतार वॉट्सऐप इस मायने में इन दिनों फेक न्यूज को विस्तार देने का सह अपराधी है। क्या ही अच्छा हो कि इस पर रोक लगाने का कोई प्रभावी कदम उठाया जाए। न्यायपालिका की ओर से पहले भी पत्रकारिता की आड़ में जुर्म करने वालों से सावधान किया गया है। अफसोस है कि अभी तक इस संबंध में ठोस काम नहीं हुआ है।

हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक सरोकारों का खुलकर इजहार किया है। इससे पहले सितंबर में भी उसने पेगासस मामले में अपनी चिंता प्रकट की थी। अगस्त में इसी शिखर संस्था के न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने भी निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता पर जोर दिया था। कई बार कुछ उच्च न्यायालयों ने भी पत्रकारिता की गैर जिम्मेदारी और राजनीतिक स्वार्थों के लिए काल्पनिक कहानियों को खबर बनाकर पेश करने की आलोचना की है। जिंदगी के किसी भी क्षेत्र में फर्जीवाड़ा या जालसाजी को मंजूर क्यों करना चाहिए? कानूनी भाषा में इसे चार सौ बीसी कहा जाता है और यह गंभीर अपराधों की श्रेणी में रखा जाता है।

न्यायमूर्ति रमना की एक चिंता यह भी थी कि इन दिनों न्यूज और व्यूज का घालमेल हो रहा है। जब पत्रकार अपने वैचारिक पूर्वाग्रहों का शिकार होकर खबर को उस रंग में रंग देते हैं तो वे अपनी निष्पक्ष भूमिका के साथ न्याय नहीं करते। खबर और विचार का यह कॉकटेल बेहद खतरनाक है।

माननीय मुख्य न्यायाधीश ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा है कि आपसी होड़ के चलते समाचारों को जांचने (जिसे हम क्रॉस चेक कहते हैं) की प्रक्रिया का भी पालन नहीं हो रहा है। दशकों से पत्रकारिता की कक्षाओं में यह सिद्धांत पेशे की एक बुनियादी शर्त की तरह पढ़ाया जा रहा है। आजादी के बाद से लगभग सभी बड़े संपादकों और धुरंधरों ने प्रत्येक सूचना की सच्चाई परखने की वकालत की है।

यह भी जरूरी नहीं है कि हर सच समाचार का प्रकाशन/प्रसारण जरूरी हो। कई बार जिम्मेदार और गंभीर पत्रकार को देश तथा समाज के हित में कुछ खबरें रोकनी भी पड़ती हैं। इन दिनों यह देखा जाता है कि यदि किसी ने माइक पर अथवा प्रकाशन के लिए बयान जारी कर दिया तो फिर उसके नतीजों की परवाह किए बिना उसे जारी कर दिया जाता है। यदि राष्ट्रहित में ऐसे समाचार रोकना आवश्यक है तो उनको रद्दी की टोकरी में स्थान देना ही उचित है। अन्यथा हम पत्रकारिता के एक ऐसे दौर में दाखिल हो जाएंगे, जो अराजकता को बढ़ावा देने वाली होगी और उस पर अंकुश लगाना कठिन हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: पत्रकारों के प्रति ममता का यह व्यवहार आपातकाल के दिनों की याद दिला रहा है

यह स्थिति पत्रकारों के लिए खतरे की घंटी है मिस्टर मीडिया!

यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

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‘इस खुलासे के बाद इमरान खान की बोलती बंद है, अवाम का पारा सातवें आसमान पर है’

पाकिस्तान मुश्किल में है। जब दोस्त ही दुश्मनों जैसा बर्ताव करने लगें तो वह कहां जाए? हिंदुस्तान का यह पड़ोसी मुल्क अपना अच्छा-बुरा भी नहीं समझ पा रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 21 December, 2021
Last Modified:
Tuesday, 21 December, 2021
Rajesh Badal

पाकिस्तान मुश्किल में है। जब दोस्त ही दुश्मनों जैसा बर्ताव करने लगें तो वह कहां जाए? हिंदुस्तान का यह पड़ोसी मुल्क अपना अच्छा-बुरा भी नहीं समझ पा रहा है। अपनी विदेश नीति को वह ताश के पत्तों की तरह फेंट रहा है।इसके बाद भी बात नहीं बन रही है।दिवालियेपन के कगार पर खड़े इस देश के लिए अपनी वित्तीय नीति निर्धारित करना भी कठिन हो गया है।

एक तरफ कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री इमरान खान नियाजी पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने एक औद्योगिक घराने से हर महीने पचास लाख रुपये की घूस लेने का आरोप लगा दिया है। इस खुलासे के बाद इमरान खान की बोलती बंद है। अवाम का पारा सातवें आसमान पर है।

पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश रहे वजीउद्दीन अहमद की ख्याति बेहद ईमानदार और निष्पक्ष जज की है। जब वे सेवानिवृत्त हुए तो उन दिनों नवाज शरीफ सत्ता में थे। मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान ने सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए विरोध में आंदोलन छेड़ दिया था। वजीउद्दीन अहमद साफ-सुथरी सियासत के लिए उनके इस आंदोलन में शरीक हो गए। पर, शीघ्र ही मोहभंग हो गया।

उन्होंने पाया कि इमरान खान आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं। वहां के चीनी माफिया सरगना जहांगीर तरीन इमरान खान को हर महीने बीस लाख रुपये पहुंचा रहे थे, फिर यह रकम तीस लाख रुपये कर दी गई। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह बढ़कर 50 लाख रुपये हो गई। यह माफिया देश में अपने मनमाफिक चीनी पॉलिसी तय करवाता है, बाजार में शक्कर के दाम आए दिन बढ़ाता है, चोरी-छिपे दूसरे देशों से बिना शुल्क अदा किए सस्ती कीमत में शक्कर मंगाता है और ऊंचे दामों पर बेचता है।

यहां तक कि इमरान खान की कार में पेट्रोल डलवाने से लेकर उन्हें निजी विमान उपलब्ध कराने का काम यही माफिया करता है। फौज के कुछ आला अफसर भी इस खेल में शामिल हैं। प्रधानमंत्री को यह धन उनकी पार्टी के लिए मिलने वाले चंदे से अलग है। पूर्व न्यायाधीश के इस बेबाक खुलासे से इमरान सरकार हक्का-बक्का है।

एक तरफ काला धन पाकिस्तान की सियासत में बह रहा है तो दूसरी तरफ इमरान खान पड़ोसी अफगानिस्तान पर भ्रष्टाचार का खुला आरोप लगाने लगे हैं। रविवार को अपने देश में ही उनकी भद्द पिट गई। उन्होंने अफगानिस्तान के मसले पर इस्लामिक देशों की पंचाट बुलाई। आधे से भी कम देश पहुंचे। इससे खफा इमरान अफगानिस्तान की हुकूमतों पर बरस पड़े।

उनका आरोप था कि अफगानिस्तान की सरकारें भ्रष्ट रही हैं। इतना सुनना था कि पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भड़क उठे। उन्होंने कहा कि इमरान अफगानिस्तान के प्रवक्ता नहीं हैं और उन्हें मुल्क के अंदरूनी मामलों में दखल देने का कोई हक नहीं है। अफगानिस्तान की खराब हालत के लिए काफी हद तक खुद पाकिस्तान जिम्मेदार है, उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। उनके देश की स्थिति कौन सी बेहतर है?

पाकिस्तान की जनता भी यह समझती है कि इमरान खान परिणाम देने में नाकाम रहे हैं, इसलिए उसका ध्यान बंटाने के लिए कभी कश्मीर तो कभी अफगानिस्तान के मसलों को जोर-शोर से उठाते हैं।करजई की खरी-खरी बात का समर्थन ज्यादातर प्रतिनिधियों ने किया। हकीकत भी यही है कि पाकिस्तान की माली हालत दिन-ब-दिन खस्ता होती जा रही है।

वहां के फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के पूर्व अध्यक्ष सैयद शब्बर जैदी ने इमरान सरकार को झूठा बताते हुए दावा किया है कि देश दिवालिया होने जा रहा है। जैदी को इमरान सरकार ने ही इस बोर्ड का अध्यक्ष बनाया था, मगर यह रिश्ता भी टूट गया। जैदी का दावा है कि पाकिस्तान का केंद्रीय वित्तीय ढांचा चरमरा गया है। इसे नए सिरे से बनाने की जरूरत है, लेकिन सरकार इस बारे में चिंतित नहीं है।

जैदी के मुताबिक पाकिस्तान पर इस समय 50.5 लाख करोड़ रुपये की उधारी है, इसमें से 20.7 लाख करोड़ रुपये तो अकेले इमरान सरकार ने लिया है। स्पष्ट है कि इमरान सरकार कर्ज लेकर घी पी रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पहले ही और उधार देने से मना कर चुका है और उसके सिर पर एफएटीएफ से ब्लैक लिस्ट होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

बीते दिनों अमेरिका के लोकतांत्रिक शिखर सम्मलेन में निमंत्रण के बाद भी पाकिस्तान ने जाने से साफ इनकार कर दिया था। इसके बाद ब्लैक लिस्ट होने की आशंका बढ़ गई है। इसके बाद पाकिस्तान को लगा कि चीन के दबाव में उससे भयंकर चूक हुई है, इसलिए अब वह बार-बार सफाई दे रहा है।

उसने यहां तक कहा कि पाकिस्तान अमेरिका या चीन किसी के गुट का हिस्सा नहीं बनना चाहता, जबकि चीन ने उसे भाई जैसा बताया था। अब यही चीन डेढ़ साल से कर्ज चुकाने के लिए पाकिस्तान पर दबाव डाल रहा है। उसने चाइना-पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर का काम डेढ़ साल से बंद कर रखा है। इसी तरह पाकिस्तान के एक और अभिन्न मित्र सऊदी अरब ने चार फीसदी ब्याज पर तीन अरब डॉलर का कर्ज तो दिया, पर बंदिश लगा दी कि पाकिस्तान इसे खर्च नहीं कर सकता। यानी वह अपनी शान में कलगी की तरह इसका इस्तेमाल कर सकता है। सऊदी अरब ने शर्त रखी है कि केवल 72 घंटे के नोटिस पर वह यह पैसा वापस छीन लेगा।

दोस्तों का यह व्यवहार खुद पाकिस्तान ही नहीं समझ पा रहा है। भले ही वह नहीं समझे, लेकिन इससे कोई असहमत नहीं हो सकता कि पाकिस्तान स्वयं अपनी दुर्दशा के लिए दोषी है।

(साभार: लोकमत)

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'जिंदा-धड़कता लोकतंत्र चलाने के लिए विपक्ष की बेंचों पर असहमतियों के अनेक सुर चाहिए'

तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी के तेवर इन दिनों हैरान करने वाले हैं। चंद रोज पहले तक वे यूपीए के बारे में कुछ नहीं बोलती थीं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 15 December, 2021
Last Modified:
Wednesday, 15 December, 2021
TMC58754

तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी के तेवर इन दिनों हैरान करने वाले हैं। चंद रोज पहले तक वे यूपीए के बारे में कुछ नहीं बोलती थीं। उसकी कमान कांग्रेस के हाथों में रहने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं था। पिछली यात्रा में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी लंबी मंत्रणा की थी। लेकिन कुछ समय बाद ही उनकी प्राथमिकता की सूची से कांग्रेस अनुपस्थित थी। वे दिल्ली आईं तो यूपीए अध्यक्ष से नहीं मिलीं और न कांग्रेस के नेतृत्व में हुई विपक्षी दलों की बैठक में शामिल हुईं। 

बैठक में जाने और कांग्रेस अध्यक्ष से नहीं मिलने की बात उतनी गंभीर नहीं है। असल मसला तो उनके व्यवहार में नाटकीय बदलाव के कारण सामने आया। उन्होंने कांग्रेस को कोसते हुए यूपीए के अस्तित्व को ही नकार दिया। ममता का कहना था कि आवश्यक नहीं है कि विपक्षी मोर्चे की अगुआई कांग्रेस ही करे। इसके बाद उनके सियासी रणनीतिकार और पेशेवर अनुबंध पर काम कर रहे प्रशांत किशोर ने भी कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के बिना भी विपक्षी एकता मुमकिन है। हालांकि वे पहले बने ऐसे मोर्चो का अंजाम भूल गए।

जिंदा और धड़कता लोकतंत्र सिर्फ सरकार में बैठे दल के सहारे नहीं चल सकता। विपक्ष की बेंचों पर असहमतियों के अनेक सुर चाहिए। भारत का संविधान बहुदलीय लोकतंत्र का समर्थन करता है। इस व्यवस्था में प्रतिपक्ष का बौना और नाटा होना देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता। यदि विपक्षी दलों ने इस प्रसंग में गैरजिम्मेदारी दिखाई तो वे अपना नुकसान तो करेंगे ही, मुल्क का भला भी नहीं होगा। इस नाते ममता बनर्जी की छटपटाहट स्वाभाविक मानी जा सकती है। बंगाल में उन्होंने भाजपा के साथ जिस तरह किला लड़ाया, उसकी मिसाल लंबे समय तक दी जाएगी। वे विपक्षी एकता की पहल करें तो कुछ अनुचित नहीं है। अलबत्ता उनके नए अंदाज ने लोकतंत्र समर्थकों की चिंता बढ़ा दी है। 

वे कुछ समय पहले मुंबई जाती हैं और एक औद्योगिक घराने के मुखिया से मिलती हैं। वे राकांपा के शिखर पुरुष से मिलती हैं और वे भी यूपीए की भूमिका को लेकर ममता बनर्जी से सहमत नजर आते हैं। जाहिर है पूरब और पश्चिम की यह दोनों क्षेत्रीय पार्टियां अब राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरने के लिए बेताब हैं। फीस लेकर तृणमूल कांग्रेस के लिए काम कर रहे प्रशांत किशोर की दाल कांग्रेस में नहीं गली तो वे भी कांग्रेस को भला-बुरा कहते दिखाई दे रहे हैं।  

एक उद्योगपति घराने से संपर्क और भाजपा के साथ-साथ ममता बनर्जी का कांग्रेस के खिलाफ खुलकर सामने आना परदे के पीछे की कहानी भी कहता है। ध्यान देने की बात है कि क्या कांग्रेस के बगैर उन्होंने प्रतिपक्ष की एकता के व्यावहारिक और कूटनीतिक पहलुओं पर भी विचार किया है? विपक्ष के नाम पर चमक रहे जुगनुओं में से आप कांग्रेस हटा दें तो बचता ही क्या है? अतीत बताता है कि कई छोटे दलों ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाकर अपनी पार्टियां बनाई थीं। तृणमूल कांग्रेस यदि राकांपा के साथ मिलकर महाराष्ट्र में चुनाव लड़ती है तो अपने शून्य वोट प्रतिशत में वह जो भी इजाफा करेगी, वह एनसीपी का ही वोट बैंक होगा। जिस दिन महाराष्ट्र के मतदाता के सामने एनसीपी और टीएमसी संयुक्त होकर वोट मांगने जाएंगी तो वह टीएमसी को कितना पसंद करेगा? इसी तरह यदि तृणमूल कांग्रेस अपने शून्य मतों का कटोरा लेकर उत्तरप्रदेश में सपा के साथ चुनाव मैदान में उतरती है तो क्या गारंटी है कि वह अखिलेश यादव के वोट बैंक में सेंध नहीं लगाएगी।

पिछले लोकसभा चुनाव के आंकड़े देखें तो कांग्रेस इतिहास के दुर्बलतम स्वरूप में होते हुए भी करीब 12 करोड़ मतदाताओं के साथ मंच पर उपस्थित है और ममता के पास कांग्रेस के मतों का सिर्फ दस-बारह फीसदी वोट है। यही उनकी पच्चीस बरस की पूंजी है। इसी के सहारे वे अश्वमेध अश्व देश भर में घुमा रही हैं। इसी तरह महाराष्ट्र में एनसीपी के पास कांग्रेस की तुलना में महज छह-सात फीसदी वोट हैं। समाजवादी पार्टी का मत प्रतिशत भी विपक्षी एकता को बढ़ाने वाली प्राणवायु नहीं देता। वह कांग्रेस के कुल मतों का दस प्रतिशत भी नहीं है। 

इसके बाद ममता बनर्जी के पास कौन से ठोस सहयोगी दल हो सकते हैं, जो यूपीए के दरम्यान कांग्रेस से प्रताड़ित रहे हों और ममता की छांव में जाने के लिए उतावले हों? पहला नाम तो अकाली दल का ही है, जो किसी भी सूरत में कांग्रेस के साथ नहीं जाएगा। परंतु अकाली दल का मत प्रतिशत कांग्रेस की तुलना में 3-4 फीसदी ही है। तेलुगुदेशम और वाईएसआर कांग्रेस भी कांग्रेस के कुल मतों का 10 प्रतिशत मत ही पा सके थे। आम आदमी पार्टी के पास कांग्रेस के मतों का केवल 2-3 फीसदी वोट है और बीजू जनता दल के पास नौ-दस प्रतिशत। 

मैं सभी पार्टियों के प्रति सम्मान जताते हुए बताना चाहता हूं कि पिछले दो चुनाव में नोटा (यानी जो किसी भी पार्टी को पसंद नहीं करते) मतों की संख्या एक प्रतिशत से कुछ ही अधिक थी और पंद्रह से अधिक पार्टियों के कुल वोट नोटा के मतों से भी कम थे। इनमें अकाली दल, अपना दल, लोजपा, कम्युनिस्ट पार्टी, अन्नाद्रमुक, लोकदल और आम आदमी पार्टी के मत तो नोटा से भी कम हैं। खुद एनसीपी भी नोटा से कोई बहुत अधिक आगे नहीं है। 

लब्बोलुआब यह कि सभी समर्थक दलों का मत प्रतिशत भी ममता जोड़ लें तो वह बमुश्किल कांग्रेस के मतों का 25 फीसदी ही ठहरता है। ऐसे में कठिन है कि कांग्रेस के बिना विपक्ष का तीन टांग वाला अश्वमेध का घोड़ा चार कदम भी चल पाएगा। महत्वाकांक्षी होना बुरा नहीं है, मगर उसके लिए वोट बैंक का निरंतर विस्तार करना होता है। खेद है कि कांग्रेस विहीन मोर्चा बनाने के लिए उतावली पार्टियों ने अपने पच्चीस-तीस बरस के जीवनकाल में कोई सार्थक कोशिशें नहीं की हैं। अब वे कांग्रेस से पिंड छुड़ाएं भी तो कैसे?

(साभार: लोकमत)

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मिस्टर मीडिया: पत्रकारों के प्रति ममता का यह व्यवहार आपातकाल के दिनों की याद दिला रहा है

बंगाल विधानसभा में जीत के बाद ममता बनर्जी अलग अंदाज में हैं। वे अपने प्रदेश के पत्रकारों से कह रही हैं कि अगर उन्हें विज्ञापन चाहिए तो सरकार के पक्ष में लिखें।

राजेश बादल by
Published - Monday, 13 December, 2021
Last Modified:
Monday, 13 December, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

बंगाल विधानसभा में जीत के बाद ममता बनर्जी अलग अंदाज में हैं। वे अपने प्रदेश के पत्रकारों से कह रही हैं कि अगर उन्हें विज्ञापन चाहिए तो सरकार के पक्ष में लिखें। इतना ही नहीं, वे उनसे कहती हैं कि डीएम के दफ्तर में पॉजिटिव खबरों वाले अंक जमा करें। फिर उन्हें विज्ञापन मिलेंगे। यानी यदि आप सरकार की आलोचना करते हैं तो सरकार से मदद की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता ने यह बात कही। उनका यह व्यवहार मुझे आपातकाल के दिनों की याद दिला रहा है। उन दिनों सरकार के पक्ष में ही लिखना होता था और जिला कलेक्टर कार्यालय में समाचारपत्र की प्रतियां जमा करनी होती थीं। उसके बाद ही सरकारी विज्ञापन मिला करते थे। ममता अपने प्रदेश में यही व्यवस्था लागू कर रही हैं। इसका अर्थ यह है कि आंचलिक स्तर पर जिला कलेक्टर ही पत्रकार को प्रमाणपत्र देगा। यह अनुचित है। उन्हें याद रखना चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी आपातकाल के बाद अपनी भूल का अहसास किया था और माफी मांगी थी। 

ममता बनर्जी की यह मंशा जनकल्याणकारी राज्य की लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है। सरकार सिर्फ तारीफ पसंद करे और आलोचकों से किनारा करे, यह कतई जायज नहीं है। हम सब जानते हैं कि ममता बनर्जी के अंदर सब कुछ लोकतांत्रिक नहीं है। उनके भीतर एक अधिनायक नेत्री बैठी हुई है। हालांकि अगर वह नहीं होती तो बंगाल में चुनाव जीतना उनके लिए शायद संभव नहीं होता। मगर वे भूल जाती हैं कि जम्हूरियत में सारे जिम्मेदार प्रतिष्ठानों को एक-दूसरे के प्रति सहयोग का भाव होना चाहिए।

अभिव्यक्ति की आजादी इकतरफा नहीं हो सकती। यदि पत्रकारिता सत्ता प्रतिष्ठान की तारीफ की राह पर चल पड़े और आलोचना बंद कर दे तो समझ लीजिए सत्ता दल का अंत निकट है। क्योंकि पत्रकारिता समय-समय पर आंखें खोलने या सरकार की असफलताओं को उजागर करती है। यदि उसने यह काम रोक दिया तो हुकूमत कर रहे राजनेता को पता भी नहीं चलेगा कि कब उसके पैरों के नीचे से जाजम खिसक गई। ममता बनर्जी के साथ यह शुरुआत हो चुकी।

पत्रकारिता दरअसल उस आलोचक की तरह है, जो अंततः देश और सरकार के भले के लिए काम करता है। कबीरदास ने सदियों पहले कहा था, ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाय,बिन पानी, साबुन बिना,निर्मल करे सुभाय।’ यानी जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिक से अधिक करीब रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव को साफ और निर्मल कर देता है। किसी भी निर्वाचित सरकार को लोकतंत्र में इन पंक्तियों पर अमल करना चाहिए। उसे अपने आलोचकों की जानकारी भी होनी चाहिए, भले ही प्रशंसकों की सूचना नहीं हो।

इतना ही नहीं, उसे अपने आलोचकों या निंदकों के साथ पवित्र रिश्ता रखना चाहिए। आजकल किसको क्या पड़ी है, जो आलोचना करे। पत्रकारिता के पवित्र काम में आलोचना अनिवार्य हिस्सा है। इन दिनों व्यवस्था के दोष निकालने वाले पत्रकारों के साथ सरकारें बदले की भावना से काम कर रही हैं। यह उनकी नासमझी और अपरिपक्वता की निशानी है। किसी भी अधिनायकवादी प्रवृति और बदले की कार्रवाई करने वाली हुकूमत अथवा राजनेता-नेत्री से डरने की आवश्यकता नहीं है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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विनोद दुआ का जाना दुख का सबब भी है और सबक भी: विनोद अग्निहोत्री

उन्होंने अपने विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और आखिर तक उनके लिए वह लड़ते रहे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
Vinod Agnihotri Vinod Dua

विनोद अग्निहोत्री
सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह

बात उन दिनों की है, जब मैं ‘नवभारत टाइम्स‘ दिल्ली में बतौर उप संपादक काम करता था। एक दिन ‘नवभारत टाइम्स‘ के तत्कालीन कार्यकारी संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह से मिलने एक सज्जन आए। संयोग से मैं उस दिन एसपी सिंह के कमरे में ही बैठा था। एसपी ने मुझे उनसे मिलवाया कि ये विनोद दुआ हैं और दुआ से कहा कि ये आपके समान नाम वाले विनोद अग्निहोत्री हैं। विनोद दुआ से व्यक्तिगत रूप से मेरी वह पहली और सीधी मुलाकात थी। हालांकि, मैं उन्हें ‘दूरदर्शन‘ के तमाम कार्यक्रमों में देखता था और उनके बारे में जानता था। मुझे ‘दूरदर्शन‘ पर अपने नाम वाले को कार्यक्रम होस्ट करते देख बेहद आत्मतुष्टि मिलती थी और लगता था कि जैसे मैं ही यह कार्यक्रम कर रहा हूं। इसलिए विनोद दुआ से प्रत्यक्ष मिलकर बेहद खुशी हुई, क्योंकि उन दिनों ‘दूरदर्शन‘ पर जो चेहरे दिखते थे, वह सामान्य व्यक्ति के लिए फिल्मी सितारों की तरह ही होते थे। मेरे लिए विनोद दुआ से मिलना एक अविस्मरणीय अनुभव था, क्योंकि मुझे पत्रकारिता में आए कुछ साल ही हुए थे। इस मुलाकात में ही विनोद दुआ ने जिस बेतकल्लुफी से मुझसे बात की, उसने भी मुझे बेहद प्रभावित किया।

बाद में विनोद दुआ से मेरा मिलना-जुलना होता रहा। उनकी सहजता और अपनेपन ने मुझे बेहद प्रभावित किया। हालांकि उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और देश पर कांग्रेस का एकाधिकार था और मेरी वैचारिक पृष्ठभूमि समाजवादी होने के कारण मेरा उन सभी लोगों से मतभेद रहता था जो कांग्रेस के करीब दिखाई देते थे। इसके बावजूद विनोद दुआ के साथ मेरी आत्मीयता बढ़ती चली गई। पिछले करीब दो दशकों के दौरान मुझे कई बार कुछ कार्यक्रमों में उनके साथ मंच साझा करने का भी मौका मिला। ‘इंडिया इंटरनेशलन सेंटर‘ में उनसे अक्सर मुलाकात हो जाती थी। कुछेक ऐसी दावतों में भी मैंने शिरकत की, जहां विनोद दुआ का गाना सुनने का मौका भी मिला। वह बेहतरीन गायक थे। देश विभाजन के बाद उनके माता-पिता पाकिस्तान से दिल्ली आ गए थे और दिल्ली की एक रिफ्यूजी कालोनी से उठकर विनोद दुआ पत्रकारिता के शिखर पर सितारे की तरह चमके। हिंदी और अंग्रेजी में समान अधिकार रखने वाले विनोद दुआ के भीतर मैंने भारत-पाकिस्तान दोस्ती के प्रति एक खास तरह की तड़प देखी थी। दिल्ली वाला होते हुए भी उनके भीतर एक ठेठ पंजाबीपना भी था, जिसने उन्हें बेहद हंसमुख, बेपरवाह और मस्त इंसान बना दिया था।

‘दूरदर्शन‘ पर उनके कार्यक्रम जनवाणी, परख और चुनाव विश्लेषण तो भारतीय टीवी पत्रकारिता के लिए मील का पत्थर हैं, जिनमें तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र के खोखलेपन को उजागर किया जाता था। ‘एनडीटीवी‘ में उनका विशेष शो जायका इंडिया का भी बेहद  लोकप्रिय रहा, जिसने देश के तमाम अंचलों के खान पान और पकवानों से दर्शकों को रूबरू कराया। इसके लिए उन्होंने पूरे देश में हर छोटे-बड़े शहर के गली-मुहल्लों में घूम-घूमकर वहां के खास पकवानों और व्यंजनों पर विस्तृत रिपोर्टिंग की। विनोद दुआ के समकालीन कई पत्रकारों ने अकूत संपत्ति बनाई, लेकिन अपनी तमाम योग्यता और ब्रैंड वैल्यू के बावजूद विनोद दुआ ने अपने पेशे को कारोबार नहीं बनाया। उन्होंने जिस संस्थान में भी काम किया, अपनी शर्तों पर किया और जब लगा कि संस्थान में उनके लिए काम करना मुश्किल हो रहा है तो उन्होंने बेहद शालीनता से उसे अलविदा कह दिया।

पिछले कुछ सालों से इंटरनेट पर उनका शो बेहद लोकप्रिय हुआ। हालांकि उसके लिए उन्हें मुकदमेबाजी के कानूनी झंझटों से भी उलझना पड़ा और आखिरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। लेकिन उन्होंने अपने विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और आखिर तक उनके लिए वह लड़ते रहे। विनोद दुआ उन बहादुर पत्रकारों में थे, जिनके भीतर किसी भी सरकार और बड़े से बड़े नेता से अनचाहा सवाल भी पूछने की हिम्मत थी। चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या गैर कांग्रेसी सरकार, हर बड़े नेता मंत्री और अधिकारी से उनके निजी रिश्ते भी थे, लेकिन इन संबंधों को उन्होंने कभी भी अपनी पत्रकारिता के आड़े नहीं आने दिया। इस सबके बावजूद पिछले कुछ वर्षों से विनोद दुआ अकेलेपन का शिकार हो गए थे। शायद मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के इस दौर में उन्हें अपने-पराए की सही पहचान हो गई थी। तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया ने अपने इस दिग्गज से कन्नी काट ली और उन्हें सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा। कोरोना काल में जब सब अपने घरों में एक तरह से कैद होकर रह गए थे, तब विनोद दुआ जैसे फराखदिल इंसान के लिए वह समय बेहद कठिन और चुनौती भरा रहा।

विनोद दुआ का यूं चले जाना एक सामान्य घटना नहीं है। कहा जा सकता है कि पिछले करीब एक साल से उनकी सेहत ठीक नहीं थी और करीब छह महीने पहले पत्नी के निधन के शोक ने उन्हें भीतर से और भी कमजोर कर दिया था, जो धीरे-धीरे उन्हें मौत के करीब ले गया। मैं उनकी इस मृत्यु को स्वाभाविक इसलिए नहीं मानता हूं कि एक तो 67 साल की आयु आम तौर पर ऐसी नहीं होती कि यह मान लिया जाए कि चलो उनका वक्त पूरा हो गया था, दूसरे विनोद दुआ जैसे जिंदादिल और खुशदिल इंसान के लिए शायद यह दुनिया अब घुटन भरी हो चुकी थी, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए छोड़ दिया। इसलिए विनोद दुआ का निधन पूरे पत्रकारिता जगत या आधुनिक शब्दावली में मीडिया की दुनिया के लिए एक शोक का सबब तो है ही, एक बड़ा सबक भी है।

सबक यह कि जिस कदर हम सब अपने आप में एकाकी होते जा रहे हैं वह कहीं न कहीं हम सबको भीतर ही भीतर इतना कमजोर बना रहा है कि हम अपने बाहर जो कुछ भी अच्छा-बुरा घट रहा है, न सिर्फ उससे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं बल्कि उससे लड़ने की हमारी ताकत भी घटती जा रही है। इसलिए अगर इस चुनौती भरे समय में हम सब अपने अपने घरौंदों से निकलकर एक बार फिर वैसे ही मिलना-जुलना, उठना-बैठना, लड़ना-झगड़ना, उलझना और फिर हाथ मिलाकर गले मिलकर अगले दिन मिलने का वादा करने का सिलसिला शुरु कर सकें तो शायद हम अपने एकाकीपन से भी लड़ पाएंगे और विनोद दुआ को यही सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।

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अलविदा विनोद जी! आपकी पत्रकारिता का यह देश हमेशा ऋणी रहेगा: राजेश बादल

विनोद दुआ अब नहीं हैं। इस खबर पर यकीन नहीं करना चाहता, लेकिन यह सच है कि वे अब अपनी अनंत यात्रा पर चले गए हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

विनोद दुआ अब नहीं हैं। इस खबर पर यकीन नहीं करना चाहता, लेकिन यह सच है कि वे अब अपनी अनंत यात्रा पर चले गए हैं। बीते चार दशक से वे भारतीय टेलिविजन पत्रकारिता की मज़बूत रीढ़ थे। उमर भर दबाव आए, तमाम झंझावात आए पर वे अपने सिद्धांतों से डिगे नहीं। कोई भी सरकार रही हो, विनोद दुआ के आगे उसकी नही चली। कारण यही था कि विनोद दुआ को कोई भी लालच या प्रलोभन डिगा नहीं सकता था। आने वाली नस्लें शायद भरोसा भी न करें कि देश में कभी एक ऐसा पत्रकार  एंकर भी था, जो ताल ठोक कर कहता था, जो कहूंगा सच कहूंगा। सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा। उनसे मेरे रिश्ते की शुरुआत उन्नीस सौ पचासी से नब्बे के बीच हुई थी। 

मैं उन दिनों ‘नवभारत टाइम्स’ जयपुर में मुख्य उपसंपादक था। दिल्ली आना जाना लगा रहता था और शाम की किसी महफ़िल में हम साथ थे। उन्होंने और चिन्ना भाभी ने गाने गाए। कुछ मैंने भी साथ दिया। ब्रायन सिलास पियानो पर साथ दे रहे थे। सुबह चार साढ़े चार बजे तक महफ़िल चली। फिर जामा मस्जिद के पास पूड़ी सब्ज़ी खाने गए। उन्होंने निहारी खाई। हमारे रिश्ते की वह शुरुआत थी। इसके बाद तो कई साल तक उनसे बाबा बुल्लेशाह से लेकर बाबा फरीद, कबीर, तुलसी और जायसी जैसे महा-रचनाकारों की अनगिनत रचनाएं सुनी। पुराने गीत सुने और साथ में गाए भी। चिन्ना भाभी भी बहुत अच्छा गाती थीं। उनके घर का एक कमरा हम जैसों के लिए ही आरक्षित रहता था। उनकी मां भी हम लोगों को बेटे जैसा ही प्यार करती थीं। इसके बाद अख़बार के साथ साथ ‘दूरदर्शन’ से मेरा भी रिश्ता बन गया। हमारी दोस्ती परवान चढ़ी।

उन्नीस सौ बानवे में भारत की पहली समाचार पत्रिका ‘परख’ हम लोगों ने शुरू की। कर्ता धर्ता विनोद जी ही थे। ‘परख’ ने शीघ्र ही टीवी पत्रकारिता में झंडे गाड़ दिए। पत्रिका दूरदर्शन पर थी, लेकिन कोई दबाव हमारे ऊपर नहीं था। केंद्र और राज्य सरकारों की हम खुलकर आलोचना करते थे, पर कभी कोई दबाव नहीं आया। कभी कुछ ऐसा हुआ भी तो विनोद जी ने उसे कपूर की तरह उड़ा दिया। ‘परख’ की रिपोर्टिंग टीम में हम लोगों के साथ रजत शर्मा भी थे। वे पंजाब से रिपोर्टिंग करते थे। 

असल में सरकार और सत्ता प्रतिष्ठानों से सिद्धांतों पर टकराव विनोद जी के स्वभाव में था। परख से पहले ‘जनवाणी’ नामक एक कार्यक्रम प्रसारित होता था। इसमें विनोद जी एक शख्सियत का साक्षात्कार करते थे। सवाल इतने तीखे होते थे कि सामने वाले को उत्तर देना मुश्किल हो जाता था। उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। अशोक गहलोत नए नए केंद्रीय मंत्री बने थे। विनोद जी के सवालों का उत्तर तक वे नहीं दे पाए। एपिसोड प्रसारित हुआ तो उनकी बड़ी किरकिरी हुई। अगले दिन कुछ वरिष्ठ मंत्री और कांग्रेस नेता राजीव गांधी के पास पहुंचे और उनसे कहा कि सरकारी दूरदर्शन पर सरकार के ही मंत्री की छवि ख़राब की जा रही है। विनोद दुआ को हटाया जाए। राजीव गांधी ने कहा कि अगर कोई मंत्री टीवी पत्रकार के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाए तो इसमें विनोद दुआ की क्या गलती? अगले दिन ही अशोक गहलोत का इस्तीफा हो गया। एक साक्षात्कार में रक्षा मंत्री शरद पवार आए। विनोद दुआ के सामने नहीं देखकर वे सवालों का उत्तर इधर-उधर देख कर दे रहे थे। टीवी पत्रकारिता में यह असभ्यता मानी जाती है। जब बहुत हो गया तो विनोद दुआ ने कहा, शरद पवार जी! मेरी तरफ देख कर उत्तर दीजिए। आप इधर-उधर देखते हैं तो ऐसा लगता है जैसे राष्ट्र के नाम संदेश दे रहे हैं और मैं अपना वक़्त बर्बाद  कर रहा हूं। यह टिप्पणी दूरदर्शन पर प्रसारित भी हुई। आज किसी पत्रकार में हिम्मत है? 

जब मोती लाल वोरा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे तो मैनें ‘परख’ के संवाद स्तंभ में साक्षात्कार के लिए उनसे बात की। वोरा जी ने तब तक किसी भी राष्ट्रीय टीवी कार्यक्रम के लिए कोई साक्षात्कार नहीं दिया था। लेकिन विनोद दुआ के कारण पशोपेश में थे। मैनें उन्हें भरोसा दिया कि कुछ भी गड़बड़ नहीं होगी। वे तैयार हो गए। मैं उनके साथ लखनऊ से दिल्ली आया। रिकॉर्डिंग से पहले विनोद जी से मैंने वोरा जी की यह चिंता जताई और उनसे नरमी बरतने का अनुरोध किया। विनोद जी बोले, ‘राजेश जी! वे एक राज्यपाल हैं और संवैधानिक प्रमुख हैं। उनसे कहिए, निश्चिंत रहें। कम राजनेता ऐसे हैं, जिन्हें मैं पसंद करता हूं और उनमें से एक वोरा जी भी हैं।’ जैन स्टूडियो में यह साक्षात्कार रिकॉर्ड किया गया और बेहद पसंद किया गया। 

मेरी अपनी परख की अनेक विशेष समाचार रिपोर्टों के कारण सरकारें, बड़े राजनेता तक मुश्किल में पड़ जाते थे। उन रिपोर्टों पर विनोद दुआ की पैनी टिप्पणी सोने में सुहागे का काम करती थी। इसी तरह रजत शर्मा, विनोद दुआ, विजय त्रिवेदी और मुकेश कुमार की धारदार रिपोर्टिंग परख को धारदार बनाती थी। वैसी रिपोर्टिंग तो आज की पीढ़ी के लिए असंभव ही है। मगर दूरदर्शन को यह आज़ादी मिली रही। आज के दौर को देखते हुए तो शायद ही कोई इस पर भरोसा करेगा। परख का अपना राष्ट्रीय संवाददाता तंत्र था। उन दिनों दूरदर्शन के पास भी ऐसा तंत्र नहीं था। अस्सी के दशक में प्रणव राय और विनोद दुआ की जोड़ी ने चुनावों के दौरान जो विश्लेषण किए, वे हिन्दुस्तान ही नहीं, समूचे एशिया के लिए एक धरोहर से कम नहीं हैं। उन दिनों ईवीएम नहीं होती थी और मतगणना कई दिन चलती थी। उस दरम्यान यह जोड़ी किसी भी पार्टी या सरकार या राजनेता को नही छोड़ती थी। मुद्दों पर निष्पक्ष आलोचना की नींव तो इसी जोड़ी ने छोटे परदे पर डाली। 

लोग यह मानते हैं कि छोटे परदे पर बाहरी प्रड्यूसर की ओर से ‘डीडी मेट्रो’ पर दैनिक बुलेटिन ‘आजतक’ ने प्रारंभ किया था। पर यह सच नहीं है। ‘आजतक’ से पहले विनोद दुआ ने उसी समय पर ‘न्यूज वेब’ दैनिक बुलेटिन शुरू किया था। इस बुलेटिन ने एक सप्ताह में ही झंडे गाड़ दिए थे। अफ़सोस, यह कुछ महीनों बाद किन्ही कारणों से बंद हो गया। लेकिन विनोद दुआ ने शानदार पत्रकारिता के ज़रिए नए नए कीर्तिमान स्थापित किए। ‘सहारा’, ‘ऑब्जर्वर’, ‘चक्रव्यूह’ और ‘न्यूज़ ट्रैक’ पर विनोद दुआ की पत्रकारिता हरदम याद की जाएगी। ‘एनडीटीवी’ पर उनका दैनिक शो अपनी गुणवत्ता के लिए मशहूर था। लोग उसका बेताबी से इंतज़ार करते थे। ‘द वायर’ पर उनकी तीखी टिप्पणियों पर दर्शक रीझते थे क्योंकि वे उनके दिल की बात करते थे। 

विनोद जितने अच्छे सरोकारों को समर्पित पत्रकार थे, उससे अच्छे प्रस्तोता याने एंकर थे। जितने अच्छे प्रस्तोता थे, उससे अच्छे टीवी की बारीकियों के विशेषज्ञ और उससे भी अच्छे गायक। जितने अच्छे गायक, उससे बड़े जानकार थे मुल्क के तमाम हिस्सों के देशज खाने के बारे में। उनका देशभर का ज़ायके का सफ़र उतने ही चाव से देखा जाता था, जितनी गंभीरता से उनका न्यूज विश्लेषण। सबसे बड़ी बात, वे सबसे बेहतरीन इंसान थे। उनके मानवीय गुण बेमिसाल थे। उनकी टीम में सारे सदस्य बराबर थे, चाहे वे किसी भी पद पर हों। नए नए लोगों को खोजकर उन्हें टीवी पत्रकारिता सिखाने का उनका हुनर बेजोड़ था। कितने लोग जानते हैं कि आज इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा ने ‘परख’ के साथ पंजाब से रिपोर्टिंग करते हुए टीवी पत्रकारिता का ककहरा सीखा था। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के पूर्व संपादक दिलीप पडगांवकर और बादशाह सेन भी विनोद दुआ के टीवी स्कूल में रहे थे। मैंने स्वयं उनसे बहुत सी नई बातें सीखी। मेरे साथी विजय त्रिवेदी, डॉक्टर मुकेश कुमार, लोकप्रिय एंकर संदीप चौधरी से लेकर उनसे टीवी पत्रकारिता समझने वालों की एक लंबी सूची है।

अफ़सोस! हालिया दौर में विनोद दुआ को अपनी स्वस्थ्य पत्रकारिता और सरोकारों पर डटे रहने के लिए परेशान किया गया। हालांकि इसका उन पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा। वे अपने अंदाज़ में बेखौफ पत्रकारिता करते रहे। अलबत्ता उन्हें झटका ज़रूर लगा था। अक्सर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हमारी शाम को महफ़िल जम जाती थी और वे तब खेद प्रकट करते थे कि एक ज़माने में राजनीति दूरदर्शन जैसे सरकारी मंच से निष्पक्ष पत्रकारिता करने का अवसर प्रदान करती थी और आज दूरदर्शन किस तरह व्यवहार कर रहा है। एक नवोदित चैनल ने उनके साथ धोखा किया था। शो के लिए तय राशि नहीं दी। यह राशि लगभग पैंतालीस लाख थी। वे खिन्न थे। मुझसे फ़ोन पर बोले, मेरा पैसा तो मैं निकाल कर रहूंगा।

मेरे घर के सारे सदस्य उनके साथ वैसे ही जुड़े थे, जैसे एक पारिवारिक सदस्य होता है। मेरी मां और पत्नी से उनकी एकदम घरेलू बातचीत होती थी। जब मेरे घर दो जुड़वां बेटे आए तो उनका नाम विनोद जी ने मेघ-मल्हार रखा था। चूंकि मेरी बेटी का नाम मेघना है इसलिए अब भी लाड़ में उन्हें मेघना, मेघ मल्हार कहते थे। बच्चों की अपनी बातचीत में विनोद अंकल भी एक विषय होते थे। एक बार मैनें उन्हें लोक कवि ईसुरी की जीवन दर्शन पर आधारित एक रचना गाकर सुनाई। उनके अंतर्मन को छू गई। एक सप्ताह बाद रात साढ़े ग्यारह बजे उनका फोन आया। बोले, क्या कर रहे हैं? मैंने कहा सोने की तैयारी। बोले कुछ आवारागर्दी का मूड है। मैंने कहा, क्यों नहीं, वह तो टॉनिक है। उससे सेहत को कोई नुकसान नहीं होता। पंद्रह मिनट में ही वे मुझे लेने आ पहुंचे। बैठते ही उन्होंने कहा, उस दिन से ईसुरी की वह रचना मेरे दिमाग़ में छाई हुई है। आज वही गाते हैं। फिर हम लोग समवेत वह रचना गाते रहे। वह रचना थी-

‘अब न होबी यार किसी के, जनम-जनम खां सीके, यार करे की बड़ी बिबूचन, बिना यार के नीके...’ ईसुरी की प्रेम केंद्रित फागें भी उन्हें बेहद पसंद थीं। हम लोग सारी रात क़रीब सुबह साढ़े चार बजे तक ईसुरी गाते रहे। बीच बीच में बाबा बुल्ले शाह भी आ जाते थे तो शिव कुमार बटालवी भी। 

मेरे लिए जो क्षति है, वह तो है ही, सारी विश्व पत्रकार बिरादरी के लिए यह बड़ा आघात है। कुछ बरस पहले अमेरिका में था तो वॉशिंगटन में पाकिस्तान के ‘एआरवाई’ चैनल के प्रमुख मोहसिन भाई अक्सर कहते थे, ‘राजेश भाई बंटवारे के बाद कुछ हीरे ऐसे हैं जो पाकिस्तान में भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने हिन्दुस्तान में होंगे। इनमें लता मंगेशकर, जगजीत सिंह, मोहम्मद रफ़ी, खुशवंत सिंह और विनोद दुआ। आपका एक विनोद दुआ सौ-सौ पत्रकार के बराबर है। बाजू में खड़े नेपाल के पत्रकार रघु मैनाली, अफ़ग़ानिस्तान के पत्रकार इक़राम सिंघवारी और बांग्लादेश के पत्रकार (मैं नाम भूल रहा हूं) ने तुरंत इसका समर्थन किया। उनका कहना था कि विनोद जी उनके देशों में भी बड़े आदर से याद किए जाते हैं। 

अलविदा विनोद जी! आपके साथ बिताया समय अनमोल है। आपकी पत्रकारिता का यह देश हमेशा ऋणी रहेगा। 

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