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बिहार में राहुल गांधी ने खड़ा किया बड़ा संकट : समीर चौगांवकर

केंद्र और राज्यों के चुनावों में बीजेपी की सिलसिलेवार जीत भी राहुल गांधी या विपक्ष को परेशान नहीं करती। कांग्रेस और आरजेडी के आपसी संघर्ष ने सारी ताक़त और ऊर्जा को गंवा दिया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago

समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

लोकतंत्र में प्रतिपक्ष का तकाज़ा कठिन है। लगातार चुनावी हार और नकारात्मकता की तोहमत के बावजूद चुनाव में सत्ता पक्ष को उधेड़ना उसका दायित्व भी है और चुनावी जीत के लिए आवश्यक भी। सवाल यह उठता है कि बिहार में विपक्षी दल उन अपेक्षाओं को क्यों नहीं संभाल पाए, जो ताकतवर सरकार के सामने मौजूद प्रतिपक्ष के साथ अपने आप जुड़ जाती हैं?

बिहार में ‘करो या मरो’ के चुनाव के बाद भी विपक्ष इतना लाचार और लचर क्यों नज़र आ रहा है? सोच के खोल आसानी से नहीं टूटते। उन्हें तोड़ने के लिए बदलावों का बहुत बड़ा होना ज़रूरी है। बिहार का यह चुनाव एनडीए से ज़्यादा महागठबंधन के लिए करो या मरो का है। बीच का कुछ समय छोड़ दिया जाए तो 20 साल से सत्ता पर काबिज़ एनडीए पूरी ऊर्जा और एकजुटता के साथ कमर कसकर मैदान में उतर चुका है और विपक्ष उनके सामने कहां खड़ा है?

प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, संघ और संगठन के पैदल सिपाही ज़मीन पर काम शुरू कर चुके हैं, लेकिन राहुल गांधी कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं, न बिहार में और न सोशल मीडिया पर। आज पूरे 56 दिन हो गए हैं जब राहुल गांधी आख़िरी बार बिहार आए थे।

1 सितंबर को उन्होंने पटना में ‘वोट अधिकार यात्रा’ का समापन किया था। उसके बाद राहुल ने बिहार की ओर देखना भी मुनासिब नहीं समझा और पूरी पार्टी को अपने सिपहसालारों के भरोसे छोड़ दिया। राहुल की बिहार से दूरी और राजनीति से अरुचि समझ से परे है। सामने मोदी, शाह और नीतीश जैसे नेता होने के बावजूद राहुल गांधी के अब तक प्रचार से दूरी बनाए रखने ने पूरे विपक्ष के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

केंद्र और राज्यों के चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सिलसिलेवार जीत भी न राहुल गांधी को और न ही विपक्ष को परेशान करती दिखती है। मोदी ने भव्य चुनावी विजयों के साथ यह तय कर दिया है कि अब विपक्ष को उनके जितना लोकप्रिय और अखिल भारतीय नेतृत्व सामने लाना होगा। इससे कम पर मोदी को चुनौती देना नामुमकिन है।

बिहार में कांग्रेस और आरजेडी के आपसी संघर्ष ने सारी ताक़त और ऊर्जा को गवां दिया। इतने महत्वपूर्ण चुनाव में राहुल और तेजस्वी को मिलकर एक और एक ग्यारह होना चाहिए था, पर दोनों का न मन मिला, न हाथ। चुनाव एक दिन का महोत्सव हैं, लेकिन लोकतंत्र की परीक्षा रोज़ होती है।

अच्छी सरकारें नियामत हैं, पर ताकतवर विपक्ष हज़ार नियामत है। जैसे बंद मुट्ठी से रेत फिसल जाती है, वैसे ही बिहार का चुनाव राहुल और तेजस्वी के हाथ से फिसल चुका है। विपक्ष ने सत्ता पक्ष को फिर सत्ता में आने का मौक़ा उपलब्ध करा दिया है। ध्यान रखिए, लोकतंत्र में चुनाव सरकार की सफलता से कम, विपक्ष के ज़मीनी संघर्ष से आंके जाते हैं और राहुल तथा तेजस्वी यही चूक गए।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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