स्वाधीनता काल में हिंदी के विरुद्ध राजनीति: अनंत विजय

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने कालखंड में हिंदी के विरुद्ध मुस्लिम नेताओं के बयानों को जिहाद बताया था। स्वाधीनता पूर्व हिंदी को दुर्बल करने के लिए मुसलमानों ने राजनीति की।

Last Modified:
Monday, 16 March, 2026
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अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

कुछ दिनों पूर्व नागिरीप्रचारिणी सभा, बनारस की फेसबुक वाल पर एक रील देखी जिसमें कवि अशोक वाजपेयी के वक्तव्य का एक अंश था। उस रील में अशोक वाजपेयी ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कविता की समझ को रेखांकित किया था। रील देखने के बाद संदर्भ समझने के लिए अशोक वाजपेयी का पूरा भाषण ढूंढा। पता चला कि नागरीप्रचारिणी सभा के तीन प्रकाशनों पर दिल्ली में एक चर्चा का आयोजन था।

मंच पर अशोक वाजपेयी और सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल इत्यादि थे। अपने भाषण में वाजपेयी कह रहे हैं कि वो हिंदी साहित्य के वैध विद्यार्थी नहीं रहे हैं। एक जमाने जब सबलोग आचार्य राaमचंद्र शुक्ल इत्यादि को विधिवत पढ़ते थे वैसे उन्होंने नहीं पढ़ा। कुछ छुट्टा, इधर उधर पल्लवग्राही रूप में पढ़ा। उन्होंने शुक्ल जी के निबंध कविता क्या है की पंक्तियों को पढ़ उसपर टिप्पणी की। जब वो शुक्ल को उद्धृत करते थे तो उनके बगल में मंच पर बैठे व्योमेश दाद दे रहे थे। पूरे प्रसंग की चर्चा मैंने एक मित्र से की। मेरे मित्र काशीवासी और साहित्यिक अभिरुचि के हैं।

उनसे अशोक वाजपेयी का कथन बताया कि उन्होंने शुक्ल को विधिवत नहीं पढ़ा है तो उन्होंने गंभीरता से एक प्रश्न पूछा कि ये किसका दुर्भाग्य है ? आचार्य का या अशोक वाजपेयी का। मैं तबतक समझ गया था कि वो ऐसा क्यों पूछ रहे हैं। मैंने छूटते ही कहा कि जाहिर तौर पर दुर्भाग्य तो शुक्ल जी का ही रहा। इतना सुनकर मेरे मित्र जोर से हंसे और बोले कि अगर शुक्ल जी को वो विधिवत और समग्रता में पढ़ लेते तो शुक्ल जी पर बोलने के लिए नहीं आते।

ना ही उनके साथ वामपंथी लेखक संघ से जुड़े लोग मंच पर होते। अब मैं थोड़ा विनोद के भाव में आ गया था। मैंने मित्र से पूछा कि उनके कथन का आधार क्या है। उनके अनुसार अगर अशोक वाजपेयी शुक्ल जी के भाषा संबंधी लेखों को विधिवत पढ़ लेते तो शायद नागिरीप्रचारिणी सभा के प्रकाशनों पर बोलने नहीं आते।

दरअसल शुक्ल जी ने हिंदी और उर्दू को लेकर जो लेख नागिरीप्रचारिणी पत्रिका और लीडर जैसी पत्रिकाओं में वर्ष 1908 से 1917 के कालखंड में लिखा उसको अगर वाजपेयी पढ़ लिए होते तो शुक्ल जी की प्रशंसा कर पाते, इसमें संदेह है। शुक्ल जी ने तो हिंदी के विरुद्ध उस समय के मुसलमान नेताओं के वक्तव्यों को ‘पवित्र जिहाद’ कहा था। वो लिखते हैं कि हिंदी के विरुद्ध अपने पवित्र जिहाद में नवाब अब्दुल मजीद वह हर युक्ति अपनाते हैं, जिसमें उनकी तरह सोचनेवाले व्यक्ति विशेष रूप से निपुण कहे जाते हैं।

क्या गलतबयानी, क्या भ्रांतव्याख्या, क्या धमकी, क्या शेखी, क्या स्तुति, क्या निंदा- वे सबका सहारा लेते हैं। यदि सहारा नहीं लेते हैं तो सिर्फ उचित तर्क देने का। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इतने पर नहीं रुकते हैं बल्कि यहां तक कहते हैं कि नवाब साहब जब हिंदुओं को ये याद दिलाते हैं कि पुराने समय में वो मुसलमानों के अधीन थे वहां भी वो ये तथ्य विस्मृत कर जाते हैं कि दिल्ली के मुसलमान बादशाह ब्रिटिश शुरक्षा में आने के पहले मराठों की सुरक्षा में थे। पुराने समय के मुसलमानी साम्राज्य की अपेक्षा सिख और मराठा सम्राज्य जनता की स्मृति में अधिक है।

इसके लिए शुक्ल जी इंपीरियल गजेटियर खंड छह का उदाहरण देते हैं। अशोक वाजपेयी ने सही माना कि वो हिंदी के वैध विद्यार्थी नहीं रहे। जो वैध नहीं रहता है वो क्या होता है ये बताने की आवश्कता नहीं है। अशोक वाजपेयी जैसे लोग भारत की सामासिक संस्कृति की बहुत बातें करते हैं। बहुधा गंगा-जमुनी संस्कृति की भी और हिंदी की जगह पर हिंदुस्तानी को प्राथमिकता देने पर जोर देते रहे हैं। इस पर भी शुक्ल जी ने टिप्पणी की थी। वो लिखते हैं कि जो लोग राजनीतिक दृष्टि से हिंदू-मुस्लिम एकता अत्यंत आवश्यक समझते हैं वे एक बीच का रास्ता पकड़कर ‘हिंदुस्तानी’ लेकर उठे हैं।

इस ‘हिंदुस्तानी’ का समर्थन कुछ उदार समझे जानेवाले मुसलमान और उर्दू की गोद में पले हिंदू भी कर रहे हैं। हम भोली-भाली जनता को उस ‘हिंदुस्तानी से सावधान करना अत्यंत आवश्यक समझते हैं। जो ‘हिंदुस्तानी’ इन लोगों के ध्यान में है वह थोड़ी छनी हुई उर्दू के सिवा कुछ और नहीं है। उर्दू के सब लक्षण जैसे वाक्य रचना की फारसी शैली, अरबी फारसी के अप्रचलित मुंशी-फहम शब्द अरबी-फारसी के कायदे के बहुवचन इसमें वर्तमान रहेंगे तब तो वह ‘हिंदुस्तानी’ कहलाएगी अन्यथा नहीं।

आचार्य शुक्ल उर्दू को अलग भाषा मानते ही नहीं थे वो तो उसको हिंदी की ही एक शाखा मात्र मानते थे। इसको लेकर उनकी बहुत कठोर टिप्पणी है- हर विद्वान जानता है कि उर्दू कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। यह पश्चिमी हिंदी की एक शाखा मात्र है, जिसे मुसलमानों द्वारा अपनी ऐकांतिक रुचियों और पूर्वग्रहों के अनुकूल एक निजी रूप दे दिया गया है। इस प्रकार हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं।

ये बात तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी कही थी। शुक्ल जी ये भी कहते हैं कि उर्दू ईर्ष्यावश संस्कृत शब्दों से परहेज करती है और केवल अरबी और फारसी से शब्द उधार लेती है। शुक्ल जी उर्दू को सैन्य छावनी से निकलनेवाली भाषा नहीं मानते हैं। इस तरह की बातों का उपहास करते थे। विचारणीय प्रश्न ये है कि किस तरह से सैयद अहमद ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर राजनीति आरंभ की और उसको एक समुदाय से जोड़ दिया जो विभाजन तक आते आते बहुत गहरा हो गया। शुक्ल जी ही क्यों उस कालखंड के तमाम लेखकों ने उर्दू को लेकर टिप्पणियां की।

स्वाधीन भारत में जब गंगा-जमुनी तहजीब के ध्वजवाहकों ने राजनीति से लेकर सांस्कृतिक लैंडस्केप पर अपना अधिकार जमाना आरंभ किया तो उन्होंने रामचंद्र शुक्ल, प्रताप नाययण मिश्र, भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट और महावीर प्रसाद दिविदी जैसे दिग्गजों के हिंदी-उर्दू संबंधी लेखन को नेपथ्य में धकेलने का प्रयत्न किया। हिंदी-उर्दू के विवाद में ये बात भी उभर कर आई थी कि उर्दू को जमानेवाले लोग सायास अपनी लेखन में भारतीय इतिहास ग्रंथों और पुराणों से उदाहरण नहीं लेकर फारसी से लेने लगे थे। यहां ये भी देखा जाना चाहिए कि उस समय नागरी लिपि को लेकर भी एक बड़ा विमर्श हुआ था।

नागिरीप्रचारिणी सभा की पत्रिका से लेकर अन्य पत्रिकाओं में भी इस पर चर्चा हुई थी। ये कैसे हो गया कि नागरी में नुक्ता का प्रयोग आरंभ हो गया। अभी प्रकाशित नागिरीप्रचारिणी सभा के मुखपत्र के लेखों में नुक्ता का उपयोग किया गया है। कैसे और क्यों ? विमर्श इस बात पर भी होना चाहिए कि हिंदी में नुक्ता का प्रयोग क्यों ? हिंदी वर्णमाला में तो नुक्ता का स्थान है ही नहीं।

प्रश्न भाषा का तो है ही उससे अधिक बड़ा प्रश्न ये है कि किस तरह से भारतीय लेखन को ओझल किया गया। बाद की पीढ़ियों को अपने पूर्वज लेखकों के सोच से दूर किया गया। इस तरह की शिक्षा पद्धति बनाई गई कि भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों के लेखन को पीछे धकेला जा सके। इस संदर्भ में कुबेरनाथ राय का नाम लिया जा सकता है। कुबेरनाथ राय ने भारतीय पौराणिक ग्रंथों से उदाहरण लेकर विपुल लेखन किया।

उनके लेखन को भी लंबे समय तक अनदेखा किया गया। अब जाकर उनके लेखन पर थोड़ी बहुत चर्चा होने लगी है। अकादमिक जगत में रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य का इतिहास को प्रमुखता दी गई। भाषा संबंधी उनके विचार स्थान नहीं बना पाए। हिंदी को हिंदू और हिंदुस्तान से जोड़कर एक विमर्श खड़ा कर दिया गया। हिंदी राष्ट्रवाद तक की बात की गई और उसपर पुस्तकें प्रकाशित हुईं। जब हम भारतीय सभ्यता की पुनर्स्थापना की बात करते हैं तो साहित्य और भाषा पर पूर्व में हुए विचारों को समग्रता में देखना होगा। बिना उसके हिंदी की विकास यात्रा को नहीं समझा जा सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।

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इतिहास लेखन की बाधा स्लीपर सेल: अनंत विजय

मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के करीब चार वर्ष बाद 2018 में भारत के समग्र इतिहास लेखन का सोच भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च- आईसीएचआर) में आया।

Last Modified:
Monday, 18 May, 2026
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अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

इतिहास एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा भारतीय राजनीति में निरंतर होती रहती है। भारतीय राजनीतिक दल हमेशा एक दूसरे पर दोषारोपण करने में अबतक लिखे इतिहास का सहारा लेते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय इतिहास को समग्रता में देखे और लिखने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार कर चुके हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ वर्षों पहले काशी की एक गोष्ठी में कहा था कि इतिहास लेखन में दूसरे की गलतियों को रेखांकित करने से बेहतर होगा कि अपनी लकीर लंबी की जाए।

कहना ना होगा कि देश का शीर्ष नेतृत्व भारतीय इतिहास को समग्रता में लिखे जाने और देश की जनता के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की अपेक्षा करता है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से वामपंथी इतिहास लेखन की जगह भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन की बात की जाने लगी थी। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के करीब चार वर्ष बाद 2018 में भारत के समग्र इतिहास लेखन का सोच भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च- आईसीएचआर) में आया। चार वर्षों तक वहां इसपर मंथन होता रहा।

इस बीच देश की जनता ने एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत दिया। 2022 में भारत के समग्र इतिहास की योजना पर कार्य आरंभ हुआ। उस समय के समाचार पत्रों में आईसीएचआऱ के चैयरमैन राघवेन्द्र तंवर के हवाले से ये बातें प्रकाशित हैं कि आईसीएचआर भारत के समग्र इतिहास के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने इसको इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर इसकी आलोचना आरंभ कर दी। एक वामपंथी सांसद ने 2022 के दिसंबर में संसद में इसपर प्रश्न भी उठाया।

शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने उस प्रश्न के उत्तर में सदन को बताया था कि इतिहास का पुनर्लेखन नहीं किया जा रहा है। आईसीएचआर ने भारत के समग्र इतिहास लेखन पर एक प्रोजेक्ट आरंभ किया है। कांग्रेस सांसद मनीषे तिवारी ने भी इस पर प्रश्न उठाया था। प्रश्न ये नहीं है कि इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है या इतिहास लेखन के एकांगी प्रविधि से उत्पन्न रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए इतिहास लिखा जा रहा है। प्रश्न ये है कि आईसीएचआर ने 2018 में जो सोचा वो आठ वर्षों बाद भी भौतिक रूप से आकार नहीं ले सका है।

अब तक भारत के समग्र इतिहास का एक भी खंड प्रकाशित नहीं हो पाया है। जबकि इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया गया था। इस प्रोजेक्ट के लिए इतिहासकार सुष्मिता पांडे की नियुक्ति संपादक के पद पर की गई थी। उनके साथ प्रधानमंत्री मेमोरियल लाइब्रेरी से नरेन्द्र शुक्ल को प्रतिनियुक्ति पर लाकर इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया। दो और युवा विद्वानों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया था। नरेन्द्र शुक्ल वापस जा चुके हैं। कहना ना होगा कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के वेतन आदि का खर्च तो आईसीएचआर उठा ही रहा है।

इस बीच आईसीएचआर के सदस्य सचिव रहे उमेश कदम पर 2022 में गंभीर वित्तीय अमियमितता के आरोप लगे। वो यहां से कार्यमुक्त हो गए। भारत के समग्र इतिहास के पहले खंड पर कार्य आरंभ हो चुका था। इस प्रोजोक्ट से जुड़े लोगों ने बताया कि उमेश कदम ने पदमुक्त होने के बाद पत्र लिखकर आईसीएचआर को अपने लिखित कार्यों के उपयोग से रोक दिया था। पहले खंड के लिए उन्होंने मध्यकालीन इतिहास पर लिखा था। उसकी जगह नए व्यक्ति की खोज करना और लिखवाने में समय लगा, बताया गया। इस बात को भी चार वर्ष बीत गए।

अभी तक पहला खंड नहीं आ पाना आईसीएचआर की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है। प्रभारी सचिव ओमजी उपाध्याय को आशा है कि जल्द ही पहला खंड प्रकाशित हो जाएगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि 2022 में ये प्रोजेक्ट जमीन पर उतरा और पहला खंड 2026 में आ जाएगा तो इस हिसाब से तो आठ खंड को प्रकाशित होने में 32 वर्ष लगेंगे। इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के अनुसार ये तय हुआ था कि भारत का समग्र इतिहास का पहला खंड परिचयात्मक होगा। इस खंड में भारत के समग्र इतिहास लेखन की आवश्यकता को स्थापित किया जाएगा।

इस बात की चर्चा होगी कि भारत के इतिहास लेखन का आधार भू-राजनीतिक न होकर भू-सांस्कृतिक होगा। पहला खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का होना था। बढ़ते बढ़ते वो करीब ग्यारह सौ पृष्ठों का हो गया। इसके प्रकाशन के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि ग्यारह सौ पन्नों के पहले खंड को तीन विशेषज्ञों के पास भेजा गया है। उनसे अनुरोध किया गया है कि वो इसका मूल्यांकन करके अपनी राय दें। विशेषज्ञों के लिखे हुए को विशेषज्ञों से मूल्यांकन करवाने की क्या आवश्यकता है। क्या आईसीएचआर को इस प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों पर भरोसा नहीं है।

इस प्रोजेक्ट की संपादक सुष्मिता पांडे विदुषी हैं। आईसीएचआर के अध्यक्ष राघवेन्द्र तंवर स्वयं विद्वान इतिहासकार हैं। ऐसे में मूल्यांकन के लिए बाहर के विद्वानों के पास भेजने की आवश्यकता क्यों ? इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए अगर पहला खंड परिचयात्मक और इस प्रोजेक्ट की आवश्यकता बताने वाला है तो ग्यारह सौ पृष्ठों का भारी भरकम खंड क्यों? क्या ये खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का नहीं होना चाहिए जो पहले तय किया गया था। तय तो ये भी किया जाना चाहिए कि ये प्रोजेक्ट कब तक पूरा होगा? क्या अनंत काल तक इस प्रोजेक्ट को चलाया जाना उचित रहेगा?

क्या आईसीएचआर इसको निश्चित समय सीमा में पूरा नहीं कर सकता है। बहुत संभव है कि आईसीएचआर में अब भी वामपंथियों के स्लीपर सेल सक्रिय हों और इस प्रोजेक्ट को अपने आकाओं के कहने पर लटकाने का उपक्रम कर रहे हों। ये देखना तो अध्यक्ष का काम है कि ये प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो। आईसीएचआर में गड़बड़ियों का समाचार भी आता रहता है. चाहे वो मदर आफ डेमोक्रेसी पुस्तक का प्रकाशन हो या सुभाषचंद्र बोस नाम की पुस्तक का गलत शीर्षक प्रकाशन का मसला हो। दरअसल आईसीएचआर की समस्या बौद्धिक कम प्रशासनिक अधिक प्रतीत होती है।

2022 में उमेश कदम के पद छोड़ने के बाद से वहां स्थायी सदस्य सचिव नहीं हैं। पिछले वर्ष मई में अल्केश चतुर्वेदी को मंत्रालय ने सदस्य सचिव नियुक्त किया लेकिन वो इस पद पर अपना योगदान नहीं दे सके। कारण मंत्रालय और आईसीएचआर बेहतर बता सकते हैं। कुछ दिनों पूर्व फिर से सदस्य सचिव पद के लिए इंटरव्यू हुआ। पैनल तय करके नाम मंत्रालय भेज दिए गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी। अब तो ये भी संदेह होता है कि आईसीएचआर के उच्च पदों पर बैठे लोग ही नहीं चाहते हैं कि वहां सदस्य सचिव के पद पर कोई स्थायी नियुक्ति हो।

अगर सदस्य सचिव आ जाते हैं तो वो संस्था को चलाएंगे, इससे यथास्थितिवादियों को परेशानी हो सकती है। लेकिन चार वर्षों से इतनी महत्वपूर्ण संस्था में सदस्य सचिव का नहीं होना शिक्षा मंत्रालय के निर्णय लेने की क्षमता पर भी प्रश्न खड़े करता है। आईसीएचआर ऐसी संस्था है जिसकी सक्रियता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। बशर्ते कि सक्रिय हो।

( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।

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विदेशी मुद्रा भंडार कितना है? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ईरान युद्ध शुरू होने से पहले $730 बिलियन था। पिछले दो महीने में यह करीब $31 बिलियन घट गया। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से दोहरी मार पड़ी है।

Last Modified:
Monday, 18 May, 2026
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मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

केंद्र सरकार ने पिछले हफ़्ते ताबड़तोड़ फ़ैसले किए हैं। सोने-चाँदी पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा दी गई है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें ₹3 प्रति लीटर बढ़ा दी गई हैं। विदेशी मुद्रा की बचत इन फ़ैसलों के पीछे बड़ा कारण है। हमारे पास साल भर का सामान ख़रीदने के बराबर विदेशी मुद्रा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक 3 महीने का है। फिर ऐसे क़दमों की ज़रूरत क्यों पड़ गई?

हम विदेशी मुद्रा में surplus नहीं हैं, जैसे चीन है। हम जितने डॉलर कमाते हैं, उससे ज़्यादा डॉलर खर्च करते हैं। सामान और सर्विस ख़रीदने के लिए हमारा खर्च मान लेते हैं कि $100 है, तो कमाई $88 है। इसे current account deficit कहते हैं। $12 का गैप हम भरते हैं विदेशी निवेश से, जैसे FDI यानी Foreign Direct Investment, FPI यानी Foreign Portfolio Investment। इसे capital account में रखा जाता है। इस रास्ते से $12-13 आते थे। बचे हुए एक-दो डॉलर रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार में जमा कर देता था।

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ईरान युद्ध शुरू होने से पहले $730 बिलियन था। पिछले दो महीने में यह करीब $31 बिलियन घट गया। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से दोहरी मार पड़ी है। कच्चे तेल की क़ीमतें बढ़ गई हैं, तो डॉलर ज़्यादा ख़र्च करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ़ शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशक $22 बिलियन की बिकवाली कर चुके हैं।

युद्ध से पहले एक डॉलर की क़ीमत करीब ₹90 थी और अब ₹96। जब रुपया गिरता है, तो रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बाज़ार में बेचता है। यह बिक्री इस उम्मीद में की जाती है कि डॉलर की सप्लाई बढ़ेगी, तो उसका दाम नहीं बढ़ेगा। यह कोशिश पूरी तरह सफल नहीं रही है।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अशोक लाहिड़ी ने इंडिया टुडे से कहा कि भारत के पास नौ महीने का सामान ख़रीदने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा है। अंतरराष्ट्रीय मानक है कि कम से कम तीन महीने का विदेशी मुद्रा भंडार होना चाहिए। अभी तो हमारी स्थिति ठीक है, लेकिन युद्ध लंबा खिंचा तो दिक़्क़त आ सकती है। पेट्रोल-डीज़ल और सोने-चाँदी पर हमारी विदेशी मुद्रा का एक-तिहाई हिस्सा ख़र्च होता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने अपील की है कि पेट्रोल-डीज़ल और सोने-चाँदी की खपत फ़िलहाल कम की जाए।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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राहुल गांधी विदेशी नेटवर्क से जुड़े भारत विरोधी ताकतों के सवाल: आलोक मेहता

असल में मैंने नवभारत टाइम्स के विशेष संवाददाता के रूप में 1985 में सीआईए से जुड़े एक जासूसी कांड पर चल रही जाँच पर एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट लिखी थी।

Last Modified:
Monday, 18 May, 2026
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आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के खर्च का विवाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच चल रहा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। बीजेपी का आरोप है कि राहुल गांधी ने पिछले 22 वर्षों में 54 विदेश यात्राएँ की हैं। इन यात्राओं पर अनुमानित खर्च लगभग 60 करोड़ रुपये आया है, जबकि उनकी घोषित आय केवल 11 करोड़ रुपये के आसपास है। कांग्रेस पार्टी इसे गैर-महत्वपूर्ण कहकर कोई विस्तृत सफाई नहीं दे रही।

सवाल केवल यात्राओं और खर्च का नहीं, विदेशों के मेजबान लोगों, संगठनों और फिर वहाँ भारत के लोकतंत्र को लेकर दिए बयानों, गतिविधियों, गुप्त यात्राओं के भी महत्वपूर्ण हैं। शायद राहुल गांधी और कांग्रेस के उनके करीबी नेताओं को उनके सत्ता काल में ही ऐसी विदेश यात्राओं से आए राजनीतिक संकट का ध्यान नहीं है। सबसे बड़ा संकट 1985 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री और पार्टी प्रमुख रहते आया था, जब कांग्रेस के नेताओं की विदेश यात्राओं के तार जासूसी के प्रकरण से जुड़े और मंत्रियों के इस्तीफे करवाने पड़े।

मेरे जैसे पत्रकार उन तथ्यों की ओर ध्यान दिला सकते हैं। असल में मैंने नवभारत टाइम्स के विशेष संवाददाता के रूप में 1985 में सीआईए से जुड़े एक जासूसी कांड पर चल रही जाँच पर एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट लिखी थी।

10 अक्टूबर 1985 को प्रकाशित इस रिपोर्ट में मैंने बताया था कि “सरकारी एजेंसियाँ एक विवादास्पद व्यापारी राम स्वरूप और उससे जुड़े लोगों के संबंधों तथा सीआईए के लिए जासूसी के प्रकरण की जाँच कर रही हैं और इससे राजीव गांधी सरकार के मंत्रियों के नाम भी होने से कांग्रेस तथा पीएम के लिए राजनीतिक संकट पैदा हो सकता है।” खबर पर हंगामा और राम स्वरूप की तरफ से मानहानि का कानूनी नोटिस आना स्वाभाविक था। लेकिन नोटिस के जवाब के बजाय मैंने कुछ फॉलो-अप खबरें करके जासूसी से जुड़े और तथ्यों को छाप दिया।

असल में राम स्वरूप जासूसी प्रकरण 1985-86 के भारत के सबसे रहस्यमय और राजनीतिक रूप से विस्फोटक मामलों में गिना जाता है। इसमें खुफिया एजेंसियों, विदेशी लॉबिंग और राजनीति का मिश्रण दिखाई दे रहा था। 1985 की शुरुआत में भारत में एक अन्य बड़े जासूसी नेटवर्क — कुमार नारायण जासूसी कांड — का खुलासा हुआ। इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय और अन्य विभागों से दस्तावेज लीक होने के आरोप लगे।

तब गुप्तचर एजेंसियों और दिल्ली पुलिस ने गहरी जाँच-पड़ताल शुरू की। इसी व्यापक निगरानी के दौरान राम स्वरूप नेटवर्क पर भी ध्यान गया। सितंबर में राम स्वरूप के घर, दफ्तर और कुछ अन्य ठिकानों पर छापे मारे गए। सरकारी सूत्रों के अनुसार वहाँ से विदेशी मुद्रा, राजनीतिक दस्तावेज, संसद चर्चाओं के नोट्स, रक्षा और विदेश नीति से जुड़ी फाइलें तथा विदेशी संपर्कों के रिकॉर्ड मिले। हमने प्रमुख तथ्य प्रकाशित कर दिए। तब एक-दो अन्य अखबारों में भी उनका उल्लेख हुआ।

जाँच एजेंसियों ने बताया कि राम स्वरूप विदेशी एजेंसियों के लिए सूचनाएँ इकट्ठा करता है। भारत की विदेश और रक्षा नीति पर सूचनाएँ इकट्ठी की गईं तथा प्रभावशाली नेताओं/अधिकारियों को प्रलोभनों से जोड़ रहा था। इसलिए उसके फोन की निगरानी, विदेशी संपर्कों, दूतावासों से संपर्कों और उसके तथा उससे जुड़े लोगों की विदेश यात्राओं के विवरण इकट्ठे किए गए। इसमें ताइवान, इज़राइल जैसे देशों के रास्ते सीआईए के लिए भारत संबंधी जानकारियाँ पहुँचाने की बातें सामने आने लगीं। 29 अक्टूबर 1985 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

दिल्ली हाई कोर्ट में उसने बचाव में कहा कि वह केवल व्यापार प्रोत्साहन का काम करता था। सरकार ने उस पर आरोप लगाया कि वह कुछ देशों के लिए संवेदनशील जानकारी जुटाता रहा था। उसके पास ऐसे दस्तावेज मिले जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे। विदेशी संपर्कों को संवेदनशील सुरक्षा संबंधी जानकारियाँ भेजी जा रही थीं। मामले की संवेदनशीलता देखते हुए कोर्ट की कुछ कार्यवाही इन-कैमरा यानी सार्वजनिक रूप से नहीं हुई। एजेंसियों के वकील ने आरोपपत्र दाखिल किया कि कुछ नेताओं और अधिकारियों ने राम स्वरूप से सुविधाएँ लीं, ताइवान तथा कुछ देशों की राम स्वरूप द्वारा प्रायोजित यात्राएँ कीं। राम स्वरूप ने राजनीतिक प्रभावशाली नेटवर्क बनाया।

इस मामले के गंभीर रूप लेने पर, जैसा हमने लिखा था, राजनीतिक संकट हो गया। तब टीवी, निजी न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया नहीं था। दूसरी तरफ राजीव गांधी सरकार अमेरिका से रिश्ते सुधार रही थी। पार्टी में सोवियत समर्थक लॉबी मजबूत थी। इसलिए 29 जनवरी 1986 को मंत्रिमंडल के दो सदस्यों चंदूलाल चंद्राकर और के. पी. सिंह देव के मंत्री पद से इस्तीफे ले लिए गए। एक अन्य नेता एम. एस. संजीव राव के इलेक्ट्रॉनिक कमीशन के अध्यक्ष पद (कैबिनेट स्तर का) से इस्तीफा हुआ। इन सबके राम स्वरूप के लिए विदेश यात्राओं के प्रमाण मिले थे।

उन पर सीधे जासूसी का औपचारिक आपराधिक आरोप सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक दबाव और विवाद के कारण इस्तीफा लिया गया। भारत से अधिक अमेरिका में इन इस्तीफों को जासूसी कांड से जोड़कर प्रकाशित किया गया। चंद्राकर पहले हिंदी अखबार के संपादक भी रहे थे। इस जासूसी कांड में दो-तीन अन्य पत्रकारों के नाम भी आए। उनसे लंबी पूछताछ हुई। एक तो बाद में अमेरिका जाकर बस गया। बाद में सरकार ने प्रकरण को धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में डाल दिया।

इस तरह की पृष्ठभूमि में भाजपा का यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब राहुल गांधी की कुल संपत्ति और देनदारियाँ लगभग 21 करोड़ रुपये हैं, तो इन विदेश यात्राओं पर खर्च हुए 60 करोड़ रुपये का हिसाब कैसे बैठता है? यह कानूनी सवाल पैदा करता है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के प्रावधानों के तहत किसी भी सांसद, न्यायाधीश या सरकारी अधिकारी को किसी भी एजेंसी द्वारा प्रायोजित यात्रा के लिए गृह मंत्रालय से पूर्व अनुमति लेनी होती है। यदि कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत खर्च पर विदेश यात्रा करता है, तो उसे इसका विवरण आयकर रिटर्न में देना होता है।

यदि विदेश में आपको कोई उपहार मिलता है या आप पर अज्ञात तरीके से पैसा खर्च किया जाता है, तो यह ‘काला धन अधिनियम 2015’ के प्रावधानों के दायरे में आता है। अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी की यात्राओं से अधिक आश्चर्य राहुल की कोलंबिया, वियतनाम, थाईलैंड, कतर, ओमान और मलेशिया की गुपचुप यात्राओं पर होता रहा है। भाजपा ने सवाल किया, “क्या उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं के लिए गृह मंत्रालय से अनिवार्य पूर्व अनुमति प्राप्त की थी? दस्तावेज़ कहाँ हैं? क्या उन्होंने आयकर रिटर्न में इसका खुलासा किया है?”

यही नहीं, पिछले साल सितंबर में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर दिसंबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच राहुल गांधी की छह ‘अघोषित विदेश यात्राओं’ पर चिंता जताई थी। अभी 3 मई 2026 की रात गांधी की मस्कट (ओमान) की निजी यात्रा का एक वीडियो फुटेज सामने आया। उन्होंने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम की घोषणा नहीं की थी।

न तो मेजबान का खुलासा किया गया और न ही कोई यात्रा कार्यक्रम बताया गया। उन्हें किसने आमंत्रित किया था? इसके लिए एफसीआरए की धारा 6 के तहत अनिवार्य अनुमति भी नहीं दिखाई गई है। यदि ओमान से जुड़ी इस जानकारी की पुष्टि हो जाती है, तो यह ‘येलो बुक’ सुरक्षा प्रोटोकॉल (नियमों) के उल्लंघन और अघोषित विदेश यात्राओं के उस क्रम में सातवीं यात्रा होगी। गांधी द्वारा की जा रही ये विदेश यात्राएँ और विशेष रूप से उनकी ‘रहस्यमयी यात्राएँ’ गंभीर सवाल खड़े करती हैं, खासकर तब जब वह भविष्य में देश का प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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भारत की समस्या व्यवस्था नहीं, नागरिक व्यवहार है: राजीव बुद्धिराजा

भारत में गवर्नेंस की समस्या केवल सरकार या व्यवस्था तक सीमित नहीं है। नागरिक अनुशासन, सार्वजनिक व्यवहार और जिम्मेदारी की कमी भी देश के विकास और संस्थागत सुधारों में बड़ी बाधा बनती जा रही है।

Last Modified:
Saturday, 16 May, 2026
rajevbudhiraja

राजीव बुद्धिराजा, मार्केटिंग विशेषज्ञ

भारत में गवर्नेंस यानी सुशासन पर चर्चा कोई नई बात नहीं है। हम नेताओं की आलोचना करते हैं, अफसरशाही पर सवाल उठाते हैं, नीतियों का विश्लेषण करते हैं और हर विफलता के लिए व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराते हैं। टीवी डिबेट से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह सिस्टम पर चर्चा होती है। लेकिन इस पूरी बहस में एक सवाल अक्सर गायब रहता है — क्या भारत की गवर्नेंस समस्या की शुरुआत हम नागरिकों से भी होती है?

गवर्नेंस केवल संसद, मंत्रालयों और सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है। यह ट्रैफिक सिग्नल पर हमारे व्यवहार, सार्वजनिक स्थानों पर हमारी आदतों, कतार में खड़े रहने की हमारी संस्कृति और दूसरों के अधिकारों के प्रति हमारे सम्मान से भी तय होता है। किसी भी देश का सार्वजनिक जीवन उसके नागरिकों के व्यवहार का प्रतिबिंब होता है।

भारत में एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। भारतीय दुनिया भर में अपनी प्रतिभा, मेहनत और नवाचार के लिए पहचाने जाते हैं। भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करती हैं और भारतीय पेशेवर दुनिया की बड़ी संस्थाओं का नेतृत्व करते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में अक्सर वही समाज नियमों को बोझ की तरह देखने लगता है।

हम विश्वस्तरीय सड़कें चाहते हैं, लेकिन ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते। साफ शहरों की मांग करते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते। भ्रष्टाचार की आलोचना करते हैं, लेकिन सुविधा मिलने पर “जुगाड़” और “सिफारिश” का रास्ता अपनाने से भी नहीं हिचकते।

यही वह जगह है जहां भारत का असली गवर्नेंस संकट दिखाई देता है। क्योंकि शासन केवल सरकार और नागरिक के बीच एकतरफा संबंध नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अनुबंध है। सरकार व्यवस्था बनाती है, लेकिन समाज उसे सफल या विफल बनाता है।

जिन देशों को बेहतर गवर्नेंस के उदाहरण के रूप में देखा जाता है — जैसे जापान, सिंगापुर या संयुक्त अरब अमीरात — वहां केवल कानून सख्त नहीं हैं, बल्कि नागरिक अनुशासन सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। लोग सार्वजनिक स्थानों का सम्मान करते हैं, नियमों का पालन बिना डर के करते हैं और सामूहिक जिम्मेदारी को समझते हैं।

भारत में समस्या क्षमता की नहीं, निरंतरता की है। प्राकृतिक आपदाओं, धार्मिक आयोजनों या राष्ट्रीय संकट के समय भारतीय समाज असाधारण सहयोग और जिम्मेदारी का परिचय देता है। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में वही अनुशासन अक्सर गायब हो जाता है।

इसका असर केवल सामाजिक नहीं, आर्थिक और संस्थागत भी है। जब नागरिक अनुशासन कमजोर होता है, तो कानून लागू करने की लागत बढ़ जाती है। पुलिस गंभीर अपराधों की जगह अव्यवस्था संभालने में व्यस्त हो जाती है। नगर निगम बार-बार गंदगी साफ करने में संसाधन खर्च करते हैं। अदालतों पर मामलों का बोझ बढ़ता है क्योंकि नियमों का पालन सामाजिक आदत नहीं बन पाता।

बेशक, इसका अर्थ यह नहीं कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती हैं। व्यवस्था को पारदर्शी, जवाबदेह और कुशल बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि नागरिक जिम्मेदारी के बिना कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकती।

भारत को आज केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि “सिविक मैच्योरिटी” यानी नागरिक परिपक्वता की जरूरत है। अगर हर नागरिक पांच छोटी आदतें बदल ले — ट्रैफिक नियमों का पालन करे, सार्वजनिक स्थानों को साफ रखे, कतारों का सम्मान करे, छोटी रिश्वत और प्रभाव संस्कृति को नकारे और बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनने की शिक्षा दे तो यह किसी बड़े कानून से कम बदलाव नहीं होगा।

एक विकसित राष्ट्र केवल ऊंची जीडीपी, बड़ी इमारतों या आधुनिक तकनीक से नहीं बनता। वह जिम्मेदार नागरिकों से बनता है, जो समझते हैं कि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी साथ-साथ चलती हैं। भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि देश विकसित बन सकता है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम भारतीय विकसित समाज की तरह व्यवहार करने के लिए तैयार हैं?

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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PR प्रोफेशनल्स को सलाम, जो पर्दे के पीछे संभालते हैं भरोसे की डोर: डॉ. सुरेश गौर

दोस्तों, हर साल 21 अप्रैल को भारत में नेशनल PR डे मनाया जाता है। यह दिन 1958 में 'पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया' (Public Relations Society of India) की स्थापना की याद में मनाया जाता है।

Last Modified:
Tuesday, 12 May, 2026
SureshGaur7854

डॉ. सुरेश गौर, पीआर गुरु ।।

दोस्तों, हर साल 21 अप्रैल को भारत में नेशनल PR डे मनाया जाता है। यह दिन 1958 में 'पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया' (पब्लिक रिलेशंस Society of India) की स्थापना की याद में मनाया जाता है। लेकिन यह सिर्फ एक सालगिरह नहीं है। यह उस पेशे को सम्मान देने का दिन है, जो अक्सर खुद सुर्खियों में नहीं रहता, लेकिन तय करता है कि सुर्खियां किस दिशा में जाएंगी।

अक्सर लोग पब्लिक रिलेशंस यानी PR को सिर्फ प्रेस रिलीज भेजने या मीडिया मैनेजमेंट तक सीमित मान लेते हैं। लेकिन असल में यह सिर्फ काम का एक छोटा हिस्सा है। PR की असली कला किसी संगठन और जनता के बीच भरोसा बनाने में होती है। यही वजह है कि एक PR प्रोफेशनल को एक ही दिन में कई अलग-अलग भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं। नेशनल PR डे पर इन्हीं भूमिकाओं और उनके पीछे की कला को समझना जरूरी है।

स्ट्रैटेजिस्ट की भूमिका

किसी खबर के सार्वजनिक होने से पहले PR की शुरुआत एक शांत कमरे और व्हाइटबोर्ड से होती है। यहां सबसे बड़ा सवाल होता है कि लोगों को क्या जानना चाहिए और वे अभी इसकी परवाह क्यों करें। यहीं से कहानी की शुरुआत होती है।

अच्छी PR रणनीति सिर्फ दिखावा नहीं होती, बल्कि बिजनेस के लक्ष्यों और जनता की जरूरतों के बीच संतुलन बनाती है। चाहे नया प्रोडक्ट लॉन्च हो, कोई संकट हो या नई पॉलिसी, PR स्ट्रैटेजिस्ट देर रात तक सोशल मीडिया का माहौल समझता है, सुबह-सुबह नियमों के ड्राफ्ट पढ़ता है और कंपनी को बताता है कि लोगों की प्रतिक्रिया कैसी हो सकती है।

इस भूमिका की असली कला दूरदृष्टि में है। एक अच्छा स्ट्रैटेजिस्ट सिर्फ खबरों पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि पहले से अंदाजा लगा लेता है कि आगे क्या हो सकता है।

स्टोरीटेलर की भूमिका

डेटा जानकारी देता है, लेकिन कहानियां लोगों को जोड़ती हैं। PR इन दोनों के बीच पुल का काम करता है। उदाहरण के तौर पर, बायोमेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट को “20 लाख मरीजों के लिए नई उम्मीद” के रूप में लोगों तक पहुंचाया जाता है। इसी तरह CSR पहल को “गांव की पहली लाइब्रेरी” की कहानी बनाकर पेश किया जाता है।

इस भूमिका में संवेदनशीलता और संतुलन बहुत जरूरी है। जरूरत से ज्यादा प्रचार भरोसा तोड़ देता है और मुश्किल भाषा लोगों की दिलचस्पी खत्म कर देती है। PR प्रोफेशनल कठिन बातों को आसान और इंसानी भाषा में समझाता है, बिना सच्चाई से समझौता किए।

आज के 3 सेकंड वाले अटेंशन स्पैन के दौर में यह किसी कला से कम नहीं है। एक अच्छा स्टोरीटेलर जानता है कि दर्शक अपना समय मुफ्त में नहीं देते, उसे कमाना पड़ता है।

डिप्लोमैट की भूमिका

मीडिया, सरकार, निवेशक, कर्मचारी, एक्टिविस्ट और ग्राहक- हर किसी का नजरिया अलग होता है। PR वह कड़ी है जो इन सभी को जोड़ती है।

जब कोई पत्रकार मुश्किल सवाल पूछता है, तो PR प्रोफेशनल उससे बचने की कोशिश नहीं करता। वह जवाब देता है, संदर्भ समझाता है और रिश्तों को भी संभालता है। जब कर्मचारी बदलाव के दौरान खुद को अनसुना महसूस करते हैं, तो PR सिर्फ नोटिस जारी नहीं करता, बल्कि बातचीत के मंच तैयार करता है।

इस भूमिका की असली ताकत संतुलन में है। PR प्रोफेशनल कंपनी का पक्ष भी रखता है और जनता की चिंता भी समझता है। भरोसा इसी बीच के रास्ते में बनता है।

क्राइसिस मैनेजर की भूमिका

कोई भी PR टीम को अच्छे दिनों में फोन नहीं करता। फोन तब आता है जब कोई ट्वीट गलत वजह से वायरल हो जाए, फैक्ट्री में हादसा हो जाए या CEO का बयान गलत तरीके से पेश हो जाए।

क्राइसिस मैनेजर की भूमिका बहुत कठिन होती है। इसमें नींद छोड़कर स्थिति को संभालना पड़ता है। “नो कमेंट” कहने की बजाय यह कहना पड़ता है कि “अभी हमारे पास पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन हम कार्रवाई कर रहे हैं।”

इस भूमिका की कला है- संयम, तेजी और जिम्मेदारी। तेजी से काम करना जरूरी है, लेकिन बिना लापरवाही के। पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन बिना नुकसान पहुंचाए। सबसे पहले लोगों की सुरक्षा और फिर ब्रांड की छवि।

रिसर्चर की भूमिका

जिस बात को खुद नहीं समझते, उसे लोगों तक सही तरीके से पहुंचाया नहीं जा सकता। हर साफ-सुथरे मैसेज के पीछे लंबी रिसर्च, डेटा, मीडिया ऑडिट, प्रतिस्पर्धियों की रणनीति और नियमों की समझ होती है।

PR रिसर्चर 80 पन्नों की रिपोर्ट पढ़ता है ताकि प्रवक्ता 80 सेकंड में सही जवाब दे सके। उसे पता होता है कि कौन-सा शब्द किस समुदाय को प्रभावित करेगा और कौन-सा डेटा पत्रकार इस्तेमाल करेगा।

गलत जानकारी के इस दौर में यह भूमिका बेहद जरूरी है। PR की विश्वसनीयता एक गलत तथ्य से खत्म हो सकती है।

डिजिटल एक्सपर्ट की भूमिका

अब खबरें सिर्फ टीवी या अखबारों तक सीमित नहीं हैं। सुबह का Reddit पोस्ट रात तक टीवी डिबेट बन सकता है। इसलिए PR को सोशल मीडिया, सेंटिमेंट डैशबोर्ड, इन्फ्लुएंसर और कमेंट सेक्शन पर लगातार नजर रखनी पड़ती है।

लेकिन असली कला सिर्फ टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने में नहीं, बल्कि सही फैसला लेने में है। हर ट्वीट का जवाब जरूरी नहीं और हर ट्रेंड पर ब्रांड की राय देना भी जरूरी नहीं।

एक अच्छा डिजिटल PR प्रोफेशनल जानता है कि कब बोलना है, कब समझाना है और कब चुप रहना है।

काउंसलर की भूमिका

PR का सबसे मुश्किल काम बयान लिखना नहीं, बल्कि कभी-कभी यह कहना होता है कि “हमें बयान जारी नहीं करना चाहिए” या “माफी आपको खुद मांगनी होगी।”

PR प्रोफेशनल कंपनी के बड़े अधिकारियों को सलाह देता है। इसके लिए हिम्मत, भरोसा और वर्षों की मेहनत से बनाई गई साख चाहिए।

यह भूमिका शॉर्ट टर्म फायदे की जगह लॉन्ग टर्म प्रतिष्ठा को प्राथमिकता देती है। कभी-कभी यह चेतावनी भी देती है कि कोई कैंपेन लोगों को नाराज कर सकता है।

एजुकेटर की भूमिका

दुनिया तेजी से जटिल होती जा रही है- चाहे बायोमेडिसिन हो, फिनटेक हो या क्लाइमेट टेक। PR आम लोगों और विशेषज्ञों के बीच अनुवादक का काम करता है।

यह “CRISPR” जैसी तकनीक को आसान भाषा में समझाता है और यह भी बताता है कि कोई नीति किसान के लिए क्यों जरूरी है।

लोकतंत्र में समझ से सहमति बनती है और बाजार में समझ से अपनापन बढ़ता है। इसलिए PR सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि जागरूकता का भी काम करता है।

एथिक्स की भूमिका

ऊपर बताई गई सारी भूमिकाएं बेकार हैं अगर उनमें नैतिकता नहीं है। नैतिकता के बिना PR सिर्फ प्रचार बनकर रह जाता है।

एक ईमानदार PR प्रोफेशनल हमेशा खुद से पूछता है- क्या यह सच है? क्या यह सही है? क्या हम कल भी इसका बचाव कर पाएंगे?

वह सच छिपाने की बजाय सही जानकारी देने की कोशिश करता है। क्योंकि जनता का भरोसा उधार की तरह होता है, जिसे सम्मान के साथ लौटाना पड़ता है।

इतने सारे रोल क्यों जरूरी हैं?

दोस्तों, कंपनियां सिर्फ खराब प्रोडक्ट की वजह से नहीं टूटतीं। वे तब कमजोर पड़ती हैं जब लोगों का भरोसा खत्म होने लगता है। और भरोसा तब टूटता है जब संवाद खत्म हो जाए, भ्रम बढ़ जाए या अहंकार दिखने लगे।

PR का सबसे बड़ा काम इसी भरोसे को बनाए रखना है। यह शुरुआती चेतावनी देने वाली प्रणाली है, स्पष्ट जानकारी देने वाला माध्यम है और रिश्तों को मजबूत रखने वाला जरिया है।

PR में करियर बनाने वाले छात्रों के लिए यह समझना जरूरी है कि यह आसान पेशा नहीं है। इसमें जिज्ञासा, धैर्य और मजबूत नैतिक सोच चाहिए। कई बार उन गलतियों के लिए भी आलोचना झेलनी पड़ती है जो आपकी नहीं होतीं और कई बार उन संकटों का श्रेय भी नहीं मिलता जिन्हें आपने टाल दिया।

कंपनियों के नेताओं के लिए भी संदेश साफ है- PR टीम को सिर्फ संकट आने पर मत बुलाइए। उन्हें शुरुआत से शामिल कीजिए। जितनी जल्दी सही जानकारी मिलेगी, उतना बेहतर वे आपकी साख की रक्षा कर पाएंगे।

पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी यह याद रखना जरूरी है कि PR और मीडिया दोनों का मकसद एक ही है- जनता तक भरोसेमंद जानकारी पहुंचाना।

नेशनल PR डे पर सलाम

आज का दिन उन PR प्रोफेशनल्स के नाम है, जो खुद पीछे रहकर दूसरों की आवाज को आगे बढ़ाते हैं। उन लोगों के नाम, जो गलत समय पर भी फोन उठाते हैं, सही शब्द चुनते हैं और जानते हैं कि शब्द बाजार, समाज और लोगों की सोच बदल सकते हैं।

दोस्तों, पब्लिक रिलेशंस सिर्फ कला नहीं, बल्कि कला, विज्ञान और जिम्मेदारी का मेल है। इसका मकसद एक ही है- भरोसा कमाना, उसे बनाए रखना और टूट जाए तो फिर से जोड़ना।

यही इस पेशे की सबसे बड़ी ताकत है। और यही वजह है कि यह सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी देने लायक करियर है।

सभी PR प्रोफेशनल्स को नेशनल PR डे की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

 

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गोवा फेस्ट पर उठे सवालों के बीच शुभ्रांशु सिंह बोले, इसे बेहतर बनाना सबकी जिम्मेदारी

अपने एक लेख में सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने कहा, गोवा फेस्ट केवल एक फेस्टिवल नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री की सामूहिक पहचान और विरासत है।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2026
Shubhranshu Singh

शुभ्रांशु सिंह, सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ।।

देश की ऐडवर्टाइजिंग और क्रिएटिव इंडस्ट्री में ‘गोवा फेस्ट 2026’ को लेकर जारी बहस के बीच सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने इस प्रतिष्ठित आयोजन का समर्थन करते हुए कहा है कि किसी भी संस्था को उसकी कमियों की वजह से खत्म करने की बजाय उसे बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए।

एक विस्तृत लेख में शुभ्रांशु सिंह ने गोवा फेस्ट पर उठ रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि भारत में इंडस्ट्री द्वारा बनाई और लगातार चलाए जाने वाली संस्थाएं बहुत कम हैं। ऐसे में गोवा फेस्ट केवल एक फेस्टिवल नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री की सामूहिक पहचान और विरासत है।

उन्होंने लिखा कि गोवा फेस्ट की शुरुआत किसी सरकारी आदेश, कानून या किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की पहल से नहीं हुई थी। इसे ‘एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ और ‘द एडवरटाइजिंग क्लब’ ने मिलकर बनाया और पिछले 19 वर्षों से लगातार आगे बढ़ाया है।

शुभ्रांशु सिंह के मुताबिक, ‘किसी भी संस्था को खड़ा करना आसान नहीं होता। संस्थाएं अपने आप नहीं बनतीं, बल्कि लगातार प्रयास, भागीदारी और समय के साथ मजबूत होती हैं। उन्होंने कहा कि आज लोग गोवा फेस्ट की मौजूदगी को सामान्य मानने लगे हैं, लेकिन यही किसी सफल संस्था की सबसे बड़ी पहचान होती है।’

उन्होंने दुनिया की कई बड़ी संस्थाओं और आयोजनों का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘कान्स लायंस’, ‘ऑस्कर’, ‘ओलंपिक’ और ‘दावोस’ जैसे मंच भी विवादों, पक्षपात और आलोचनाओं से गुजरे हैं। बावजूद इसके, लोगों ने इन संस्थाओं को खत्म करने की जगह सुधारने की कोशिश की।

शुभ्रांशु सिंह ने माना कि गोवा फेस्ट को लेकर उठ रहे कई सवाल पूरी तरह जायज हैं। उन्होंने नेटवर्क एजेंसियों के वर्चस्व, जूरी में सीमित प्रतिनिधित्व, ब्रैंड साइड क्लाइंट्स की कम भागीदारी, बढ़ती लागत और सीखने की बजाय एंटरटेनमेंट पर अधिक फोकस जैसे मुद्दों को वास्तविक चिंताएं बताया।

हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि यदि गोवा फेस्ट नहीं होगा, तो भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री के पास ऐसा कौन-सा साझा मंच है, जहां बड़े स्तर पर लोग एकत्र हों, नए विचारों पर चर्चा करें, बेहतरीन काम को पहचान मिले और इंडस्ट्री के लिए साझा मानक तय किए जा सकें।

उन्होंने कहा कि फिलहाल इसका कोई विकल्प मौजूद नहीं है। गोवा फेस्ट भले ही परफेक्ट न हो, लेकिन यह वही मंच है जिसे इंडस्ट्री ने खुद बनाया और वर्षों तक जिंदा रखा।

अपने लेख में शुभ्रांशु सिंह ने भारत में ‘इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग’ यानी संस्थाएं खड़ी करने की कमजोर संस्कृति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत में लोग संस्थाओं की आलोचना तो खूब करते हैं, लेकिन उन्हें मजबूत बनाने के लिए उतनी प्रतिबद्धता नहीं दिखाते।

उन्होंने लिखा कि अक्सर एक पीढ़ी बेहद मेहनत से कोई संस्था खड़ी करती है, जबकि अगली पीढ़ी उसकी कमियां गिनाने लगती है। यही स्थिति अब गोवा फेस्ट के साथ भी दिखाई दे रही है।

शुभ्रांशु सिंह ने ‘मोमेंटम’ यानी निरंतरता की अहमियत समझाते हुए कहा कि 19 वर्षों में गोवा फेस्ट ने इंडस्ट्री के भीतर रिश्ते, संवाद, पहचान और साझा संस्कृति तैयार की है। यदि ऐसी संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं, तो उनकी जगह तुरंत कोई बेहतर विकल्प तैयार नहीं हो जाता। इसके बजाय इंडस्ट्री छोटे-छोटे बिखरे मंचों में टूट जाती है और सामूहिक पहचान कमजोर होने लगती है।

उन्होंने सुझाव दिया कि गोवा फेस्ट को बेहतर बनाने के लिए जूरी सिस्टम में सुधार, स्वतंत्र एजेंसियों के लिए अलग श्रेणी, क्लाइंट्स की ज्यादा भागीदारी और युवा प्रोफेशनल्स व क्षेत्रीय एजेंसियों के लिए कम लागत वाले विकल्प जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।

लेख के अंत में शुभ्रांशु सिंह ने इंडस्ट्री से अपील करते हुए कहा कि केवल आलोचना करने की बजाय लोगों को आगे आकर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी भी संस्था को मजबूत बनाने का रास्ता उसे छोड़ देना नहीं, बल्कि उसके भीतर रहकर सुधार करना होता है।

उन्होंने कहा, ‘गोवा फेस्ट परफेक्ट नहीं है, लेकिन यह हमारा अपना मंच है। इसकी आलोचना हो सकती है, लेकिन इससे दूरी बनाने की नहीं, इसे बेहतर बनाने की जरूरत है।’

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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बिहार की प्रतिभाओं को अब चाहिए फिल्म स्कूल: अनंत विजय

बिहार में फिल्म और नाट्य संस्थान की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। कला और संस्कृति विभाग की पहल के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि राज्य को जल्द अपना संस्थान मिल सकता है।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2026
anantvijay

अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

बिहार में फिल्म और नाट्य शिक्षा को लेकर लंबे समय से महसूस की जा रही कमी अब एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे की ओर से सोशल मीडिया पर साझा की गई एक जानकारी ने इस बहस को नई दिशा दे दी। पोस्ट में बताया गया कि बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने संस्थान का दौरा किया और वहां चलाए जा रहे शॉर्ट टर्म कोर्स तथा आउटरीच कार्यक्रमों की जानकारी ली। साथ ही बिहार में ऐसे कार्यक्रम शुरू करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।

इस पहल ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले की गई उन घोषणाओं की याद दिला दी, जिनमें राज्य में फिल्म और नाट्य संस्थान स्थापित करने की बात कही गई थी। उस समय तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए कहा था कि बिहार फिल्म एवं नाट्य संस्थान की स्थापना को मंजूरी दी गई है, जो राज्य की कला और संस्कृति को नई पहचान देगा। वहीं विजय कुमार सिन्हा ने भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) की तर्ज पर बिहार नाट्य विद्यालय खोलने की बात कही थी।

अब जबकि बिहार में नई सरकार का गठन हो चुका है और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री की भूमिका में हैं, उम्मीद जताई जा रही है कि चुनाव पूर्व किए गए वादों पर ठोस पहल होगी। FTII पुणे का हालिया दौरा भी इसी दिशा में एक संभावित कदम माना जा रहा है।

दरअसल, बिहार लंबे समय से रंगमंच और अभिनय की समृद्ध परंपरा वाला राज्य रहा है। मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी, अखिलेंद्र मिश्रा और विजय कुमार जैसे कलाकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। लेखक और निर्देशक अमिताभ सिन्हा जैसे फिल्मकार भी बिहार से निकलकर FTII पुणे तक पहुंचे। बावजूद इसके राज्य में आज तक कोई सरकारी फिल्म और टेलीविजन संस्थान या नाट्य विद्यालय स्थापित नहीं हो पाया।

हर साल बिहार के सैकड़ों छात्र अभिनय, फिल्म निर्माण, पटकथा लेखन, निर्देशन और तकनीकी क्षेत्रों में करियर बनाने का सपना देखते हैं। लेकिन संस्थान नहीं होने के कारण उन्हें दिल्ली, मुंबई या दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों के कई प्रतिभाशाली छात्र महंगे निजी संस्थानों तक पहुंच ही नहीं पाते।

इसी कारण अब यह मांग उठ रही है कि बिहार में केवल अभिनय प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि साउंड रिकॉर्डिंग, एडिटिंग, डबिंग, सिनेमैटोग्राफी और वीएफएक्स जैसी आधुनिक तकनीकी विधाओं का प्रशिक्षण देने वाला संस्थान स्थापित किया जाए। अगर राज्य सरकार चाहे तो केंद्र सरकार के सहयोग से FTII पुणे या सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI), कोलकाता का क्षेत्रीय केंद्र बिहार में खोला जा सकता है।

बिहार में फिल्म सिटी निर्माण की चर्चा भी पिछले कुछ समय से चल रही है। बांका क्षेत्र में संभावनाओं को लेकर अधिकारियों और फिल्म जगत से जुड़े लोगों ने दौरा भी किया था। लेकिन केवल फिल्म सिटी बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन भी जरूरी होगा और यह तभी संभव है जब राज्य में फिल्म शिक्षा का मजबूत ढांचा तैयार किया जाए।

हाल ही में पश्चिम बंगाल में अमित शाह द्वारा विश्वस्तरीय नाट्य और कला विद्यालय की बात किए जाने के बाद बिहार में भी ऐसी अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। बिहार के लोगों का मानना है कि “डबल इंजन” सरकार का लाभ राज्य को कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी मिलना चाहिए।

बिहार में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। जरूरत केवल अवसर, संसाधन और संस्थागत समर्थन की है। यदि राज्य सरकार इस दिशा में गंभीर पहल करती है, तो यह केवल कला शिक्षा का विस्तार नहीं होगा, बल्कि बिहार के युवाओं के सपनों को नई उड़ान देने वाला बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।

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बंगाल को निवेश की राह पर लौटना होगा: पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन ने पश्चिम बंगाल की राजनीति बदल दी। लेकिन उद्योगों के पलायन और धीमी आर्थिक वृद्धि ने अब राज्य की विकास नीति और औद्योगिक भविष्य पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2026
milindkhandekar

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगुर और नंदीग्राम केवल दो जगहों के नाम नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे मोड़ साबित हुए जिन्होंने राज्य की सत्ता, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक दिशा तीनों को बदल दिया। साल 2006 में वाम मोर्चा (Left Front) ने 235 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उस समय तक लेफ्ट की सरकार को लगभग 30 साल पूरे हो चुके थे और मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य यह समझ चुके थे कि केवल कृषि और कुटीर उद्योगों के भरोसे बंगाल को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

इसी सोच के तहत कोलकाता के पास सिंगुर में टाटा मोटर्स (Tata Motors) को नैनो कार प्लांट लगाने के लिए जमीन दी गई। वहीं नंदीग्राम में केमिकल हब के लिए भूमि अधिग्रहण शुरू हुआ। यह वामपंथी राजनीति के पारंपरिक आर्थिक मॉडल से बड़ा बदलाव था। लेकिन यहीं से विरोध की राजनीति भी शुरू हो गई।

भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नेता ममता बनर्जी को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल गया। ममता बनर्जी लंबे समय से वाम मोर्चा को सत्ता से हटाने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन ने उन्हें जनता के बीच नई पहचान और समर्थन दिया।

विरोध इतना बढ़ा कि टाटा मोटर्स को सिंगुर प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा। उसी दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने रतन टाटा को मशहूर संदेश भेजा — “Welcome to Gujarat.” कुछ ही दिनों में टाटा मोटर्स ने गुजरात के साणंद में अपना प्लांट लगाने का फैसला कर लिया। यह घटना भारतीय राजनीति और उद्योग जगत दोनों में एक बड़े प्रतीक के रूप में देखी गई। सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन ने अंततः पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की तीन दशक पुरानी सत्ता खत्म कर दी। साल 2011 में ममता बनर्जी “परिवर्तन” के नारे के साथ सत्ता में आईं। लेकिन 15 साल बाद अब वही “परिवर्तन” सवालों के घेरे में है।

आलोचकों का मानना है कि राजनीतिक बदलाव के बावजूद आर्थिक नीतियों में बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। ममता सरकार ने लक्ष्मी भंडार जैसी कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, लेकिन बड़े उद्योगों को आकर्षित करने में राज्य अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया। संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 2011 से 2025 के बीच करीब 7 हजार कंपनियों ने पश्चिम बंगाल से अपना रजिस्टर्ड ऑफिस दूसरे राज्यों में शिफ्ट कर लिया। इनमें 110 सूचीबद्ध कंपनियां भी शामिल थीं।

इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देता है। कभी कोलकाता की तुलना मुंबई से होती थी। 1961 में बंगाल प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश के शीर्ष पांच राज्यों में शामिल था, लेकिन अब वह निचले राज्यों में गिना जाने लगा है। वहीं गुजरात जैसे राज्यों ने तेज औद्योगिक विकास के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली।

इसी पृष्ठभूमि में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में सिंगुर में इंडस्ट्रियल पार्क बनाने का वादा किया है। यह केवल एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और आर्थिक प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बंगाल को फिर से उद्योग और निवेश की राह पर लौटना होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में वास्तविक परिवर्तन केवल सत्ता बदलने से नहीं आएगा। इसके लिए आर्थिक नीतियों में स्पष्ट बदलाव, उद्योगों के लिए भरोसेमंद माहौल और रोजगार आधारित विकास मॉडल की जरूरत होगी। सिंगुर का घाव आज भी बंगाल की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में महसूस किया जाता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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बंगाल से बिहार तक, 2029 के लिए भाजपा का नया मिशन: आलोक मेहता

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की सफलता को 2029 लोकसभा चुनाव की बड़ी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पूर्वी भारत में बढ़ती पकड़ BJP के राष्ट्रीय समीकरण बदलने का संकेत मानी जा रही है।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2026
aalokmehta

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बड़ी सफलता को अब केवल एक राज्य की राजनीतिक जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2029 लोकसभा चुनाव की संभावित रणनीतिक नींव के रूप में देखा जा रहा है। बंगाल में मिली बढ़त भाजपा के लिए पूर्वी भारत में राजनीतिक विस्तार का संकेत है, जिसका असर आने वाले राष्ट्रीय चुनावों में दिखाई दे सकता है।

2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत से पीछे रह गई थी और उसे 240 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। हालांकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने सरकार बना ली, लेकिन भाजपा के लिए यह स्पष्ट संदेश था कि उसे नए क्षेत्रों में राजनीतिक मजबूती हासिल करनी होगी। इसी संदर्भ में अब पश्चिम बंगाल को सबसे अहम राज्य माना जा रहा है।

बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं और लंबे समय तक यहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दबदबा रहा है। लेकिन हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन ने यह संकेत दिया है कि पार्टी अब ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में भी संगठनात्मक आधार मजबूत कर चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह रुझान कायम रहता है, तो 2029 लोकसभा चुनाव में भाजपा बंगाल में अपनी सीटें दोगुनी से अधिक कर सकती है।

भाजपा की रणनीति अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं दिखती। पार्टी पूर्वी भारत को अपने नए विस्तार क्षेत्र के रूप में देख रही है। ओडिशा, असम और बिहार में उसकी बढ़ती ताकत इसी दिशा की ओर इशारा करती है। असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा लगातार मजबूत हुई है, जबकि ओडिशा में भी पार्टी ने पिछले वर्षों में तेजी से विस्तार किया है।

बिहार में भी भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी है। यहां पार्टी के पास सम्राट चौधरी जैसे बड़े चेहरे हैं, जबकि जनता दल यूनाइटेड (JDU) के साथ गठबंधन भी उसके लिए अहम बना हुआ है। राजनीतिक समीकरणों को देखें तो भाजपा 2029 में बिहार से अपनी सीट संख्या बढ़ाने की तैयारी में दिखाई देती है।

हालांकि भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र बने रहेंगे। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें राष्ट्रीय राजनीति की धुरी मानी जाती हैं। 2024 में यहां भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ था। ऐसे में पार्टी 2029 से पहले संगठनात्मक और सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में जुटी हुई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका और प्रदेश नेतृत्व की एकजुटता भी आने वाले समय में महत्वपूर्ण रहेगी।

महाराष्ट्र में भी 2024 में भाजपा को उम्मीद से कम सफलता मिली थी। लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में पार्टी यहां फिर से मजबूती हासिल करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि गठबंधन स्थिर रहता है और विपक्ष बिखरा रहता है, तो भाजपा महाराष्ट्र में वापसी कर सकती है।

इसके अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और ओडिशा जैसे राज्यों में भाजपा अपनी मौजूदा बढ़त बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पार्टी संगठन को और मजबूत करने की कोशिश जारी है। भाजपा नेतृत्व अब 2029 को केवल अगला चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की अगली बड़ी लड़ाई के रूप में देख रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह लगातार चुनावी तैयारी और संगठन विस्तार पर फोकस बनाए हुए हैं।

राजनीतिक तौर पर यह भी दिलचस्प है कि कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दल पूर्वी भारत में कमजोर स्थिति में दिखाई दे रहे हैं। बंगाल में वाम दलों की पकड़ पहले जैसी नहीं रही, जबकि बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में भाजपा इस राजनीतिक खालीपन को अवसर के रूप में देख रही है।

हालांकि 2029 की तस्वीर अभी दूर है और राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल अब राष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण रणक्षेत्र बनने जा रहा है। भाजपा की नजर यहां सिर्फ एक चुनावी जीत पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहुमत के नए गणित पर टिकी हुई है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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एमेजॉन के बड़े इंटीग्रेशन के बाद क्या होगी करण बेदी और अमोघ दुसाद की नई भूमिका?

एमेजॉन ने भारत में अपनी स्ट्रीमिंग स्ट्रैटेजी को बड़ा आकार देते हुए Amazon के Prime Video और MX Player को एकीकृत करने का फैसला लिया है।

Last Modified:
Thursday, 07 May, 2026
Karan Amogh

कंचन श्रीवास्तव, एक्सचेंज4मीडिया

एमेजॉन ने भारत में अपनी स्ट्रीमिंग स्ट्रैटेजी को बड़ा आकार देते हुए Amazon के Prime Video और MX Player को एकीकृत करने का फैसला लिया है। इस कदम के बाद अब इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों करण बेदी और अमोघ दुसाद की भूमिका आगे क्या होगी।

एमेजॉन ने गुरुवार को इस इंटीग्रेशन की घोषणा करते हुए साफ किया कि कंपनी अब अपने फ्री और पेड स्ट्रीमिंग बिजनेस को एक ही प्लेटफॉर्म के तहत चलाएगी। इस नए स्ट्रक्चर में गौरव गांधी पूरे एकीकृत प्लेटफॉर्म का नेतृत्व जारी रखेंगे।

अब तक एमेजॉन की AVOD (Advertising Video on Demand) स्ट्रैटेजी मिनीटीवी और एमएक्स प्लेयर के जरिए आगे बढ़ रही थी। एमएक्स प्लेयर के डायरेक्टर और हेड करण बेदी प्लेटफॉर्म की ग्रोथ और बिजनेस स्ट्रैटेजी संभालते हैं। वहीं अमोघ दुसाद, हेड ऑफ कंटेंट के तौर पर ओरिजिनल कंटेंट और प्रोग्रामिंग को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

यह भी पढ़ें: OTT बाजार में बड़ा दांव, साथ आए Amazon MX Player और Prime Video

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमोघ दुसाद का ट्रांजिशन नए स्ट्रक्चर में अपेक्षाकृत आसान रहेगा, क्योंकि कंटेंट की भूमिका एकीकृत प्लेटफॉर्म में और मजबूत होगी। वहीं करण बेदी के लिए स्थिति थोड़ी जटिल मानी जा रही है, क्योंकि नए स्ट्रक्चर में कई बिजनेस और प्लेटफॉर्म फंक्शंस एक साथ आ रहे हैं, जिससे जिम्मेदारियों का ओवरलैप हो सकता है।

हालांकि, अभी तक एमेजॉन ने किसी भी अधिकारी के पद या जिम्मेदारियों में बदलाव को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की है। कंपनी से इस संबंध में प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।

इंडस्ट्री में यह भी चर्चा है कि करण बेदी संभवतः Applause Entertainment से जुड़ सकते हैं और वहां समीर नायर की जगह ले सकते हैं। हालांकि इस पर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह इंटीग्रेशन एमेजॉन की बड़ी स्ट्रैटेजी का हिस्सा है, जिसके तहत कंपनी अलग-अलग ब्रैंड्स को चलाने के बजाय एक मजबूत और एकीकृत वीडियो इकोसिस्टम बनाना चाहती है। इस नए मॉडल में AVOD, SVOD (Subscription Video on Demand), TVOD (Transactional Video on Demand) और ऐड-ऑन सब्सक्रिप्शन—all-in-one प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगे।

बता दें कि एमएक्स प्लेयर ने जहां फ्री कंटेंट, इंटरनेशनल डब्ड शोज और माइक्रोड्रामा के जरिए बड़ी ऑडियंस बनाई, वहीं प्राइम वीडियो ने प्रीमियम कंटेंट और फ्रेंचाइज़ आधारित प्रोग्रामिंग पर फोकस किया। अब दोनों को मिलाकर एमेजॉन एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार कर रहा है, जो विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन—दोनों से मजबूत रेवेन्यू मॉडल बना सके।

ग्लोबल स्तर पर भी अब फ्री और पेड स्ट्रीमिंग के बीच का अंतर तेजी से कम हो रहा है। ऐसे में एमेजॉन का यह कदम न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी उसकी पकड़ को मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है।

(अंग्रेजी में लिखी गई मूल कॉपी को आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

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