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सौभाग्य और दुर्भाग्य का फर्क आखिर है क्या: नीरज बधवार
इस हादसे में अपने छोटे भाई को खोने का दुख हरदम उन्हें कचोटता रहता है, और उस दिन की यादें उनको हर वक्त परेशान करती हैं। मनोविज्ञान की भाषा में इसे Survivor Guilt कहा जाता है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago
नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
अहमदाबाद प्लेन हादसे में जब एक शख्स के ज़िंदा बचने की ख़बर सामने आई तो लोगों ने उसे दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान कहा। मगर अब पता चल रहा है कि हादसे में बचे विश्वास कुमार बेहद डिप्रेशन में हैं। उन्होंने खुद को कमरे में बंद कर लिया है। यहां तक कि वो अपनी बीवी और बच्चे से भी बात नहीं करते। कहीं काम पर भी नहीं जा रहे। इस हादसे में अपने छोटे भाई को खोने का दुख हरदम उन्हें कचोटता रहता है, और उस दिन की यादें उनको हर वक्त परेशान करती हैं। मनोविज्ञान की भाषा में इसे Survivor Guilt कहा जाता है।
अभी कुछ दिन पहले यूपी के एक शख्स का वीडियो सोशल मीडिया पर देखा। वो बता रहा था कि कुछ महीने पहले उसने अपनी बीवी को खोया था। उसके जाने के बाद वो सामान्य होने की कोशिश कर रहा था। वो लोग अपने ननिहाल एक कार्यक्रम में आए थे। उसके मामा के घर एक शादी थी, जो नदी के दूसरी तरफ थी। उसकी मां, मौसी और उसका इकलौता बेटा एक नाव में बैठकर दूसरी ओर चले गए।
उसे भी उसी नाव में जाना था, मगर नाव में जगह न होने के कारण उसने सोचा कि वो अगले चक्कर में चला जाएगा। लेकिन वो नाव रास्ते में पलट गई। हादसे में उसकी मां, मौसी और उसका इकलौता बेटा मर गए। मतलब, बीवी के जाने के बाद जिन मां और बेटे के सहारे वो ज़िंदा था, अब वो भी नहीं रहे। वो आदमी रोते हुए बस यही कह रहा था कि काश मैं भी उस नाव में होता। मैं इस दर्द को बर्दाश्त नहीं कर सकता।
याद आता है कि नेपाल में कुछ साल पहले आए भूकंप में एक अस्सी साल के बुज़ुर्ग बता रहे थे कि उनके परिवार के 18 लोग भूकंप में मारे गए। कोई नहीं बचा, बस वो बचे हैं और उन्हें इस बात का अफसोस है कि वो क्यों बच गए।
आप चाहें तो कह सकते हैं कि जिस प्लेन हादसे में ढाई सौ लोग मारे गए, अगर कोई एक आदमी उसमें बच गया है, तो वो खुशकिस्मत है। जिस नाव हादसे में 18 लोगों की जान चली गई, जो आदमी उसमें सवार नहीं हो पाया, वो भी खुशकिस्मत है। मगर जब हम ये देखते हैं कि किसी इंसान के होने का वजूद सिर्फ उसके ज़िंदा रहने से नहीं, बल्कि उन लोगों के साथ ज़िंदा होने से है जो उसके अपने हैं तो फिर आपको वो खुशकिस्मती सबसे बड़ी सज़ा लगने लगती है।
एक इंसान जो अस्सी साल की उम्र में अपनी बाकी ज़िंदगी इस अहसास के साथ जीने के लिए अभिशप्त है कि उसके परिवार का एक भी सदस्य ज़िंदा नहीं है, उससे ज़्यादा बदनसीब और कौन होगा? जिस शख्स ने कुछ महीनों में अपनी मां, बीवी और इकलौते बच्चे को खो दिया, उससे ज़्यादा दुखी और कौन होगा? और ढाई सौ लोगों के बीच जो शख्स जलते जहाज़ से ज़िंदा लौट आया हो, लेकिन उसका छोटा भाई उसमें मारा गया हो उससे ज़्यादा ग्लानि में और कौन होगा?
कभी-कभी हम सारा जीवन ये नहीं समझ पाते कि हमारा दुर्भाग्य क्या है और सौभाग्य क्या। क्या हमारा सौभाग्य भविष्य की भौतिक कल्पनाओं में है, दूसरों की सोशल मीडिया पर दिखाई Selected ज़िंदगी को जीने में है, या हमारा सौभाग्य उन लोगों के साथ जीवन जीने में है जो हमारे अपने हैं? फिर चाहे हालात कैसे भी क्यों न हों। शायद ये फर्क समझने में ही ज़िंदगी बीत जाती है और हम अपना सौभाग्य देख नहीं पाते।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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