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पत्रकारिता अपने आचरण से अपमानित हो तो यह गंभीर चेतावनी है मिस्टर मीडिया!

पत्रकारिता की आड़ में वैचारिक जंग पर उतारू इन महारथियों को समझना होगा कि उनके व्यवहार से समूचे पेशे की बदनामी होती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।। 

धार्मिक जहर का हथियार पत्रकारिता 

भारतीय जनता पार्टी को अपने दो प्रवक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी। इन प्रवक्ताओं ने पत्रकारिता के परदे का सहारा लेकर अल्पसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया था। इसकी आग समंदर पार पहुंची और भारत सरकार को अपना रवैया साफ करना पड़ा कि वह सभी धर्मों का सम्मान करती है और किसी भी मजहब की आस्थाओं को चोट नहीं पहुंचाना चाहती।

सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को बताया कि टीवी चैनलों पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की राय से उसका कोई लेना देना नहीं है। अब बहस यह चल पड़ी है कि क्या टेलिविजन चैनलों को अपने मंच का इस्तेमाल सियासी पार्टियों के उस जहर का प्रसार करने देना चाहिए, जो भारतीय संविधान के ढांचे और लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। भारत का संविधान दुनिया भर में बड़े आदर के साथ देखा जाता है। यह प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म के चुनाव का हक देता है, लेकिन एक धर्म का अनुयायी दूसरे धर्म की निंदा करता है तो उसे संरक्षण नहीं देता। चाहे वह अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक। 

भारत जैसे विराट लोकतंत्र में यह बहस जायज है और यकीनन सामाजिक हस्तक्षेप की मांग  करती है। हम देख रहे हैं कि कुछ वर्षों से भारतीय पत्रकारिता गैर जिम्मेदारी के रास्ते पर चल पड़ी है। न्यायपालिका से लेकर अन्य प्रबुद्ध वर्गों ने उसके इस भटकाव पर अनेक बार गंभीर चिंता प्रकट की हैं। मैंने इस स्तंभ में भी कई बार इन चिंताओं का जिक्र किया है। सर्वोच्च न्यायालय और कुछ उच्च न्यायालयों ने तो पत्रकारिता को बाकायदा  फटकार लगाई है और कहा है कि वे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अराजक होने की छूट नहीं ले सकते। यह अफसोसनाक है कि पत्रकारिता के तमाम अवतारों पर यह गैर जिम्मेदारी नियंत्रित होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है ।

कहावत है कि एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। पत्रकारिता की आड़ में वैचारिक जंग पर उतारू इन महारथियों को समझना होगा कि उनके व्यवहार से समूचे पेशे की बदनामी होती है। यह सच है कि सारे पत्रकार मर्यादा की सीमा नहीं लांघते। मगर एक वर्ग के अमर्यादित और अभद्र आचरण से सभी पर उंगलियां उठती हैं। यदि पूर्वजों की ओर से स्थापित आचार संहिता के बुनियादी सिद्धांतों का हम पालन नहीं करते तो एक दिन वह भी आएगा, जब समाज और देश पत्रकारिता को ही खारिज कर देगा। पत्रकारिता के इतिहास में वह बेहद कलंकित अध्याय होगा। जिस पत्रकारिता ने मुल्क की आजादी के अनुष्ठान में आहुति दी हो, वह अपने आचरण से लांछित और अपमानित की जाने लगे तो यह आने वाले दिनों के लिए गंभीर चेतावनी है।


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