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विजय शाह जैसे नेता समाज और सियासत के लिए कलंक : समीर चौगांवकर
दरअसल हमारी राजनीति ही नहीं, हमारे समूचे सार्वजनिक विमर्श की भाषा बहुत सपाट, अश्लील और निरर्थक हो चुकी है। इस विमर्श में सिर्फ़ नफ़रत है और शब्द अपने अर्थ जैसे खो चुके हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 9 months ago
समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
विजय शाह जैसे नेता समाज और सियासत दोनों के लिए कलंक है। विजय शाह का बयान माफ़ी लायक़ नहीं है। समाज,सेना और देश का गर्व कर्नल सोफिया कुरैशी के ख़िलाफ़ अभद्र भाषा दरअसल सांप्रदायिक नफ़रत की ख़ाद से पैदा हुई है और इसके पीछे बस मुस्लिम घृणा का इकलौता एजेंडा है। विजय शाह जैसे लोग राजनीति में आते हैं तो वे राजनीति का बहुत भला नहीं करते।
बीजेपी की राजनीतिक संस्कृति में विजय शाह जैसे लोग स्वीकार्य नहीं होने चाहिए। बीजेपी का चाल,चरित्र और चेहरा बाक़ी दलों से अलग है। संघ के संस्कार से बीजेपी निकली है। बीजेपी “पार्टी विथ डिफरेंस” का दंभ भरती है, तों उसे अन्य राजनीतिक दलों से अलग दिखना भी चाहिए।
सेना का सम्मान बड़ा है या विजय शाह का आदिवासी होना? पूरे देश में अपनी छीछालेदार कराना स्वीकार्य है, लेकिन विजय शाह अपरिहार्य है? दरअसल हमारी राजनीति ही नहीं, हमारे समूचे सार्वजनिक विमर्श की भाषा बहुत सपाट,अश्लील और निरर्थक हो चुकी है।
इस विमर्श में सिर्फ़ नफ़रत है और शब्द अपने अर्थ जैसे खो चुके हैं। शब्द या किसी का बयान तभी चुभते या तंग करते हैं जब वे बहुत अश्लील या फूहड़ ढंग से इस्तेमाल किए जाते हैं। राजनीतिक दलों को कुछ नहीं चुभता, बस वे उसे अपने राजनीतिक इस्तेमाल के लायक बना लेते है। हम भी अपना पक्ष देखकर उनका विरोध या बचाव करते हैं। दरअसल यह समाज का संकट है।
हम सूक्ष्मता और गहराई में सोचने और जीने का अभ्यास खो बैठे हैं। समझने की ज़रूरत है कि राजनीति का शील सिर्फ़ शब्दों का शील नहीं होता। वह मुद्दों और आचरण का भी शील होता है। विजय शाह के शब्दों के चयन में दिख रहा है कि पुराने पूर्वग्रह कैसे शब्दों के चयन से बाहर आते हैं। विजय शाह के बयान में सत्ता का दर्प झलक रहा है। इसे कोई संवेदनशील व्यक्ति लक्ष्य कर सकता है।
विजय शाह को माफ़ी से मुक्ति नहीं मिलना चाहिए। शाह का इस्तीफा नहीं होने की सबसे अहम वजह आदिवासी वोटर्स की मजबूरी भी है। हरसूद और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में शाह का काफी प्रभाव है। वे पिछले 40 साल से इस इलाके से जनप्रतिनिधि हैं।
विजय शाह 12 साल पहले 14 अप्रैल 2013 को भी महिलाओं को लेकर झाबुआ में बेहद अभद्र और अश्लील टिप्पणी की थी, तब उनसे केवल 4 महीने के लिए मंत्री पद छीना था लेकिन बाद में विजय शाह के बग़ावती तेवर देखकर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान विजय शाह को गले लगाते हुए आदिवासी वोट बैंक की खातिर वापस अपने मंत्रिमंडल में जगह दी थी। मैं बीजेपी का प्रशंसक हूँ, लेकिन विजय शाह के बयान से शर्मिंदा हूँ।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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