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भारतीय संचार परंपरा का उत्सव है कुंभ: प्रो. संजय द्विवेदी

कुंभ भारतीय संचार और ज्ञान परंपरा का एक ऐसा उत्सव और जुटान है, जिससे ‘भारत’ को जानने की समझ मिलती है। आंखें मिलती हैं। नई रोशनी मिलती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago

- प्रो. संजय द्विवेदी ।।

साथ मिलना- बैठना, संवाद करना और लोक विमर्श से बनी है महान परंपरा

कुंभ भारतीय संचार और ज्ञान परंपरा का एक ऐसा उत्सव और जुटान है, जिससे ‘भारत’ को जानने की समझ मिलती है। आंखें मिलती हैं। नई रोशनी मिलती है। भारत जैसे विशाल देश, उसकी संस्कृति, संत परंपरा का यह महाउत्सव है। स्वयं को जानना, भारत को जानना, भारत के धर्म और उसकी विविध ज्ञान धाराएं और ज्ञान परंपरा का अवगाहन करने का यह उत्सव है। भारत की अद्भुत संचार परंपरा का भी यह केंद्र है। सामान्य जन से लेकर देश के प्रभुजनों का न सिर्फ यहां आगमन होता है, बल्कि यहां से मिले संदेश को वे देश भर में लेकर जाते हैं। यहां संवाद, संदेश और एकत्व का सृजन खास है। दुनिया भर के मनुष्य एक हैं और वे एक ही भावबोध से बंधे हुए हैं यह विचार यहां हमें मिलता है। भारत का ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ का विचार इसके मूल में हैं। जो सामान्य जन को शक्ति देता है। यहां से प्राप्त विचार हमें जीवन युद्ध में खड़े और डटे रहने का हौसला देते हैं। यह सामान्य संवाद क्षण नहीं है, विमर्श का भी उत्सव है।

भारत की संवाद और संचार परंपरा से ही यह राष्ट्र सांस्कृतिक रूप से एक रहा है। इसलिए कहते हैं इस राष्ट्र में राज्य अनेक थे, राजा अनेक थे किंतु राष्ट्र एक था। राष्ट्र को जोड़ने वाली शक्ति ही संस्कृति ही। इसलिए विष्णु पुराण में हमारे ऋषि कह पाए-

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥

इस सांस्कृतिक एकता को बनाए रखने के लिए संवाद सबसे जरूरी तत्व था। जिससे सम भाव, मम भाव और समानुभूति पैदा होती है। उत्तर से दक्षिण तक,पूर्व से पश्चिम तक समूचा भारत एक भाव से जुड़े और सोचे इसके लिए ऐसे आयोजन जरूरी हैं जो एकत्व के सूत्र को मजबूत कर सकें। कुंभ एक ऐसा ही आयोजन है जिसमें समूचा भारत एक साथ आकर अपने सामयिक संदर्भों, जीवन संदर्भों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों पर विचार करता है। हमारी संत परंपरा, ऋषि परंपरा के नायक हमें संवाद के वे सूत्र देते हैं जिनसे हमारा आगे का जीवन समर्थ होता है। संवाद परंपरा की यह उजली परिपाटी आज भी बनी हुई है। एक समय था जब हमारे पास संवाद के,संचार के समाचार के आधुनिक माध्यम नहीं थे। मीडिया या पत्रकारिता नहीं थी। किंतु समाज था, लोग थे, विविध भाषाएं थीं। संवाद, संचार और शास्त्रार्थ जैसे शब्द भी थे। ये आधुनिक शब्द नहीं हैं। यानी तब भी समाज में जीवंत संचार परंपरा थी। जिसने सारे राष्ट्र को जोड़ रखा था। राजा राज्यों को बनाते होंगें, किंतु भारत राष्ट्र को ऋषियों ने रचा है। इसलिए यह राष्ट्र चिरंतन है। एक साथ नया और पुराना दोनों है। इसलिए भारत राष्ट्र को एक ओर जीता जागता राष्ट्रपुरुष कहा गया तो दूसरी ओर भारतमाता कहकर इससे आत्मीयता का संबंध भी बनाया गया। ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’ यह मंत्र इसी भाव की सार्थक अभिव्यक्ति है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा है-

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

भारतीय ज्ञान परंपरा में विमर्श का सबसे बड़ा मंच कुंभ ही है। जहां समूचे विश्व से साधक, ज्ञानी और विद्वान आते हैं। उनकी उपस्थिति में वहां होने वाली चर्चाएं जहां आध्यात्मिक जीवन के लिए प्रेरक होती हैं, वही लोकजीवन के लिए भी उनके संदेश प्रेरणा बनते हैं। यहां होने वाले विमर्श और चर्चाएं सारे भारत के गिरिवासियों, नगरवासियों, ग्रामवासियों और वनवासियों तक पहुंचती रही हैं। संवाद और संचार की यह परंपरा कितनी वैज्ञानिक रही होगी कि यहां होने वाली चर्चाओं का समूचा संदेश उसी रूप में बिना विकृत हुए आमजन तक पहुंचता रहा है। जबकि आधुनिक संचार माध्यमों से प्रसारित संदेशों ग्रहणशीलता के कई तल हैं। ऐसा अनेक अध्ययनों में प्रामाणिक हो चुका है। यानी कुंभ की संचार और संवाद परंपरा ज्यादा प्रभावी तथा लोकमंगलकारी है। सही मायनों में लोकप्रबोधन का सबसे सशक्त माध्यम हमारे देश की वाचिक परंपरा रही है। वाचिक परंपरा के नाते ही श्रुति और स्मृति परंपरा हमारे सामने आती है। इसका बहुत महत्व है। विद्वान मानते हैं कि बोले हुए शब्द हमारी सांस्कृतिक परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण हैं।  प्रख्यात संस्कृतिकर्मी विनय उपाध्याय कहते हैं,- “वेद हमारे आदिग्रंथ हैं तो उनके मंत्र लगभग दो हज़ार वर्षों तक हमारी मानवीय सभ्यता के पास मौखिक परंपरा में ही रहे। स्मृति और कंठ ने इन्हें कई पीढि़यों तक जीवित रखा। जब लिपि का आविष्कार हुआ तब वे ग्रंथ में यानी पृष्ठों पर अंकित हुए। सामवेद से जन्में संगीत का ही कमाल है कि आज भी वे स्वर और लय की निश्चित गतियों और आरोह-अवरोह में गाये जाते हैं। थोड़ा आगे बढ़ें तो रामायण और महाभारत की कथाएँ आख्यान की रोचक-रम्य शैली में आज तक जन मानस को आन्दोलित करती हैं।”

  भारत की संचार परंपरा वास्तव में श्रुति और स्मृति परंपरा से ही आकार लेती है। जिसका उद्देश्य ही लोकमंगल और विश्वमंगल है। लोककल्याण भारत की चिति है। इससे कम और ज्यादा कुछ नहीं। हमारे शास्त्र कई रूपों में इसकी घोषणा करते हैं। भारत के पर्व, उत्सव,मेले, प्रवचन, प्रदर्शन कलाएं, लोक कलाएं,संगीत, साहित्य, योग, आयुर्वेद सब लोकमंगल में ही अपनी मुक्ति खोजते हैं। कुंभ मेला इन अभिव्यक्तिजन्य कलाओं का सामूहिक मंच रहा है। जहां ज्ञान,कला, संगीत और ज्ञान-विज्ञान के सभी अनुशासन अपना स्थान पाते रहे हैं। इन सामूहिक अभिव्यक्तियों से ही समूचा भारत प्रेरित होता रहा और जीवनी शक्ति पाता रहा। भारत में मनुः भव की संस्कृति को अपने समूचे लोकजीवन में स्थापित किया। इसलिए सर्वभूत हिते रताः का भाव पूरे भारत के मन पर अंकित हो गया। जिसे तुलसीदास के शब्दों में सुनें तो-

परहित सरिस धर्म नहिं भाई,

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।

(श्री रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)

 यही बात एक मंत्र में भी कही गई-

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

परोपकार और लोकमंगल भारतीय अवचेतन का लक्ष्य है। शायद इसीलिए बाद के दिनों में मिर्जा गालिब भी इसे इस रूप में लिखते हैं-

यूं तो मुश्किल है हर काम का आसां होना,

आदमी को मयस्सर नहीं इंसा होना।

 भारत की सांस्कृतिक यात्रा में कुंभ के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि विविधता भरे इस समाज को एक सूत्र में जोड़ने का काम ऐसे आयोजनों के माध्यम से होता रहा है। भारत की सांस्कृतिक थाती और विरासत को बनाने, बचाने और संवादरत रखने का काम भी इन आयोजनों ने किया है। ज्ञान को अमृत मानकर चखने की परंपरा का उत्कर्ष ही कुंभ है। यह काम दुनिया में भारत ही कर सकता है। वह ज्ञान में ही रत है यानी ‘भा-रत’ है। संचार के जितने भी प्रकार हो सकते हैं, कुंभ में उन सबका प्रकटीकरण होता  है। इन अर्थों में यह सभा आध्यात्मिक शुद्धि के विचारों से कहीं आगे है, जिसमें संपूर्ण जीवन का विचार है। यहां पारंपरिक संगीत,नृत्य, कलाओं, शिल्प कौशल सबके प्रयोग से सार्थक संवाद का सृजन होता है। आध्यात्मिक यात्रा के साथ-साथ विविध जीवनानुभवों की साक्षी बनकर व्यक्ति भारत की सांस्कृतिक भाव यात्रा से भी जुड़ जाता है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी विवरण में कहा गया है कि,-“ वर्ष 2025 का महाकुंभ मेला सिर्फ एक सभा नहीं है; यह स्वयं की ओर एक यात्रा है। अनुष्ठानों और प्रतीकात्मक कृत्यों से परे, यह तीर्थयात्रियों को आंतरिक प्रतिबिंब और परमात्मा के साथ गहरे संबंध का अवसर प्रदान करता है। आधुनिक जीवन की माँगों पर अकसर हावी रहने वाली दुनिया में, महाकुंभ मेला एकता, पवित्रता और ज्ञानोदय के प्रतीक के रूप में खड़ा है। यह कालातीत तीर्थयात्रा शक्तिशाली अनुस्मारक के रूप में कार्य करती है कि मानवता के विभिन्न मार्गों के बावजूद, हम मूल रूप से शांति, आत्म-बोध और पवित्र के प्रति स्थायी श्रद्धा की ओर एक साझा यात्रा के लिए एकजुट हैं।”

     कुंभ यानी साथ मिलना- बैठना, संवाद करना और लोक विमर्श से बनी इस महान परंपरा का आधुनिक युग में भी महत्व कम नहीं हुआ है। आज के समय में जब समूची दुनिया में संघर्ष, कत्लेआम, युद्ध और श्रेष्ठता के लिए दूसरे को कुचल डालने के षड़यंत्र आम हैं। मानवता संकटों से घिरी हुई है। ऐसे कठिन समय में भारत की संवाद और संचार की परंपरा हमारे तनावों को कम करने में सहयोगी हो सकती है। भारत ने संवाद और शास्त्रार्थ के माध्यम से संकटों की हल निकालने की परिपाटी विकसित की है। जहां हिंसा और आतंक का कोई स्थान नहीं है। संवाद न होने से ही ज्यादातर संकट खड़े होते हैं। संवाद की दुनिया इसका एकमात्र विकल्प है। एक ही देश से अलग होकर बने दो देशों में भी संवाद नहीं है। रूस-यूक्रेन इसके उदाहरण हैं। भारत-पाकिस्तान-बंगलादेश भी इस क्रम में गिनाए जा सकते हैं। इसका एकमात्र कारण है कि हमने लोकमंगल और संवाद का विचार त्याग दिया है। संवाद न होने से राज्य-राज्य,व्यक्ति-व्यक्ति, समाज-समाज टकरा रहे हैं। कुंभ का विचार आध्यात्म, ज्ञान और संवाद तीनों की त्रिवेणी है। इससे उपजी संवाद की धाराएं हमें  लोकमंगल और विश्वमंगल के लिए प्रेरित करती हैं। एक सुंदर दुनिया बनाने के लिए हमें इन्हीं भावों से भरी मनुष्यता का निर्माण करना पड़ेगा। यह विश्व मानवता के सुमंगल का विचार करने की जगह भी है। मानवता के सम्मुख चुनौतियां हम सबकी हैं। समूचे विश्व की हैं। आध्यात्म जहां हमें समष्टि से जोड़ता है वहीं संवाद हमें आपस में जोड़ता है। कुंभ भारतबोध का भी उत्सव है। यह हमें बताता है कि भारत क्या है। यहां आप भारत को महसूस कर सकते हैं। पत्रकार उमेश चतुर्वेदी के अनुसार, “भारतबोध शब्द दो शब्दों का सम्मिलन है—भारत और बोध, जिसका सामान्य अर्थ होता है भारत का बोध। स्पष्ट है कि भारत बोध का अभिप्राय है भारत संदर्भित वे अनुभूत तथ्य और सत्य, जिसमें देश की सामूहिक चेतना आप्लावित होती है। भारतबोध, भारतीयता का ही चैतन्य विस्तार है।”

आज जब विश्वमानवता के सामने संकट के बादल छाए हुए हैं, ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में कुंभ का आयोजन सही मायने में बहुत प्रासंगिक है। इसके आयोजन से विश्व मानवता आपस में जुड़ती है, संवादित होती है और लोकमंगल के संकल्प प्रखर होते हैं।  उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत की संचार और संवाद परंपरा का अनुगमन कर समूचा विश्व अपने संकटों का ठोस और वाजिब हल तलाश सकेगा।

लेखक परिचयः 

प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में 10 वर्ष मास कम्युनिकेशन विभाग के अध्यक्ष, विश्वविद्यालय के कुलपति और कुलसचिव भी रहे।  भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली (आईआईएमसी) के  पूर्व महानिदेशक हैं। 'मीडिया विमर्श' पत्रिका के सलाहकार संपादक। राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर निरंतर लेखन। अब तक 35 पुस्तकों का लेखन और संपादन।

 

 

 

 

 

 


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