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पत्रकारिता, संवेदनशीलता और हमारे समय के मूल प्रश्न : राणा यशवंत
इस तरह के जीवन से लेकर निजी स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी दफ्तरों में शोषण वाली बेलगाम व्यवस्था हर जगह दिखती है। यह सख्त नियंत्रण और नियमन की माँग करती है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago
राणा यशवंत, वरिष्ठ पत्रकार, कवि, लेखक।
मधुबनी की एक हरिजन बस्ती में हाल के बिहार चुनावों के दौरान पहुँचा। दोपहर में महिलाएँ एक जगह बैठकर बतिया रही थीं। मैंने बताया कि चुनाव के सिलसिले में घूम रहा हूँ, आपके पास यहाँ से गुज़र रहा था तो आ गया। बात करने के बाद जब चलने लगा तो एक महिला इसरार करने लगी कि सर, एक बार मेरा घर तो देख जाओ।
मैंने कहा, चलिए आपका घर देख लेता हूँ। पगडंडी से होकर एक बांसवाड़ी में मिट्टी और टाट से बने मकान तक वह ले गई। उस बांसवाड़ी में चार मकान और थे, थोड़े-थोड़े फासले पर। आगे एक छोटा-सा ओसारा था और उससे लगते दो कमरे। मैंने कमरा खुलवाया तो एक चौकी पड़ी थी, बिस्तर नहीं था। मैंने पूछा, आपके कमरे में ठंड है, रात में बिना ओढ़ने के कैसे सोते होंगे? बोली, साहब बोरा-चटाई डाल लेते हैं।
खाना? मेरे पति मजदूरी पर गए हैं, कुछ ले आएँगे तो पकाऊँगी। घर में ऐसा कुछ नहीं दिखा जो दुर्दशा को ढाँकता-छुपाता हो। फटेहाली चारों तरफ़ से झाँक रही थी। मन बहुत ख़राब हुआ। तीन बच्चों के साथ पाँच लोगों का परिवार अपना गुज़ारा करने भर का नहीं जुटा पा रहा है और देश में न जाने कहाँ-कहाँ क्या-क्या बहाया, उड़ाया जाता रहता है।
भारत जैसे देश में लोकहित और व्यवस्था परक कई बड़े और महत्वपूर्ण प्रश्न पत्रकारिता से उम्मीद करते हैं कि उनको गंभीरता से रखा जाए। अभाव और शोषण का जीवन किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न भी। लेकिन हाशिए पर जी रहा वह समाज सरकारों की प्राथमिकता में अब भी अपनी जगह नहीं बना पा रहा। और ख़बरों की दुनिया उससे लगभग बेख़बर है।
इसी तरह पूर्णिया के क़स्बा विधानसभा इलाके में एक गाँव गया। एक आदमी कहीं से लकड़ी काटकर साँझ के जलावन के लिए ले आया था। माँ के नाम पर गैस सिलिंडर था, उनके गुज़रने के बाद वह अपने नाम पर ट्रांसफर करवाने की कोशिश कर चुका था, मगर हो नहीं सका। घर के दरवाज़े पर तीन साल का बच्चा कटोरे में सूखा भात खा रहा था।
आवास योजना का पैसा आया, लेकिन बेटी को जाउंडिस हो गया, सीरियस हो गई, पैसा सब उसमें लग गया। जिसको मैं घर कह रहा हूँ वह मिट्टी और ऐस्बेस्टस का एक कमरा और सामने छोटा ओसारा भर था। लकड़ी लाने के बाद वह आदमी परिवार के शाम के राशन के जुगाड़ में निकलने वाला था।
इस तरह के जीवन से लेकर निजी स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी दफ्तरों में शोषण वाली बेलगाम व्यवस्था हर जगह दिखती है। यह सख्त नियंत्रण और नियमन की माँग करती है। जब भी इससे दो-चार होते हैं, लगता है इस मोर्चे पर सब कुछ के साँचे में आने तक आवाज़ उठाते रहना चाहिए। कौन उठाएगा? ज़ाहिर है पत्रकार। उठाते हैं? नहीं न? क्यों? चर्चा होनी चाहिए।
मैंने ऊपर दो घटनाओं और कुछ ज़रूरी क्षेत्रों में जनविरोधी तंत्र के होने का ज़िक्र इसलिए नहीं किया कि यह कोई रहस्योद्घाटन है। सब सर्वविदित है। बावजूद इसके उधर से आँखें बंद हैं, सवाल यह है। बल्कि पत्रकारिता अपने दायित्व से उसको लगभग रद्द कर चुकी है। नतीजा यह है कि एक बड़ी आबादी मजबूर और लाचार है। जबकि थोड़ी-सी सक्रियता सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था को तंद्रा से जगा सकती है।
लोगों के जो अधिकार उदासीनता, बेईमानी और भ्रष्टाचार के हाथों मार दिए जाते हैं, बहुत हद तक बचाए जा सकते हैं। पत्रकारिता इन्हीं सवालों और सरोकार का मोर्चा है, ऐसा नहीं है। लेकिन इनके बिना वह क्या किसी काम की है? भारत के टीवी न्यूज़ चैनलों से लेकर अख़बार और डिजिटल माध्यम तक अपने-अपने हित साधने का तंत्र बन चुके हैं, यह आम आदमी को लगता है।
इससे मुक्त होने की ज़िम्मेदारी किसकी है? बेशक पत्रकारिता की। होगा कैसे? पत्रकारिता में एक ऐसे इकोसिस्टम के ज़रिए जो देश के मूल प्रश्नों और चिंताओं पर पत्रकारों को संवेदनशील और परिवर्तनकारी औज़ार की तरह तैयार कर सके। संभव है? बेशक। लेकिन भटकाव के इस काल में उसके लिए एक अलग विमर्श और व्यवस्था निर्माण पर चर्चा की आवश्यकता होगी।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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