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कांग्रेस राज में हुई बड़ी जासूसी का जवाब जरूरी: आलोक मेहता
यह भंडाफोड़ होने पर पूर्व रॉ प्रमुख सीडी सहाय ने कहा था, अमेरिका से सख्त सवाल होना चाहिए। हम इस मामले को दबा कर नहीं रख सकते और हमें अमेरिका से जवाब मांगना चाहिए।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
पहलगाम में पर्यटकों पर घातक आतंकी हमला करवाने से लेकर ऑपरेशन सिंदूर जारी रहने तक पाकिस्तान लगातार झूठ बोलता रहा है। पाकिस्तान के झूठ उजागर करने के लिए भारत सरकार ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को विभिन्न देशों की यात्रा पर भेजने का फैसला किया। ऑपरेशन सिंदूर का मकसद और पाकिस्तान का असल चेहरा दुनिया को बताने के लिए देश के 59 सांसदों को 33 देश भेजा गया है। 59 सांसद 7 सर्वदलीय टीमों (डेलिगेशन) में बंटे हैं। 7 टीमों के साथ 8 पूर्व राजनयिक भी हैं।
विदेश सचिव ने सांसदों को इस मिशन के लिए भारत सरकार के महत्वपूर्ण मुद्दों की जानकारियां दी। प्रतिनिधि मंडलों में कांग्रेस पार्टी के भी वरिष्ठ नेता पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, आनंद शर्मा, संयुक्त राष्ट्र में रहे राजनयिक से नेता बने शशि थरुर भी शामिल हैं। फिर भी राहुल गाँधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और जयराम रमेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सिंदूर आपरेशन और सीजफायर पर जवाब मांग रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के नेता सिंदूर ऑपरेशन के स्थगन में अमेरिका के हस्तक्षेप के आरोप लगा रहे हैं जबकि विदेश मंत्री एस जयशंकर कई बार बता चुके हैं कि पाकिस्तान ने अमेरिका सहित कई देशों से सहायता की गुहार लगाई और फिर सीधे भारतीय सेना के कमांडर से सीजफायर का अनुरोध किया तब ऑपरेशन स्थगित हुआ है।
जहाँ तक समर्थन का सवाल है अमेरिका, रुस , यूरोप सहित दुनिया के अधिकांश देशों ने इस समय ही नहीं कई बार आतंकवाद की लड़ाई में भारत का समर्थन व्यक्त किया है। राहुल गाँधी का यह तर्क हास्यास्पद है कि उन देशों ने पाकिस्तान का नाम क्यों नहीं लिया? भारत पाकिस्तान के साथ ही तो वर्षों से आतंक के खिलाफ लड़ रहा है। विभिन्न देशों के साथ समझौतों में आतंकवाद से लड़ने के संकल्प का उल्लेख है। इस सप्ताह यूरोप यात्रा में विदेश मंत्री जयशंकर के साथ वार्ताओं के बाद जर्मनी ने पाकिस्तान से आतंक की लड़ाई में भारत का समर्थन व्यक्त किया।
वहीँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर रखी है कि पाकिस्तान के खिलाफ सिंदूर आपरेशन सिर्फ स्थगित हुआ है और फिर कोई आतंकी हमला हुआ तो मुंहतोड़ जवाब देंगे। पाकिस्तान कभी भारत से सीधी लड़ाई जीत ही नहीं सकता। भारत परमाणु बम की गीदड़ भभकियों से डरने वाला नहीं है। आतंकी हमला हुआ तो करारा जवाब के लिए समय और तरीका हमारी सेनाएं तय करेंगी और शर्तें भी हमारी होंगी। पाकिस्तान के साथ ना व्यापार होगा और बातचीत होगी तो सिर्फ पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने की।
जहाँ तक सिंदूर ऑपरेशन के स्थगन में अमेरिकी भूमिका का सवाल है राहुल गाँधी को अपनी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद, आनंद शर्मा से समझ लेना चहिए कि उनके अपने सत्ता काल में अमेरिकी हस्तक्षेप कितना अधिक हुआ था। इंदिरा गाँधी या नरसिंह राव राज में ही नहीं मनमोहन सिंह ( सोनिया राहुल गाँधी के बल पर) राज के दौरान तो हस्तक्षेप की सारी सीमाएं पार हो गई थी। राहुल तब सांसद भी थे, लेकिन शायद उन्हें कुछ समझ नहीं आया या वे अब भूल रहे हैं। हम जैसे पत्रकार ही नहीं देश दुनिया को ध्यान आ जाएगा।
मनमोहन सिंह के राज में अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के मुखबिर एडवर्ड स्नोडेन द्वारा उपलब्ध कराए गए एक गुप्त दस्तावेज से पता चला कि अमेरिका द्वारा भारत में तथा वाशिंगटन स्थित भारतीय दुतावास न्यूयोर्क के संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में की गई 13.5 अरब जानकारियों की जासूसी में से केवल 1 अरब जानकारियां ही आतंकवाद से संबंधित थी। बाकी गोपनीयता का उल्लंघन था। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के मुखबिर एडवर्ड स्नोडेन द्वारा किए गए इस चौंकाने वाले खुलासे से यह स्पष्ट है कि भारत अमेरिकी एजेंसी द्वारा जासूसी के शीर्ष लक्ष्यों में से एक था।
अमेरिका ने अपना बचाव करते हुए कहा कि जासूसी कार्यक्रम वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा है। हालांकि, भारतीयों का मानना है कि इस तरह की जासूसी सिर्फ दुश्मन देशों पर की जाती है। इंटेलिजेंस ब्यूरो और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग दोनों के अधिकारियों ने उन्हीं दिनों बताया था ,अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि हम आतंकवाद के निर्यातक नहीं हैं। जो डेटा इकट्ठा किया गया उसके अनुसार सिर्फ़ 1 अरब डेटा ही आतंकवाद से जुड़ा था, जबकि बाकी डेटा भारत सरकार की अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां है।
इसका मतलब यह है कि एनएसए द्वारा सिर्फ़ भारत की हर गतिविधि पर नज़र रखने का एक तरीका था। अमेरिका ने अपनी खुफिया जानकारी के जरिए भारत में कुछ लोगों को रडार पर रखा और उन पर जासूसी की। अमेरिका द्वारा भारत के बारे में एकत्रित किए गए डेटा का अनुपात बहुत बड़ा है। इसने न केवल वाशिंगटन स्थित दूतावास में जासूसी की है, बल्कि घरेलू राजनीति, परमाणु और अंतरिक्ष कार्यक्रमों के बारे में भी जानकारी एकत्र की है। लगभग 1 अरब ऐसे इंटरसेप्ट हैं (सभी कार्रवाई योग्य नहीं हैं) जिन्हें पकड़ा गया है। इस संख्या में ईमेल, चैट और टेलीफोन पर बातचीत के माध्यम से प्राप्त जानकारी शामिल थी अमेरिका ने गूगल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट जैसे प्रदाताओं के सर्वरों में सेंध लगाकर भारत के बारे में जानकारी हासिल की।
यह भंडाफोड़ होने पर पूर्व रॉ प्रमुख सीडी सहाय ने कहा था ,अमेरिका से सख्त सवाल होना चाहिए। हम इस मामले को दबा कर नहीं रख सकते और हमें अमेरिका से जवाब मांगना चाहिए। भारत को यह जानने की जरूरत है कि किस तरह का डेटा इकट्ठा किया गया है और इसका इस्तेमाल कौन कर रहा है? क्या यह डेटा किसी के साथ साझा किया जा रहा है और अमेरिका इस तरह के डेटा को कब तक अपने पास रखने का प्रस्ताव रखता है? सीआईए के ठेकेदार एडवर्ड स्नोडेन ने 2011 से पहले भारत की यात्रा कर चुके थे। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस रिपोर्ट पर दुनिया भर में हंगामा हो गया लेकिन मनमोहन, सोनिया गाँधी सरकार की ओर से तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा कहलवाया गया कि एक देश दूसरे देश की ऐसी जासूसी होती रहती है।
वाशिंगटन पोस्ट द्वारा प्रकाशित एनएसए लीकर की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी विदेशी खुफिया निगरानी न्यायालय ने 2010 में विदेश में जासूसी के लिए एक व्यापक प्रमाणन को मंजूरी दी थी, जिसमें 193 देशों की सूची शामिल थी। अमेरिकी कंपनियों के माध्यम से संचार को बाधित करने की अनुमति मिल गई। इस सूची में विश्व बैंक समूह और यूरोपीय संघ जैसी बैंकें और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां भी शामिल थीं। भाजपा उन छह राजनीतिक संगठनों में से एक थी, जिन्हें निगरानी के लिए अनुशंसित किया गया था। सूची में मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी भी शामिल थे।
भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारत में जुलाई 2014 में एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक को उन रिपोर्टों के संबंध में तलब किया था जिनमें कहा गया था कि अमेरिका ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी को सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा पर जासूसी करने के लिए अधिकृत किया गया था।
पिछले वर्षों के दौरान भारत ने अपने तंत्र की गोपनीयता की रक्षा के लिए अत्याधुनिक तकनीकी बना ली और विशेषज्ञ भी रखे हैं। लेकिन यह तो तथ्य है कि 5 अप्रैल, 2010 को, अमेरिकी सैनिक चेल्सी मैनिंग द्वारा लीक किया गया और जूलियन असांजे के विकीलीक्स द्वारा प्रकाशित "कोलैटरल डैमेज" वीडियो एक युगांतकारी घटना थी, जो व्हिसलब्लोअर द्वारा उजागर किए जाने वाले सरकारी और कॉर्पोरेट रहस्यों का सबसे बड़ा और सबसे लगातार ऐतिहासिक अध्याय बन गया है। राहुल गांधी को अपना रिकॉर्ड अवश्य याद रखना चाहिये।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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