विश्व समाचार दिवस केवल अखबारों, टेलीविजन चैनलों, डिजिटल प्लेटफॉर्म या पत्रकारों का उत्सव मनाने का अवसर नहीं है। यह सोचने का भी अवसर है कि आज दुनिया खबरों के लिए किस ओर देख रही है और क्यों?
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Alok Mehta
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।।
विश्व समाचार दिवस केवल अखबारों, टेलीविजन चैनलों, डिजिटल प्लेटफॉर्म या पत्रकारों का उत्सव मनाने का अवसर नहीं है। यह सोचने का भी अवसर है कि आज दुनिया खबरों के लिए किस ओर देख रही है और क्यों? मेरे लिए यह सवाल व्यक्तिगत रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है। मैंने 1970 के दशक की शुरुआत में पत्रकारिता में प्रवेश किया था। उस समय खबरों की दुनिया हस्तलिखित नोट्स, टाइपराइटर, टेलीफोन, टेलीप्रिंटर और छपे हुए अखबारों से चलती थी। पांच दशक से अधिक समय के बाद मैं पत्रकारिता के उस असाधारण परिवर्तन का साक्षी हूं, जिसमें नोटबुक और पेन लेकर चलने वाले संवाददाता से लेकर आज ऐसे पत्रकार तक की यात्रा हुई है, जिसके हाथ में स्मार्टफोन है—जिसमें कैमरा, रिकॉर्डर, संपादन के साधन और पूरी दुनिया तक पहुंच मौजूद है।
इन दशकों में भारत भी असाधारण रूप से बदला है। और मेरे विचार से आज भारत केवल दुनिया के महत्वपूर्ण समाचार बाजारों में से एक नहीं है, बल्कि दुनिया की खबरों और सूचनाओं के प्रमुख केंद्रों में तेजी से शामिल हो गया है। इसके कई कारण हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां की विशाल आबादी राजनीतिक रूप से सक्रिय है। भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति, परमाणु शक्ति, प्रमुख तकनीकी केंद्र और वैश्विक कूटनीति में लगातार बढ़ती भूमिका वाला देश है। इसके साथ ही भारत अनेक भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं वाला एक प्राचीन सभ्यतागत समाज भी है। मैं सदैव आशावादी रहा हूँ। मैंने पत्रकारिता पर अपनी किताब 'पावर प्रेस एंड पॉलिटिक्स' (ब्लूम्सबरी से प्रकाशित) में भारतीय पत्रकारिता की सफलता और भावी चुनौतियों का विस्तार से वर्णन किया और अनेक वरिष्ठ संपादकों, राजनयिकों ने किताब के विचारों पर सहमति के साथ टिप्पणियां लिखी हैं।
दुनिया के लिए भारत की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक यह है कि इतनी विविधताएं एक संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर साथ-साथ मौजूद हैं। हिंदी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, मलयालम, कन्नड़, पंजाबी, उर्दू और अनेक अन्य भाषाओं की अपनी पत्रकारिता, टेलीविजन दर्शक, साहित्यिक परंपराएं और डिजिटल समुदाय हैं। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अन्य धर्मों के लोग एक ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं। किसी भी अंतरराष्ट्रीय पत्रकार के लिए यह भारत को लगभग अंतहीन समाचारों का स्रोत बना देता है।
भारत का आर्थिक परिवर्तन भी दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया भारत की आर्थिक वृद्धि, बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, तकनीक, स्टार्ट-अप व्यवस्था, डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष कार्यक्रम, रक्षा क्षमता, ऊर्जा परिवर्तन और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासों पर नजर रखती है। अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान, खाड़ी देशों, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के साथ भारत के संबंध भी प्रतिदिन अंतरराष्ट्रीय समाचार पैदा करते हैं।
भारत की विदेश नीति पर भी दुनिया का ध्यान लगातार बढ़ा है। ऐसे समय में जब दुनिया युद्धों, भू-राजनीतिक तनाव और बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है, भारत का संवाद, रणनीतिक स्वायत्तता, विकास और शांति पर जोर उसकी अंतरराष्ट्रीय भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है। दुनिया के अलग-अलग नेताओं और उनकी नीतियों के बीच तुलना होती रहती है, लेकिन भारत की अपनी आवाज आज अंतरराष्ट्रीय मामलों में पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली और महत्वपूर्ण है।
मुझे वह समय याद है जब दुनिया में भारत की तस्वीर काफी हद तक कुछ पश्चिमी समाचार एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों के माध्यम से बनती थी। भारतीय पत्रकार और समाचार पत्र अंतरराष्ट्रीय खबरों के लिए अक्सर Reuters, AP, AFP, UPI जैसी विदेशी एजेंसियों पर काफी निर्भर रहते थे। वह दुनिया अब बदल चुकी है। आज भारतीय अखबार, टेलीविजन नेटवर्क, समाचार एजेंसियां, वेबसाइट और डिजिटल प्लेटफॉर्म बड़ी मात्रा में मौलिक खबरें तैयार करते हैं। भारतीय पत्रकार दुनिया के लगभग सभी प्रमुख केंद्रों में मौजूद हैं। भारतीय टेलीविजन चैनल भारत के बाहर भी दर्शकों तक पहुंच रहे हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने यह संभव कर दिया है कि भारत में पैदा हुई कोई खबर कुछ ही मिनटों में पूरी दुनिया की खबर बन जाए। यह सूचना की दुनिया में भारत की बदलती भूमिका का महत्वपूर्ण संकेत है।
भारत प्रिंट, टेलीविजन, रेडियो, वेबसाइट, मोबाइल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया—सभी के लिए दुनिया के सबसे बड़े समाचार बाजारों में से एक है। विशाल आबादी, बढ़ती साक्षरता, विस्तार करता मध्यम वर्ग, इंटरनेट और स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच तथा सूचना की जबरदस्त भूख भारत को एक असाधारण बड़ा समाचार बाजार बनाती है। लेकिन शायद सबसे बड़ी संभावना महानगरों के बाहर है। भारत की ग्रामीण और अर्ध-शहरी आबादी एक बहुत बड़ा और अभी भी काफी हद तक कम सेवा प्राप्त सूचना बाजार है। जैसे-जैसे साक्षरता, स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच बढ़ रही है, गांवों और छोटे शहरों के लोग सरकार की योजनाओं, कृषि, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, अदालतों, पुलिस, स्थानीय प्रशासन, कीमतों और राष्ट्रीय राजनीति के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं।
सूचना की भूख कम नहीं हो रही है। वह लगातार बढ़ रही है। लेकिन इस विस्तार ने एक गंभीर चुनौती भी पैदा की है—विश्वसनीयता की चुनौती। डिजिटल क्रांति ने पत्रकारिता को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसी ने गलत सूचनाओं, एडिट किए गए या भ्रामक वीडियो, झूठे उद्धरण, गढ़ी हुई खबरों और बिना स्रोत के दावों को भी बहुत तेजी से फैलाना संभव बनाया है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को प्रकाशित करने की क्षमता दे दी है, लेकिन किसी चीज का प्रकाशित होना और उसका पत्रकारिता होना एक ही बात नहीं है। यहीं पत्रकारिता का भविष्य तय होगा।
इसका उत्तर केवल अधिक नियंत्रण या प्रतिबंध नहीं हो सकता। दूसरी ओर पत्रकारिता पूरी तरह जिम्मेदारी और मानकों से मुक्त भी नहीं हो सकती। आवश्यकता है स्वनियमन, मजबूत पत्रकारिता नैतिकता, पारदर्शिता, जवाबदेही और ऐसे विवेकपूर्ण कानूनों की, जो नागरिकों की सुरक्षा करें लेकिन अभिव्यक्ति की वैध स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से कमजोर न करें। पत्रकारों को यह समझना होगा कि उनकी सबसे बड़ी पूंजी विश्वसनीयता है। जब पाठक और दर्शक किसी समाचार संस्था पर भरोसा करना बंद कर देते हैं, तब उसकी तकनीक, पहुंच और कमाई भी उस भरोसे की भरपाई नहीं कर सकती।
मेरी अपनी पत्रकारिता यात्रा इस परिवर्तन की प्रत्यक्ष गवाह रही है। 1970 के दशक की शुरुआत में जब मैंने पत्रकारिता शुरू की, तब पत्रकारिता के मूल साधन बहुत साधारण थे—नोटबुक, पेन, टाइपराइटर, टेलीफोन और तथ्यों की पुष्टि करने का अनुशासन। एक शहर से दूसरे शहर खबर पहुंचने में घंटों लग सकते थे। तस्वीरों को भेजने और प्रकाशित करने की अपनी अलग तकनीकी प्रक्रिया थी। संपादन का काम कागज की प्रतियों और प्रूफ के माध्यम से होता था। फिर कंप्यूटर आया। उसके बाद फैक्स, सैटेलाइट टेलीविजन, मोबाइल फोन, इंटरनेट, वेबसाइट, 24 घंटे के समाचार चैनल और अंततः सोशल मीडिया का दौर आया।
आज पत्रकार दुनिया के किसी भी हिस्से से खबर भेज सकता है, वीडियो और ऑडियो रिकॉर्ड कर सकता है, फोटो ले सकता है, सामग्री संपादित कर सकता है और कुछ ही मिनटों में उसे पूरी दुनिया तक पहुंचा सकता है। तकनीक ने पत्रकारिता की गति बदल दी है। लेकिन उसकी मूल जिम्मेदारी नहीं बदली। पत्रकार को आज भी पूछना पड़ता है—क्या हुआ? किसने कहा? प्रमाण क्या है? दूसरा पक्ष क्या कहता है? हम क्या जानते हैं और क्या नहीं जानते? यह अनुशासन जरूरी रहेगा, चाहे खबर कागज पर छपे या मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई दे।
एक संवाददाता और रिपोर्टर से लेकर संपादक और प्रसारक तक की अपनी लंबी यात्रा में मैंने पत्रकारिता की कई पीढ़ियों को देखा है। मैंने हर तकनीकी दौर की कठिनाइयों और संभावनाओं को अनुभव किया है। मैंने यह भी देखा है कि पत्रकारिता किस तरह सीमित पाठक वर्ग वाली एक विशिष्ट पेशेवर गतिविधि से बदलकर एक व्यापक और सहभागी सूचना व्यवस्था बन गई है।
फिर भी मैं इसके भविष्य को लेकर आशावादी हूं। भारत की जनसंख्या का आकार, बढ़ती साक्षरता, विशाल ग्रामीण आबादी, बहुभाषी समाज, बढ़ती अर्थव्यवस्था और सूचना की निरंतर बढ़ती भूख एक बहुत बड़े समाचार उद्योग की मजबूत नींव प्रदान करते हैं। प्रिंट मीडिया समाप्त होने के बजाय अपना स्वरूप बदलेगा। टेलीविजन बदलेगा। डिजिटल पत्रकारिता का विस्तार होगा। वीडियो और ऑडियो का महत्व बढ़ेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समाचार संकलन, अनुवाद, शोध और उत्पादन के तरीके बदल देगा। लेकिन तकनीक विश्वास का स्थान नहीं ले सकती।
इसलिए विश्व समाचार दिवस पर मैं केवल पत्रकारिता के अस्तित्व का उत्सव नहीं मनाऊंगा, बल्कि उसके लगातार बदलते और विकसित होते स्वरूप का भी उत्सव मनाऊंगा। 1970 के दशक में एक युवा पत्रकार के रूप में शुरुआत से लेकर आज के डिजिटल युग तक मेरे अनुभव ने एक बात लगातार सिखाई है: पत्रकारिता के साधन बदलते हैं, लेकिन सत्य का महत्व कभी नहीं बदलता। भारत की वैश्विक समाचार व्यवस्था में भूमिका आगे और बढ़ेगी, क्योंकि भारत स्वयं बदल रहा है और दुनिया उस परिवर्तन को समझना चाहती है।
जिस भारत को मैंने पत्रकारिता के शुरुआती वर्षों में देखा और जिस भारत को आज देख रहा हूं, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। लेकिन पत्रकार की मूल जिम्मेदारी आज भी वही है—ध्यान से देखना, ईमानदारी से तथ्यों की पुष्टि करना, निर्भीकता से सवाल पूछना और जिम्मेदारी के साथ सूचना देना। इसीलिए पांच दशक से अधिक समय पत्रकारिता में बिताने के बाद भी मुझे विश्वास है कि भारत में समाचार मीडिया का भविष्य केवल जीवित नहीं, बल्कि बेहद उज्ज्वल और संभावनाओं से भरा हुआ है। अगली पीढ़ी के सामने चुनौती यह है कि नई तकनीक की अपार शक्ति को केवल गति, सनसनी और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम न बनने दिया जाए, बल्कि उसे सत्य, जनहित और जागरूक नागरिकों की सेवा में लगाया जाए। शायद यही विश्व समाचार दिवस का वास्तविक संदेश है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
World News Day पर शायद यही याद रखना सबसे जरूरी है कि तकनीक और माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी आज भी भरोसा है।
by
Samachar4media Bureau
सुमित अवस्थी, सीनियर कंसल्टिंग एडिटर, टाइम्स नाउ नवभारत।।
World News Day हमें याद दिलाता है कि खबर सिर्फ सूचना नहीं होती, वह समाज को देखने और समझने का एक माध्यम भी है। लेकिन जिस दौर में हर पल हमारे मोबाइल पर सैकड़ों खबरें दस्तक दे रही हों, वहां असली चुनौती खबरों की कमी नहीं, बल्कि भरोसेमंद खबर की पहचान है। तकनीक ने सूचना को हमारी उंगलियों तक पहुंचा दिया है, लेकिन सही और गलत के बीच फर्क करने की जिम्मेदारी अब पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
एक समय था जब सुबह का अखबार खबरों का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करता था। फिर रेडियो, टेलीविजन और 24 घंटे के समाचार चैनलों का दौर आया। अब खबर हमारे मोबाइल की स्क्रीन पर हर पल मौजूद है। इस बदलाव ने आज के युवा को सिर्फ खबरों का दर्शक नहीं, बल्कि उनका सक्रिय हिस्सा बना दिया है। वह खबर देखता है, प्रतिक्रिया देता है, उसे साझा करता है और कई बार खुद खबर का हिस्सा भी बन जाता है।
किसी छोटे शहर की समस्या का वीडियो सोशल मीडिया के जरिए देशभर में पहुंच सकता है। किसी छात्र या आम नागरिक की आवाज लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। इसने लोकतंत्र में भागीदारी के नए रास्ते खोले हैं। लेकिन पहुंच और विश्वसनीयता एक ही चीज नहीं हैं।
लाखों व्यूज किसी खबर की सच्चाई का प्रमाण नहीं हैं। कई बार पूरी तरह झूठ से ज्यादा खतरनाक आधा सच होता है – पुराने वीडियो को नए संदर्भ में दिखाना, किसी बयान का सिर्फ एक हिस्सा सामने रखना या सही तस्वीर के साथ गलत जानकारी जोड़ देना। इसलिए खबर को सिर्फ देखना नहीं, उसके स्रोत और संदर्भ को समझना भी जरूरी है।
इस बदलती दुनिया में महिलाओं की आवाज़ को भी बराबर महत्व देना होगा। डिजिटल माध्यमों ने महिलाओं को अपने अनुभव साझा करने, सवाल उठाने और सार्वजनिक बहस में अपनी जगह बनाने का अवसर दिया है। लेकिन ट्रोलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, चरित्र पर सवाल और victim blaming जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं। महिलाओं को सिर्फ बोलने का मंच देना पर्याप्त नहीं; ऐसा वातावरण भी जरूरी है जहां उनकी बात बिना पूर्वाग्रह के सुनी और गंभीरता से ली जाए।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने सूचना की इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। तस्वीर, आवाज और वीडियो को इस तरह बदला जा सकता है कि वास्तविक और कृत्रिम के बीच अंतर करना कठिन हो जाए। इसलिए युवाओं के लिए तकनीक को समझना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसके सामने सवाल खड़े करना भी है। AI उपयोगी सहायक हो सकता है, लेकिन उसकी हर जानकारी को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं।
यह जिम्मेदारी केवल नागरिकों की नहीं है। मीडिया को भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी। पत्रकारिता का काम किसी सत्ता या राजनीतिक पक्ष का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच करना, जरूरी सवाल पूछना और नागरिकों को अपनी राय बनाने के लिए पर्याप्त जानकारी देना है। खबर और राय के बीच अंतर बनाए रखना भी इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
लोकतंत्र केवल संसद या चुनाव के दिन नहीं बचता। वह हमारी रोजमर्रा की सूचना की आदतों में भी दिखाई देता है – किसी खबर को आगे भेजने से पहले रुकना, स्रोत देखना, दूसरा पक्ष सुनना और नए तथ्य सामने आने पर अपनी राय बदलने का साहस रखना।
आज का युवा केवल देश का भविष्य नहीं, उसका वर्तमान भी है। उसके हाथ में मोबाइल है, कैमरा है, अपनी बात कहने का मंच है और AI जैसी तकनीक भी।
World News Day पर शायद यही याद रखना सबसे जरूरी है कि तकनीक और माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी आज भी भरोसा है। और उस भरोसे को कायम रखने की जिम्मेदारी पत्रकारों के साथ-साथ हर उस नागरिक की भी है, जो हर दिन तय करता है कि वह क्या देखेगा, क्या मानेगा और क्या आगे बढ़ाएगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
विश्व समाचार दिवस यह सोचने का अवसर भी है कि खबरें हमारे जीवन में कितनी जरूरी हैं और तेजी से बदलती दुनिया में भरोसेमंद जानकारी का महत्व कितना बढ़ गया है।
by
pankaj sharma
पंकज शर्मा, समाचार4मीडिया।।
28 सितंबर को हर साल विश्व समाचार दिवस यानी वर्ल्ड न्यूज डे मनाया जाता है। यह सिर्फ पत्रकारिता या न्यूज इंडस्ट्री के लिए एक खास दिन नहीं है, बल्कि यह सोचने का अवसर भी है कि खबरें हमारे जीवन में कितनी जरूरी हैं और तेजी से बदलती दुनिया में भरोसेमंद जानकारी का महत्व कितना बढ़ गया है।
एक समय था जब खबर का मतलब सुबह का अखबार, रेडियो का न्यूज बुलेटिन या शाम का टेलीविजन समाचार हुआ करता था। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। स्मार्टफोन पर कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी हिस्से की खबर हमारे सामने आ जाती है। वेबसाइट, न्यूज ऐप, सोशल मीडिया, वीडियो, पॉडकास्ट और न्यूजलेटर ने खबरों तक पहुंच को पहले से कहीं आसान बना दिया है। माध्यम बदला है, लेकिन अपने आसपास और दुनिया में क्या हो रहा है, यह जानने की हमारी जरूरत नहीं बदली।
हालांकि खबरों की इस तेज रफ्तार ने पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। सबसे पहले खबर देने की होड़ में कई बार यह खतरा रहता है कि तेजी, सटीकता से आगे निकल जाए। सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट या वीडियो कुछ ही मिनटों में वायरल हो सकता है, लेकिन वायरल होना उसके सही होने की गारंटी नहीं है। ऐसे माहौल में पत्रकारिता की असली जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
एक अच्छी खबर सिर्फ सूचना नहीं देती, बल्कि उसके पीछे की पड़ताल, संदर्भ और जरूरी सवाल भी सामने रखती है। किसी खबर को प्रकाशित करने से पहले स्रोतों की पुष्टि करना, तथ्यों की जांच करना और गलती होने पर उसे सुधारना पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारियां हैं।
आज पत्रकारिता के सामने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चुनौती भी है और अवसर भी। एआई खबरों के विश्लेषण, अनुवाद, रिसर्च और कंटेंट तैयार करने की प्रक्रिया को बदल सकता है। लेकिन तकनीक अपने आप भरोसा पैदा नहीं कर सकती। एआई के दौर में बदली हुई तस्वीरों, डीपफेक और भ्रामक सूचनाओं के बीच यह और जरूरी हो गया है कि पाठक को पता हो कि सूचना कहां से आई है और उसकी पुष्टि कैसे हुई।
पत्रकारिता के इतिहास में कई बार यह कहा गया कि नया माध्यम पुराने माध्यम को खत्म कर देगा। रेडियो के दौर से लेकर टेलीविजन, इंटरनेट और अब एआई तक ऐसी आशंकाएं सामने आती रही हैं। लेकिन हर बार माध्यम बदला और पत्रकारिता ने खुद को नए रूप में ढाला। भविष्य में भी यही होगा। कुछ पुराने फॉर्मेट कमजोर पड़ सकते हैं, नए फॉर्मेट सामने आ सकते हैं, लेकिन विश्वसनीय जानकारी की जरूरत बनी रहेगी।
मेरे लिए विश्व समाचार दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि पत्रकारिता की पहचान सिर्फ उसकी गति, पहुंच या लोकप्रियता से नहीं होनी चाहिए। उसकी सबसे बड़ी पूंजी भरोसा है। खबर कितनी जल्दी पहुंची, यह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि वह कितनी सही, उपयोगी और संदर्भपूर्ण है।
खबरों की दुनिया आने वाले वर्षों में और ज्यादा डिजिटल, व्यक्तिगत और तकनीक आधारित होगी। ऐसे में चुनौती खबरों की कमी की नहीं, बल्कि सही और भरोसेमंद खबर पहचानने की होगी। माध्यम बदलते रहेंगे, लेकिन पत्रकारिता की बुनियाद वही रहेगी यानी तथ्य, सवाल, संदर्भ और जनता का भरोसा। शायद यही विश्व समाचार दिवस को याद करने की सबसे सार्थक वजह भी है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
वर्ल्ड न्यूज डे पर BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ व एक्सचेंज4मीडिया समूह के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने बदलती न्यूज की दुनिया और हमारे जीवन में इसकी भूमिका पर अपने विचार साझा किए हैं।
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Samachar4media Bureau
हर साल 28 सितंबर को वर्ल्ड न्यूज डे मनाया जाता है। इस मौके पर BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ व एक्सचेंज4मीडिया समूह के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने बदलती न्यूज की दुनिया और हमारे जीवन में इसकी भूमिका पर अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने कहा कि आज भले ही लोग बहुत ज्यादा खबरों, नोटिफिकेशन और अलग-अलग राय से परेशान होने की बात करें, लेकिन सुबह उठते ही ज्यादातर लोग यह जानना चाहते हैं कि जब वे सो रहे थे, तब दुनिया में क्या हुआ।
एक समय था जब खबरें तय समय पर मिला करती थीं। सुबह घर के दरवाजे पर अखबार आता था और एक निश्चित समय पर रेडियो से न्यूज बुलेटिन सुनने को मिलता था। लोग चाय के साथ अखबार पढ़ते थे और रेडियो से दिन की प्रमुख खबरें सुनते थे। लेकिन आज न्यूज 24 घंटे उपलब्ध है। मोबाइल पर एक नोटिफिकेशन दुनिया के दूसरे हिस्से में हुई घटना की जानकारी भी कुछ ही पलों में दे देता है। जो कभी सुबह की एक आदत हुआ करती थी, वह अब लगातार चलने वाली जानकारी की धारा बन गई है।
न्यूज प्लेटफॉर्म की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। अखबार प्रिंट से डिजिटल तक पहुंचे हैं, टेलीविजन चैनल चौबीसों घंटे न्यूज दिखा रहे हैं और डिजिटल पब्लिकेशन, न्यूज ऐप, पॉडकास्ट, न्यूजलेटर व सोशल मीडिया ने न्यूज की पूरी दुनिया बदल दी है। स्मार्टफोन ने अखबार, टेलीविजन, रेडियो और न्यूज स्टैंड, इन सभी को एक ही जगह ला दिया है। हालांकि इतना बदलाव आने के बावजूद खबर जानने की हमारी मूल जरूरत नहीं बदली है।
डॉ. अनुराग बत्रा के मुताबिक, न्यूज देखने और पढ़ने वाले दर्शकों की आदतों में जरूर बड़ा बदलाव आया है। पहले सुबह के न्यूज एजेंडे में अखबार की बड़ी भूमिका होती थी, जबकि आज लोग एक ही खबर को अलग-अलग तरीकों से देखते हैं। नई पीढ़ी छोटी वीडियो, पॉडकास्ट या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए खबर जानना पसंद कर सकती है। जेनरेशन जेड और जेनरेशन अल्फा ऐसी दुनिया में बड़ी हो रही हैं, जहां जानकारी तुरंत, विजुअल, इंटरैक्टिव और व्यक्तिगत जरूरत के मुताबिक उपलब्ध है। इसलिए न्यूज वही रहते हुए भी उसकी प्रस्तुति बदल गई है और न्यूज संगठनों को भी इसके साथ बदलना पड़ा है।
न्यूज अब अलग-अलग क्षेत्रों में भी बंट गई है। राजनीतिक, बिजनेस और वित्तीय खबरों के साथ खेल, मनोरंजन, टेक्नोलॉजी, लाइफस्टाइल, सामान्य और अंतरराष्ट्रीय खबरों के लिए भी अलग-अलग प्लेटफॉर्म और विकल्प मौजूद हैं। इससे लोगों के पास ज्यादा विकल्प आए हैं, लेकिन इसके साथ यह भी आसान हो गया है कि लोग केवल उन्हीं विषयों और विचारों से जुड़ी खबरें देखें, जिनमें उनकी रुचि है।
आज न्यूज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक सबसे पहले खबर देने की होड़ भी है। 24 घंटे चलने वाले न्यूज माहौल में तेजी महत्वपूर्ण हो गई है। हर प्लेटफॉर्म सबसे पहले खबर देने की कोशिश करता है, लेकिन सबसे पहले खबर देना हमेशा सही होने की गारंटी नहीं है। जल्दबाजी में प्रकाशित खबर, बिना पुष्टि की गई सोशल मीडिया पोस्ट या अधूरी जानकारी कुछ ही समय में कई प्लेटफॉर्म पर फैल सकती है और उसे सच मान लिया जा सकता है। ऐसे समय में पत्रकारिता के मूल सिद्धांत और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं—तथ्यों की जांच, स्रोत की पुष्टि, सही संदर्भ देना, जानकारी और राय को अलग रखना और गलती होने पर उसे सुधारने की जिम्मेदारी लेना।
डॉ. अनुराग बत्रा का कहना है कि न्यूज का भविष्य केवल टेक्नोलॉजी से तय नहीं होगा, बल्कि भरोसे से तय होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने वाले समय में न्यूज जुटाने, उसका विश्लेषण करने, अनुवाद, निर्माण और वितरण के तरीके को प्रभावित करेगा। न्यूज और ज्यादा व्यक्तिगत हो सकती है तथा वीडियो, ऑडियो और वॉयस जैसे फॉर्मेट की भूमिका भी बढ़ सकती है। हालांकि टेक्नोलॉजी अपने आप विश्वसनीयता पैदा नहीं कर सकती। विश्वसनीयता हासिल करनी पड़ती है।
एआई से तैयार कंटेंट, बदली हुई तस्वीरों, डीपफेक और गलत सूचनाओं के बढ़ते प्रभाव के बीच विश्वसनीय न्यूज संगठनों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि किसी न्यूज संगठन ने कितनी जल्दी खबर दी, बल्कि यह भी होगा कि जो जानकारी दी गई है, उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है।
आने वाले पांच या दस साल में न्यूज किस रूप में होगी, यह कहना मुश्किल है। अखबारों का आकार छोटा हो सकता है, टेलीविजन न्यूज के फॉर्मेट बदल सकते हैं और संभव है कि भविष्य में स्मार्टफोन की जगह कोई दूसरी डिवाइस ले ले। नए प्लेटफॉर्म भी सामने आ सकते हैं, जिनकी आज हम कल्पना तक नहीं कर सकते। लेकिन लोगों की अपने आसपास की दुनिया के बारे में जानने की जरूरत बनी रहेगी। लोग अपने देश, अर्थव्यवस्था, खेल, कारोबार और दुनिया में हो रही घटनाओं को समझना चाहते रहेंगे। माध्यम बदल सकता है, लेकिन न्यूज जानने की आदत नहीं बदलेगी।
वर्ल्ड न्यूज डे का संदेश सिर्फ न्यूज इंडस्ट्री या पत्रकारों को याद करने तक सीमित नहीं है। यह लोगों तक जानकारी पहुंचाने की जिम्मेदारी की भी याद दिलाता है। न्यूज तेज, रंगीन, विजुअल और टेक्नोलॉजी से भरपूर हो सकती है, लेकिन इसकी बुनियाद ईमानदारी, पारदर्शिता और जिम्मेदारी पर होनी चाहिए। किसी न्यूज संगठन की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं बनती कि वह कितनी खबरें प्रकाशित करता है, कितने नोटिफिकेशन भेजता है या कितने क्लिक हासिल करता है। उसकी असली पहचान समय के साथ बनी विश्वसनीयता और भरोसे से बनती है।
न्यूज की दुनिया लगातार बदलती रहेगी। कुछ प्लेटफॉर्म खत्म होंगे, नए प्लेटफॉर्म सामने आएंगे और दर्शकों की आदतें भी बदलती रहेंगी। लेकिन न्यूज के पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है। क्योंकि कभी-कभी बिना खबर के रहना अच्छी बात हो सकती है, लेकिन खबरों के बिना पूरी दुनिया की कल्पना करना मुश्किल है।
वर्ल्ड न्यूज डे पर शायद आने वाले दशक का बड़ा सवाल यह नहीं है कि हमारे पास कितनी ज्यादा खबरें होंगी। खबरें निश्चित रूप से और बढ़ेंगी। असली सवाल यह होगा कि जानकारी से भरी इस दुनिया में हम किस पर भरोसा करेंगे कि वह हमें बताए कि वास्तव में खबर क्या है।
समाधान-केंद्रित सोच अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता को जवाबदेह बनाना है। किसी समस्या को सामने लाने के साथ उसे हल करने की कोशिश भी होनी चाहिए।
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Samachar4media Bureau
संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार।
विश्व समाचार दिवस पर पत्रकारिता की मृत्यु की खबरें खुद लिखी जाती रही हैं। पहले भी पत्रकारिता को मृत घोषित किया जा चुका है। कहा गया कि रेडियो प्रिंट को खत्म कर देगा। फिर लगा कि टेलीविजन रेडियो को खत्म कर देगा। इंटरनेट के आने पर कहा गया कि न्यूज़रूम का अंत हो जाएगा। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को पत्रकारिता की नई अंतिम सूचना माना जा रहा है। लेकिन पत्रकारिता हर बार बची रही। माध्यम बदलते रहे। जो पत्रकार समय के साथ नहीं बदले, वे जरूर पीछे छूट गए।
अब पत्रकारिता का हर रूप अपना दर्शक और पाठक पाएगा। यह इस दौर का उपहार है। लेकिन यही एक जाल भी है। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां अपनी सोच की पुष्टि करने वाली खबरों के लिए तुरंत पुरस्कार मिलता है। एक पक्ष चुनिए, अपने समूह को वही सुनाइए जो वह सुनना चाहता है और आंकड़ों को बढ़ते देखिए। यह कमाई का रास्ता भी है। इसलिए पत्रकारों के लिए किसी एक पक्ष को करियर की रणनीति बना लेना आसान और आकर्षक हो गया है।
हर मुद्दे को केवल दोनों पक्षों में बांटकर देखने वालों की पकड़ अब कम होगी। पत्रकारिता हमेशा किसी न किसी दृष्टिकोण से जुड़ी रही है और आगे भी रहेगी। पत्रकार एक निश्चित नजरिए से रिपोर्ट करता है। सूचना को अवलोकन तक पहुंचना ही होता है। यही हमें केवल संदेश पहुंचाने वाले डाकिए से अलग करता है। लेकिन अवलोकन और राय को अंतिम सत्य नहीं बनाया जा सकता। जिन तथ्यों पर वे आधारित हैं, उनका तथ्यात्मक होना जरूरी है।
दर्शक और पाठक अब ज्यादा चाहते हैं-ज्यादा दृष्टिकोण, ज्यादा जानकारी और ज्यादा संदर्भ। पत्रकार की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इतनी समझदारी के साथ यह सब दे सके कि उसमें आत्ममुग्धता न आ जाए। एक पीढ़ी ने खबरों को जरूरत से ज्यादा बौद्धिक बना दिया और अंततः खुद को अप्रासंगिक कर लिया। ‘मैं जो कह रहा हूं वही सही है’ और ‘मैं दूसरे विचार के लिए भी खुला रहूं’ के बीच एक बेहद महीन रेखा है। इसे पार करते ही आप रिपोर्टिंग करना बंद कर देते हैं और उपदेश देने लगते हैं।
डिजिटल अब कोई अतिरिक्त काम नहीं है। पत्रकारिता के हर रूप को अब डिजिटल दुनिया के साथ ही चलना होगा। खबर के कोण, खबर की प्रस्तुति और खबर की समझ को एल्गोरिदम और एसईओ के साथ जोड़ना होगा। ज्यादातर पत्रकार इस बदलाव को स्वीकार कर चुके हैं। जो अब भी नहीं कर पाए हैं, वे अपनी ही विदाई लिख रहे हैं। पत्रकारिता खत्म नहीं होगी। माध्यम बदलेंगे। जो पत्रकार नहीं बदलेंगे, वे पीछे छूट जाएंगे।
समाधान-केंद्रित सोच अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता को जवाबदेह बनाना है। किसी समस्या को सामने लाने के साथ उसे हल करने की कोशिश भी होनी चाहिए। दुर्भाग्य से हम अक्सर इसके उलट करते हैं-समस्या बताने के साथ समस्या पैदा करने वाली सोच भी सामने आ जाती है। समाधान-केंद्रित पत्रकारिता को आगे ज्यादा जगह मिलेगी। यह समस्या है। इसके ये संभावित समाधान हैं। अब समाधान पर बहस कीजिए, घाव पर नहीं।
और आखिरी बात, सबसे बड़ा जोखिम-कंटेंट निर्माण और पत्रकारिता के बीच की रेखा। मोबाइल कैमरा रखने वाला हर व्यक्ति कंटेंट बना सकता है। लेकिन वह पत्रकार नहीं है। वह सिर्फ मोबाइल कैमरा रखने वाला व्यक्ति है।
आधुनिक पत्रकारिता में बहुत लोगों ने क्रम ही उलट दिया है-पहले लोकप्रियता, बाद में जानकारी। पत्रकार की लोकप्रियता के लिए सबसे पहली शर्त उसका सही होना है। कंटेंट की दुनिया में किसी और से यह शर्त पूरी करने की अपेक्षा नहीं की जाती। यही पत्रकार का काम है। सबसे पहले नहीं, बल्कि तथ्यात्मक होना। सबसे ज्यादा तेज नहीं, बल्कि उपयोगी होना।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
स्तंभकार, लेखक, मार्केटिंग कंसल्टेंट और मैनेजमेंट गुरु सुहेल सेठ का मानना है कि पत्रकारिता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती उसकी विश्वसनीयता को लेकर है।
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Samachar4media Bureau
सुहेल सेठ, स्तंभकार, लेखक, मार्केटिंग कंसल्टेंट और मैनेजमेंट गुरु।।
विश्व समाचार दिवस (World News Day) सिर्फ पत्रकारिता का जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह सोचने का भी अवसर है कि आज पत्रकारिता किस दौर से गुजर रही है और उसका भविष्य किस दिशा में जा रहा है। स्तंभकार, लेखक, मार्केटिंग कंसल्टेंट और मैनेजमेंट गुरु सुहेल सेठ का मानना है कि पत्रकारिता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती उसकी विश्वसनीयता को लेकर है।
सुहेल सेठ लिखते हैं कि उन्होंने करीब चार दशक ऐसे माहौल में बिताए हैं, जहां न्यूजरूम, ग्रीन रूम और सत्ता के गलियारों में पत्रकारों की अहम भूमिका रही है। कभी पत्रकारों का प्रभाव उनकी पहुंच की वजह से नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता की वजह से था। आज यही विश्वसनीयता पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
पत्रकारिता का असली उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया: सुहेल सेठ के मुताबिक, पत्रकारिता का उद्देश्य कभी लोगों का मनोरंजन करना या उन्हें खुश करना नहीं था। उसका काम समाज की अंतरात्मा की तरह काम करना था। पत्रकारिता को ऐसे सवाल पूछने थे, जिन्हें सरकारें पूछे जाने से बचना चाहती थीं, ऐसी सच्चाइयों को सामने लाना था जिन्हें बड़ी कंपनियां छिपाना चाहती थीं और ऐसी कहानियां बतानी थीं, जिन्हें ताकतवर लोग सामने नहीं आने देना चाहते थे।
लेकिन 24 घंटे चलने वाले न्यूज चक्र और एल्गोरिदम के दौर में पत्रकारिता ने कई बार दृश्यता को महत्व से जोड़ दिया। अब किसी खबर की गहराई से ज्यादा उसकी तेजी और वायरल होने की क्षमता पर ध्यान दिया जाने लगा है। छह महीने की मेहनत से तैयार की गई खोजी रिपोर्ट का मुकाबला 15 सेकंड की उस वीडियो से होने लगा है, जिसमें कोई मंत्री मंच से गिर जाता है।
सुविधा के कारण कमजोर हुई विश्वसनीयता: सुहेल सेठ का कहना है कि पत्रकारिता का विश्वसनीयता संकट सिर्फ बाहरी वजहों से पैदा नहीं हुआ है। इसमें पत्रकारिता की अपनी भूमिका भी रही है। गलत सूचनाओं के अभियान, अत्यधिक राजनीतिक ध्रुवीकरण वाले स्वामित्व ढांचे और गुस्से को बढ़ावा देने वाले एल्गोरिदम ने स्थिति को मुश्किल बनाया है। लेकिन पत्रकारिता में कठोर तथ्यों की जांच और पूरी तैयारी से पीछे हटने का भी असर पड़ा है।
जब सही खबर से ज्यादा तेजी से ब्रेकिंग न्यूज देने की होड़ महत्वपूर्ण हो जाए, जब पूरी खबर से ज्यादा एक्सक्लूसिव की कीमत बढ़ जाए और जब एंकर जानकारी देने के बजाय गुस्से और बहस को प्राथमिकता देने लगें, तो इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
सुहेल सेठ के अनुसार, टेलीविजन डिबेट कई बार एक तरह के मंचन में बदल गई हैं, जहां प्राइम टाइम में ऊंची आवाज और टकराव गहन विश्लेषण की जगह लेते दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि यह पत्रकारिता नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के रूप में पेश किया जा रहा मनोरंजन है। दर्शक भी इस अंतर को समझने लगे हैं।
बदलाव जरूरी है, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा बची रहनी चाहिए: इसके बावजूद सुहेल सेठ पत्रकारिता के भविष्य को लेकर पूरी तरह निराश नहीं हैं। उनका मानना है कि प्रिंट से डिजिटल, गेटकीपर से भागीदार और एकतरफा संवाद से बातचीत तक पत्रकारिता का बदलाव जरूरी था। चुनौती यह है कि इस बदलाव के दौरान पत्रकारिता की मूल भावना बची रहे।
उनके मुताबिक, भारत में स्वतंत्र डिजिटल न्यूजरूम ने हाल के वर्षों में कई बेहतरीन खोजी रिपोर्टिंग के उदाहरण पेश किए हैं। पूर्व संपादकों द्वारा लिखे जाने वाले सबस्टैक न्यूजलेटर ने पाठकों के साथ उस तरह की नजदीकी दोबारा स्थापित की है, जो बड़े मीडिया संस्थानों से काफी पहले दूर हो गई थी। वहीं, पॉडकास्ट ने टेलीविजन की बेहद छोटी अवधि वाली ध्यान क्षमता से अलग पत्रकारिता में विस्तार और बारीकी के लिए जगह बनाई है। सुहेल सेठ के अनुसार, यह पत्रकारिता के खत्म होने का संकेत नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के नए तरीके तलाशने का दौर है।
एआई के दौर में भरोसे की चुनौती: आज पत्रकारिता के सामने एक नई और बड़ी चुनौती आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की भी है। एआई कुछ ही समय में ऐसी हजारों खबरें तैयार कर सकता है, जो देखने में विश्वसनीय लगें। ऐसे दौर में असली और कृत्रिम सामग्री के बीच अंतर करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। सुहेल सेठ का कहना है कि अगर पत्रकारिता का काम हमेशा से सही सूचना को शोर से अलग करना रहा है, तो अब यह काम कहीं अधिक कठिन हो गया है, क्योंकि शोर भी अब सूचना जैसा दिखाई देने लगा है।
ऐसे समय में मानवीय समझ, संदर्भ और निर्णय क्षमता रखने वाले पत्रकार की अहमियत कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाती है। तकनीक सामग्री तैयार कर सकती है, लेकिन अंतरात्मा नहीं। किसी बाढ़ प्रभावित गांव में जाकर यह तय करना कि सबसे पहले किस कहानी को सामने लाया जाना चाहिए, यह मानवीय संवेदना और समझ का काम है।
पत्रकारिता को फिर असुविधाजनक सवाल पूछने होंगे: सुहेल सेठ के मुताबिक, पत्रकारिता को फिर से उन सच्चाइयों को सामने लाने की आदत विकसित करनी होगी, जिन्हें सामने लाना असुविधाजनक हो सकता है। उसे व्यावसायिक, राजनीतिक और एल्गोरिदम के दबाव में जटिल मुद्दों को छोटे-छोटे नारों में बदलने से बचना होगा।
न्यूजरूम को फिर से तथ्य जांच, विश्वसनीय स्रोतों और धैर्य जैसी उन प्रक्रियाओं में निवेश करना होगा, जो भले ही आकर्षक न हों, लेकिन पत्रकारिता की बुनियाद हैं। वहीं, पाठकों को भी अच्छी और गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के लिए भुगतान करने के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के लिए संसाधनों की जरूरत होती है।
मीडिया मालिकों को यह समझना होगा कि एक बार खर्च हो चुका भरोसा दोबारा हासिल करना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। संपादकों को याद रखना होगा कि साहस केवल युद्ध क्षेत्रों में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि सत्ता पर रिपोर्टिंग करने वाले हर पत्रकार के लिए यह रोज की जरूरत है। सुहेल सेठ कहते हैं कि पत्रकारों को यह भी याद रखना चाहिए कि उन्होंने इस पेशे को क्यों चुना था। उनके मुताबिक, ज्यादातर लोगों ने पत्रकारिता को पैसे के लिए नहीं चुना था, बल्कि सच तक पहुंचने और उसे सामने लाने के लिए चुना था।
पत्रकारिता का भविष्य उसकी तकनीक नहीं, उसकी विश्वसनीयता तय करेगी: विश्व समाचार दिवस को आत्मसंतुष्टि का अवसर नहीं, बल्कि खुद को आईना दिखाने का दिन होना चाहिए। सुहेल सेठ के अनुसार, पत्रकारिता का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि वह किन प्लेटफॉर्म पर मौजूद है या उसके पास कौन सी तकनीक है। असली सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता उस साहस और विश्वसनीयता को फिर हासिल कर पाती है, जिसने कभी उसे समाज के लिए अनिवार्य बनाया था।
दुनिया को सिर्फ और ज्यादा खबरों की जरूरत नहीं है। उसे ऐसे सच की जरूरत है, जिसे साहस के साथ बताया जाए, ईमानदारी के साथ परखा जाए और बिना किसी डर या पक्षपात के लोगों तक पहुंचाया जाए। यही तय करेगा कि पत्रकारिता भविष्य में भी समाज के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका निभाती है या केवल मनोरंजन का एक और रूप बनकर रह जाती है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
विश्व समाचार दिवस पर एक बात बिना किसी शर्त के कही जा सकती है- पत्रकारिता जिंदा है। पत्रकारिता को कई बार खत्म घोषित किया गया है। लेकिन हर बार यह उन भविष्यवाणियों को गलत साबित करके आगे बढ़ी है।
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Samachar4media Bureau
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
विश्व समाचार दिवस पर एक बात बिना किसी शर्त के कही जा सकती है- पत्रकारिता जिंदा है। पत्रकारिता को कई बार खत्म घोषित किया गया है। लेकिन हर बार यह उन भविष्यवाणियों को गलत साबित करके आगे बढ़ी है।
कहा गया कि रेडियो के आने से अखबारों का महत्व कम हो जाएगा। फिर कहा गया कि टेलीविजन रेडियो को अप्रासंगिक बना देगा। इंटरनेट के आने पर कहा गया कि प्रिंट खत्म हो जाएगा। सोशल मीडिया के दौर में कहा गया कि न्यूज रूम की जरूरत ही नहीं रहेगी। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को पत्रकारिता के लिए अगली बड़ी चुनौती बताया जा रहा है।
प्लेटफॉर्म बदलता है। भविष्यवाणी फिर लौट आती है। लेकिन पत्रकारिता खुद को बदल लेती है। क्योंकि इसकी मूल जरूरत आज भी वही है- किसी को यह पता लगाना और बताना ही होगा कि वास्तव में हुआ क्या है।
यही चीज पत्रकारिता को हमारे आसपास मौजूद जानकारी के विशाल प्रवाह से अलग करती है। पत्रकारिता का मतलब है रिपोर्टिंग, जानकारी की पुष्टि, सवाल पूछना, जांच-पड़ताल, संदर्भ देना और सबसे महत्वपूर्ण- जो प्रकाशित किया गया है, उसकी जिम्मेदारी लेना। भारतीय पत्रकारिता हर दिन इसका उदाहरण देती है।
देश की कई महत्वपूर्ण खबरें इसलिए सामने आईं क्योंकि पत्रकारों ने दस्तावेजों की पड़ताल करने, सूत्रों से जानकारी जुटाने और मुश्किल सवाल पूछने में कई हफ्ते या महीने लगाए। विदेशी खातों, राजनीतिक फंडिंग, कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय गड़बड़ियों, सरकारी नीतियों और संस्थानों के फैसलों से जुड़ी जांचों ने बार-बार दिखाया है कि गंभीर और गहराई से की गई रिपोर्टिंग उन तथ्यों को सामने ला सकती है, जो वरना छिपे रह जाते। लेकिन पत्रकारिता की अहमियत सिर्फ उस जांच से तय नहीं होनी चाहिए, जो अखबार के पहले पन्ने पर सबसे बड़ी खबर बन जाए।
इसकी असली ताकत भारतभर में काम कर रहे हजारों पत्रकारों के रोजमर्रा के काम में भी है। वे अदालतों में बैठते हैं, संसद और विधानसभा की गतिविधियों पर नजर रखते हैं, गांवों से रिपोर्ट करते हैं, कंपनियों और बाजारों की खबरें देखते हैं, अस्पतालों और विश्वविद्यालयों को कवर करते हैं, स्थानीय प्रशासन से सवाल पूछते हैं और उन जगहों तक जाते हैं, जो अक्सर राष्ट्रीय न्यूज साइकल का हिस्सा नहीं बन पातीं। वे दूरदराज के इलाकों से चुनावों की रिपोर्टिंग करते हैं, जमीन से प्राकृतिक आपदाओं की खबर देते हैं और उन आम भारतीयों की कहानियां सामने लाते हैं, जिनकी आवाज शायद ही कभी सुनी जाती है।
इनमें से बहुत सा काम कभी वायरल नहीं होता। फिर भी उसका महत्व कम नहीं होता। दरअसल, कई बार सबसे उपयोगी पत्रकारिता वही होती है, जिसे वायरल होने के लिए तैयार नहीं किया गया होता। उसकी अहमियत इस बात में होती है कि वह सटीक, लगातार और तथ्यों पर आधारित है।
भारतीय पत्रकारिता की कमियां भी हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय पत्रकारिता आलोचना से परे है। न्यूज इकोसिस्टम के कुछ हिस्से रफ्तार, तमाशे और एंगेजमेंट के आंकड़ों से जरूरत से ज्यादा प्रभावित हो गए हैं। टीवी डिबेट कई बार उन खबरों से भी ज्यादा शोर वाली हो जाती हैं, जिन्हें समझाने के लिए उन्हें किया जाना चाहिए।
क्लिकबेट कई बार गहराई वाली पत्रकारिता पर भारी पड़ जाता है। राय और रिपोर्टिंग के बीच का अंतर भी हमेशा साफ नहीं रखा जाता। और सबसे पहले खबर देने की होड़ में कई बार सही खबर देने की ज्यादा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पीछे छूट जाती है।
एक आत्मविश्वासी मीडिया इंडस्ट्री में इन कमियों को स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन पत्रकारिता की आलोचना को पत्रकारिता का अंतिम संस्कार नहीं बना देना चाहिए। अगर कुछ है तो आज का सूचना का माहौल पेशेवर पत्रकारिता को पहले से ज्यादा जरूरी बनाता है।
हम ऐसे दौर में रह रहे हैं, जहां स्मार्टफोन रखने वाला लगभग कोई भी व्यक्ति लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। अफवाह कुछ ही मिनटों में पूरी दुनिया में फैल सकती है। जनरेटिव AI कुछ ही पलों में भरोसेमंद दिखने वाला टेक्स्ट, फोटो, आवाज और वीडियो बना सकता है।
आज जानकारी की कमी नहीं है। कमी भरोसे की है। और आने वाले वर्षों में शायद यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। दर्शकों और पाठकों को सिर्फ यह जानना नहीं होगा कि वे जो देख रहे हैं, वह क्या है। उन्हें यह भी जानना होगा कि क्या इसकी पुष्टि हुई है? इसे किसने जांचा? इसके पीछे क्या सबूत हैं? क्या दूसरे पक्ष की बात भी सुनी गई है? क्या कोई व्यक्ति अपने नाम और प्रतिष्ठा के साथ उस जानकारी की जिम्मेदारी लेने को तैयार है? ये पत्रकारिता के मूल सवाल हैं।
भविष्य का न्यूज रूम सिर्फ ज्यादा कंटेंट से नहीं जीतेगा। भविष्य का न्यूज रूम सिर्फ ज्यादा कंटेंट बनाकर या कुछ सेकंड पहले खबर प्रकाशित करके सफल नहीं होगा। उसकी असली ताकत विश्वसनीयता, ओरिजिनल रिपोर्टिंग, विशेषज्ञता, जानकारी की पुष्टि और सही संदर्भ देने में होगी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस निश्चित तौर पर न्यूज रूम को बदल देगा। यह रिसर्च, अनुवाद, प्रोडक्शन और खबरों के वितरण में मदद करेगा। बिजनेस मॉडल बदलेंगे। फॉर्मेट बदलेंगे। कुछ संस्थान खत्म होंगे और नए संस्थान सामने आएंगे। लेकिन इसका मतलब जरूरी नहीं कि पत्रकारिता खत्म हो रही है। यह वही काम है जो पत्रकारिता हमेशा से करती आई है- बदलते समय के साथ खुद को ढालना।
बहुत लंबे समय से हम किसी खास फॉर्मेट के कमजोर होने को पूरे पेशे के कमजोर होने से जोड़ते रहे हैं। अखबार बदलेंगे। टेलीविजन बदलेगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म भी आगे बदलेंगे। लेकिन पत्रकारिता उस प्लेटफॉर्म से कहीं बड़ी है, जिस पर वह मौजूद है।
पत्रकारिता इसलिए मौजूद है क्योंकि समाज को ऐसे लोगों की जरूरत है जो वहां जाएं जहां दूसरे नहीं जाना चाहते, वे सवाल पूछें जिन्हें दूसरे पूछना नहीं चाहते, सबूतों की जांच करें, सत्ता को सवालों के घेरे में लाएं और नागरिकों को बताएं कि उन्होंने क्या पाया।
जब तक सरकारें शासन करती रहेंगी, कंपनियों के पास प्रभाव रहेगा, संस्थान फैसले लेते रहेंगे और लोग अपने आसपास की दुनिया को समझना चाहेंगे, तब तक पत्रकारिता की जरूरत बनी रहेगी। इसलिए विश्व समाचार दिवस पर शायद हमें यह पूछना बंद कर देना चाहिए कि पत्रकारिता बचेगी या नहीं। वह बच चुकी है और ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ है।
पत्रकारिता में तीन दशक से ज्यादा समय बिताने के बाद, मैंने इस पेशे को बहुत तेजी से बदलते देखा है। अगले दिन सुबह अखबार में खबर आने के दौर से लेकर अब रियल टाइम में ब्रेकिंग न्यूज तक का सफर देखा है।
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राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार ।।
मेरा नजरिया-
पत्रकारिता में तीन दशक से ज्यादा समय बिताने के बाद, मैंने इस पेशे को बहुत तेजी से बदलते देखा है। अगले दिन सुबह अखबार में खबर आने के दौर से लेकर अब रियल टाइम में ब्रेकिंग न्यूज तक का सफर देखा है। लेकिन एक चीज नहीं बदली है- हमारी पहली जिम्मेदारी सच के प्रति होनी चाहिए, उन लोगों के प्रति नहीं जिनके हाथ में सत्ता है।
कहीं न कहीं पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा अब एक्सेस, दिखने, तेजी और अगला वायरल मोमेंट हासिल करने के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। शायद अब समय आ गया है कि हम एक बार फिर अपने नैतिक मूल्यों और पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों की तरफ लौटें।
मेरे लिए पत्रकारिता हमेशा से ऐसे असहज सवाल पूछने का नाम रही है, जिन्हें पूछना कोई नहीं चाहता। ऐसे दरवाजे पर दस्तक देने का नाम रही है, जिसे ताकतवर लोग बंद रखना चाहते हैं। और ऐसी खबर सामने लाने का नाम रही है, जब आपको पता हो कि इसके कुछ नतीजे भी हो सकते हैं। और यह सब बिना डर और बिना किसी पक्षपात के करना ही पत्रकारिता है।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में पत्रकारिता सिर्फ नोएडा के टीवी स्टूडियो या लुटियंस दिल्ली के गलियारों में क्या हो रहा है, तक सीमित नहीं हो सकती। स्टूडियो की रोशनी से बाहर भी एक पूरा भारत है- वह किसान जो फसल खराब होने से परेशान है, वह युवा जो नौकरी तलाश रहा है, वह आदिवासी समुदाय जो अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहा है, वह प्रवासी मजदूर जो अपने घर से दूर है और वह छोटे शहर का मतदाता जिसकी आवाज शायद ही कभी राष्ट्रीय न्यूज साइकल का हिस्सा बनती है। अगर हम उनके बीच जाकर उनकी बात नहीं सुनते, तो हम वास्तव में भारत की रिपोर्टिंग नहीं कर रहे हैं। हम सिर्फ भारत के उस हिस्से की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, जो हमें दिखाई देता है।
इस हफ्ते द इंडियन एक्सप्रेस की जांच-पड़ताल वाली रिपोर्ट इस बात की याद दिलाती है कि जब पत्रकार शोर से दूर होकर गहराई से पड़ताल करते हैं और तथ्यों का पीछा करते हैं, तो पत्रकारिता क्या हासिल कर सकती है। और वह यह दिखाता है कि गंभीर और मेहनत से की गई पत्रकारिता आज भी मायने रखती है और महत्वपूर्ण बात यह है कि आज भी उसके लिए दर्शक और पाठक मौजूद हैं।
इतने वर्षों के बाद भी मेरा मानना है कि अच्छी पत्रकारिता कमरे में सबसे ऊंची आवाज बनने का नाम नहीं है। यह उस कमरे में जाने की हिम्मत रखने का नाम है, जहां कोई आपको जाने नहीं देना चाहता। उस सवाल को पूछने का नाम है, जिसे कोई सुनना नहीं चाहता। और फिर उस जवाब को प्रकाशित करने का साहस रखने का नाम है।यही पत्रकारिता की असली ताकत है।
विश्व समाचार दिवस ऐसा मौका है, जब हमें न्यूज मीडिया की भूमिका और उसकी जिम्मेदारियों पर रुककर सोचने का मौका मिलता है। खासकर ऐसे समय में, जब यह साल कई मायनों में बेहद मुश्किल रहा है।
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चिंतामणि राव, स्ट्रैटजिक मार्केटिंग व मीडिया एडवाइजर ।।
विश्व समाचार दिवस ऐसा मौका है, जब हमें न्यूज मीडिया की भूमिका और उसकी जिम्मेदारियों पर रुककर सोचने का मौका मिलता है। खासकर ऐसे समय में, जब यह साल कई मायनों में बेहद मुश्किल रहा है।
जब मैंने अपने करियर की शुरुआत की थी, तब न्यूज मीडिया का मतलब अखबार, कुछ न्यूज मैगजीन और ऑल इंडिया रेडियो (AIR) हुआ करता था। महीने में एक या दो बार फिल्म देखने जाते थे तो वहां भारत सरकार के फिल्म्स डिवीजन की बनाई न्यूजरील दिखाई जाती थी। बस, खबरों के लिए यही माध्यम थे। दूरदर्शन तब एक ही चैनल था, जो शाम को प्रसारण शुरू करता था। दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो दोनों सामान्य कंटेंट वाले ब्रॉडकास्टर थे, जिनमें न्यूज बुलेटिन भी आते थे। 1982 में एशियन गेम्स के साथ कलर टीवी भारत में आया।
मई 1991 में राजीव गांधी की हत्या हुई। यह घटना रात करीब 10 बजे के बाद हुई थी। मैं यात्रा कर रहा था और मद्रास में था, जहां से घटनास्थल करीब 40 किलोमीटर दूर था। मेरी पत्नी, जो उस समय बेंगलुरु में घर पर थीं, उन्होंने मुझे फोन करके यह खबर बताई। वह द हिंदू के लिए लिखती थीं और वहां से किसी ने उन्हें फोन करके घटना की जानकारी दी थी। उस समय दूरदर्शन रात 10 बजे अपना प्रसारण बंद कर देता था, जैसा वह हर रात करता था। इसलिए अगली सुबह तक कोई खबर नहीं थी। उस समय खबरें इसी तरह मिलती थीं।
1980 के दशक के आखिर में हमें हॉन्गकॉन्ग के एक कारोबारी की एक ऐसी योजना के बारे में सुनने को मिला, जो उस समय किसी पागलपन भरे आइडिया जैसी लगती थी। योजना थी सैटेलाइट के जरिए टीवी प्रसारित करने की, ताकि पूरे एशिया में एक ही समय पर एक ही कार्यक्रम देखा जा सके।
कराची से कुआलालंपुर और हैदराबाद से हॉन्गकॉन्ग तक लोग एक ही समय पर एक ही चीज देख सकते थे। यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता था। इसी से स्टार टीवी की शुरुआत हुई। शायद आज बहुत से लोग यह भी नहीं जानते कि STAR यानी Satellite Television Asian Region का संक्षिप्त रूप था और आज हम यहां हैं, जहां टीवी पर 24x7 न्यूज उपलब्ध है। भारत में अलग-अलग भाषाओं में करीब 400 न्यूज चैनल हैं और कई भाषाओं में अंतरराष्ट्रीय चैनलों तक भी पहुंच है।
ऑनलाइन दुनिया में टीवी और प्रिंट के बीच का फर्क भी काफी हद तक खत्म हो गया है। लगभग सभी न्यूज संस्थान वीडियो और टेक्स्ट, दोनों तरह का कंटेंट दे रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि आज हम सभी के पास 24 घंटे खबरों की पहुंच अपने मोबाइल फोन में है।
विज्ञापन पर निर्भरता अब भी कायम
एक चीज जो नहीं बदली है, वह है विज्ञापन से होने वाली कमाई पर मीडिया की निर्भरता। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो न्यूज ही नहीं, मीडिया की लगभग सभी कैटेगरी अब भी विज्ञापन से कमाई पर निर्भर हैं। लेकिन पारंपरिक मीडिया यानी प्रिंट और ब्रॉडकास्ट मॉडल का विज्ञापन कारोबार डिजिटल की तरफ जा रहा है। अलग-अलग विश्लेषकों के आंकड़े अलग हैं, लेकिन यह कहना सुरक्षित है कि दुनियाभर में करीब 70 फीसदी विज्ञापन खर्च डिजिटल पर जा रहा है। भारत में यह हिस्सा करीब 60 से 65 फीसदी है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म खूब पैसा कमा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर के डिजिटल विज्ञापन राजस्व का करीब 70 फीसदी MAANG कंपनियों यानी Meta, Amazon, Apple, Netflix और Google के पास जाता है। यह वैश्विक कुल विज्ञापन राजस्व का करीब 56 फीसदी बताया जाता है। ऐसे में बाकी 30 फीसदी डिजिटल विज्ञापन राजस्व के लिए लाखों दूसरी डिजिटल कंपनियां और प्लेटफॉर्म हैं।
न्यूज के मामले में सबसे ज्यादा पहुंच किसकी?
Reuters Institute for the Study of Journalism हर साल Digital News Report जारी करता है। यह रिपोर्ट अब अपने 10वें साल में है। इस साल की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 में पहली बार सोशल मीडिया और वीडियो नेटवर्क का इस्तेमाल दुनियाभर में खबरों के लिए दूसरे न्यूज सोर्स से आगे निकल गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 के बाद से टीवी न्यूज और न्यूज संस्थानों की वेबसाइटों और ऐप्स के इस्तेमाल में गिरावट आई है। टीवी के न्यूज सोर्स के रूप में कमजोर होने की बात मीडिया इंडस्ट्री में काफी समय से चर्चा में है। लेकिन न्यूज वेबसाइट और ऐप्स के इस्तेमाल में भी हाल के वर्षों में लगभग इसी तरह की गिरावट आई है। यानी डिजिटल दुनिया में खबरों को सबसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का काम न्यूज संस्थानों की वेबसाइट और ऐप नहीं, बल्कि सोशल मीडिया और वीडियो नेटवर्क कर रहे हैं। मेरे अपने प्रोफेशनल जीवन में खबरों के प्रसार और उनकी उपलब्धता में यह बदलाव वाकई काफी बड़ा है।
सबसे बड़ी चुनौती है भरोसा
आज न्यूज की दुनिया में सबसे बड़ा सवाल भरोसे का है। पहले अगर आपने टीवी पर खबर देखी, रेडियो पर सुनी या अखबार में पढ़ी, तो आप उस पर विश्वास कर लेते थे। सरकारी मीडिया, यानी दूरदर्शन और रेडियो भी कुछ खबरों को ज्यादा दिखा सकते थे और कुछ को नजरअंदाज या कम दिखा सकते थे, लेकिन वे जानबूझकर गलत खबर नहीं देते थे या लोगों को गुमराह नहीं करते थे। आज हमारे पास 24 घंटे, हर समय सैकड़ों न्यूज सोर्स मौजूद हैं। लेकिन समस्या यह है कि हमें पता नहीं होता कि इनमें से किस पर भरोसा किया जाए।
पिछले कुछ वर्षों में ‘फेक न्यूज’ शब्द हमारी आम भाषा का हिस्सा बन गया है। दूसरी तरफ, ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ शब्द भी कई बार आलोचना के तौर पर इस्तेमाल होने लगा है। हम सभी को व्हाट्सऐप पर ऐसे मैसेज मिलते हैं जिनमें लिखा होता है कि ‘जो मेनस्ट्रीम मीडिया आपको नहीं बताएगा...’। यह भरोसे की कमी और सामाजिक ध्रुवीकरण सिर्फ भारत की समस्या नहीं है, बल्कि दुनियाभर में दिखाई देती है।
मैंने इसके लिए Edelman Trust Barometer की ओर देखा। इस साल यह सर्वे 28 देशों में 34,000 लोगों के बीच किया गया। 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 देशों में 70 फीसदी लोग ऐसे व्यक्ति पर भरोसा करने को लेकर हिचकिचाते हैं या भरोसा नहीं करना चाहते, जिसकी वैल्यू, सूचना के स्रोत, सामाजिक समस्याओं को देखने का नजरिया या पृष्ठभूमि उनसे अलग हो। यह स्थिति अलग-अलग आय वर्ग, जेंडर, उम्र और विकसित व विकासशील बाजारों में देखने को मिलती है। यानी जिस दुनिया में हम पहले से कहीं ज्यादा जुड़े हुए हैं और जहां हर तरफ बहुत ज्यादा जानकारी उपलब्ध है, उसी दुनिया में हम एक-दूसरे को लेकर ज्यादा शक करने लगे हैं और अपने-अपने दायरे में सिमटते जा रहे हैं।
Reuters Institute भी न्यूज में भरोसे के कम होने की बात करता है। उसके मुताबिक, दुनियाभर में न्यूज पर भरोसा कम हुआ है। इसका एक कारण न्यूज इंडस्ट्री से बाहर की चिंताएं भी हैं। संस्थानों और नेताओं पर भरोसा भी कम हो रहा है और पत्रकारिता पर हाई-प्रोफाइल राजनेताओं की तरफ से सीधे हमले भी हो रहे हैं।
फिर भी उम्मीद बाकी है
लेकिन तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। रॉयटर्स के मुताबिक, इन दबावों के बावजूद सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ व्यक्तिगत न्यूज ब्रांड्स पर भरोसा, कुल न्यूज पर भरोसे के मुकाबले बेहतर बना हुआ है। लोगों में चिंता, न्यूज से दूरी और निराशा जरूर है, लेकिन वे नए सोर्स और नए फॉर्मेट को अपनाने के लिए तैयार भी हैं। साथ ही, लोगों का यह भरोसा अब भी बना हुआ है कि अच्छी पत्रकारिता क्या कर सकती है।
राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक बदलावों के इस दौर में भी न्यूज के मूल सिद्धांत महत्वपूर्ण बने हुए हैं। कई देशों में लोगों की राय अलग-अलग दिशाओं में बंट रही है, लेकिन निष्पक्षता जैसे सिद्धांतों के लिए समर्थन अब भी मौजूद है, भले ही लोग अपने मौजूदा न्यूज अनुभव से पूरी तरह संतुष्ट न हों।
इसलिए इतनी चिंता और असुरक्षा के बावजूद, संस्थानों पर भरोसे में गिरावट और खबरों को लेकर असंतोष के बीच भी लोगों ने व्यक्तिगत न्यूज ब्रांड्स पर अपना भरोसा पूरी तरह नहीं खोया है। उन्हें अब भी विश्वास है कि अच्छी पत्रकारिता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इस भरोसे को बनाना, कायम रखना और मजबूत करना ही न्यूज ब्रांड्स चलाने वालों का सबसे बड़ा काम होना चाहिए।
न्यूज टीवी में सबसे जरूरी है तुरंत खबर देना
न्यूज टीवी की सबसे बड़ी ताकत तुरंत खबर पहुंचाना है। प्रभावी न्यूज टीवी हमें सीधे घटनास्थल तक ले जाता है। हम खुद देख सकते हैं कि वहां क्या हो रहा है और मौके पर मौजूद लोगों से सीधे सुन सकते हैं। यह घटनास्थल पर मौजूद होने के सबसे करीब का अनुभव है।
1991 का गल्फ वॉर एक कम चर्चित न्यूज चैनल CNN के लिए बड़ा मोड़ साबित हुआ। युद्ध की उसकी लाइव कवरेज ने टीवी न्यूज को हमेशा के लिए बदल दिया। Bernard Shaw, John Holliman और Peter Arnett की रियल-टाइम रिपोर्टिंग ने CNN को एक छोटे केबल चैनल से ग्लोबल न्यूज लीडर बना दिया। लेकिन आज हमारे टीवी न्यूज चैनलों में वह तुरंत खबर देने वाली ताकत कहां है?
जब मैं न्यूज देखता हूं तो कई बार सोचता हूं कि रिपोर्टर कहां हैं। ज्यादातर समय स्क्रीन पर स्टूडियो में बैठे कई लोग दिखाई देते हैं और अक्सर उनके बीच बहस या शोर होता रहता है। अगर न्यूज में घटनास्थल की तत्काल जानकारी ही नहीं है, तो फिर हमें 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों की जरूरत क्यों है? इसका मतलब यह नहीं है कि न्यूज शो में सिर्फ रिपोर्टर ही होने चाहिए। बात सिर्फ इतनी है कि बहस से पहले खबर दीजिए।
तकनीक खरीदी जा सकती है, भरोसा नहीं
एक न्यूज चैनल को दूसरे से अलग करने वाली सबसे बड़ी चीज वहां काम करने वाले लोग और उनकी पत्रकारिता है। इसमें पत्रकारिता की गुणवत्ता, संपादकीय फैसलों की ईमानदारी और समय के साथ हासिल किया गया भरोसा सबसे महत्वपूर्ण है।
टेक्नोलॉजी खरीदी जा सकती है। स्टूडियो बनाए जा सकते हैं। ग्राफिक्स बदले जा सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कई कामों को तेज और सस्ता बना सकता है। लेकिन विश्वसनीयता बनाई नहीं जा सकती। इसे एक-एक खबर के साथ हासिल करना पड़ता है। और हर दिन इसकी रक्षा करनी पड़ती है। इसलिए न्यूज मीडिया के सामने चुनौती सिर्फ नई टेक्नोलॉजी या नए बिजनेस मॉडल को अपनाने की नहीं है। असली चुनौती उन मूल्यों को फिर से मजबूत करने की है, जो पत्रकारिता की ईमानदारी को परिभाषित करते हैं।
रफ्तार से पहले सटीकता, खबर फैलाने से पहले पुष्टि, राय से पहले रिपोर्टिंग और पक्षपात से पहले निष्पक्षता। दर्शक बदल गए हैं और प्लेटफॉर्म भी बदल गए हैं, लेकिन इंसानी स्वभाव नहीं बदला है। लोग आज भी जानना चाहते हैं कि क्या हो रहा है, खासकर ऐसे मुश्किल समय में। वे जानना चाहते हैं कि यह क्यों महत्वपूर्ण है, इसका उन पर क्या असर होगा और वे किस पर भरोसा कर सकते हैं। ऐसे दौर में, जब जानकारी की कोई सीमा नहीं है, भरोसा सबसे दुर्लभ चीज बन गया है।
न्यूज का भविष्य न तो सिर्फ एल्गोरिदम तय करेंगे और न ही यह कि कौन सबसे ज्यादा जोर से बोलता है। भविष्य उन लोगों का होगा जो हर दिन अपने दर्शकों और पाठकों को यह भरोसा दिला सकें कि वे उन पर विश्वास करने के लायक हैं। यह एक बड़ी चुनौती है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा मौका भी है। जो न्यूज ब्रांड भरोसा बनाने और उसे कायम रखने में सफल होंगे, वे सिर्फ इस बदलाव के दौर से गुजरेंगे नहीं, बल्कि आने वाले समय में पहले से ज्यादा मजबूत और महत्वपूर्ण बनकर उभर सकते हैं।
हमारे नौजवान क्या और कैसे पढ़ रहे हैं कि वे रोजगार के मोर्चे पर आवश्यक योग्यताएं नहीं रखते? सरकारी, निजी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की पहुंच बढ़ी है।
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Samachar4media Bureau
प्रो. संजय द्विवेदी, भारतीय जनसंचार संस्थान-आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक।
पढ़ तो रहे हैं, पर आप सीखते क्या हैं? यह सवाल हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने यक्ष प्रश्न है। जैसे भाषा का विद्यार्थी वर्षों तक पढ़ने के बाद भी ‘सही भाषा’ नहीं लिख पाता, तब आप उससे भाषा कौशल की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? ऐसे में कौशल विकास की नारेबाजियों के बीच हम वास्तव में कर क्या रहे हैं?
आंकड़े बताते हैं कि देश में उच्च शिक्षा के विस्तार के साथ शोध करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले बढ़े हैं। हर वर्ग और समुदाय में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है। किंतु स्नातकों की रोजगार-क्षमता अब भी बड़ी चुनौती है। डिग्री और जॉब मार्केट के बीच की खाई को पाटने पर गंभीरता जरूरी है।
डिग्रियां बांटने का कारखाना बने हैं शिक्षा परिसर-
हमारे नौजवान क्या और कैसे पढ़ रहे हैं कि वे रोजगार के मोर्चे पर आवश्यक योग्यताएं नहीं रखते? सरकारी, निजी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की पहुंच बढ़ी है। देश में उच्च शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सकल नामांकन अनुपात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पर युवाओं और स्नातकों के बीच बेरोजगारी तथा कौशल-अंतराल गंभीर विमर्श का विषय बन गया है।
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण की रिपोर्ट और श्रम बाजार से संबंधित विभिन्न रिपोर्टें बताती हैं कि चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। तब सवाल उठता है कि क्या हमारी उच्च शिक्षा केवल ‘डिग्रियां बांटने का कारखाना’ है? या वह युवाओं को वास्तविक अर्थों में सक्षम भी बना रही है? डिग्रियां लेकर समाज में खड़े नौजवान आखिर क्या करेंगे? बेरोजगारी को कम करने और युवाओं को रोजगार के योग्य बनाने का रास्ता क्या है?
नई शिक्षा नीति कौशल विकास पर खासा जोर देती है, किंतु हमारे सामने अधोसंरचना का टोटा और अध्यापकों की कमी जैसी समस्याएं हैं। देश की सामाजिक, भौगोलिक और आर्थिक विविधता को देखते हुए एक जैसी शिक्षा अपने आप में बड़ी चुनौती है। निजी विश्वविद्यालयों में भारी फीस देने के बावजूद विद्यार्थियों को अपेक्षित गुणवत्ता और कौशल नहीं मिल पाता। कई जगह विद्यार्थियों के साथ क्लाइंट्स जैसा व्यवहार होने लगा है और कहीं-कहीं केवल डिग्रियां बांटने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
परिसरों में हैं, पर कुछ सीखते नहीं-
देश में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात लगातार बढ़ा है। महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की भागीदारी में वृद्धि सामाजिक समावेशन का महत्वपूर्ण संकेत है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे विषयों में भी विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है।
‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ और ‘इंडिया स्किल्स रिपोर्ट’ जैसे विभिन्न अध्ययनों में स्नातकों की रोजगार-क्षमता से जुड़ी गंभीर चुनौतियों की ओर संकेत किया गया है। उच्च डिग्रियां हासिल करने के बाद भी युवाओं का पारंपरिक या कम कौशल वाले अस्थायी कार्यों पर निर्भर होना चिंता की बात है। बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर भी नौजवानों को उनकी शिक्षा और योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिल पाता। इसका कारण आवश्यक कौशल का अभाव भी है।
निजी क्षेत्र में रोजगार पाने के लिए केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है। वहां सक्रिय व्यक्तित्व, संवाद-कौशल, तकनीकी दक्षता, विश्लेषण की क्षमता, समस्या-समाधान का हुनर और बदलती परिस्थितियों के साथ स्वयं को ढालने की क्षमता भी जरूरी है। अनेक नियोक्ताओं से चर्चा करने पर यह बात सामने आती है कि उन्हें डिग्रीधारी युवाओं की कमी नहीं, बल्कि काम के अनुरूप तैयार और प्रशिक्षित युवाओं की आवश्यकता है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में आज भी सैद्धांतिक और पारंपरिक शिक्षा पर अधिक जोर है, जबकि उद्योग जगत की मांग तकनीकी, व्यावहारिक और विश्लेषणात्मक दक्षता की है। भारी संख्या में संस्थानों के खुलने के बावजूद छात्र-शिक्षक अनुपात, शोध की गुणवत्ता और बुनियादी शोध निवेश के मामले में हम अनेक वैश्विक मानकों से पीछे हैं।
स्कूली शिक्षा के स्तर से ही, विशेषकर छठी कक्षा से, व्यावसायिक और कौशलपरक शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। नई शिक्षा नीति भी इसी दिशा में ध्यान दिलाती है। लेकिन क्या हमारे परिसर इसके लिए तैयार हैं?
हमारे पाठ्यक्रम ऐसे होने चाहिए, जो बदलती दुनिया और बाजार की वास्तविक जरूरतों को समझ सकें। डिग्री पाठ्यक्रमों में ‘कमाई के साथ सीखने’ और अप्रेंटिसशिप मॉडल को बढ़ावा देना चाहिए। केवल परीक्षा पास करने और डिग्री हासिल करने की संस्कृति से आगे बढ़कर सीखने, काम करने और कौशल अर्जित करने की संस्कृति विकसित करनी होगी।
गुणात्मक सुधारों की जरूरत-
भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है, जब हम मात्रात्मक विस्तार से आगे बढ़कर गुणात्मक उत्कृष्टता और रोजगार-उन्मुख सुधारों की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाएं। भारत जैसे विशाल देश में यह चुनौती और बड़ी है। एक ओर महानगरों और शहरों में शिक्षा के अनेक अवसर हैं, तो दूसरी ओर गांवों, आदिवासी और वनवासी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की स्थिति अभी भी चिंता का विषय है।
शासकीय विद्यालयों में शिक्षकों की कमी बड़ी समस्या है। लोग ग्रामीण, आदिवासी और वनवासी क्षेत्रों में जाने के बजाय शहरों के आसपास ही नौकरियां करना पसंद करते हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। निजी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के तेजी से विस्तार के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल बना हुआ है। आज सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर भी देश की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूरी तरह पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। देश में कई स्तरों की शिक्षा व्यवस्था विकसित हो गई है। समान शिक्षा और समान अवसर एक आदर्श और दूर का लक्ष्य बन गए हैं।
‘कौशल’ ही आपको मैदान में टिकाए रखेगा-
असल सवाल डिग्रियों की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि उन डिग्रियों को अर्थपूर्ण बनाने का है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को ऐसे युवा तैयार करने होंगे, जो केवल नौकरी खोजने वाले न हों, बल्कि अपने ज्ञान, कौशल और सृजनात्मकता के बल पर रोजगार पैदा करने की क्षमता भी रखते हों। शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र देना नहीं है, बल्कि व्यक्ति को जीवन और समाज की चुनौतियों से जूझने योग्य बनाना है।
आज जरूरत इस बात की है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ‘डिग्री-केंद्रित’ होने के बजाय ‘ज्ञान, कौशल और व्यक्तित्व-केंद्रित’ बने। तभी डिग्रियों की बढ़ती संख्या देश के लिए वास्तविक मानव-संसाधन में बदल सकेगी। ‘डिग्रियां’ सिर्फ प्रवेश पत्र सरीखी हैं, जबकि आपका ‘कौशल’ ही आपको मैदान में टिकाए रख सकता है। क्या वह हमारे पास है? सोचिएगा जरूर।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
इस कड़ी में अमेरिकी बॉन्ड भी जुड़ गए हैं। जब वहाँ 5% सेफ रिटर्न हैं तो भारत के शेयरों में रिस्क क्यों लिया जाए? आप जानते ही हैं कि शेयरों में बॉन्ड से ज़्यादा रिस्क है।
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Samachar4media Bureau
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
क़र्ज़ अमेरिका की सरकार ले रही है और भुगत भारत का शेयर बाज़ार रहा है। आप सोच रहे होंगे कि ये क्या बात हुई? तो हिसाब-किताब में समझ लीजिए। अमेरिकी सरकार (दुनिया की हर सरकार) अपना खर्च पूरा करने के लिए बॉन्ड बेचती है। निवेशक बॉन्ड ख़रीदकर सरकार को डॉलर देते हैं। सरकार की आमदनी कम होती है और खर्च ज़्यादा।
इसकी भरपाई बॉन्ड से होती है। इसमें 10 और 30 साल अवधि के बॉन्ड की चर्चा ज़्यादा है। अमेरिकी बॉन्ड सबसे सेफ माने जाते हैं। इसके पीछे निवेशकों का विश्वास है कि अमेरिका की सरकार डिफ़ॉल्ट नहीं कर सकती है। 10 साल बॉन्ड पर अब 5.2% ब्याज मिल रहा है तो विदेशी निवेशक (FII) भारतीय शेयरों में पैसे क्यों लगाएँगे? यहाँ रिस्क है और वहाँ लगभग रिस्क फ्री।
अब भारतीय शेयर बाज़ार की हालत देखिए। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का सूचकांक निफ़्टी सितंबर 2024 में 26 हज़ार के आसपास था और अब 23 हज़ार के क़रीब घूम रहा है। अगर आपने निफ़्टी में दो साल पहले 1 लाख रुपये लगाए थे तो आज उनकी क़ीमत करीब 90 हज़ार रुपये होती, यानी आप 10 हज़ार रुपये के घाटे पर बैठे होते। शेयर बाज़ार पिछले दो साल से बढ़ ही नहीं रहा है। इसका एक बड़ा कारण है कि विदेशी निवेशकों (FII) ने भारत से हाथ खींच लिए हैं। वो करीब 5 लाख करोड़ रुपये की नेट बिक्री कर चुके हैं।
FII के हाथ खींचने के कई कारण हैं। AI स्टॉक भारत में नहीं है। अमेरिका, कोरिया और ताइवान में AI शेयरों के कारण तेज़ी है। भारतीय शेयरों का महंगा होना। निफ़्टी का PE रेशियो 20 है, जबकि 15 साल का औसत 17 रहा है, यानी गिरावट के बाद भी बाज़ार महंगा है।
डॉलर के मुक़ाबले रुपया टूटने से FII का रिटर्न कम हो जाता है। इस साल की शुरुआत में डॉलर की क़ीमत ₹90 के आसपास थी और अब ₹96। जब FII शेयर बेचकर अपने देश ले जाते हैं तो उन्हें डॉलर ख़रीदने पड़ते हैं। जब शेयर ख़रीदे थे तो डॉलर बेचकर रुपये लगाए थे। डॉलर महंगा होने से उनका रिटर्न कम होता है।
इस कड़ी में अमेरिकी बॉन्ड भी जुड़ गए हैं। जब वहाँ 5% सेफ रिटर्न हैं तो भारत के शेयरों में रिस्क क्यों लिया जाए? आप जानते ही हैं कि शेयरों में बॉन्ड से ज़्यादा रिस्क है।
अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड बढ़ना दुनिया भर की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है। अमेरिकी सरकार का क़र्ज़ 40 ट्रिलियन डॉलर पार कर चुका है। टैरिफ़ और ईरान युद्ध के कारण निवेशकों में अमेरिकी बॉन्ड को लेकर चिंता बढ़ी है। वहाँ ब्याज दरों में और बढ़ोतरी होने की आशंका है। हमारे यहाँ भी बढ़ोतरी के आसार बने हुए हैं। ब्याज दर बढ़ती है तो चाहे सरकार हो या कंपनी, कमजोरी बाहर आ जाती है। क़र्ज़ लेकर आख़िर कब तक घी पी सकते हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)