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कैसे विश्व, संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव की कीमत चुका रहा है: अरुण आनंद

यूएसएसआर न केवल पीआरसी को मान्यता देने वाला पहला देश बन गया बल्कि यूएन में आरओसी को बदलने के लिए इसने काफी प्रयास किया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

अरुण आनंद, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तम्भकार।

25 अक्टूबर 1971 की तारीख को विश्व इतिहास में निर्णायक क्षणों में से एक के रूप में याद किया जाएगा। इस दिन हुई एक घटना उस समय दुनिया को बहुत महत्वहीन लगती थी। बहुत से लोगों को यह एहसास नहीं होगा कि यह एक विनाशकारी घटना थी जो आने वाले दिनों में दुनिया को नया रूप देगी। 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन के जनवादी गणराज्य में अपनी तानाशाही स्थापित की और च्यांग-काई-शेक सरकार को ताइवान में चीन गणराज्य के रूप में स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया। लेकिन 1971 तक ताईवान में चीन गणराज्य की सरकार यानी रिपब्लिक ऑफ चाइना को वास्तविक चीनी लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता था और इसलिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसके पास एक स्थायी सीट थी।

लेकिन संयुक्त राष्ट्र की प्रस्ताव संख्या 2758 के साथ, विश्व व्यवस्था रातों रात बदल गई। रिपब्लिक ऑफ चाइना (आरओसी) को संयुक्त राष्ट्र से निष्कासित कर दिया गया और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना यानी कम्युनिस्ट चीन ने इसकी जगह ले ली। जब मतदान हुआ तो 76 देशों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जिसमें दुर्भाग्य से भारत भी शामिल था। पैंतीस देशों ने इसका विरोध किया था और 17 ने इस वोट से भाग नहीं लिया था।

सबसे पहले, हम संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) द्वारा पारित संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 2758 के आधिकारिक पाठ पर एक नजर डालते हैं। 'यह स्वीकार करते हुए कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार के प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र में चीन के एकमात्र वैध प्रतिनिधि हैं और यह कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से एक है, संयुक्त राष्ट्र, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के सभी अधिकारों को बहाल करने और संयुक्त राष्ट्र में चीन के एकमात्र वैध प्रतिनिधियों के रूप में अपनी सरकार के प्रतिनिधियों को मान्यता देने और चियांग काई-शेक के प्रतिनिधियों को उस स्थान से तत्काल निष्कासित करने का फैसला करता है जिस पर वे अवैध रूप से काबिज हैं।'

संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 2758 के पहले के मसौदे का शीर्षक ए/एल 630 था और इसे अल्बानिया द्वारा पेश किया गया था। जिन अन्य देशों ने इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए सह-प्रस्तावक की भूमिका निभाई वे थे- अल्बानिया, अल्जीरिया, बर्मा, सीलोन [अब श्रीलंका], कांगो (पीपुल्स रिपब्लिक), क्यूबा, इक्वेटोरियल गिनी, गिनी, इराक, माली, मॉरिटानिया, नेपाल, पाकिस्तान, रोमानिया, सिएरा लियोन, सोमालिया, सूडान, सीरियाई अरब गणराज्य, संयुक्त गणराज्य तंजानिया, यमन, यमन (पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक), यूगोस्लाविया, जाम्बिया।

1960 के दशक में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान एक तानाशाही शासन द्वारा लाखों लोगों की हत्या  के बाद भी साम्यवादी चीन को वैधता प्रदान करने वाला यी प्रस्ताव जटिल भू-राजनीतिक हालातों  के साथ-साथ कई पश्चिमी और तीसरी दुनिया के देशों के अदूरदर्शी दृष्टिकोण का परिणाम था, जिन्होंने आरओसी यानी ताइवान के बदले यूएन में काबिज होने के लिए कम्युनिस्ट चीन का समर्थन किया था। संयुक्त राष्ट्र में "चीन" की सीट के लिए यह  खेल प्रतिस्पर्धी भू-राजनीतिक ताकतों की  आपसी कशमकश का भी नतीजा था। 1949 से 1971 तक, एक तीव्र शीत युद्ध था जहां वारसा संधि द्वारा एक साथ बंधे सोवियत संघ के नेतृत्व वाला कम्युनिस्ट ब्लॉक संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके उत्तरी अटलांटिक संधि संघ (नाटो) के मित्र देशों के खिलाफ खड़ा  था। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कई विवाद थे जो वास्तव में दो महाशक्तियों और विपरीत खेमों- यूएसएसआर और यूएस के नेताओं के बीच के विवाद का परिणाम थे।

 ये भू-राजनीतिक तनाव संयुक्त राष्ट्र में भी मौजूद थे क्योंकि यूएसएसआर न केवल पीआरसी को मान्यता देने वाला पहला देश बन गया बल्कि यूएन में आरओसी को बदलने के लिए इसने काफी प्रयास किया  1949 से 1971 के बीच, अमेरिका अपने कुछ पश्चिमी सहयोगियों द्वारा कम्युनिस्ट चीन के प्रवेश को यूएन में रोकने में कामयाब भी रहा। लेकिन दोनों ओर से घात—प्रतिघात चल रहे थे। कम्युनिस्ट चीन इस बीच संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने के लिए बेताब था। 1965 तक उसने अपने हमदर्द देशों के  माध्यम से यूएन में कई प्रस्ताव लाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुआ। लेकिन फिर उसने अपनी रणनीति बदली।

1965 के बाद एक खामोशी थी, उस दौरान पीआरसी ने एक संगठन में शामिल होने में अनिच्छा व्यक्त की थी। साथ ही बीजिंग ने यूएन में शामिल होने के लिए  पूर्व शर्तों की एक व्यापक सूची जारी की जिसे बाकी दुनिया ने काफी हद तक अनसुना कर दिया गया था।

इसके तुरंत बाद, 1966 में सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत के साथ, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का पूरा ध्यान आंतरिक विद्रोह को दबाने पर था। जैसे-जैसे सांस्कृतिक क्रांति का प्रभाव कम होने लगा, बीजिंग ने संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने के लिए नए सिरे से जोर देना शुरू कर दिया। यह एक व्यापक, अधिक लचीली विदेश नीति का हिस्सा था।  

बीजिंग की नई विदेश नीति  ने द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने पर अधिक जोर दिया, जिसमें पूर्व विरोधियों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने और विकासशील देशों के साथ संबंध सामान्य करने पर विशेष  दिया गया । द्वितीय विश्व युद्ध के बाद औपनिवेशीकरण के खिलाफ एक लहर उठी जिसमें अफ्रीका और एशिया के तीन दर्जन देशों ने 1945 और 1960 के बीच स्वतंत्रता प्राप्त की। इसने ने संयुक्त राष्ट्र में शक्ति संतुलन को स्थानांतरित कर दिया।

चीन ने इसका लाभ उठाया साथ ही सोवियत संघ के विकल्प के रूप में भी इसने कई पश्चिमी देशों को अपने साथ आने के लिए राजी कर लिया। इस प्रकार चीन ने 1971 में एक प्रस्ताव पारित करवा इन सभी देशों का समर्थन हासिल किया और संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता हासिकल कर ली। उसने यह भी सूनिश्चित किया कि ताइवान को संयुक्त राष्ट्र से निष्कासित कर दिया जाए। आज तक ताइवान संयुक्त राष्ट्र से बाहर है और चीन सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में शामिल होकर अपनी स्थिति का पूरा लाभ उठा रहा है। इस ऐतिहासिक भूल के कारण ही आज चीन पूरे विश्व के लिए चूनौती बन कर खड़ा है। संभव हो तो इसे सुधारा जाना चाहिए। ताइवान को वापिस संयुक्त राष्ट्र में शामिल करना इस दिशा में पहला कदम होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं)


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