राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का हिंदू मन : अनंत विजय

विस्मृति नाम की इस कविता में मैथिलीशरण हिंदुओं से पराधीनता पाश में फंसे होने की बात करते हुए हिंदी समाज को जागृत करने का उपक्रम करते हैं। उनके हताश होने को लेकर प्रश्न खड़े करते हैं।

Last Modified:
Monday, 30 June, 2025
anantvijay


मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक। कुछ दिनों पूर्व हिंदी के आलोचक नन्ददुलारे वाजपेयी का मैथिलीशरण गुप्त के कृतित्व पर लिखा एक लेख पढ़ रहा था। उसमे...
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