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डिजिटल इकोसिस्टम का शुद्धिकरण करेगी गूगल की नई पॉलिसी : अभिषेक मेहरोत्रा
आमतौर पर जब भी कुछ नया होता है, तो डर एवं आशंकाएं जन्म लेती हैं। जो लाजमी भी हैं, हालांकि, इस बार हालात इसलिए थोड़े अलग हैं, क्योंकि AI पहले से ही हमारे मन-मस्तिष्क में भूचाल मचाए हुए है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago
अभिषेक मेहरोत्रा, मीडिया कॉमेंटेटर।
जब से गूगल और यूट्यूब की नई पॉलिसी आई है, हर तरफ बेचैनी है। गूगल के कोर अपडेट ने खासतौर पर भारतीय डिजिटल पब्लिशिंग इकोसिस्टम को एक बड़ा झटका दिया है। इस अपडेट के लागू होते ही कई न्यूज वेबसाइट्स के वेब ट्रैफिक में भारी गिरावट दर्ज हुई है। वहीं, यूट्यूब के क्रेअटर्स को अपनी कमाई कम या बंद होने का डर सता रहा है और इस डर को बयां करने वाले तमाम वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद हैं।
आमतौर पर जब भी कुछ नया होता है, तो डर एवं आशंकाएं जन्म लेती हैं। जो लाजमी भी हैं। हालांकि, इस बार हालात इसलिए थोड़े अलग हैं, क्योंकि AI पहले से ही हमारे मन-मस्तिष्क में भूचाल मचाए हुए है। कुछ दशक पहले जब कंप्यूटर ने हमारे कामकाज में दखल दी, तब भी ऐसी ही बेचैनी और घबराहट थी। लेकिन बाद में यह दखल सहायक ही साबित हुई। हां, हमें कंप्यूटर के अनुरूप खुद में बदलाव ज़रूर करने पड़े और बदलाव प्रकृति का नियम है। सरल शब्दों में कहें तो गूगल और यूट्यूब के पॉलिसी अपडेट भले ही अभी चिंताजनक लग रहे हों, लेकिन यह एक बेहतर और सार्थक कल के लिए ज़रूरी हैं। बस ज़रूरत इन्हें समझने और इनके अनुरूप बदलाव करने की है।
सबसे पहले बात करते हैं, न्यूज वेबसाइट्स की। जब से पत्रकारिता अखबारों से निकलकर डिजिटल हुई है, उसका स्वरूप कुछ हद तक विकृत हुआ है। एक जैसी और अमूमन तथ्यविहीन खबरों की बाढ़ आई हुई है। ग्राउंड रिपोर्टिंग और ओरजिनल कंटेंट की भूख लगातार कम होती जा रही है। 'Jack of all trades, master of none' को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है, जबकि 'Jack of all trades, master of one' पर फोकस होना चाहिए। अधिकांच न्यूज पोर्टल्स पर एक ही व्यक्ति यानी एक ट्रेनी या सब एडिटर हेल्थ, बिज़नेस, साइंस, क्लाइमेट, एस्ट्रो सहित लगभग कर विषय पर ज्ञान दे रहा है यानी खबर लिख रहा है।
एक पुरानी कहावत है - कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा। आजकल खबरें ऐसे ही तैयार हो रही हैं। कुछ इस साइट से, कुछ उस साइट से उठाया, शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा और अपनी वेबसाइट पर चस्पा कर दिया। जिन खबरों पर आमतौर पर ट्रैफिक आता है, उन्हें बार-बार हल्के-फुल्के बदलाव के साथ पब्लिश करना आज डिजिटल पत्रकारिता के लिए परंपरा बन गई है। इसमें नया या ओरजिनल कहां है? और क्या ऐसे कंटेंट की कोई ऑथेंटेसिटी है?
गूगल भी यही सवाल पूछ रहा है। गूगल के पॉलिसी अपडेट में मुख्यतौर पर तीन बिन्दुओं पर जोर दिया गया है। ओरजिनल एवं ऑथेंटिक कंटेंट, AI का सीमित इस्तेमाल और ग्राउंड रिपोर्टिंग। AI के आने के बाद से जहां घबराहट है। वहीं, कंटेंट क्रिएशन से जुड़े लोगों का काम आसान भी हुआ है। कोई न्यूज़ लिखवानी हो या फिर कोई लेख तैयार करना हो, AI पलक झपकते ही सबकुछ कर देता है। लेकिन सवाल फिर वही है कि इसमें ओरजिनेलिटी या ऑथेंटेसिटी कहां है? AI आपकी-हमारी तरह दिमाग नहीं चला सकता, वह केवल पहले से मौजूद कंटेंट में डुबकी लगाकर सबसे बेहतरीन आउटपुट हमारे सामने पेश कर सकता है।
गूगल चाहता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स AI को कंटेंट क्रिएशन के टूल के रूप में नहीं बल्कि शोध के हथियार के रूप में इस्तेमाल करें। कुल मिलाकर कहें तो गूगल की नई पॉलिसी डिजिटल पब्लिशिंग इकोसिस्टम के शुद्धिकरण की तरह है और यह पूरी तरह से पाठक एवं दर्शकों के पक्ष में है। मतलब साफ है कि अब अगर आपको सर्वाइव करना है, तो समझौते वाली पत्रकारिता नहीं चलेगी यानी बिना एक्सपर्टीज के भी विषय पर लिख देना।
अब ऐसे पत्रकार और संपादकों की ज़रूरत होगी, जिनके DNA में कॉपी-पेस्ट नहीं बल्कि ओरजिनेलिटी है, जो हमेशा कुछ नया करना चाहते हैं और जिनमें तथ्यों को परखने की क्षमता है। ये बात ज़रूर है कि वेबसाइट्स का ट्रैफिक गिरने से मीडिया कंपनियों का रिवेन्यू घटेगा और परिणामस्वरूप नौकरियों पर कैंची चलेगी। संभव है कि 100 लोगों की टीम आने वाले दिनों में 50 सदस्यों में बदल जाए। लेकिन इस स्क्रूटनी से टैलेंट और नॉन टैलेंट का पता चलेगा। केवल वही लोग बचेंगे, जो वास्तव में टैलेंटेड हैं और कम से कम jack of all trades, master of one की धारणा पर विश्वास करते हैं।
यूट्यूब की बात करें, तो वहां भी AI जनरेटेड कंटेंट की बाढ़ है। AI ने हर किसी यूट्यूबर बना दिया है। आवाज से लेकर आईडिया और वीडियो तक, सबकुछ AI से हो रहा है। गूगल की तरह यूट्यूब भी यही चाहता है कि ओरजिनेलिटी पर फोकस हो और AI का इस्तेमाल एक सीमित दायरे में किया जाए। यानी एक तरह से यहां भी शुद्धिकरण की शुरुआत हो चुकी है। बिना मेहनत और दिमाग चलाये यूट्यूब से कमाई करने वालों को अब अपनी आदत बदलनी होगी या फिर कोई नया ठिकाना तलाशना होगा। लिहाजा उन लोगों को घबराने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है, जो टैलेंटेड हैं और सफलता के लिए शॉर्टकट में विश्वास नहीं रखते।
इसी तरह, विज्ञापन एजेंसियों में भी AI को लेकर घबराहट है। वह इसलिए कि अब उनके लिए क्लाइंट्स को 'मूर्ख' बनाना आसान नहीं होगा। दरअसल, अधिकांश ऐड एजेंसियां क्लाइंट से प्रति घंटे के हिसाब से चार्ज करती हैं और ये घंटे कितने लंबे होंगे, इसका निर्धारण भी उन्हीं के हाथ होता है। AI के आने से क्लाइंट को भी इसका अंदाजा हो गया है कि कोई काम कितनी देर में पूरा हो सकता है। ऐसे में उनके लिए क्लाइंट को कन्वेंस करना पहले से ज्यादा मुश्किल हो जाएगा। संभव है कि इससे उनकी बिलिंग में गिरावट हो और नतीजतन नौकरियों पर कैंची चलानी पड़े।
कुल मिलाकर देखें तो पूरा ईकोसिस्टम एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है और यह बदलाव एक बेहतर कल का निर्माण करेगा। यहां केवल वही टिक पाएगा, जो वास्तव में टैलेंट से लैस है। डीपफेक जैसे टैलेंट वालों की कोई जगह नहीं होगी। यह समय चिंता या घबराहट में डूबने का नहीं है, बल्कि बदलाव का हिस्सा बनकर खुद को और बेहतर बनाने का है। यदि AI को स्किल अपग्रेड करने का जरिया बनाया जाए, तो आगे का सफर बेहद आसान हो सकता है।
पीडब्लूसी की ग्लोबल एआई जॉब्स बैरोमीटर 2025 रिपोर्ट बताती है कि इंसानों को पहले से ज्यादा वैल्यूएबल बना रहा है। बशर्ते, आप इसके लिए तैयार हों। रिपोर्ट में AI से जुड़े मिथकों को दूर करने का प्रयास किया गया है। मसलन, 2022 से अब तक, जहां एआई को तेजी से अपनाया गया, वहां प्रोडक्टिविटी 4 गुना तक बढ़ी है। इतना ही नहीं, जिन इंडस्ट्रीज में AI सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा, वहां सैलरी दोगुनी रफ्तार से बढ़ रही है। इसी तरह, AI के इस्तेमाल वाले क्षेत्रों में 2019 से 2024 के बीच 38% नई नौकरियां आईं। लिहाजा, कहा जा सकता है कि AI के आने के बाद जितने बदलाव हुए या हो रहे हैं, उनके परिणाम अच्छे ही होंगे। ठीक वैसे ही जैसे कंप्यूटर के मामले में हुए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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